सत्य का अनुसरण कैसे करें (11) भाग तीन
सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना
अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना
I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना
च. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता, बल्कि इसका लक्ष्य उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलना है
6. जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ
इस अवधि के दौरान हमारी संगति सत्य का अनुसरण करने के तरीके में “त्याग देने” के अभ्यास के सिद्धांत से जुड़े एक विशिष्ट विषय—जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव—के बारे में रही है। इस विषय पर कई बार संगति करने के बाद, क्या तुम लोगों को अब इन तीन पहलुओं—जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव—से जुड़ी कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों और खुलासों के बारे में भेद की थोड़ी पहचान है? (इन चीजों के बारे में भेद की मेरी पहचान पहले से कुछ बेहतर है। पहले मैं अक्सर चरित्र और भ्रष्ट स्वभावों को एक समझ लेता था, लेकिन परमेश्वर की पिछली कुछ संगतियों के माध्यम से अब मैं कुछ हद तक उनके बीच अंतर कर सकता हूँ।) इन चीजों के बीच अंतर करना क्यों आवश्यक है? (यह इसलिए है ताकि हम जान सकें कि हमारे भीतर की किन समस्याओं को हल किया जाना चाहिए और किन समस्याओं से हमें बस सही तरीके से निपटने की आवश्यकता है।) सही कहा। इतने विस्तार से संगति करने से जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के बीच के अंतर अधिक स्पष्ट हो जाते हैं और लोगों को भ्रष्ट स्वभावों और अत्यंत खराब चरित्र की अभिव्यक्तियों की अधिक स्पष्ट समझ प्राप्त होती है, जो कि दो अलग-अलग चीजें हैं। विशेष रूप से लोग खराब चरित्र, भ्रष्ट स्वभावों और जन्मजात स्थितियों के बीच अंतर करने में सक्षम होते हैं। वे मानवता के कुछ दोषों को भ्रष्ट स्वभाव नहीं मानेंगे और बेशक वे जन्मजात स्थितियों के भीतर की कुछ कमियों और दोषों को भी भ्रष्ट स्वभाव नहीं मानेंगे। जब लोगों में इस भेद की पहचान आ जाती है, तो वे भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के बारे में अधिकाधिक स्पष्ट हो जाते हैं और वे उन समस्याओं का राई का पहाड़ नहीं बनाते जिनमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल नहीं होते हैं। साथ ही उन्हें इस बात की भी अधिक स्पष्ट समझ हो जाती है कि भ्रष्ट स्वभाव वास्तव में क्या हैं। तो क्या तुम लोग स्पष्ट रूप से समझा सकते हो कि भ्रष्ट स्वभाव वास्तव में क्या हैं? क्या भ्रष्ट स्वभावों का जन्मजात स्थितियों से कोई संबंध है? क्या वे जन्मजात स्थितियों से प्रभावित होते हैं? (नहीं।) मान लो कि कोई व्यक्ति सुंदर है, गोरे रंग का है और उसके नैन-नक्श सुडौल हैं—तो क्या यह कहा जा सकता है कि चूँकि उसका रूप-रंग अच्छा है, इसलिए उसमें कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है, उसकी मानवता उसके रूप-रंग की तरह ही पूर्ण और शुद्ध है, वह बिल्कुल भी घमंडी या दुष्ट नहीं बल्कि असाधारण रूप से पवित्र है? क्या ऐसा कहा जा सकता है? (नहीं।) इस तरह संगति करने के बाद, इन तीन पहलुओं—भ्रष्ट स्वभाव, जन्मजात स्थितियाँ और मानवता—के बीच के अंतर अब मूल रूप से स्पष्ट हैं, है ना? (हाँ।) उनका भेद पहचानना आसान है।
