परमेश्वर के दैनिक वचन | "मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं" | अंश 551

पहचानने की योग्यता रखना, अधीनता में रहना, और चीज़ों को समझने की योग्यता रखना ताकि तुम आत्मा में प्रखर हो, इसका अर्थ है कि जैसे ही तुम्हारा सामना किसी बात से होता है, तब परमेश्वर के वचन तुम्हें भीतर से रोशन और प्रबुद्ध करते हैं। यही आत्मा में प्रखर होना है। हर बात जो परमेश्वर करता है, वह लोगों की आत्माओं को पुनर्जीवित करने में उनकी सहायता करने के लिए है। परमेश्वर सर्वदा क्यों कहता रहता है कि लोग सुन्न और मन्द-बुद्धि हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों की आत्माएँ मर चुकी हैं, और वे इस सीमा तक सुन्न हो चुके हैं कि वे आत्मा की बातों के लिए पूर्णत: अचेत हो गए हैं। परमेश्वर का कार्य, लोगों के जीवनों की उन्नति कराने और लोगों की आत्माओं को जीवित करने में सहायता करने के लिए है, जिससे वे आत्मा की बातों को समझ सकें और सर्वदा अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने में समर्थ रहें। इस चरण पर पहुँचना यह दर्शाता है कि उस व्यक्ति की आत्मा पुनर्जीवित कर दी गई है, और अगली बार जब वह किसी बात का सामना करता है, वह उसी समय प्रतिक्रिया कर सकता है। वह उपदेशों के प्रति प्रतिक्रिया देता है और परिस्थितियों के प्रति अतिशीघ्र प्रतिक्रिया करता है। यही आत्मा की प्रखरता प्राप्त करना है। ऐसे अनेक लोग हैं, जिनकी बाहरी घटना के प्रति अतिशीघ्र प्रतिक्रिया होती है, परन्तु जैसे ही वास्तविकता में प्रवेश, या आत्मा की विस्तृत बातों का उल्लेख किया जाता है, तो वे सुन्न और मन्द-बुद्धि बन जाते हैं। वे तभी कुछ समझते हैं, जब यह उनके बिलकुल सामने हो। ये सभी आत्मिक रीति से सुन्न और मन्द-बुद्धि होने और आत्मा की बातों का कम अनुभव रखने के चिह्न हैं। कुछ लोग आत्मा में प्रखर होते हैं और पहचानने की योग्यता रखते हैं। जैसे ही वे अपनी अवस्था बताने वाले वचनों को सुनते हैं, तो वे समय व्यर्थ किए बिना जल्दी से इसे लिख लेते हैं। एक बार जब वे अभ्यास के सिद्धांतों के बारे में सुन लेते हैं, तो वे इसे स्वीकारने लगते हैं और इसे अपने अनुवर्ती अनुभव में लागू करने में समर्थ हो जाते हैं और इस तरह स्वयं को परिवर्तित करते हैं। यह एक ऐसा व्यक्ति है जो आत्मा में प्रखर है। और वह अतिशीघ्र प्रतिक्रिया करने में क्यों समर्थ है? क्योंकि वह प्रतिदिन के जीवन में इन बातों पर ध्यान लगाता है। जब ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे इससे तुलना कर अपनी अवस्था को जाँचने में और खुद पर मंथन करने में समर्थ होते हैं। जब वे सहभागिता, उपदेश, और ऐसे वचन सुनते हैं जो उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करते हैं, वे इन्हें तुरंत ग्रहण करने के योग्य होते हैं। यह एक भूखे व्यक्ति को भोजन प्रदान करने के समान है; वे उसी समय खाने में समर्थ होते हैं। यदि तुम किसी व्यक्ति को भोजन दो जो भूखा नहीं है, तो वो अतिशीघ्र प्रतिक्रिया नहीं करेगा। तुम प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, और जब तुम्हारा सामना किसी बात से होता है, तब तुम