परमेश्वर के दैनिक वचन | "एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है" | अंश 348

मनुष्य का प्रबंधन करना मेरा कार्य है, और मेरे द्वारा उसे जीत लिया जाना और भी अधिक कुछ चीज़ है जो तब नियत की गई थी जब मैंने संसार की रचना की थी। हो सकता है कि लोग नहीं जानते हों कि अंत के दिनों में मैं उन्हें पूरी तरह से जीत लूँगा और हो सकता है कि वे इस बारे में भी अनजान हों कि मानवजाति में से विद्रोही लोगों को जीत लेना ही शैतान को मेरे द्वारा हराने का प्रमाण है। परन्तु जब मेरा शत्रु मेरे साथ संघर्ष में शामिल हुआ, तो मैंने उसे पहले से ही बता दिया था कि मैं उन सभी को जिन्हें शैतान ने बंदी बना लिया था और अपनी संतान बना लिया था और उसके घर की निगरानी करने वाले उसके वफादार सेवकों को जीतने वाला बनूँगा। जीतने का मूल अर्थ है—परास्त करना, अपमान के अधीन करना है। इस्राएलियों की भाषा में, इसका अर्थ पूरी तरह से परास्त करना, नष्ट करना, और मेरे विरुद्ध आगे विद्रोह करने में अक्षम कर देना है। परन्तु आज जैसे कि तुम लोगों के बीच उपयोग किया जाता है, इसका अर्थ है जीतना। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि मेरा अभिप्राय मानवजाति से शैतान को पूरी तरह से समाप्त और निकाल बाहर करना है, ताकि वह मेरे विरुद्ध अब और विद्रोह न कर सके, मेरे कार्य में अवरोध उत्पन्न करने या उसे अस्तव्यस्त करने के लिए तो दम भी न ले सके। इस प्रकार, जहाँ तक मनुष्य का सवाल है, इसका अर्थ जीतना हो गया है। शब्द के चाहे कुछ भी अर्थ हों, मेरा कार्य मानवजाति को हराना है। क्योंकि, जबकि यह सत्य है कि मानवजाति मेरे प्रबंधन में एक अनुबंध है, परन्तु सटीक रूप से कहें तो, मानवजाति मेरी शत्रु के अलावा अन्य कुछ नहीं है। मानवजाति वह बुराई है जो मेरा विरोध और मेरी अवज्ञा करती है। मानवजाति मेरे द्वारा श्रापित दुष्ट की संतान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। मानव जाति उस प्रधान दूत के वंशज के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है जिसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। मानव जाति उस शैतान की विरासत के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है जो बहुत पहले ही मेरे द्वारा ठुकराया गया, हमेशा से मेरा कट्टर विरोधी शत्रु रहा है। समस्त मानवजाति के ऊपर का आसमान, स्पष्टता की अधिक जगमगाहट के बिना, झुका हुआ, उदास और अँधकारमय है, और मानव दुनिया स्याह अंधेरे में डूबी हुई है, जिससे कि उसमें रहने वाला कोई भी व्यक्ति जब अपना सिर उठाता है तो यहाँ तक कि अपने चेहरे के सामने फैले हाथ को या सूरज को भी नहीं देख सकता है। उसके पैरों के नीचे की कीचड़दार और गड्ढों से भरी सड़क घुमावदार और टेढ़ी-मेढ़ी है; पूरी जमीन पर लाशें बिखरी हुई हैं। अँधेरे कोने मृतकों के अवशेषों से भरे पड़े हैं और ठण्डे और छाया वाले कोनों में दुष्टात्माओं की भीड़ ने अपने निवास बना लिया है। मनुष्यों के संसार में हर कहीं में, दुष्टात्माएँ जत्थों में आती-जाती रहती हैं। सभी तरह के जंगली जानवरों की गन्दगी से ढकी हुई संतानें भीषण संघर्ष में उलझी हुई हैं, जिनकी आवाज़ दिल में दहशत पैदा करती है। ऐसे समयों में, इस तरह के संसार में, एक ऐसे "सांसारिक स्वर्ग" में, कोई कहाँ जीवन के आनंद की खोज करने जाता है? अपने जीवन की मंजिल की खोज करने के लिए कोई कहाँ जाएगा? मानवजाति, जो बहुत पहले से शैतान के पैर के नीचे रौंद दी गयी है, शुरू से ही शैतान की छवि