सत्य का अनुसरण कैसे करें (26) भाग एक

हाल ही में हमने देहधारी परमेश्वर के विषय पर संगति की है। इस विषय में “सत्य का अनुसरण कैसे करें” के तहत “त्याग देने” का अभ्यास शामिल है और हमने “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देने” के विषय के तहत “परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देने” पर संगति की। हमने इस पहलू पर कई बार संगति की है और मुख्य रूप से इस पर चर्चा की है कि देहधारी परमेश्वर से कैसे पेश आएँ। हमने इस विषयवस्तु को दो विषयों में विभाजित किया है। क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो कि वे दो विषय क्या हैं? (देहधारी परमेश्वर के संबंध में परमेश्वर ने हमें अभ्यास के दो सही सिद्धांत दिए हैं : पहला है उसकी तुलना स्वर्ग के परमेश्वर से नहीं करना और दूसरा है उसे भ्रष्ट मानवजाति के साथ बराबरी पर नहीं रखना।) हमने इन दोनों विषयों के कुछ विवरणों पर संगति की है जिसमें देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता की कुछ अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं। इसमें इस बात पर संगति शामिल थी कि देहधारी परमेश्वर मनुष्यों के बीच जीने, अस्तित्व में रहने, आचरण करने और कार्य करने में किन विशिष्ट सिद्धांतों का पालन करता और उन्हें मानता है। इन विषयों पर संगति का उपयोग लोगों को यह समझने और जानने में सक्षम बनाने के लिए किया जाता है कि देहधारी परमेश्वर, एक विशिष्ट पहचान वाला यह व्यक्ति, मनुष्यों के बीच रहते हुए किन अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करता है। हमने मुख्य रूप से देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के विषय पर संगति की और कई विशिष्ट बारीकियों पर संगति की। इसे सुनने के बाद तुम लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा? क्या देहधारी परमेश्वर के बारे में तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ कम हुई हैं या तुमने कुछ नई धारणाएँ बना ली हैं? (देहधारी परमेश्वर के बारे में हमारी धारणाएँ और कल्पनाएँ कम हुई हैं।) तो क्या इस विषय पर संगति देहधारी परमेश्वर को जानने में लोगों के लिए मददगार है? (हाँ, है।) यह बहुत ही अच्छा है।

देहधारी परमेश्वर के विषय पर हमारी संगति मुख्य रूप से देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता से संबंधित विशिष्ट प्रकाशनों और अभ्यासों पर केंद्रित होती है जिसका उद्देश्य लोगों को देहधारी परमेश्वर, एक विशिष्ट पहचान वाले इस व्यक्ति की ज्यादा ठोस समझ प्रदान करना है। तो क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को जितना ज्यादा समझते हो, उतना ही ज्यादा तुम्हें महसूस होता है कि वह बस एक सामान्य व्यक्ति है, कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है, और तुम देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को जितना ज्यादा समझते हो, तुम्हें उसके दिव्य प्रभामंडल का उतना ही कम आभास होता है? क्या तुम्हारे ऐसे विचार हैं? (नहीं। परमेश्वर द्वारा दिए गए कुछ ऐसे उदाहरणों को सुनकर जिनमें देहधारी परमेश्वर के व्यावहारिक जीवन यापन करने और प्रकाशनों के बारे में बात की गई, मुझे लगता है कि परमेश्वर की बाहरी छवि साधारण और सामान्य है, लेकिन उसकी सामान्य मानवता के प्रकाशन हम मनुष्यों से कहीं बढ़कर हैं; ये ऐसी चीजें हैं जिन तक हम पहुँच नहीं सकते। परमेश्वर की सामान्य मानवता में कोई भ्रष्ट स्वभाव, कोई घमंड या धोखेबाजी, कोई मानवीय अभिमान या भोग-विलास नहीं है। वैसे तो देहधारी परमेश्वर बाहर से साधारण और सामान्य दिखता है, लेकिन उसकी विनम्रता से उसकी महानता देखी जा सकती है। मुझे ऐसा ही लगता है।) आमतौर पर जब मशहूर लोग, महान लोग या मानवजाति के बीच सफल बड़ी हस्तियाँ विभिन्न पहलुओं से अपना परिचय देती हैं तब क्या वे अपनी सामान्यता, व्यावहारिकता, साधारणता और आम होने के बारे में बात करती हैं? (नहीं।) अगर भ्रष्ट मानवजाति में से कोई दूसरों को अपने बारे में बताने के लिए अपना परिचय देता है तो वह बिल्कुल भी यह वर्णन नहीं करेगा कि वह कितना साधारण, आम और सामान्य है। इसके विपरीत, वह अपने परिचय और अपने वर्णनों के जरिए लोगों को यह महसूस करवाने का प्रयास करेगा कि वह दूसरों से भिन्न, असाधारण और महान है और उसमें अलौकिक क्षमताएँ हैं। अगर कोई उसे एक अनोखे व्यक्ति के रूप में भी देख सके तो वह ज्यादा खुश होगा। देखो कि भ्रष्ट मनुष्य अपना परिचय कैसे देते हैं। सबसे