परमेश्वर के दैनिक वचन : जीवन में प्रवेश | अंश 552

यदि तुम्हें पूर्ण बनाया जाना है, तो कुछ मानदंड पूरे करने होंगे। अपने संकल्प, अपनी दृढ़ता और अपने अंतःकरण के माध्यम से और अपनी खोज के माध्यम से तुम जीवन को अनुभव करने और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में समर्थ हो जाओगे। यह तुम्हारा प्रवेश है, और ये वे चीज़ें हैं, जो पूर्णता के मार्ग पर आवश्यक हैं। पूर्णता का कार्य सभी लोगों पर किया जा सकता है। जो कोई भी परमेश्वर को खोजता है, उसे पूर्ण बनाया जा सकता है और उसके पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर और योग्यताएँ हैं। यहाँ कोई नियत नियम नहीं है। कोई व्यक्ति पूर्ण बनाया जा सकता है या नहीं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि वह क्या खोजता है। जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य को जीने में सक्षम हैं, वे निश्चित रूप से पूर्ण बनाए जाने में सक्षम हैं। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, परमेश्वर उनकी प्रशंसा नहीं करता; वे ऐसा जीवन धारण नहीं करते, जिसकी परमेश्वर माँग करता है और वे पूर्ण बनाए जाने में अक्षम हैं। पूर्णता का कार्य केवल लोगों को प्राप्त करने के वास्ते है और शैतान से युद्ध करने के कार्य का अंग नहीं है; विजय का कार्य केवल शैतान से युद्ध करने के वास्ते है, जिसका अर्थ है मनुष्य पर विजय का उपयोग शैतान को हराने के लिए करना। विजय का कार्य ही मुख्य कार्य है, नवीनतम कार्य है, ऐसा कार्य है जो सभी युगों में कभी नहीं किया गया है। कहा जा सकता है कि इस चरण के कार्य का लक्ष्य मुख्य रूप से सभी लोगों को जीतना है, ताकि शैतान को हराया जा सके। लोगों को पूर्ण बनाने का कार्य—यह नया कार्य नहीं है। देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान समस्त कार्य का मर्म सभी लोगों को जीतना है। यह अनुग्रह के युग के समान है, जब सलीब पर चढ़ने के माध्यम से संपूर्ण मानवजाति का छुटकारा मुख्य कार्य था। "लोगों को प्राप्त करना" देह में किए गए गए कार्य से अतिरिक्त था और केवल सलीब पर चढ़ने के बाद किया गया था। जब यीशु ने आकर अपना कार्य किया, तो उसका लक्ष्य मुख्य रूप से मृत्यु और अधोलोक के बंधन पर विजय प्राप्त करने के लिए, शैतान के प्रभाव पर विजय प्राप्त करने के लिए, अर्थात् शैतान को हराने के लिए अपने सलीब पर चढ़ने का उपयोग करना था। यीशु के सलीब पर चढ़ने के बाद ही पतरस एक-एक कदम उठाकर पूर्णता के मार्ग पर चला। बेशक, पतरस उन लोगों में से था, जिन्होंने तब यीशु का अनुसरण किया, जब यीशु कार्य कर रहा था, परंतु उस दौरान वह पूर्ण नहीं बना था। बल्कि, यीशु के अपना कार्य समाप्त करने के बाद उसने धीरे-धीरे सत्य को समझा और तब पूर्ण बना। देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर थोड़े-से समय में केवल कार्य के एक मुख्य, महत्वपूर्ण चरण को पूरा करने आता है, पृथ्वी पर लोगों को पूर्ण बनाने के इरादे से उनके बीच लंबे समय तक रहने के लिए नहीं। वह उस कार्य को नहीं करता। वह अपना कार्य पूरा करने के लिए उस समय तक प्रतीक्षा नहीं करता, जब तक कि मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण नहीं बना दिया जाता। यह उसके देहधारण का लक्ष्य और मायने नहीं है। वह केवल मानवजाति को बचाने का अल्पकालिक कार्य करने आता है, न कि मानवजाति को पूर्ण बनाने का अति दीर्घकालिक कार्य करने। मानवजाति को बचाने का कार्य प्रातिनिधिक है, जो एक नया युग आरंभ करने में सक्षम है। इसे एक अल्प समय में समाप्त किया जा सकता है। परंतु मानवजाति को पूर्ण बनाने के लिए मनुष्य को एक निश्चित स्तर तक लाना आवश्यक है; ऐसे कार्य में लंबा समय लगता है। यह वह कार्य है, जिसे परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाना चाहिए, परंतु यह उस सत्य की उस बुनियाद पर किया जाता है, जिसके बारे में देह में कार्य के दौरान बोला गया था। इसे मानवजाति को पूर्ण बनाने का अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए चरवाही का दीर्घकालिक कार्य करने हेतु प्रेरितों को उन्नत करने के उसके कार्य के माध्यम से भी किया जाता है। देहधारी परमेश्वर इस कार्य को नहीं करता। वह केवल जीवन के मार्ग के बारे में बोलता है, ताकि लोग समझ जाएँ, और वह मानवजाति को केवल सत्य प्रदान करता है, सत्य का अभ्यास करने में लगातार मनुष्य के साथ नहीं रहता, क्योंकि यह उसकी सेवकाई के अंतर्गत नहीं है। इसलिए वह मनुष्य के साथ उस दिन तक नहीं रहेगा, जब तक कि मनुष्य सत्य को पूरी तरह से न समझ ले और सत्य को पूरी तरह से प्राप्त न कर ले। देह में उसका कार्य तभी समाप्त हो जाता है, जब मनुष्य परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर औपचारिक रूप से प्रवेश कर लेता है, जब मनुष्य पूर्ण बनाए जाने के सही मार्ग पर कदम रख लेता है। यह भी वास्तव में तब होगा, जब परमेश्वर ने शैतान को पूरी तरह से हरा दिया होगा और संसार पर विजय प्राप्त कर ली होगी। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य ने अंततः उस समय सत्य में प्रवेश कर लिया होगा या नहीं, न ही वह इस बात की परवाह करता है कि मनुष्य का जीवन बड़ा है या छोटा। इसमें से कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसका देह में उसे प्रबंधन करना चाहिए; इसमें से कुछ भी देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के अंदर नहीं है। एक बार जब वह अपना अभीष्ट कार्य पूरा कर लेगा, तो वह देह में अपने कार्य का समापन कर देगा। इसलिए, जो कार्य देहधारी परमेश्वर करता है, वह केवल वही कार्य है, जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, यह उद्धार का अल्पकालिक कार्य है, ऐसा कार्य नहीं है जिसे वह पृथ्वी पर दीर्घकालिक आधार पर करेगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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