परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 6" | अंश 531

जैसे ही पतरस का उल्लेख होता है, प्रत्येक व्यक्ति उसकी प्रशंसा से भर जाता है, तुरन्त ही पतरस के बारे में इन कहानियों से बारे में स्मरण कराए जाते हुए—उसने किस प्रकार से तीन बार परमेश्वर को जानने के विषय में इन्कार किया और इससे भी अधिक शैतान को अपनी सेवाएं प्रदान कीं, और इस प्रकार परमेश्वर की परीक्षा ली, परन्तु अंत में उसके ही खातिर क्रूस पर उल्टा लटकाया गया इत्यादि। अब मैं तुझे यह बताने पर बहुत ही महत्व देता हूँ कि किस प्रकार से पतरस ने मेरे बारे में जाना और साथ ही साथ उसके अंतिम परिणाम के बारे में भी। पतरस नामक इस व्यक्ति के पास उत्कृष्ट क्षमता थी, परन्तु उसकी परिस्थितियां पौलुस से भिन्न थीं। उसके माता-पिता ने मुझे सताया था, वे शैतान की दुष्ट शक्तियों के अधीन थे, और इसी कारण से कोई यह नहीं कह सकता कि उन्होंने पतरस को तरीका सौंप दिया था। पतरस बुद्धि से चुस्त था, देशी बुद्धिमत्ता के साथ सम्पन्न था, बचपन से उसके माता-पिता उससे स्नेह करते थे, फिर भी, बड़े होने के बाद, वह उनका शत्रु बन गया था, क्योंकि उसने हमेशा मुझे जानने के लिए कोशिश किया, और इसी बात ने उसे अपने माता-पिता से मुँह मुड़वा दिया। यह इसलिए हुआ क्योंकि, सबसे पहले, उसने यह विश्वास किया कि स्वर्ग और पृथ्वी और उसमें की सभी वस्तुएं सर्वशक्तिमान् के हाथों में हैं, और सभी सकारात्मक बातें उसी से उत्पन्न होती हैं और सीधे उसी की ओर से आती हैं, शैतान द्वारा किसी संसाधन से गुज़रे बिना। उसके माता-पिता के द्वारा विफल हुओं की तरह कार्य करने के विपरीत उदाहरण के कारण, इससे वह मेरे प्रेम एवं दया को और भी अधिक आसानी से समझने में सक्षम हो पाया, जिससे उसके भीतर मुझे खोजने की ज्वाला और भी अधिक भड़क गई। उसने न केवल बहुत ही करीबी से मेरे वचनों को खाने और पीने पर ध्यान दिया, बल्कि मेरे इरादों को समझने के लिए और भी अधिक प्रयास किया, और वह अपने विचारों में लगातार दूरदर्शी एवं सतर्क रहा, इसलिए वह अपनी आत्मा में बहुत ही उत्सुकता से हमेशा चालाक बना रहा और वह अपने हर काम में मुझे प्रसन्न करने के योग्य रहा। साधारण जीवन में, उसने उन लोगों से पाठ सीखने पर बहुत करीबी से ध्यान दिया जो अतीत में असफल रहे थे ताकि और भी महान प्रयास के लिए अपने आप को प्रेरणा देता रहे, गहराई से भयभीत कि वह कहीं उन असफलता के जाल में गिर न जाए। उसने उन लोगों के विश्वास और प्रेम को आत्मसात करने पर भी करीब से ध्यान दिया जो युगों से परमेश्वर को प्रेम करते आ रहे थे। इस प्रकार से उसने न केवल नकारात्मक रूप में, बल्कि और भी अधिक महत्वपूर्णता से, सकारात्मक रूम में अपने विकास की प्रगति को तेज़ किया, जब तक कि वह मेरी उपस्थिति में मुझे सबसे अच्छी तरह से पहचानने वाला व्यक्ति न बन गया। इसी कारण से, इस की कल्पना करना कठिन नहीं होगा कि किस प्रकार से वह अपना सब कुछ मेरे हाथों में दे पाया, यहां तक कि खाने-पीने, कपड़े पहनने, सोने या रहने में भी वह स्वयं का स्वामी नहीं रहा, परन्तु मुझे सभी बातों में संतुष्टि प्रदान की जिस बुनियाद पर वह मेरे उपहार का आनन्द ले सका। कई बार मैंने उसे परीक्षाओं में रखा, जो वास्तव में उसे अधमरा करके छोड़ा, परन्तु इन सैकड़ों परीक्षाओं के मध्य में भी, उसने कभी भी मुझमें अपने विश्वास को नहीं छोड़ा या मुझ से उसका मोह भंग नहीं हुआ। बल्कि जब मैंने कहा कि मैंने उसे पहले से ही अलग कर दिया है, उसके दिल में निराशा नहीं आई या निराशा में नहीं पड़ गया, बल्कि पहले की ही तरह अपने सिद्धांतों का पालन जारी रखा ताकि मेरे प्रति प्रेम को महसूस कर सके। जब मैंने उससे कहा कि हालांकि उसने मुझ से प्रेम किया, मैं उसकी प्रशंसा नहीं करूँगा बल्कि अंत में मैं उसे शैतान के हाथों में दे दूँगा। इन