पहले वे यह वर्णन करेंगे कि वे कितने पूर्ण हैं, उनमें कोई दोष या कमी नहीं है। वे यह दिखावा भी करेंगे कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत ही शानदार है, उनका ओहदा बहुत ही कुलीन है, उनके पास क्या शैक्षिक योग्यताएँ हैं और उनके रूप-रंग में क्या उत्कृष्ट है। अगर उनके चेहरे पर तिल है तो उन्हें उसका वर्णन करने का भी एक अनूठा तरीका ढूँढ़ना पड़ता है, जैसे, “देखो, यहाँ तक कि इस तिल की जगह भी असामान्य है; कहा जाता है कि इस जगह पर तिल वाले लोगों की नियति में धन या कुलीनता लिखी होती है।” जब उनके रूप-रंग की बात आती है तब वे दिखावटी ढंग से प्रचार करते हैं कि उनके चेहरे की हर विशेषता बहुत अनूठी है और उनके चेहरे की हर विशेषता के लिए मुखाकृति विज्ञान में क्या सकारात्मक व्याख्याएँ हैं, जैसे कि नियति में धन या कुलीनता लिखी होना या शोहरत हासिल करने में समर्थ होना और लोगों के बीच वे उस मछली जैसे हैं जो अपने तालाब के हिसाब से बहुत ही बड़ी है। इसके अलावा, उन्हें विशेष क्षेत्रों में अपने गुणों और शक्तियों का, उनकी सोच और विचार कितने असाधारण और विशिष्ट हैं इसका दिखावा करने में और यह दिखावा करने में विशेष आनंद आता है कि उन्होंने किन समूहों में क्या उपलब्धियाँ हासिल की हैं, कैसे प्रतिष्ठित लोग उनकी तारीफ करते हैं, उनके बारे में ऊँची राय रखते हैं, उनसे ईर्ष्या करते हैं और उनकी सराहना करते हैं या उन्होंने किस उद्योग में क्या महान योगदान दिया है और उनके वरिष्ठ उनकी कितनी तारीफ करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे जो कहते हैं वह सच है या नहीं, अपने आत्म-परिचय के हर पहलू में वे लोगों को यह महसूस करवाने का प्रयास करते हैं कि वे दूसरों से भिन्न हैं, लोगों के बीच वे इकलौते हैं, अद्वितीय हैं, सभी सामान्य लोगों से बढ़कर हैं। वे सबको ऐसे अंदाज से देखते हैं मानो वे सबसे श्रेष्ठ हों; वे बाकी सबको नीच लोग और तुच्छ आम लोग समझते हैं, जबकि सिर्फ खुद को ही सबसे महान, सबसे कुलीन और सबसे असाधारण समझते हैं। अगर तुम उनसे उनकी शैक्षिक योग्यताओं के बारे में पूछोगे तो वे कहेंगे कि उन्होंने किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से स्नातक किया है, उनके पास स्नातकोत्तर या पीएचडी की डिग्री है, जबकि सच तो यह है कि उन्होंने सिर्फ एक साधारण विश्वविद्यालय से ही शिक्षा प्राप्त की है। वे कभी भी अपने खुद के दोषों, कमियों, भ्रष्ट स्वभावों, अपने नीच चरित्र के पहलुओं या उन गलत चीजों के बारे में नहीं बोलते हैं जो उन्होंने की हैं। जब भी दूसरों को अपने बारे में बताने के लिए अपना परिचय देने की बात आती है, वे दिखावा करने, तारीफ करने, खुद को आकर्षक दिखाने और खुद को बहुत महान, असाधारण और असामान्य के रूप में वर्णित करने का हर संभव प्रयास करेंगे। अगर वे बीमार पड़ जाते हैं तो भी वे कहेंगे कि यह “अमीरों की बीमारी” है जिससे लोगों को लगेगा कि वे नाजुक, लाड़-प्यार पाने वाले और दूसरों से भिन्न हैं। चाहे कुछ भी हो जाए, वे लोगों को यह बिल्कुल भी महसूस नहीं होने देंगे कि वे सिर्फ एक साधारण, आम व्यक्ति हैं। इसके बजाय, वे लोगों से अपना सम्मान करवाने, अपने बारे में ऊँची राय बनवाने और अपना आदर करवाने के लिए सारे तरीके आजमाएँगे। अगर लोग उनका अनुसरण कर सकें और अपने दिलों में उन्हें जगह दे सकें तो वे खुद से और भी ज्यादा खुश महसूस करते हैं। अगर तुम कहते हो कि वे साधारण और सामान्य हैं, आम जनता के सदस्य हैं तो उन्हें लगता है कि उन्होंने अपना सम्मान खो दिया है और तुमने उनके अभिमान को वाकई ठेस पहुँचाई है; यहाँ तक कि यह ऐसा है मानो यह उन्हें मार ही डालेगा। वे जीवन भर अद्वितीय और असाधारण बनने का प्रयास करते रहते हैं। बहुत-से लोग अपने भ्रष्ट स्वभावों और ऐसी इच्छाओं के कारण बहुत ऊँचे, उत्कृष्ट और कुलीन दिखने के लिए अक्सर एक बाहरी छवि बनाते हैं और उनके द्वारा अपनाया गया बाहरी आचरण, उनके शब्द और उनके क्रियाकलाप बहुत हद तक किसी महान हस्ती का अंदाज प्रदर्शित करते हैं। किसी भी समूह में अगर कोई उनसे कहता है, “इस भीड़ में मैंने तुम्हें एक ही नजर में पहचान लिया; तुम्हारी नजरों से, तुम्हारे नैन-नक्श से और तुम्हारे सम्मोहक व्यक्तित्व से मैं बता सकता हूँ कि तुम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो” तो वे बहुत खुश हो जाते हैं। वे इस मामले को बेहद बढ़ा-चढ़ाकर कहेंगे और जीवन भर उन शब्दों को अपनी जबान पर रखेंगे, हर जगह दिखावा करेंगे, “भीड़ में लोग मुझे एक ही नजर में पहचान सकते हैं और समझ सकते हैं कि मैं अगुआ हूँ, ऐसी मछली हूँ जो अपने तालाब के हिसाब से बहुत बड़ी है, मैं कोई साधारण व्यक्ति नहीं हूँ!” उन्हें इस तरह का व्यक्ति होना विशेष रूप से अच्छा लगता है, खुद को एक ऐसे असाधारण, असामान्य व्यक्ति के रूप में स्थापित करना विशेष रूप से अच्छा लगता है जो दूसरों से भिन्न हो और यहाँ तक कि अद्वितीय भी हो। बहुत-से लोग मशहूर लोगों, महान लोगों और समाज में रुतबे और प्रतिष्ठा वाले लोगों पर विशेष ध्यान देते हैं, उनके बारे में हर खबर पर, उनके शब्दों और कार्यों पर और उनके रोजमर्रा के जीवन पर ध्यान देते हैं। इस ध्यान का उद्देश्य मनोरंजन नहीं होता, बल्कि उनकी नकल करना और उनका अनुसरण करना होता है। ये लोग जो भी खाते-पीते हैं, उनके बीच जो भी लोकप्रिय होता है, वे उसकी नकल करते हैं। ये लोग जिन भी विषयों पर चर्चा करते हैं, वे भी उन्हीं पर चर्चा करते हैं। वे बहुत बारीकी से उनका अनुसरण करते हैं, इस बात से डरते हैं कि कहीं उन्हें पूरे चलन से बाहर न रख दिया जाए, वे डरते हैं कि वे पीछे न रह जाएँ और नीची नजर से न देखे जाएँ। वे बस भीड़ में अलग से दिखने वाला और असाधारण व्यक्ति बनना चाहते हैं और एक सामान्य, साधारण व्यक्ति बनने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं होते। कुछ लोग, भले ही वे औसत काबिलियत के हों, उनमें कोई शक्ति या गुण न हो और उनमें ऐसी जन्मजात स्थितियाँ हों जो सभी पहलुओं से बहुत साधारण और आम हैं, फिर भी वे एक साधारण व्यक्ति बनने के इच्छुक नहीं होते, मामूली व्यक्ति बनने के इच्छुक नहीं होते। बल्कि वे बहुत ऊँचे और उत्कृष्ट होने के लिए बढ़िया वेश-भूषा धारण करते हैं या खुद को कोई मामूली व्यक्ति नहीं बल्कि बहुत ही असामान्य व्यक्ति बताते हैं। कुछ लोग तो महान हस्तियों, योग्य और कुशल लोगों और बेहतरीन कौशल वाले लोगों की नकल करने के लिए कड़ी मेहनत भी करते हैं। वे ध्यान से देखते हैं कि ये लोग क्या करते हैं, क्या कहते हैं, क्या चर्चा करते हैं और उनकी नकल करते हैं, उनकी तरह असाधारण महान हस्तियाँ बनने का प्रयास करते हैं, वे अब साधारण, आम लोग नहीं रहना चाहते। इसलिए, जब हम देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता पर संगति करते हैं तब कुछ लोग अनिवार्य रूप से सोचते हैं : “मनुष्य पूरे जोश से अपनी ऐसी तारीफ करते हैं, खुद को ऐसे पेश करते और अपने बारे में ऐसे शेखी बघारते हैं कि वे दूसरों से बहुत भिन्न हैं, बहुत असाधारण और महान हैं, फिर भी तुम हमेशा खुद को बहुत सामान्य और व्यावहारिक बताते हो। क्या यह जरा-सा अतार्किक नहीं है? क्या यह जरा-सा मूर्खतापूर्ण नहीं है? तुम देहधारी मसीह हो, जिसकी बहुत ही कुलीन पहचान है, बहुत ही महान प्रभामंडल है और सिर पर बहुत बड़ा ताज है। तुम खुद को एक साधारण, सामान्य और व्यावहारिक व्यक्ति कैसे बता सकते हो? और इस डर से कि लोग इस पर विश्वास नहीं करेंगे, तुम यह प्रमाणित करने के लिए बहुत सारे उदाहरण भी देते हो कि तुम कितने सामान्य, व्यावहारिक और साधारण हो। यह स्वाभाविक रूप से कुछ हद तक उलझन में डालने वाला है।” वैसे तो यह मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं है, लेकिन तथ्य सचमुच ऐसे ही हैं। देहधारी परमेश्वर की सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारणता के विशिष्ट प्रकाशन ठीक ऐसे ही हैं; यह एक तथ्य है, मैं इसे गढ़ नहीं सकता। कुछ लोग कहते हैं: “क्या तुम्हें कम से कम कुछ ऐसे उदाहरणों का जिक्र नहीं करना चाहिए जिनसे लोगों को यह लगे कि तुम दूसरों से भिन्न और असाधारण हो और तुम्हारी पहचान और छवि विशेष रूप से ऊँची और रोबदार है?” अच्छा, तुम्हें निराश करने का मुझे अफसोस है, लेकिन वास्तव में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। दरअसल, मैं जीवन और कार्य में जिन तरीकों से आचरण करता हूँ और कार्य करता हूँ, मेरे द्वारा किए गए उनके वर्णन देहधारी परमेश्वर के सच्चे प्रकाशन हैं; यह बस उतना ही वस्तुनिष्ठ है। यह सब वास्तव में ऐसा ही है; ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जिससे लोग मुझे दूसरों से अलग, असाधारण, महान, या ऊँची, रोबदार छवि वाले के रूप में देखें। कुछ लोग कहते हैं, “क्या तुम कुछ गढ़ नहीं सकते? इससे लोगों के दिलों पर अधिक अनुकूल प्रभाव पड़ेगा और वे निराश नहीं होंगे। तुम खुद को बहुत सामान्य और व्यावहारिक, बस एक साधारण व्यक्ति बताते हो; तुम्हारी छवि बिल्कुल भी ऊँची नहीं