परमेश्वर के दैनिक वचन | "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" | अंश 562

परमेश्वर के वचनों के सच्चे अर्थ की वास्तविक समझ पाना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोच : "मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई मेरी व्याख्या को अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर के वचनों को समझता हूँ।" यह परमेश्वर के वचनों को समझने के समान नहीं है। यदि तूने परमेश्वर के कथनों के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तूने उसके वचनों के वास्तविक अर्थ को महसूस किया है, यदि तू उसके वचनों के पीछे के इरादे को और वे अंततः जो प्रभाव प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकता है, तो एक बार इन सब बातों की स्पष्ट समझ हो जाने पर, यह माना जा सकता है कि तुम्हारे पास कुछ अंश तक परमेश्वर के वचनों की समझ है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तू परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की एक लच्छेदार व्याख्या दे सकता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि तू इन्हें समझता है। तू चाहे उनके शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर पाये, तेरी व्याख्या तब भी मनुष्य की कल्पना और उसके सोचने के तरीके पर आधारित होगी। यह बेकार है! तुम परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ सकते हो? मुख्य बात है कि उनके भीतर से सत्य को खोजना; केवल तभी तुम सच में समझ पाओगे कि परमेश्वर क्या कहता है। जब भी परमेश्वर बोलता है, तो वह निश्चित रूप से केवल सामान्यताओं में बात नहीं करता है। उसके द्वारा कथित प्रत्येक वाक्य के भीतर ऐसे विवरण होते हैं जो परमेश्वर के वचनों में निश्चित रूप से प्रकट किए जाने हैं, और वे अलग तरीके से व्यक्त किये जा सकते हैं। जिस तरीके से परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। परमेश्वर के कथन बहुत गहरे हैं और मनुष्य के सोचने के तरीके के माध्यम से उसे समझा नहीं जा सकता है। जब तक लोग प्रयास करते रहेंगे, तब तक वे सत्य के हर पहलू का पूरा अर्थ समझ सकते हैं; अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम इन्हें अनुभव कर सकते हो, शेष बचा विवरण पूरी तरह से तब भर दिया जाएगा जब पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, इस प्रकार वह तुम्हें इन ठोस अवस्थाओं की समझ देगा। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचनों को समझना, उन्हें पढ़ने के द्वारा उनकी विशिष्ट सामग्री को ढूंढना। दूसरा हिस्सा अनुभव के माध्यम से और पवित्र आत्मा से प्रबोधन प्राप्त करके परमेश्वर के वचनों के निहितार्थ को समझना है। मुख्य रूप से इन दोनों तरीकों से ही परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ हासिल की जाती है। यदि तू उसके वचनों की व्याख्या शाब्दिक रूप से या अपनी स्वयं की सोच या कल्पना के चश्मे से करता है, तो परमेश्वर के वचनों की तेरी समझ वास्तविक नहीं है, भले ही तू कितनी भी वाक्पटुता से इनकी व्याख्या कर सकता हो। यह संभव है कि तू संदर्भ से बाहर भी उनका अर्थ निकाल ले और उनका ग़लत अर्थ निकाले, यह करना और भी अधिक तकलीफ़देह है। इस प्रकार, सत्य मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों का ज्ञान हासिल करने के माध्यम से पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता प्राप्त करके प्राप्त किया जाता है। उसके वचनों के शाब्दिक अर्थ को समझना या उन्हें समझाने में सक्षम होना यह सत्य को प्राप्त करने के रूप में नहीं गिना जाता है। यदि तुझे केवल उसके वचनों की शाब्दिक व्याख्या करने की आवश्यकता होती, तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता का मतलब ही क्या होता? अगर ऐसा होता तो तुझे बस कुछ निश्चित स्तर की शिक्षा की आवश्यकता होती, और अशिक्षित काफी कठिन परिस्थितियों में होते। परमेश्वर का कार्य कुछ ऐसा नहीं है जिसे मानव मस्तिष्क द्वारा समझा जा सकता है। परमेश्वर के वचनों की एक सच्ची समझ मुख्य रूप से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता पाने पर निर्भर करती है; सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया ऐसी ही है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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