परीक्षाओं के मध्य, जो उसके देह में नहीं पहुंची परन्तु शब्दों के द्वारा परीक्षण थे, फिर भी उसने मेरे लिए प्रार्थना की: ओह, परमेश्वर! स्वर्ग, पृथ्वी और उसके असंख्य वस्तुओं के मध्य, ऐसा कोई मनुष्य है, कोई सृष्टि है, या कोई ऐसी वस्तु है सर्वशक्तिमान, जो तेरे हाथों में न हो? जब तूने मुझे दया दिखाने के लिए इच्छा करता है, मेरा हृदय तेरी दया के कारण बहुत आनन्दित होता है, हालांकि मैं उसके अयोग्य हो सकता हूँ, मैंने तेरे रहस्यमय कार्यों को और भी अधिक महसूस किया, क्योंकि तू अधिकार और बुद्धि से परिपूर्ण है। हालांकि मेरा शरीर पीड़ित हो सकता है, मैं अपनी आत्मा में चैन से हूं। मैं तेरी बुद्धि और कार्यों की प्रशंसा क्यों न करूं? यदि मैं तुझे जानने के बाद मर भी जाऊं, तो मैं उसके लिए हमेशा तैयार और इच्छित रहूंगा। ओह, सर्वशक्तिमान! निश्चय ही ऐसा नहीं है कि तू सचमुच मुझे देखने नहीं देना चाहता है? निश्चय ही ऐसा नहीं है कि मैं सच में तेरे न्याय को प्राप्त करने के अयोग्य हूँ? क्या यह सम्भव हो सकता है कि मुझ में ऐसा कुछ है जो तू नहीं देखना चाहता? इस प्रकार की परीक्षाओं के मध्य, हालांकि पतरस भी मेरे इरादों को जानने में असफल रहा, यह स्पष्ट है कि उसने मेरे द्वारा उपयोग किए जाने को गर्व और व्यक्तिगत महिमा का विषय समझा (चाहे यह केवल मेरा न्याय पाना हो ताकि मानवता मेरी महिमा और क्रोध को देख सके), और परीक्षाओं के अधीन रखे जाने पर बिल्कुल भी निरूत्साहित नहीं हुआ। मेरी उपस्थिति में उसकी वफादारी के कारण, और उस पर मेरी आशीषों के कारण, वह हज़ारों सालों के लिए मानवजाति के लिए एक उदाहरण और आदर्श बन गया है। क्या यह ऐसा उदाहरण ठीक नहीं है जिसका तुम लोगों को अनुसरण करना चाहिए? इस समय, तुम लोगों को जोर लगा कर सोचना चाहिए और यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि क्यों मैंने तुम लोगों को पतरस का इतना लम्बा वृत्तांत दिया है। यह तुम लोगों के लिए आचार संहिता के समान होना चाहिए।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

Peter’s Attitude Toward Trials

I

Peter suffered trials, countless trials by God in his life. These tests would leave him half-dead, but his faith would never decline. Even when God said He would not praise him, and to Satan he would fall, and said He had forsaken him, he was not discouraged at all. He continued to love God in a practical way, in accordance with past principles; he continued to pray. Amid such trials, not of flesh, but of words, Peter still prayed to God.

II

“Oh, God, the Almighty, among heaven, earth and all things, in Your hands You hold all the creatures and all human beings. When You are merciful, my heart rejoices with Your mercy. When You judge me, unworthy though I may be, I gain a greater sense of Your unfathomable deeds, because You are filled with wisdom and authority. Though my flesh suffers, I am comforted in my soul. How could I not give praise to Your wisdom and deeds? Even if I were to die after knowing You, how could I not do that happily?”

III

During such trials, Peter couldn’t fully grasp God’s will, yet he was proud and he was honored to be used by Him still. Because of his loyalty, and because of God’s blessing, he has been a model to man for thousands of years. Isn’t this precisely what you should mirror? Think about why God gave such a lengthy account of Peter. These should be the principles of your behavior.

from Follow the Lamb and Sing New Songs

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