व्यापार करने में कुशल होना
पिछली बार हमने व्यापार से प्रेम करने के बारे में संगति की थी। व्यापार से प्रेम करने और उसे पसंद करने की इस अभिव्यक्ति को किस पहलू के अंतर्गत रखा जाना चाहिए? (जन्मजात स्थितियों के अंतर्गत।) इसे जन्मजात स्थिति क्यों माना जाता है? (यह एक रुचि और शौक है, इसलिए इसे जन्मजात स्थिति माना जाता है।) एक बात तो यह है कि यह एक रुचि और शौक है; दूसरी बात यह है कि यदि किसी व्यक्ति को व्यापार से प्रेम है और उसमें व्यापार की स्वाभाविक समझ है—वह पेशेवर अध्ययन किए बिना ही स्वाभाविक रूप से इसमें कुशल है और दूसरों के मार्गदर्शन के बिना इसे समझने और पैसा कमाने, मुनाफा कमाने, व्यापार के अवसरों का लाभ उठाने आदि के तरीके जानता है—तो इस व्यक्ति के पास अपनी जन्मजात स्थितियों के भीतर व्यापार करने की खूबी है। यदि किसी व्यक्ति में जन्मजात रूप से यह खूबी है, तो यह निश्चित रूप से एक जन्मजात स्थिति है और जन्मजात स्थितियों का जन्म के बाद पड़ने वाले प्रभावों से बहुत ही कम लेना-देना होता है। तुम देखो, कुछ लोग 15 या 16 साल की उम्र में स्कूल में रहते हुए ही व्यापार करने का कौशल सीखना शुरू कर देते हैं। जब भी उन्हें कोई अच्छी चीज मिलती है, तो वे उसे बेचने के तरीके सोचते हैं। वे अपने माता-पिता द्वारा दिए गए जन्मदिन के उपहार भी बेच देते हैं। वे अपनी जेब के पैसे खर्च नहीं करते हैं, बल्कि व्यापार करने के लिए सारा पैसा बचा लेते हैं। 18 या 19 साल के होने तक वे पहले से ही छोटे व्यापारिक उद्यम चलाने में सक्षम हो जाते हैं। स्कूल में उनके ग्रेड बस औसत होते हैं, लेकिन उनके पास व्यापार करने का दिमाग होता है, वे हिसाब-किताब में तेज होते हैं और उनमें व्यापार करने की एक विशेष कुशलता होती है—यह एक खूबी है। व्यापार से प्रेम करना जन्मजात स्थितियों के भीतर खूबियों या रुचियों और शौक की श्रेणियों में आता है। खैर यह जन्मजात स्थितियों का एक पहलू है और व्यापार से प्रेम करने की अभिव्यक्ति को इसी श्रेणी में रखा गया है। कुछ लोगों में जरूरी नहीं कि व्यापार से संबंधित कोई शौक या खूबी हो। वे व्यापार करते समय मुख्य रूप से लोगों से धोखाधड़ी और फरेब करने पर निर्भर रहते हैं। वे अपनी कड़ी मेहनत और प्रयास के माध्यम से या वैध व्यापारिक साधनों और तरीकों का उपयोग करके पैसा नहीं कमाते हैं, बल्कि मुनाफा कमाने और पैसा बनाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हर तरह की धोखाधड़ी, छल-कपट और कानूनी खामियों का फायदा उठाने का सहारा लेते हैं। यह किस तरह की समस्या है? ऐसे लोग लगातार इसी तरह से व्यापार करते हैं—क्या इसमें उनकी मानवता का सार शामिल है? (हाँ।) ऐसी मानवता अच्छी है या खराब? (यह खराब है।) यह कैसे खराब है? जब ऐसे लोगों की मानवता की बात आती है, तो आम तौर पर उनका चरित्र खराब होता है। व्यापार करने में लोगों का लक्ष्य हमेशा पैसा कमाना होता है। यदि तुम व्यापार करने के वैध साधनों के माध्यम से पैसा कमाते हो, तो यह एक क्षमता है जो तुम्हारे पास है और यह परमेश्वर द्वारा तुम्हें दी गई खूबी से मिलने वाला लाभ है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति व्यापार करने के वैध साधनों के माध्यम से पैसा और मुनाफा नहीं कमाता है, बल्कि हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट के माध्यम से पैसा कमाता है, तो ऐसे लोग