की अभिनेता—उससे भी अधिक, शैतान का मूर्त रूप रही है, जो उस साक्ष्य के काम आ रही है "जो जोर से और स्पष्ट रूप से शैतान की गवाही देती है"। ऐसी मानवजाति, ऐसे अधम मैल का ढेर, या इस भ्रष्ट मानव परिवार की ऐसी संतान, कैसे परमेश्वर की गवाही दे सकती हैं? मेरी महिमा कहाँ से आती है? कोई मेरी गवाही के बारे में बोलना कहाँ से शुरू कर सकता है? क्योंकि उस शत्रु ने, जो मानवजाति को भ्रष्ट करके मेरे विरोध में खड़ा है, पहले ही मानव जाति को दबोच लिया है—उस मानव जाति को जिसे मैंने बहुत समय पहले बनाया था और जो मेरी महिमा और मेरे जीवन से भरी थी—और उन्हें दूषित कर दिया है। इसने मेरी महिमा को छीन लिया है और इसने मनुष्य को जिस चीज़ से भर दिया है वह शैतान की कुरूपता की मिलावट वाला ज़हर, और अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष के फल का रस है। आरंभ में, मैंने मानवजाति का सृजन किया, अर्थात्, मैंने मानवजाति के पूर्वज, आदम का सृजन किया। वह उत्साह से भरपूर, जीवनक्षमता से भरपूर, रूप और छवि से सम्पन्न था, और उससे बढ़कर, वह मेरी महिमा के साहचर्य में था। यह महिमामय दिन था जब मैंने मनुष्य का सृजन किया। उसके बाद, आदम के शरीर से हव्वा को बनाया गया था, वह भी मनुष्य की पूर्वज थी, और इस प्रकार जिन लोगों का मैंने सृजन किया था वे मेरी श्वास से भर गए थे और मेरी महिमा से भरपूर हो गए थे। आदम को मूल रूप से मेरे हाथों के द्वारा बनाया गया था और वह मेरी छवि का प्रतिनिधित्व था। इसलिए "आदम" का मूल अर्थ था मेरे द्वारा सृजन किया गया ऐसा प्राणी, जो मेरी प्राणाधार ऊर्जा से भरा हुआ, मेरी महिमा में भरा हुआ, रूप और छवि वाला, आत्मा और श्वास वाला था। आत्मा से सम्पन्न, वह ही एकमात्र सृजन किया गया प्राणी था जो मेरा प्रतिनिधित्व करने, मेरी छवि को धारण करने, और मेरी श्वास को प्राप्त करने में सक्षम था। आरंभ में, हव्वा दूसरी ऐसी मानव थी जो श्वास से सम्पन्न थी जिसके सृजन का मैंने आदेश दिया था, इसलिए "हव्वा" का मूल अर्थ था, एक सृजन किया गया प्राणी जो मेरी महिमा को जारी रखेगा जो मेरी प्राण शक्ति से भरा हुआ है और उससे भी अधिक मेरी महिमा से भरपूर संपन्न है। हव्वा आदम से आई, इसलिए उसने भी मेरा रूप धारण किया, क्योंकि वह मेरी छवि में सृजन की जाने वाली दूसरी मानव थी। "हव्वा" का मूल अर्थ आत्मा, देह और हड्डी, मेरी दूसरी गवाही और साथ ही मानवजाति के बीच मेरी दूसरी छवि वाली एक जीवित प्राणी थी। वे मानवजाति के पूर्वज, मनुष्य का शुद्ध और बहुमूल्य खजाना थे, और शुरू से, ऐसे प्राणी थे जो आत्मा से सम्पन्न थे। हालाँकि, दुष्ट लोगों ने मानवजाति के वंशज की संतान को दबोच लिया और उन्हें कुचल दिया और उन्हें बंदी बना लिया, और मानव संसार को पूर्णतः अंधकार में डुबा दिया, और इसे ऐसा बना दिया कि संतान मेरे अस्तित्व में अब और विश्वास नहीं करती है। और अधिक घिनौना यह है कि जैसे ही दुष्ट, लोगों को भ्रष्ट करता और उन्हें कुचलता है, तो यह मेरी महिमा, मेरी गवाही, प्राणशक्ति जो मैंने उन्हें प्रदान की थी, वह श्वास और जीवन जो मैंने उनमें डाला था, मानव संसार में मेरी समस्त महिमा, और हृदय का समस्त रक्त जो मैंने मानवजाति पर व्यय किया था उन सब को भी क्रूरतापूर्वक छीन लेता है। मानवजाति अब और प्रकाश में नहीं है, और उसने वह सब कुछ खो दिया है जो मैंने उसे प्रदान किया था, उस महिमा को भी फ़ेंक दिया जो मैंने उसे प्रदान की थी। वे कैसे अभिस्वीकृत कर सकते हैं कि मैं सभी सृजन किए गए प्राणियों