है! फिर कौन तुम्हें पूजेगा और तुम्हारा सम्मान करेगा? अगर लोग तुम्हारा सम्मान नहीं करते हैं या तुम्हें नहीं पूजते हैं तो क्या तब भी उनके दिलों में तुम्हारे लिए जगह हो सकती है?” मैं कहता हूँ, मैं सच में यह नहीं चाहता। अगर तुम मेरा सम्मान नहीं करते हो या मुझे नहीं पूजते हो तो कोई बात नहीं; मुझे कोई फिक्र नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर लोग तुम्हारा सम्मान नहीं करते हैं या तुम्हें नहीं पूजते हैं तो क्या तब भी उसे परमेश्वर का अनुसरण करना कहा जाता है?” चाहे तुम मेरा सम्मान या पूजा करो या न करो—ये चीजें महत्वपूर्ण नहीं हैं; मुझे सच में इनकी परवाह नहीं है। अगर तुम मेरा सम्मान नहीं करते हो या मुझे नहीं पूजते हो, लेकिन मेरे कहे हर वचन पर, मेरे द्वारा संगति किए गए सत्य के हर पहलू पर अपने दिल से चिंतन कर सकते हो, उसे परमेश्वर के वचनों के रूप में स्वीकार सकते हो और इन वचनों के आधार पर आचरण कर सकते हो, कार्य कर सकते हो और लोगों और चीजों को देख सकते हो तो इतना काफी है—मेरा वचन बोलना व्यर्थ नहीं जाएगा। मान लो कि तुम मेरा सम्मान नहीं करते हो या मुझे नहीं पूजते हो, लेकिन मेरे द्वारा बोले गए वचन और मेरे द्वारा प्रचार किए गए उपदेश तुम्हें परमेश्वर के सामने लाते हैं, तुम्हें यह जानने में समर्थ बनाते हैं कि सत्य का अनुसरण कैसे करना है, हर मामले से सामना होने पर सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे कार्य करना है, तुम्हें यह सीखने में समर्थ बनाते हैं कि आचरण और कार्य कैसे करना है, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे करना है, तुम्हें यह जानने में समर्थ बनाते हैं कि परमेश्वर के प्रति वफादार कैसे होना है और ऐसे किस तरीके से कर्तव्य करना है जो मानक-स्तर का हो, परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे करना है, परमेश्वर का भय कैसे मानना है और बुराई से कैसे दूर रहना है और अंततः ये तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देने और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने में समर्थ बनाते हैं। तब मेरा वचन बोलना व्यर्थ नहीं जाएगा और उनका उद्देश्य पूरा हो चुका होगा। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, अगर तुम मुझसे सही ढंग से पेश आ सको, मुझसे सिद्धांतों के अनुसार न्यायसंगत और उचित रूप से पेश आ सको तो यह पर्याप्त है। तुम लोगों से मेरी अपेक्षाएँ ज्यादा नहीं हैं। इससे पहले मैंने हमारे मेल-जोल के लिए तीन सिद्धांतों का जिक्र किया है : मसीह के साथ निष्कपट रहो, उसका आदर करो और उसके वचनों को मानो। अगर तुम लोग इन तीन सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सको तो यह पर्याप्त है। मुझे लोगों से अपनी पूजा करवाने की जरूरत नहीं है और न ही मुझे लोगों की सराहना या उच्च सम्मान की जरूरत है। मुझे इसकी जरूरत नहीं है कि लोग अपने दिलों में मेरी छवि रखें। मुझे इन चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं है। बहुत-से लोग उन हस्तियों को विशेष रूप से पूजते हैं जिनकी छवि ऊँची होती है, जो दूसरों से अलग, असाधारण रूप से सक्षम और उत्कृष्ट होते हैं, वे मानते हैं कि देहधारी परमेश्वर एक सामान्य, व्यावहारिक और साधारण मानव-पुत्र नहीं हो सकता। जो लोग मुझसे कभी नहीं मिले हैं, वे स्वाभाविक रूप से मान लेते हैं कि सामान्य लोगों की तुलना में मेरी छवि ज्यादा ऊँची है, विशेष रूप से रोबदार है। तुम्हें इस तरीके से बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए। मैं बिल्कुल भी रोबदार नहीं हूँ; मेरा कद छोटा है और मैं ठिगना हूँ। दैनिक जीवन में मेरे वचन और क्रियाकलाप विशेष रूप से सामान्य और व्यावहारिक हैं। मेरे दैनिक जीवन के सभी पहलू—मैं कैसे तैयार होता हूँ, मेरे कपड़े, भोजन, आवास और परिवहन—विशेष रूप से साधारण हैं। मैं कभी भी अद्वितीय बनने का प्रयास नहीं करता और न ही मैं कभी अनोखा बनने का प्रयास करता हूँ। मैं सिर्फ नियमों का पालन करते हुए चीजें करने, कर्तव्यनिष्ठा से आचरण करने, अपना कार्य अच्छी तरह से करने, अपनी सेवकाई पूरी करने और जो कहने की जरूरत है उसे स्पष्ट और पूरी तरह से कहने का प्रयास करता हूँ। ये मेरे आचरण और कार्य करने के सिद्धांत हैं। मेरा भिन्न बनने, असाधारण और महान बनने का मानवीय लक्ष्य नहीं है और न ही मैं कभी यह प्रयास करता हूँ कि लोग मुझे भीड़ में एक नजर में पहचान लें। अगर तुम मुझे भीड़ में नहीं पहचानो तो भी मैं बिल्कुल भी दुखी या परेशान नहीं होऊँगा और न ही मुझे कभी ऐसा महसूस होगा कि मैंने अपना सम्मान खो दिया है और यकीनन मैं यह बिल्कुल नहीं कहूँगा कि तुम मुझे ठेस पहुँचा रहे हो।