सत्यनिष्ठा से रहित होते हैं और उनका चरित्र नीच होता है। क्या ऐसे लोगों में अंतरात्मा होती है? (नहीं।) बोलचाल की भाषा में उनकी अंतरात्मा पूरी तरह से सड़ चुकी होती है—उनमें कोई अंतरात्मा नहीं होती है। हम ऐसा क्यों कहते हैं कि उनमें कोई अंतरात्मा नहीं है? (आम तौर पर जिन लोगों में अंतरात्मा होती है वे दूसरे लोगों से धोखाधड़ी और फरेब करने के बाद अपनी अंतरात्मा से धिक्कार महसूस करते हैं और वे फिर कभी ऐसे काम नहीं करते हैं। लेकिन जिन लोगों में अंतरात्मा नहीं होती है वे केवल मुनाफा कमाने की परवाह करते हैं। उनकी अंतरात्मा में बिल्कुल भी जागरूकता नहीं होती है, इसलिए वे बस वैसे ही काम करते रहते हैं।) उनमें अंतरात्मा का कार्य नहीं होता है; यह भी कहा जा सकता है कि उनमें कोई अंतरात्मा नहीं होती है। यदि उनमें अंतरात्मा होती, तो उनकी अंतरात्मा काम करती और फिर एक बार किसी को धोखा देने के बाद वे अपनी अंतरात्मा में आत्म-ग्लानि महसूस करते। भले ही उन्होंने मुनाफा कमाया हो, लेकिन वे अंदर से बहुत बुरा महसूस करते। जब वे पैसे खर्च करते, तो उनका चेहरा शर्म से लाल हो जाता और वे अंदर से बेचैन महसूस करते, यह महसूस करते हुए कि उन्होंने जो किया वह गंदा और नीच काम था। इस प्रकार, उसके बाद से वे फिर कभी किसी से धोखाधड़ी नहीं करते; चाहे संभावित मुनाफा कितना भी बड़ा क्यों न हो, वे ऐसा कभी नहीं करते—यह अंतरात्मा का कार्य है। लेकिन जो लोग दूसरों को धोखा देने, बेवकूफ बनाने और फरेब करने में कुशल होते हैं, वे जब भी चाहेंगे ऐसा करेंगे। सफल होने के बाद जब वे पैसे खर्च करते हैं, तो उन्हें अपने दिलों में बुरा नहीं लगता है। एक बार जब पैसा उनके हाथ में आ जाता है, तो वे सोचते हैं कि वे चतुर और बुद्धिमान हैं; वे अपनी धोखाधड़ी की रणनीतियों की सफलता से प्रसन्न होते हैं और विशेष रूप से गर्व महसूस करते हैं। वे कम वजन का सामान बेचते हैं, वे नकली दवा, नकली जिनसेंग, पानी का इंजेक्शन लगा मांस बेचते हैं—वे जो कुछ भी बेचते हैं वह मिलावटी और भ्रामक होता है। वे जिस भी व्यापारिक उद्यम में शामिल होते हैं उसमें धोखाधड़ी के हथकंडे और लोगों को जाल में फँसाने के तरीके शामिल होते हैं और वे जो भी पैसा कमाते हैं वह धोखाधड़ी के साधनों से प्राप्त किया जाता है। वे चाहे जो भी व्यापार करें, वे कभी भी उचित कीमत वसूलकर नियमबद्ध तरीके से इसे नहीं करते हैं। तुम देखो, कुछ लोग व्यापार करते समय विशेष रूप से नियमित ग्राहकों से धोखाधड़ी करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि तुम अक्सर उनसे सामान खरीदते हो और वे जानते हैं कि तुम्हारे पास पैसा है, तो वे उस चीज के लिए तुमसे 100 युआन लेंगे जिसे वे दूसरों को 10 युआन में बेचते हैं। वे यहाँ तक कहेंगे, “मैं इसे किसी और को नहीं बेचता—मैं इसे सिर्फ तुम्हारे लिए रखता हूँ। देखो हमारा रिश्ता कितना मजबूत है? तुम्हें अच्छा सौदा मिल रहा है, है ना?” वे लोगों को धोखा देते हैं और यहाँ तक कि उन्हें आभारी भी महसूस कराते हैं—वे कितने कुशल धोखेबाज हैं! जिन लोगों की अंतरात्मा में आत्म-ग्लानि की कोई भावना नहीं होती है, वे चाहे जो भी करें, अपनी अंतरात्मा में कोई धिक्कार या जागरूकता महसूस नहीं करते हैं, इसलिए यह कहा जा सकता है कि ऐसे लोगों में कोई अंतरात्मा नहीं होती है। उनकी समझ चाहे जैसी भी हो, केवल उनकी अंतरात्मा के