का प्रभु हूँ? वे स्वर्ग में मेरे अस्तित्व में कैसे विश्वास करते रह सकते हैं? वे कैसे पृथ्वी पर मेरी महिमा की अभिव्यक्तियों की खोज कर सकते हैं? ये पोते और पोतियाँ उस परमेश्वर पर कैसे कब्ज़ा कर सकते हैं जिसका उनके पूर्वज ऐसे प्रभु के रूप में आदर करते थे जिसने उनका सृजन किया था? इन दयनीय पोते और पोतियों ने उस महिमा, छवि, और साथ ही गवाही जो मैंने आदम और हव्वा को प्रदान की थी, और साथ ही उस जीवन को जो मैंने मानवजाति को प्रदान किया था और अस्तित्व में रहने के लिए जिस पर वे निर्भर हैं, को उदारता से दुष्ट को "प्रस्तुत कर दिया", और, दुष्ट की उपस्थिति का ज़रा सा भी विचार न करते हुए, मेरी सारी महिमा उसे दे दी। क्या यह "मल" की उपाधि का स्रोत नहीं है? ऐसी मानवजाति, ऐसे दुष्ट राक्षस, ऐसी चलती-फिरती लाशें, ऐसी शैतान की आकृतियाँ, मेरे ऐसे शत्रु मेरी महिमा से कैसे सम्पन्न हो सकते हैं? मैं मनुष्यों से अपनी महिमा को वापिस ले लूँगा, अपनी गवाही को जो मनुष्यों के बीच अस्तित्व में है, और उस सब को जो कभी मेरा था और जिसे मैंने बहुत पहले मानवजाति को दे दिया था, वापस ले लूँगा—मैं मानवजाति को पूरी तरह से जीत लूँगा। हालाँकि, तुम्हें पता होना चाहिए, कि जिन मनुष्यों का मैंने सृजन किया था वे पवित्र मनुष्य थे जो मेरी छवि और मेरी महिमा को धारण करते थे। वे शैतान से संबंधित नहीं थे, न ही वे इससे कुचले जाने के अधीन थे, बल्कि, शैतान के ज़रा से भी ज़हर से मुक्त, शुद्ध रूप से मेरी ही अभिव्यक्ति थे। और इसलिए, मैं मानवजाति को जानने देता हूँ कि मैं सिर्फ़ उसे चाहता हूँ कि जो मेरे हाथों द्वारा सृजित है, जो पवित्र व्यक्ति हैं, जिन्हें मैं प्रेम करता हूँ और जो किसी अन्य सत्त्व से संबंधित नहीं हैं। इससे अतिरिक्त, मैं उनमें आनंद लूँगा और उन्हें अपनी महिमा के रूप में मानूँगा। हालाँकि, जो मैं चाहता हूँ यह वह मानवजाति नहीं है जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है, जो आज शैतान से संबंधित है, और जो अब मेरा मूल सृजन नहीं है। क्योंकि मैं अपनी उस महिमा को वापस लेना चाहता हूँ जो मानव संसार में विद्यमान है, इसलिए मैं शैतान को पराजित करने में अपनी महिमा के प्रमाण के रूप में, मानवजाति के शेष उत्तरजीवियों पर पूर्ण विजय प्राप्त करूँगा। मैं सिर्फ़ अपनी गवाही को, अपनी आनंद की वस्तु के रूप में, अपना स्वयं का निश्चित रूप धारण करने के रूप में लेता हूँ। यह मेरी इच्छा है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है" | अंश 260

जो भी इस संसार में आता है उसे जीवन और मृत्यु का अनुभव करना आवश्यक है, और कई लोगों ने मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र का अनुभव किया है। जो जीवित...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार" | अंश 104

मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि देहधारण का अर्थ यीशु के कार्य में पूर्ण नहीं हुआ था? क्योंकि वचन पूरी तरह से देहधारी नहीं हुआ? यीशु ने जो किया वह...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में" | अंश 419

परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने से अधिक महत्वपूर्ण कदम कोई नहीं है। यह वह सबक है, जिसमें...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में" | अंश 277

उस समय यीशु के कथन एवं कार्य सिद्धान्त को थामे हुए नहीं थे, और उसने अपने कार्य को पुराने नियम की व्यवस्था के कार्य के अनुसार सम्पन्न नहीं...