जब मैं बोलता हूँ और कार्य करता हूँ और तुम लोगों के संपर्क में रहता हूँ, चाहे मैं सत्य के किसी भी पहलू पर संगति कर रहा होता हूँ या किसी भी पहलू की समस्याएँ हल करने के लिए संगति कर रहा होता हूँ या बस रोजमर्रा की चीजों के बारे में गपशप कर रहा होता हूँ या किसी चीज के बारे में बात कर रहा होता हूँ, तब मैं हमेशा तुम लोगों को अपनी बात समझाने का प्रयास करता हूँ और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किस चीज के बारे में बात करता हूँ, मैं ऐसा लोगों को फायदा पहुँचाने के लिए करता हूँ। यकीनन अगर संगति उन मुद्दों के बारे में हो जिनमें सत्य शामिल है तो यह और भी जरूरी है कि यह लोगों को सत्य का अभ्यास करने के लिए सिद्धांत प्राप्त करने और उन मुद्दों को हल करने के मार्ग ढूँढ़ने में समर्थ बनाए। अगर यह सिर्फ रोजमर्रा की चीजों के बारे में गपशप है तो यह और भी सामान्य है क्योंकि यह सामान्य मानवता की जरूरत है। सामान्य मानवता की इस जरूरत का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि कभी-कभी लोगों को अपने दैनिक जीवन में दिखाई और सुनाई देने वाली चीजों को संप्रेषित करने और साझा करने की जरूरत होती है। रोजमर्रा की चीजों के बारे में बात करना, गपशप करना और दूसरों के साथ साझा करना, ये सभी सामान्य मानवता के जमीर और तर्क-बुद्धि की जरूरतें हैं। मेरे लिए, चीजें साझा करना ज्यादातर तुम्हें इस दुनिया, इस समाज और इस मानवजाति के बारे में ज्यादा समझने में मदद करने के बारे में है और यह बताने के बारे में भी है कि तुम्हें इस समाज और इस मानवजाति के बीच होने वाली कुछ चीजों को कैसे देखना चाहिए, बुरे चलनों को कैसे समझना चाहिए, विभिन्न चीजों को कैसे समझना चाहिए और विभिन्न तरह के लोगों को कैसे समझना चाहिए। यहाँ तक कि रोजमर्रा के मामलों पर गपशप या बात करते समय भी मैं समय-समय पर या संक्षेप में लोगों, घटनाओं और चीजों से संबंधित कुछ मूलभूत मुद्दों पर चर्चा करूँगा। इसलिए, चाहे कोई भी अवसर हो, जब लोगों का मुझसे संपर्क रहता है तब वे मेरे बारे में यही देखते, सुनते और बूझते हैं कि मैं बिल्कुल भी असाधारण नहीं हूँ, बल्कि पूरी तरह से सामान्य, व्यावहारिक और साधारण हूँ। ऐसे मानवीय रूप-रंग के साथ जीते हुए जब मैं लोगों के साथ रहता हूँ तब मैं विशेष रूप से स्वतंत्र और सहज महसूस करता हूँ। अगर तुम्हें लगता है कि मेरे ऐसे कुछ क्रियाकलाप हैं जो असाधारण हैं और दूसरों से भिन्न हैं या मेरे चेहरे की बाहरी विशिष्टताओं का कोई हिस्सा या मेरा कोई दूसरा पहलू दूसरों से भिन्न है या विशेष रूप से असाधारण है तो अगर तुम इस तरीके से सोचते हो तो मैं बहुत असहज और परेशान महसूस करूँगा। मुझे लोगों का ऐसी चीजें कहना वाकई नापसंद है और मुझे लोगों का मुझे उस तरीके से देखना भी वाकई नापसंद है। विशेष रूप से कुछ लोग, जब वे मुझसे पहली बार मिलते हैं तब मेरी जाँच-परख करते हैं, मेरी आँखों के भाव, मेरे चेहरे की विशिष्टताओं की बारीकी से जाँच करते हैं, मेरे द्वारा उपयोग किए गए हर वचन को और मेरी आवाज के लहजे को बड़े ध्यान से सुनते हैं, वे यह देखना चाहते हैं कि क्या मैं उतना ही असाधारण और दूसरों से अलग हूँ जितनी उन्होंने कल्पना की थी। मैं कहता हूँ, उसकी कोई जरूरत नहीं है; मेरी जाँच-परख या पड़ताल करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं एक बहुत ही साधारण और सामान्य व्यक्ति हूँ। जब तुम मुझसे मेल-जोल रखते हो तब तुम्हें तनावमुक्त, स्वतंत्र और सहज होना चाहिए। अगर तुम हमेशा जाँच-परख और पड़ताल करते रहोगे तो जितनी ज्यादा तुम पड़ताल करोगे, उतने ही ज्यादा थक जाओगे और उतने ही ज्यादा उलझन में पड़ जाओगे। अगर तुम मेरी पड़ताल और जाँच-परख करोगे तो तुम्हारे प्रति मेरी नापसंदगी और नफरत का एहसास उत्तरोत्तर बढ़ता जाएगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरी पड़ताल कैसे करते हो, अगर तुम मेरी बात नहीं समझते, यह नहीं जानते कि मेरे वचनों का वास्तव में क्या मतलब है और यहाँ जिन सत्य सिद्धांतों को समझा जाना चाहिए वे क्या हैं तो तुम्हारी पड़ताल का क्या फायदा? तुम्हारी पड़ताल तो और भी घिनौनी है। एक बार किसी ने—मुझे नहीं पता कि वह लंबे समय से जाँच-परख कर रहा था या उसने यह अनजाने में देख लिया—कहा कि मेरी आँखों में एक चमकीला धब्बा है और यह दिखाने के लिए एक नजर ही काफी है कि मैं परमेश्वर हूँ। मैंने कहा, “तुमने और क्या देखा? क्या तुमने परमेश्वर के आत्मा को फाख्ता की तरह मुझ पर उतरते देखा? क्या तुमने मेरे मुँह से दोधारी तलवार बाहर निकलकर आती देखी? क्या तुमने मेरा पूरा शरीर प्रकाश के स्तंभ जैसा देखा? क्या तुमने मेरे हाथ में कोई लोहे की छड़ देखी? तुम कहते हो कि तुमने मेरी आँखों में एक चमकीला धब्बा देखा, लेकिन तुम जो कहते हो वह गलत है। बाइबल कहती है, ‘उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं।’ तुम्हारी समझ के अनुसार, परमेश्वर के दिव्य प्रभामंडल जैसा कुछ समझने के लिए तुम्हें मेरी दोनों आँखों को ज्वाला के समान देखना चाहिए था, लेकिन तुमने सिर्फ एक चमकीला धब्बा देखा, तो इसका मतलब है कि तुम परमेश्वर को बदनाम कर रहे हो।” मुझे बताओ, क्या इस व्यक्ति ने खुद को मूर्ख नहीं बनाया? क्या यह छोटे आध्यात्मिक कद की अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ।) मैं तुमसे कहता हूँ, तुम्हें इन चीजों की जाँच-परख या पड़ताल करने की जरूरत नहीं है। मेरे द्वारा व्यक्त इन वचनों को सुनना ही तुम्हें सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने और उद्धार के मार्ग पर चल पड़ने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त है। अगर तुम जाँच-परख करने पर अड़े रहे तो कौन-सी समस्याएँ उत्पन्न होंगी? न सिर्फ कोई नतीजा नहीं मिलेगा, बल्कि तुम परमेश्वर को जरा-सा भी जान नहीं पाओगे और परमेश्वर के बारे में तुम्हारी धारणाएँ उत्तरोत्तर मजबूत होती जाएँगी। देहधारी परमेश्वर का परमेश्वर के व्यक्तित्व या परमेश्वर के सच्चे स्वरूप से जिसके बारे में वह बात करता है या प्रकाशितवाक्य में परमेश्वर द्वारा भविष्यवाणी की गई परमेश्वर की छवि से या परमेश्वर की उस छवि से जिसको मानवजाति ने अतीत के रिकॉर्ड के जरिए देखा है, कोई संबंध नहीं है। इसलिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम देहधारी परमेश्वर की जाँच-परख कैसे करते हो, वह हमेशा सामान्य और व्यावहारिक, एक साधारण व्यक्ति है; वह तुम्हें ऐसा कोई पक्ष नहीं दिखाएगा जो असाधारण हो या दूसरों से भिन्न हो। तो इन शब्दों को कहने से मेरा क्या मतलब है? मैं बस तुम्हें यह बता रहा हूँ कि तुम्हें देहधारी परमेश्वर की जाँच-परख या पड़ताल नहीं करनी चाहिए। तुम जितनी ज्यादा परमेश्वर की पड़ताल करोगे, परमेश्वर तुमसे उतना ही दूर होगा। अगर तुम उसकी पड़ताल नहीं करते हो, बल्कि शुद्ध रूप से समर्पण करते हो और सत्य स्वीकार पाते हो तो पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध और प्रकाशित करेगा, सत्य समझने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। अगर तुम हमेशा उसकी जाँच-परख और पड़ताल करते रहोगे तो पवित्र आत्मा तुम्हें छोड़ देगा। जब पवित्र आत्मा तुम्हें छोड़ देगा तब यह ऐसा होगा मानो तुम्हारी पूरी दृष्टि काली पड़ जाती है और तुम एक भी चीज समझ नहीं सकोगे। जब तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ोगे तब वे तुम्हें समझ नहीं आएँगे; जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होगा तब तुम उसकी असलियत नहीं देख पाओगे या यह नहीं जान पाओगे कि क्या करना है और जब तुम दूसरों के साथ संगति करोगे तब तुम्हें पता नहीं होगा कि कहाँ से शुरुआत करनी है। तुम्हें बहुत अटपटा महसूस होगा और वह सबसे सरल चीज जिसे तुम पहले करने में समर्थ थे, उसे करने का तरीका अब तुम्हें पता नहीं होगा। यही समय है जब चीजें पूरी तरह से बिगड़ जाती हैं। क्या ये अच्छे संकेत हैं? (नहीं।) इसलिए, जब ये संकेत दिखाई दें तब तुम्हें जल्दी से वापस मुड़ जाना चाहिए और परमेश्वर की जाँच-परख और पड़ताल बंद कर देनी चाहिए। और जब ये संकेत दिखाई नहीं दें तब भी ऐसा मत करो। तुम्हें ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए? यह मार्ग कहीं नहीं ले जाता; तुम्हें यह मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। परमेश्वर का अनुसरण करने में तुम्हें जो मार्ग अपनाना चाहिए वह है सत्य स्वीकारना और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना, न कि परमेश्वर की जाँच-परख, पड़ताल या परीक्षा लेना। विशेष रूप से देहधारी परमेश्वर के साथ, अगर तुमने उसे कभी नहीं देखा है और तुम नहीं जानते कि वह कैसा दिखता है, तब पहली मुलाकात में उसे ध्यान से देखना सामान्य बात है। उसे ध्यान से देखने के बाद तुम्हारे पास उसकी एक याद होती