आधार पर ही देखा जाए तो ये लोग मानवता से रहित हैं और इनका चरित्र नीच है। यह किस हद तक नीच है? उनमें कोई अंतरात्मा और कोई मानवता नहीं है। यानी उनमें अंतरात्मा की उस जागरूकता, कार्य और नियंत्रण की कमी होती है जो सामान्य लोगों में होती है। इन नियंत्रणों के बिना वे कुछ भी कर सकते हैं। व्यापार करने में वे धोखाधड़ी और फरेब कर सकते हैं; किसी भी व्यापारिक संचालन में वे चीजों में हेराफेरी कर सकते हैं और नियम तोड़ सकते हैं। वे कोई भी अनैतिक काम कर सकते हैं। यहाँ तक कि जब वे घर बनाते हैं, तो वे घटिया सामग्री का उपयोग करते हैं। तुम देखो—मुख्यभूमि चीन में उन झुकी हुई इमारतों और इमारतों के ढहने का कारण क्या है? ऐसा इसलिए है क्योंकि अत्यधिक मुनाफा कमाने के लिए बिल्डरों ने कंक्रीट मिश्रण के अवमानक अनुपात और स्टील रीबार उपयोग की घटिया तकनीकों को अपनाया, जिससे इमारतों की स्थिति पहले ही प्रभावित हो गई थी। नतीजतन, लोगों के रहने आने के कुछ ही समय बाद कुछ इमारतें ढह गईं। यदि पाँच या छह तीव्रता का भूकंप आ जाए, तो अधिकांश इमारतें ढह जाएँगी और परिणाम अकल्पनीय होंगे। उन बेईमान ठेकेदारों में बिल्कुल भी अंतरात्मा नहीं होती है—लोगों को मरते हुए देखकर वे तुरंत अपने आकाओं की तलाश करते हैं, ताकि स्थिति से निपटने के प्रतिकारी उपाय किए जा सकें। यदि उनके आका काफी मजबूत हैं और उनके पास स्थिति से निपटने के प्रतिकारी उपाय हैं, तो मामले पर सफलतापूर्वक पर्दा डाला जा सकता है। उन कुछ मौतों को अंतिम संस्कार के कुछ खर्चे देकर रफा-दफा कर दिया जाएगा और कोई भी उन्हें बिल्कुल भी जवाबदेह नहीं ठहरा पाएगा। उनकी अंतरात्मा में कोई जागरूकता नहीं होती है; कुछ मौतों की तो बात ही छोड़ दो—भले ही दर्जनों, सैकड़ों या दसियों हजार लोग मर जाएँ, उनके लिए इसका कोई मतलब नहीं होगा। उनकी नजर में मानव जीवन चींटियों के जीवन से अलग नहीं है—उनका कोई मोल नहीं है। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों में अंतरात्मा होती है? जिन लोगों में अंतरात्मा नहीं होती है उनके बारे में कहा जा सकता है कि उनमें कोई मानवता नहीं है। तो क्या व्यापार करते समय दूसरों से धोखाधड़ी और फरेब करने के उनके क्रियाकलाप भ्रष्ट स्वभावों के खुलासे हैं? (हाँ।) इसके भीतर विशिष्ट भ्रष्ट स्वभाव हैं। कौन-से भ्रष्ट स्वभाव? (क्रूरता और धूर्तता।) उनके विशिष्ट और प्रतिनिधि भ्रष्ट स्वभाव धूर्तता और दुष्टता हैं। जो लोग हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट कर सकते हैं वे विशेष रूप से धूर्त होते हैं। कभी-कभी लोगों से धोखाधड़ी और फरेब करने के लिए वे जिन हथकंडों का उपयोग करते हैं वे ऐसे होते हैं जिनकी तुम कभी उम्मीद भी नहीं करोगे और तुम उनके द्वारा ठगे जाते समय काफी खुश भी महसूस कर सकते हो, यह सोचकर कि वे तुम्हारे साथ काफी अच्छा व्यवहार कर रहे हैं। लंबे समय के बाद ही तुम्हारी आँखें खुलती हैं और अचानक तुम्हें एहसास होता है कि तुम्हें बेवकूफ बनाया गया है। और जब तुम उन्हें खोजने जाते हो, तो वे पहले ही बिना कोई सुराग छोड़े गायब हो चुके होते हैं। लोगों को धोखा देने के उनके हथकंडे कितने शातिर हैं! 