परमेश्वर के दैनिक वचन | "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" | अंश 475

परमेश्वर में किसी मनुष्य के विश्वास की अत्यंत मूलभूत आवश्यकता यह है कि उसके पास एक सच्चा हृदय हो, और यह कि वह स्वयं को पूरी तरह से समर्पित कर दे, एवं सचमुच में आज्ञा का पालन करे। जो चीज़ किसी मनुष्य के लिए सबसे अधिक कठिन है वह है सच्चे विश्वास के बदले में अपना संपूर्ण जीवन प्रदान करना, जिसके माध्यम से वह सारी सच्चाई को अर्जित कर सकता है, और परमेश्वर के एक जीवधारी के रूप में अपने कर्तव्य को निभा सकता है। यह वह है जिसे उन लोगों के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है जो असफल हो गए हैं, और उनके द्वारा इसे अर्जित करना और भी ज़्यादा कठिन है जो मसीह को नहीं पा सकते हैं। क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति स्वयं को पूरी रीति से समर्पित करने में अच्छा नहीं है; क्योंकि मनुष्य सृष्टिकर्ता के प्रति अपने कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि मनुष्य ने सत्य को देखा तो है किन्तु उसे टालता है और अपने स्वयं के पथ पर चलता है, क्योंकि मनुष्य हमेशा उन लोगों के पथ का अनुसरण करके कोशिश करता है जो असफल हो चुके हैं, क्योंकि मनुष्य हमेशा स्वर्ग की अवहेलना करता है, इस प्रकार, मनुष्य हमेशा असफल हो जाता है, उसे हमेशा शैतान के छल द्वारा ठग लिया जाता है, और स्वयं के जाल में फंस जाता है। क्योंकि मनुष्य मसीह को नहीं जानता है, क्योंकि मनुष्य सत्य को समझने एवं अनुभव करने में निपुण नहीं है, क्योंकि मनुष्य पौलुस का परम आराधक है और स्वर्ग का अत्यंत लोभी है, क्योंकि मनुष्य हमेशा मांग कर रहा है कि मसीह उसकी आज्ञा माने और परमेश्वर के विषय में आदेश दे रहा है, इस प्रकार ऐसे बड़े शख्स और ऐसे लोग जिन्होंने संसार के उतार-चढ़ाव का अनुभव किया है वे अभी भी नश्वर हैं, और परमेश्वर की ताड़ना के मध्य अब भी मरते हैं। ऐसे लोगों के विषय में मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि वे एक दुखद मौत मरते है, और यह कि उनका परिणाम—उनकी मृत्यु—आंकलन किए बगैर नहीं होता है। क्या उनकी असफलता स्वर्ग की व्यवस्था के लिए कहीं अधिक असहनीय नहीं होती है? सत्य मानव संसार से आता है, फिर भी वह सत्य जो मनुष्य के मध्य है उसे मसीह के द्वारा पहुंचाया गया है। इसका उद्गम मसीह से होता है, अर्थात्, स्वयं परमेश्वर से, और इसे मनुष्य के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है। फिर भी मसीह सिर्फ सच्चाई ही प्रदान करता है; वह यह निर्णय लेने के लिए नहीं आता है कि मनुष्य सत्य के अपने अनुसरण (खोज) में सफल होगा या नहीं। इसका अर्थ है कि वास्तव में सफलता या असफलता मनुष्य के अनुसरण (खोज) पर निर्भर करता है। उस सत्य में मनुष्य की सफलता या असफलता का मसीह के साथ कभी कोई वास्ता नहीं होता है, बल्कि इसके बजाय इसका निर्धारण उसके अनुसरण के द्वारा होता है। मनुष्य की नियति एवं उसकी सफलता का ढेर परमेश्वर के सिर पर नहीं लगाओ, ताकि स्वयं परमेश्वर से ही इसका बोझ उठवाया जाए, क्योंकि यह स्वयं परमेश्वर का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उस कर्तव्य से सम्बन्धित है जिसे परमेश्वर के जीवधारियों को निभाना चाहिए। अधिकांश लोगों के पास पौलुस एवं पतरस की खोज एवं नियति का थोड़ा सा ज्ञान ज़रूर है, फिर भी लोग पतरस एवं पौलुस के परिणाम से बढ़कर और कुछ नहीं जानते हैं, और वे पतरस की सफलता के पीछे के रहस्य से, या उन कमियों से अनजान हैं जिसके परिणामस्वरूप पौलुस असफल हुआ। और इस प्रकार, यदि तुम लोग उनके अनुसरण के सार के आर-पार देखने में पूरी तरह से असमर्थ हो, तो तुम लोगों में से अधिकांश का अनुसरण अभी भी असफल होगा, और यदि तुम लोगों में से कुछ ही लोग सफल होगे, तो वे अब भी पतरस के बराबर नहीं होंगे। यदि तेरे अनुसरण का पथ सही पथ है, तो तेरे पास सफलता की आशा है; यदि ऐसा पथ जिस पर तूने सत्य का अनुसरण करते हुए कदम रखा है वह ग़लत पथ है, तो तू सर्वदा के लिए सफलता के अयोग्य होगा, और तू भी पौलुस के समान उसी अन्त को प्राप्त करेगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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