है और तुम उसकी आवाज को उपदेश रिकॉर्डिंग में बोलने वाली आवाज से मिला सकते हो, “तो देहधारी परमेश्वर ऐसा दिखता है, यह उसका कद है, वह ऐसे तैयार होता है। वह सच में सामान्य, व्यावहारिक और साधारण है—यह सब सच है, ठीक वैसा जैसे परमेश्वर के वचनों में वर्णित है।” इतना काफी है; यहीं रुक जाओ। अपने दिल में इस मामले की पड़ताल करने का प्रयास मत करते रहो। इसके बाद तुम्हें परमेश्वर जो संगति कर रहा है उसे ध्यान से सुनना चाहिए, इस पर चिंतन करना चाहिए कि परमेश्वर जिस मामले पर संगति कर रहा है उसमें सत्य का कौन-सा पहलू शामिल है, उसे जल्दी से लिख लेना चाहिए, फिर अपने दिल से उस पर मनन करना चाहिए और उसे समझने के बाद उसे अभ्यास में लाना चाहिए। यही मसीह—देहधारी परमेश्वर—से पेश आने का सही तरीका है। मैं चाहे कैसे भी संगति करूँ, मैं चाहे किसी भी विषय पर संगति करूँ, जब इसमें देहधारी परमेश्वर शामिल होता है तब मैं उसे असाधारण, महान, अनोखा या दूसरों से भिन्न होने से जोड़ने या उसे इस रूप में जानने के बजाय हमेशा तुम लोगों को परमेश्वर की सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारणता के बारे में बताने का प्रयास करता हूँ। मैं जिस भी मामले के बारे में बोलता हूँ, मैं जो भी उदाहरण देता हूँ, वह देहधारी परमेश्वर की सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारणता के इस विषय से संबंधित होता है। मैं ऐसा कुछ भी बिल्कुल नहीं गढ़ूँगा जिससे तुम गलती से यह सोच बैठो कि मैं दूसरों से भिन्न, असाधारण या महान हूँ, मुझमें एक अगुआ का आचरण है, किसी महान व्यक्ति की उदारता है या किसी महान व्यक्ति के मन की विशालता और उसकी ऊँचाई है। मैं तुम्हें बता दूँ, मुझे कभी यह समझ नहीं आता कि “ऊँचाई” या “मन की विशालता” का क्या मतलब है और न ही मैं इन पहलुओं पर चिंतन करता हूँ या उनमें अपना दिल लगाता हूँ। मैं क्या चिंतन करता हूँ? मैं यह चिंतन करता हूँ कि मैं तुम लोगों के साथ ऐसे किन विषयों पर संगति करूँ जो तुम लोगों को सत्य वास्तविकता में ला सकें, कौन-से विषय तुमसे आग्रह कर सकते हैं, तुम्हारी अगुआई और मदद कर सकते हैं और तुम्हारा मार्गदर्शन कर सकते हैं ताकि तुम लोगों में कष्ट सहने और कीमत चुकाने की इच्छा और संकल्प हो और तुम सत्य का अनुसरण कर पाओ, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर पाओ और उद्धार प्राप्त कर पाओ। मैं हमेशा यह चिंतन करता हूँ कि मैं किन विषयों पर बोलूँ और कौन-से उपदेश दूँ ताकि लोग उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू कर सकें, मानक-स्तर के तरीके से अपने कर्तव्य कर सकें और सच्चे सृजित प्राणी बन सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किस विषय पर बोलता हूँ, मैं हमेशा तुम लोगों को मानक-स्तर के सृजित प्राणी बनने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करना सीखने और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल विकसित करने में मदद करने का प्रयास करता हूँ। मैं कभी यह चिंतन नहीं करता कि मैं ऐसे कौन-से वचन कहूँ जिससे तुम लोग मेरा सम्मान करोगे या ऐसी कौन-सी चीजें करूँ जिससे तुम लोग मेरा आदर करोगे ताकि अपने दिलों में तुम लोगों को महसूस हो कि मैं किसी मशहूर या महान व्यक्ति के समान अथाह हूँ; मेरे दिल में इनमें से कोई भी चीज नहीं है। मैंने कभी इस बारे में नहीं सोचा कि मुझे कैसे बोलना चाहिए, मेरे बोलने का ढंग कैसा होना चाहिए या मैं खुद को कैसा रूप दूँ जिससे तुम लोग यह महसूस करो कि मैं बहुत ऊँचा हूँ, तुम लोग मेरी थाह न ले पाओ या मुझ तक न पहुँच पाओ और तुम लोग बहुत तुच्छ और जाहिल दिखो। मैं अपने दिल में इन चीजों के बारे में कभी नहीं सोचता और अपने रुतबे, छवि या पहचान की रक्षा करने के लिए न कभी बोलता हूँ, न ही कोई कार्य करता हूँ; मैं सिर्फ पूरे दिल से अपनी सेवकाई करता हूँ।

