परमेश्वर के दैनिक वचन | "राज्य का युग वचन का युग है" | अंश 400

परमेश्वर ने निश्चय ही मनुष्यों को पूर्ण करने का निर्णय कर लिया है। वह चाहे किसी भी दृष्टिकोण से यह कहता है, सब बातें इन लोगों को पूर्ण बनाने के लिये हैं। आत्मा के दृष्टिकोण से कहे गये वचन मनुष्यों के समझने में कठिन होते हैं, और मनुष्यों को उन पर अमल करने का मार्ग नहीं मिलता, क्योंकि मनुष्य की ग्रहण करने की क्षमता सीमित है। परमेश्वर के कार्य के विभिन्न प्रभाव होते हैं और उसके कार्य के प्रत्येक चरण का एक उद्देश्य है। साथ ही मनुष्यों को पूर्ण बनाने के लिये उसे अलग-अलग दृष्टिकोण से बात करनी होगी। यदि वह केवल पवित्रात्मा के ही दृष्टिकोण से बातचीत करे, तो परमेश्वर के कार्य का यह चरण पूरा नहीं हो सकता है। उसके बात करने के ढंग से तुम जान सकते हो कि वह इस जनसमूह के लोगों को पूर्ण करने के लिये दृढ़ संकल्पित है। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें पहला कदम क्या लेना चाहिये? सबसे पहले तुम्हें परमेश्वर के काम के बारे में जानना चाहिये। क्योंकि नये-नये साधनों का उपयोग किया जा रहा है, एक युग एक दूसरे युग में बदल गया है, परमेश्वर जिन साधनों के द्वारा काम करता है वे भी बदल गये हैं, और परमेश्वर जैसे बोलता है, उसमें भी बदलाव आया है। अब न केवल परमेश्वर के कार्य के साधन बदले हैं, साथ ही साथ युग भी बदल गया है। पूर्व में यह राज्य का युग था, इसमें जो कार्य था वह परमेश्वर से प्रेम करना था। अब, यह सहस्राब्दिक राज्य का युग है—वचन का युग—अर्थात वह युग जिसमें परमेश्वर मनुष्यों को पूर्ण बनाने के लिए बहुत तरीकों से बोलता है, और मनुष्य को आपूर्ति करने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों से बोलता है। जैसे-जैसे समय सहस्राब्दिक राज्य के युग में बदला, परमेश्वर ने मनुष्यों को पूर्ण बनाने के लिये वचन का उपयोग करना आरंभ कर दिया, मनुष्यों को जीवन की वास्तविकता में प्रवेश करने योग्य बनाने लगा, और सही मार्ग पर उनकी अगुवाई करने लगा। मनुष्यों ने परमेश्वर के कार्य के बहुत से चरणों का अनुभव किया है और यह देखा है कि परमेश्वर का कार्य बिना बदले नहीं रहता। बल्कि यह कार्य लगातार बढ़ता और गहरा होता जाता है। इतने लंबे समय तक अनुभव करने के बाद, परमेश्वर का कार्य बदला है, और बार-बार बदला है, परंतु परिवर्तन चाहे जो भी हो, वह मनुष्यों में कार्य करने के परमेश्वर के उद्देश्य से अलग नहीं हुआ। यहां तक कि दस हजार परिवर्तनों के बाद भी उसका मूल उद्देश्य नहीं बदला और वह सत्य या जीवन से कभी अलग नहीं हुआ। जिन साधनों से काम किया जाता है, उनसे भी केवल कार्य के प्रारूप और बोलने के तरीके या दृष्टिकोण में परिवर्तन आया है, उसके कार्य के केन्द्रीय उद्देश्य में परिवर्तन नहीं आया है। बोलने के स्वर और कार्य के माध्यम या साधनों में परिवर्तन का उद्देश्य कार्य में प्रभावशीलता लाना है। आवाज़ के स्तर पर परिवर्तन का अर्थ कार्य के उद्देश्य या सिद्धांत में परिवर्तन करना नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करने में मनुष्य का मूल उद्देश्य जीवन खोजना है। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो परंतु जीवन या सत्य या परमेश्वर के ज्ञान की खोज नहीं करते, तब परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास नहीं है! क्या यह यथार्थवादी है कि तुम राज्य में राजा बनने के लिये प्रवेश करना चाहते हो? जीवन खोजने के द्वारा परमेश्वर के लिये सच्चे प्रेम को प्राप्त करना ही वास्तविकता है; सत्य का पीछा करना और सत्य पर अमल करना सब वास्तविकता है। उसके वचनों को पढ़ते समय परमेश्वर के वचनों का अनुभव करो; ऐसा करने पर तुम वास्तविक अनुभव के द्वारा परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करोगे। यही वास्तव में सच्चा अनुसरण है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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