1980 और 1990 के दशक में चीन के ग्वांगडोंग में उद्योग और वाणिज्य अपेक्षाकृत विकसित थे। कुछ अपेक्षाकृत उन्नत घरेलू उपकरण अभी तक भीतरी इलाकों में नहीं पहुँचे थे, इसलिए कुछ भीतरी इलाकों के लोग नए चलन के साथ बने रहने के लिए उन्हें खरीदने ग्वांगडोंग जाते थे। जब व्यापारियों को एहसास हुआ कि ये ग्राहक भीतरी इलाकों से हैं, तो उन्होंने सोचा, “अरे, इसे ठगा जा सकता है—किसी को ठगने का एक और मौका मिल गया।” भीतरी इलाकों के लोगों ने टेप रिकॉर्डर, टेलीविजन और अन्य उपकरण खरीदे। भुगतान किए जाने के बाद विक्रेताओं ने उन्हें यह भी बताया कि वारंटी अवधि कितनी लंबी है और कहा कि यदि उपकरणों में कोई समस्या आती है, तो वे उन्हें बदलने के लिए वापस आ सकते हैं, जिससे ग्राहकों को लगा कि बिक्री के बाद की सेवा काफी अच्छी है। जब वे जाने वाले थे, तो विक्रेताओं ने कहा कि उन्हें उपकरणों को पैक करने की आवश्यकता है और फिर वे उन्हें पैक करने के लिए पीछे ले गए। लेकिन जब ग्राहक घर पहुँचे और पैकेजिंग खोली, तो उन्हें उपकरणों के बजाय अंदर ईंटों और पत्थरों के अलावा कुछ नहीं मिला—तभी उन्हें एहसास हुआ कि व्यापारियों ने सामान बदल दिया था और उन्हें ठगा गया था। उन्हें खोजने के लिए वापस जाने का सफर बहुत लंबा था और इसमें उनके यात्रा खर्च में बहुत पैसा भी लगता, इसलिए उन्हें चुपचाप नुकसान सहना पड़ा और उन्होंने इस अनुभव से सबक सीखा—जब तुम कुछ खरीदते हो, तो तुम्हें एक हाथ से पैसे देने चाहिए और दूसरे हाथ से सामान लेना चाहिए; यह सुनिश्चित करने के लिए कि तुम्हें वही मिल रहा है जिसके लिए तुमने पैसे दिए हैं, हर चीज की खुद जाँच करनी चाहिए। इस तरह की बात अक्सर उन लोगों के साथ होती है जो बार-बार व्यापारिक यात्राओं पर जाते हैं। अब ऐसी घटनाएँ किसी एक शहर में केवल कभी-कभार होने वाली बात नहीं रह गई हैं, बल्कि आम बात हो गई हैं। हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट की घटनाएँ बढ़ रही हैं और व्यापार करने वाले अधिकाधिक लोग धोखाधड़ी कर रहे हैं। पहले ऐसा इतना ज्यादा क्यों नहीं था? यह केवल इसलिए था क्योंकि उस समय कुछ लोगों ने अभी तक धोखाधड़ी के इन हथकंडों का पता नहीं लगाया था। एक बार जब समाज में धोखाधड़ी के ये हथकंडे प्रचलित हो गए, तो व्यापारियों ने एक के बाद एक उनकी नकल करना और अनुकरण करना शुरू कर दिया; उन सभी ने ऐसा करना शुरू कर दिया। उन सभी ने ऐसा करना शुरू कर दिया—क्या इसका मतलब यह हो सकता है कि बाद में उनकी अंतरात्मा भ्रष्ट हो गई थी? नहीं, इन लोगों में स्वाभाविक रूप से ज्यादा अंतरात्मा नहीं होती है। बात सिर्फ इतनी है कि पहले अपने अनुभव या ज्ञान के स्तर के कारण उन्हें अभी भी यह समझ नहीं आया था कि दूसरों के साथ इस तरह कैसे धोखा और फरेब किया जाए। बाद में सामाजिक परिवेश के भ्रष्ट होने के साथ वे ऐसे काम करने में अधिकाधिक बेरहम और निर्दयी हो गए हैं और उनके क्रियाकलापों की प्रकृति अधिकाधिक नीच हो गई है।
इस तरह के लोग व्यापार करते समय धोखाधड़ी और फरेब के हथकंडों का उपयोग करते हैं, तो क्या वे अन्य काम करते समय भी लोगों को धोखा देंगे और उनसे फरेब करेंगे? (हाँ।) व्यापार करने के उनके साधन और तरीके और धोखाधड़ी और फरेब जैसी चीजों के प्रति उनका रवैया उनकी मानवता को दर्शाता है। उनमें इसी तरह की मानवता होती है, इसलिए वे चाहे जो भी करें—भले ही वह दूसरों को धोखा देना और फरेब करना न हो—वह उससे कुछ बेहतर नहीं होगा। चूँकि इस तरह की मानवता ही वह आधार है जिस पर वे ये काम करते हैं, इसलिए वे चाहे जो भी करें, उसकी प्रकृति मूल रूप से