कभी-कभी जब मैं थक जाता हूँ तब मैं भाई-बहनों के रहने की जगहों पर सैर करने और आस-पास की चीजें देखने चला जाता हूँ। कभी-कभी मैं खेत के आस-पास भी टहलता हूँ, सब्जियों के खेतों को, सूअरों और भेड़ों को देखता हूँ। जब मुझे कोई बिल्ली का बच्चा दिखाई पड़ता है तब मैं उसे सहलाता हूँ, गले लगाता हूँ और उससे बातें करता हूँ। जब मुझे कोई प्यारा-सा पिल्ला दिख जाता है तब मैं उसे भी गले लगाता हूँ। एक कुतिया थी जिसने दस से ज्यादा पिल्लों को जन्म दिया था। वह लोगों के सामने बहुत ही खुश थी, मानो उसने कोई उपलब्धि पा ली हो। मैंने उसकी तारीफ की, कहा : “अब तुम खुद से खुश हो, है ना? देखो, तुमने कितने सारे पिल्लों को जन्म दिया है, तुमने सच में बहुत अच्छा काम किया, बहुत खूब, शाबाश!” मैंने उसे सहलाया और गले से लगाया। मैं कुत्तों के रहने की जगहों पर, खेत में और सब्जियों की बाड़ियों में भी जाता हूँ, हर जगह नजर दौड़ाता हूँ; यह वाकई अच्छा लगता है। मुझे बताओ, क्या वे महान हस्तियाँ इन गंदी, बदबूदार, अस्त-व्यस्त जगहों पर जाती हैं? वे नहीं जातीं। विशेष रूप से बदबूदार जगहों पर जैसे कि कुत्तों के रहने की जगहें और सूअरों के बाड़े—ज्यादातर लोग वहाँ जाने के इच्छुक नहीं होते हैं। मुझे भी दुर्गंध या अप्रिय गंध पसंद नहीं है, लेकिन पिल्ले की थोड़ी-सी गंध बर्दाश्त हो जाती है। कभी-कभी पिल्ले मेरी टाँगों से रगड़ खाते हैं, मेरे चेहरे को चूमते और चाटते हैं और मैं उन्हें गले लगा लेता हूँ। जानवर बहुत सरल होते हैं; उन्हें अपने मालिकों पर विश्वास होता है और चौकन्ना रहने की जरूरत नहीं होती, इसलिए वे अपने मालिकों के साथ जी भरकर खेल सकते हैं और घुल-मिल सकते हैं। उनके जीवन बहुत ही सरल होते हैं। कुछ लोग हमेशा कहते हैं कि उन्हें कुत्ते पसंद हैं, छोटे जानवर पसंद हैं और वे छोटे जानवरों की देखभाल करते हैं, लेकिन जब तुम उन्हें किसी पिल्ले को गले लगाने के लिए कहते हो तब वे आनाकानी करते हैं। वे कहते हैं, “कुत्ते गंदे और बदबूदार होते हैं और उनमें वायरस भी हो सकते हैं!” मैं कहता हूँ, “तुम बहुत ही मीन-मेख निकालने वाले व्यक्ति हो। क्या तुम्हें छोटे जानवर पसंद नहीं हैं? यह उन्हें सही मायने में पसंद करना नहीं है।” क्या ऐसे लोग काफी पाखंडी नहीं हैं? (हाँ।) वे खुद को साधारण लोग नहीं मानते हैं; उन्हें लगता है कि वे कुलीन हैं, उनके पास प्रतिष्ठा है और वे महान हस्तियाँ हैं, इसलिए वे इन छोटे जानवरों के साथ कैसे घुल-मिल सकते हैं जिन्हें लोग तुच्छ समझते हैं? अगर वे उन्हें अपने हाथों से छू भी लें तो उन्हें जल्दी से अपने हाथ धोने पड़ते हैं और खुद को कीटाणुरहित करना पड़ता है, और यहाँ तक कि वे अपने कपड़े भी बदल लेते हैं और घर पहुँचते ही तुरंत नहाते हैं। वे सफाई को इस हद तक ले जाते हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग अजीब नहीं हैं? अगर तुम्हें छोटे जानवर सच में पसंद नहीं हैं तो दिखावा मत करो। एक बार जब लोग देख लेते हैं कि तुम दिखावा कर रहे हो तब वे समझ जाते हैं कि तुम बहुत ही पाखंडी और निष्ठाहीन हो, तुम्हें देखकर उन्हें उबकाई आती है और उनके मन में तुम्हारी एक खराब छवि बन जाती है। अगर तुम्हें जानवर पसंद नहीं हैं तो यह दिखावा बिल्कुल भी मत करो और न ही खुद को अच्छा दिखाने का प्रयास करो। तुम खुद को अच्छा दिखाने का जितना ज्यादा प्रयास करोगे, लोग तुम्हें उतना ही बदसूरत और नीच समझेंगे। ईमानदार और सच्चा होना बहुत ही बेहतर है। अगर तुम ईमानदार और सच्चे नहीं हो सकते तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हारी मानवता में कोई समस्या है। बहरहाल, देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता एक तथ्य है और उसकी साधारणता भी एक तथ्य है। बहुत-से लोगों ने उसके संपर्क में रहकर इन चीजों को देखा है और वे जानते हैं कि ये तथ्य हैं। ये वे तथ्य हैं जिन्हें तुम लोगों को सबसे ज्यादा समझना और जानना चाहिए। ऐसा ही एक साधारण, सामान्य व्यक्ति देहधारी परमेश्वर है और यह बात लोगों की धारणाओं के खिलाफ जाती है। अगर वह भ्रष्ट मानवजाति की तरह व्यवहार करता और चाहे उसने कुछ बड़ा किया हो या छोटा, इस बारे में दिखावा करता कि वह दूसरों से कितना भिन्न है और खुद को अलग रखने का प्रयास करता तो हो सकता है कि यह लोगों की धारणाओं के अनुरूप होता। एक तरफ यहाँ भ्रष्ट मानवजाति की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं और दूसरी तरफ यहाँ देहधारी परमेश्वर है, जो इतना सत्य व्यक्त करने के बावजूद अभी भी ऐसी अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करता है जो एक साधारण व्यक्ति के समान ही सामान्य हैं—इन अभिव्यक्तियों में से कौन-सी अभिव्यक्ति वह सकारात्मक चीज है जो लोगों को फायदा पहुँचाती है? वह नकारात्मक चीज कौन-सी है जिससे लोग नफरत करते हैं और जिसे अस्वीकार करते हैं? क्या अब तुम लोग कुछ हद तक इसका भेद पहचानने में समर्थ हो? (हाँ।) तो फिर हमें और विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है; आओ, पिछली बार के विषय के साथ जारी रखें।

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