तुरन्त प्रतिक्रिया करने के योग्य होते हो : इस विषय में परमेश्वर क्या अपेक्षा करता है, और तुम्हें कैसे कार्य करना चाहिए। पिछली बार इस विषय में परमेश्वर ने तुम्हारा मार्गदर्शन किया था; जब आज तुम इसी प्रकार के विषय का सामना करते हो, तो स्वाभाविक रूप से तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए तुम्हें किस तरह अभ्यास करना है। यदि तुम सर्वदा इसी रीति से अभ्यास करते हो और इसी रीति से अनुभव करते हो, तो एक बिन्दु पर जा कर तुम इसमें माहिर बन जाओगे। परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते हुए तुम जानते हो परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति की ओर संकेत कर रहा है, तुम जानते हो कि वह आत्मा की किन प्रकार की परिस्थितियों की बात कर रहा है, और तुम मुख्य बात समझ लेने और इसे अभ्यास में लाने के योग्य होते हो; यह दिखाता है कि तुम अनुभव करने के योग्य हो। इस विषय में कुछ लोगों में कमी क्यों होती है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अभ्यास करने के पहलू पर अधिक प्रयास नहीं करते हैं। यद्यपि वे सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होते हैं, उनमें सेवा की विस्तृत जानकारी की, उनके जीवन के सत्य की विस्तृत जानकारी की सच्ची अन्तर्दृष्टि नहीं होती है। जब कुछ घटित हो जाता है तो वे भ्रमित हो जाते हैं। इस रीति से, जब कोई झूठा नबी या एक झूठा शिष्य सामने आता है तो तुम्हें पथभ्रष्ट किया जा सकता है। तुम्हें अक्सर परमेश्वर के वचनों और कार्य पर सहभागिता करनी चाहिए—केवल इसी तरह तुम सत्य को समझने में और पहचानने की योग्यता विकसित करने में समर्थ होगे। अगर तुम सत्य नहीं समझते, तो तुममें पहचानने की योग्यता नहीं होगी। उदाहरण के लिए, परमेश्वर क्या बोलता है, परमेश्वर कैसे कार्य करता है, लोगों से उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं, तुम्हारा सम्पर्क किस प्रकार के लोगों से होना चाहिए और तुम्हें किस प्रकार के लोगों को अस्वीकार करना चाहिए—तुम्हें अक्सर इन बातों पर सहभागिता करनी चाहिए। यदि तुम सर्वदा परमेश्वर के वचनों का इसी रीति से अनुभव करो, तो तुम सत्य और अनेक बातों को पूरी तरह से समझ जाओगे और तुम्हें पहचानने की योग्यता भी प्राप्त होगी। पवित्र आत्मा के द्वारा अनुशासन क्या है, मनुष्य की इच्छा से जन्मा दोष क्या है, पवित्र आत्मा की ओर से मार्गदर्शन क्या है, किसी वातावरण का प्रबन्ध क्या है, परमेश्वर के वचनों का भीतर से प्रबुद्ध करना क्या है? यदि तुम इन बातों के विषय में ही स्पष्ट नहीं हो, तो तुम्हारे पास पहचानने की योग्यता नहीं होगी। तुम्हें जानना चाहिए पवित्र आत्मा की ओर से क्या आता है, विद्रोही स्वभाव क्या है, परमेश्वर के वचन का पालन कैसे करें, और अपने विद्रोहीपन को कैसे उतार फेंकें; अगर तुम्हारे पास इन बातों की अनुभवजन्य समझ होगी, तो तुम्हारे पास एक आधार होगा; जब कुछ घटित होगा, तो तुम्हारे पास उपयुक्त सत्य होगा जिससे तुलना कर तुम इसे माप सकते हो, आधार के रूप में उपयुक्त दर्शन होंगे। प्रत्येक चीज़ जो तुम करते हो उसमें तुम्हारे पास सिद्धान्त होंगे और