एक ही होती है—वे बस अंतरात्मा की जागरूकता से रहित होते हैं। जब ये लोग अधिकारी बन जाते हैं, तो उनके बोलने और काम करने के तरीके वैसे ही होते हैं जैसे व्यापार करते समय होते हैं—उनमें अंतरात्मा की भूमिका नहीं होती है, वे धोखा देते और फरेब करते हैं, लोगों को नुकसान पहुँचाते हैं, मारते हैं और कानून तोड़ते हैं; वे ऐसा कुछ भी कर सकते हैं जो मानवता, नैतिकता और नैतिक न्याय के खिलाफ जाता है। वे व्यापार के साथ-साथ राजनीति में भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं। यदि वे वैज्ञानिक अनुसंधान में शामिल होते हैं, तो क्या उनका क्षेत्र अलग होने से उनकी मानवता बदल सकती है? नहीं। मुझे बताओ, जब कलीसिया में सामान्य मामलों का काम करने की बात आती है, तो क्या ऐसे लोगों के लिए स्थितियाँ अनुकूल होती हैं? कुछ लोग कहते हैं, “फलाँ व्यक्ति कभी सांसारिक दुनिया में एक बड़ा बॉस या सीईओ था। व्यापार करने के उसके तरीके विशेष रूप से चतुराईपूर्ण हैं, लेकिन बस थोड़े अशोभनीय हैं—कभी-कभी वह लोगों को धोखा देता है और फरेब करता है। मुझे नहीं पता कि कलीसिया में सामान्य मामलों का काम करने के लिए इस तरह के व्यक्ति को पदोन्नत करना उचित है या नहीं।” मुझे बताओ, क्या इस तरह का व्यक्ति एक अच्छा इंसान है? क्या वह वास्तव में प्रतिभाशाली व्यक्ति है? (नहीं।) कुछ लोग हमेशा इन व्यक्तियों को प्रतिभाशाली लोगों के रूप में देखते हैं और समाज में थोड़ी प्रतिष्ठा रखने वाले लोग इन सभी लोगों की सिफारिश करते हैं, यह कहते हुए कि फलाँ व्यक्ति सीईओ या वरिष्ठ कार्यकारी था, कोई अन्य व्यक्ति समाज के शीर्ष दस उत्कृष्ट युवाओं में से एक या अनुकरणीय कार्यकर्ता था और यह कि अन्य लोगों के पास मास्टर या डॉक्टरेट की डिग्री है या उन्होंने वकील, पत्रकार, सिविल सेवक या अधिकारियों के रूप में काम किया है। इन व्यक्तियों की सिफारिश करने वाले लोगों में वास्तव में आध्यात्मिक समझ नहीं होती है और वे सत्य को नहीं समझते हैं। उन्हें बस ऐसा लगता है कि परमेश्वर के घर में विभिन्न कार्य की मदों को समाज में जीवन के सभी क्षेत्रों के इन प्रतिभाशाली लोगों और अभिजात वर्ग द्वारा किया जाना चाहिए, इसलिए वे कार्य की इन मदों के लिए पर्यवेक्षकों के तौर पर इन लोगों की सिफारिश करते हैं। पर्यवेक्षक बनने के बाद वे लोग न केवल काम को अच्छी तरह से सँभालने में विफल रहे, बल्कि उन्होंने इसे पूरी तरह से अस्त-व्यस्त भी कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप कलीसिया के कार्य में हर जगह अराजकता फैल गई—यह बिल्कुल बकवास थी! ये लोग बस इतना कर पाए कि इन्होंने अनुचित जल्दबाजी के साथ काम करने का दुस्साहस किया, कुकर्म करते हुए बेकाबू हो गए, लापरवाह और ढीठ बने रहे और बेशर्मी से कुछ खास काम किया—इसके अलावा कार्य की एक भी मद ऐसी नहीं थी जिसे वे वास्तव में सत्य सिद्धांतों के अनुसार कर सकते थे। इन लोगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जो कुछ भी करते हैं उसमें कभी सत्य की खोज नहीं करते और उनमें परमेश्वर का भय मानने वाले दिल की कमी होती है। वे पर्यवेक्षक बनने में क्यों सक्षम होते हैं? एक कारण यह है कि उनका मानना है कि वे समाज में जीवन के सभी क्षेत्रों के अभिजात वर्ग, प्रतिभाशाली व्यक्ति और स्तंभ हैं, इसलिए वे सोचते हैं कि परमेश्वर के घर में आने के बाद उन्हें प्रमुख पदों को ग्रहण करना चाहिए, बड़ी जिम्मेदारियाँ उठानी चाहिए और महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभानी चाहिए, उनके पास प्रतिष्ठा होनी चाहिए और उन्हें आदर दिया जाना चाहिए और परमेश्वर का घर उनके बिना नहीं चल सकता। इसलिए वे पर्यवेक्षक बनने और काम की जिम्मेदारी लेने की कोशिश करते हुए खुद को सुर्खियों में लाते हैं। दूसरा कारण यह है कि परमेश्वर का घर भी उन्हें अवसर देता है। चूँकि वे काम करने के इच्छुक होते हैं, इसलिए उन्हें इसे आजमाने की अनुमति दी जाती है—भले ही वे सक्षम हों या नहीं, उनकी जाँच-परख करनी पड़ती है। लेकिन इन लोगों में कोई असली प्रतिभा या वास्तविक ज्ञान नहीं होता है। सत्य को समझना और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर पाना तो दूर की बात है—केवल उनकी अपनी काबिलियत, प्रतिभाओं, अंतर्दृष्टि, विभिन्न मामलों को समझने की उनकी क्षमता, चीजों को देखने की उनकी क्षमता और मामलों को सँभालने की उनकी क्षमता के संदर्भ में, उनमें से अधिकांश के पास कोई असली प्रतिभा या वास्तविक ज्ञान नहीं होता है। उनमें कोई असली प्रतिभा या वास्तविक ज्ञान नहीं होता है, तो फिर वे बड़ी जिम्मेदारियाँ लेने और काम का बोझ उठाने के लिए इतने उत्सुक और तत्पर क्यों होते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी महत्वाकांक्षा और घमंड हावी होते हैं और इसके अलावा वे बेशर्म होते हैं—वे अपनी असल हैसियत नहीं जानते, लेकिन हमेशा दिखावा करना चाहते हैं। परिणामस्वरूप वे काम को अच्छी तरह से करने में विफल रहते हैं और केवल अपना मजाक उड़वाते हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि इन लोगों द्वारा ये भूमिकाएँ निभाए जाने के बाद उन्होंने जो भी काम किया वह दिशाहीन और पूरी तरह से अस्त-व्यस्त था। इसे एक शब्द में कहें तो यह “अराजकता” थी। लोगों का उपयोग करने में उनके कोई सिद्धांत नहीं थे, मामलों को सँभालने में कोई सिद्धांत नहीं थे, उन्होंने चढ़ावे को अनुचित तरीके से खर्च किया और विभिन्न कार्य की मदों पर तुरंत अनुवर्ती कार्रवाई नहीं की या उन्हें नहीं सँभाला। यहाँ तक कि सबसे बुनियादी सामान्य मामलों का काम भी उनमें से अधिकांश की क्षमता से बाहर था; उन्होंने हर चीज को पूरी तरह से अव्यवस्थित छोड़ दिया। खेती करना, मुर्गियाँ पालना, भेड़ें पालना—इन कार्यों के लिए इनमें से कोई भी सक्षम नहीं था। किस मौसम में क्या रोपना है, कब खेत जोतना है, कब खाद डालनी है और निराई करनी है और कब फसल काटनी है—इन सब चीजों के बारे में वे अस्पष्ट थे। उन्होंने अपने सारे काम में अराजकता फैला दी। यदि शुरुआत में परमेश्वर के घर ने इन लोगों का उपयोग नहीं किया होता, तो उन्हें लगता कि परमेश्वर का घर उन्हें अवसर नहीं दे रहा है और उन्हें तुच्छ समझ रहा है। इसलिए उन्हें अवसर दिए गए—और उनका उपयोग किए जाने का क्या नतीजा हुआ? उन्होंने अपने काम को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त छोड़ दिया और अंततः परमेश्वर के घर को ही उनकी फैलाई गई अव्यवस्था को ठीक करना पड़ा। उनके द्वारा किए गए कार्य की हर एक मद के लिए ऊपरवाले को निर्देश देने और जाँच-परख करने की आवश्यकता होती थी—यहाँ तक कि घर के अंदर और बाहर की साफ-सफाई बनाए रखने जैसे छोटे मामलों के लिए भी ऊपरवाले को निर्देश देना पड़ता था। अंततः ऊपरवाले द्वारा सख्त पर्यवेक्षण, नियोजन