तुम सत्य के अनुसार कार्य करने के योग्य होगे। तब तुम्हारा जीवन परमेश्वर की प्रबुद्धता और परमेश्वर की आशीषों से परिपूर्ण होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी व्यक्ति से अनुचित व्यवहार नहीं करेगा, जो निष्ठा से उसे खोजता है या जो उसे जीता और उसकी गवाही देता है, और वह ऐसे किसी भी व्यक्ति को शाप नहीं देगा जो दिल से सत्य का प्यासा होने के योग्य है। यदि परमेश्वर के वचन को खाने-पीने के दौरान, तुम अपनी वास्तविक स्थिति, अपने अभ्यास, और अपनी समझ पर ध्यान दे सकते हो, तब जब तुम्हारा सामना किसी समस्या से होगा, तुम प्रबुद्धता प्राप्त करोगे, तुम व्यावहारिक समझ प्राप्त करोगे। तब सब बातों में तुम्हारे पास अभ्यास का एक मार्ग और पहचानने की योग्यता होगी। एक व्यक्ति, जिसके पास सत्य है, उसे धोखा देना असंभव है और उसका अशान्ति से व्यवहार करना या अधिकता वाला कार्य करना असंभव है। सत्य के कारण वह सुरक्षित है, और सत्य के कारण ही वह और अधिक समझ प्राप्त करता है। सत्य के कारण अभ्यास के लिए उसके पास अधिक मार्ग हैं, पवित्र आत्मा के द्वारा उसमें कार्य करने के लिए और पूर्ण होने के लिए वह अनेक सुअवसर प्राप्त करता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर उन्हें आशीष देता है जो सच्चे मन से सत्य का अनुसरण करते हैं

पवित्र आत्मा का अनुशासन क्या है? इंसानी इच्छा से उपजा दोष क्या है? पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन क्या है? परिवेश की व्यवस्था क्या है? ईश-वचन भीतर क्या प्रबुद्ध करते हैं? अगर इन बातों पर तुम न हो साफ़, तो तुममें विवेक नहीं होगा। ईश्वर उसके साथ अन्याय न करेगा जो उसे सच्चे मन से खोजे या उसके अनुरूप जीता है, उसकी गवाही देता है। वो उसे शाप नहीं देता जो सचमुच सत्य का प्यासा है।

तुम्हें जानना चाहिए आत्मा से क्या आता है, विद्रोह क्या है, ईश-वचनों का पालन कैसे करें, अपनी विद्रोहशीलता से कैसे बचें। अगर इन बातों को जान लोगे, तो तुम्हारे पास एक बुनियाद होगी। जब कुछ होगा, तो तुलना के लिए तुम्हारे पास सत्य होगा, उचित दर्शनों का आधार होगा, हर काम में तुम्हारे सिद्धांत होगा, सत्य के अनुसार तुम चलोगे, प्रबुद्ध और आशीषित होगे ईश्वर द्वारा। ईश्वर उसके साथ अन्याय न करेगा जो उसे सच्चे मन से खोजे या उसके अनुरूप जीता है, उसकी गवाही देता है। वो उसे शाप नहीं देता जो सचमुच सत्य का प्यासा है।

ईश-वचनों को खाते-पीते समय, अगर तुम अपनी असल स्थिति देखो अपने अभ्यास और अपनी समझ पर ध्यान दो, तो कोई समस्या आने पर, तुम प्रबुद्ध किए जाओगे, समझ और विवेक पाओगे, अभ्यास का मार्ग पाओगे। सत्य जिसके पास उसे धोखा देना संभव नहीं, न वो बाधा डाले, न गलत काम करे। वो सत्य के कारण सुरक्षित होता है, अधिक समझ, अभ्यास के मार्ग, पवित्र आत्मा के काम और पूर्णता के अधिक मौके पाता है। ईश्वर उसके साथ अन्याय न करेगा जो उसे सच्चे मन से खोजे या उसके अनुरूप जीता है, उसकी गवाही देता है। वो उसे शाप नहीं देता जो सचमुच सत्य का प्यासा है।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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