और समन्वय किए जाने, हर चीज को शुरू से थोड़ा-थोड़ा करके निर्देशित और संचालित किए जाने से ही अब काम को मूल रूप से सही रास्ते पर आया हुआ माना जा सकता है। किसी और बात का जिक्र किए बिना—केवल फार्मों से जुड़े मुद्दों की ही बात करें, तो साफ-सफाई का प्रबंधन करने के लिए कम से कम उपयुक्त लोग तो होने ही चाहिए थे। अधिकांश लोग जंगली जानवरों की तरह थे, हर जगह कचरा फेंकते थे, परिवेश पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार किए बिना बोलते थे, चीखते-चिल्लाते थे—वे बिल्कुल अविश्वासियों के समान थे। इन तथाकथित प्रतिभाशाली लोगों में से एक भी व्यक्ति इन ठोस सामान्य मामलों का सामना करते समय चीजों को व्यवस्थित रूप से अच्छी तरह से प्रबंधित नहीं कर सका। वे साफ-सफाई और परिवेश के प्रबंधन जैसे छोटे मामलों को भी अच्छी तरह से नहीं सँभाल सके। इन बाहरी मामलों में सत्य शामिल नहीं होता है और थोड़ी-सी काबिलियत और थोड़ी-सी अंतरात्मा वाले किसी भी व्यक्ति को इन्हें अच्छी तरह से सँभालने में सक्षम होना चाहिए—यदि कोई व्यक्ति इन बाहरी मामलों को भी अच्छी तरह से नहीं सँभाल सकता है, तो वह बिल्कुल बेकार है। अंतरात्मा और विवेक या काबिलियत और प्रतिभा न होने के बावजूद वो लोग अधिकारी बनना और फैसले लेना चाहते थे। जब उन्हें अधिकारी नहीं बनने दिया गया, तो वे विद्रोही हो गए, बहस करने लगे और किसी के आगे नहीं झुके। क्या वे दानव नहीं हैं? परमेश्वर के घर द्वारा इन दानवों को उजागर किए जाने और हटा दिए जाने के बाद फार्म का प्रबंधन करने के लिए उपयुक्त लोगों को चुना गया। ऊपरवाले के मार्गदर्शन और नियोजन की बदौलत फार्म अब बहुत अच्छी तरह से बन गया है और हर कोई इसे पसंद करता है। स्थानीय लोग भी इसकी बहुत प्रशंसा करते हैं और इसका बहुत अनुमोदन करते हैं। उनमें से कुछ ने कहा, “मैंने कभी किसी फार्म को इतना साफ और सुंदर प्रबंधित होते नहीं देखा। हम दस साल में भी इसे इस हद तक नहीं बदल सकते थे। तुम लोग इसे इतनी जल्दी, इतनी अच्छी तरह से कैसे प्रबंधित कर सके? तुम लोगों को इसे ऐसा बनाने में कितने साल लगे?” वास्तव में, इतना बड़ा बदलाव आने में केवल एक वर्ष लगा, जिसने एक बंजर भूमि को ऐसे रूप में बदल दिया जिसे भाई-बहन एक पार्क या बगीचे के रूप में देखते हैं। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि यह जगह किसी परियों के देश जैसी, किसी चित्रकारी जैसी दिखती है। उचित नियोजन और निर्माण वास्तव में बड़ा अंतर पैदा करते हैं। यह जगह मूल रूप से धूल और मिट्टी से ढकी हुई थी और हर जगह कचरा और गंदगी थी। बाद में साफ-सफाई और विनियम के माध्यम से इसमें धीरे-धीरे सुधार हुआ। समय के साथ हर कोई इस तरह के जीवन परिवेश का आदी हो गया है, इस हद तक कि अगर यह थोड़ा गंदा या अव्यवस्थित हो जाता है, तो कुछ लोगों को इसकी आदत भी नहीं रहती है। तुम देखो, इस तरह के प्रबंधन के माध्यम से अधिकांश लोगों को लाभ होता है और वे रहन-सहन की अच्छी आदतें विकसित करते हैं। ऊपरवाले के व्यक्तिगत निर्देश के तहत ही इस तरह का निर्माण संभव हो सका। इसके विपरीत, वास्तव में इन तथाकथित प्रतिभाशाली लोगों में से कोई भी कोई वास्तविक काम नहीं कर सकता है। वे बुनियादी साफ-सफाई का काम भी अच्छी तरह से प्रबंधित नहीं कर सकते। वे नहीं जानते कि किसी कमरे को इस तरह से कैसे व्यवस्थित किया जाए कि वह उपयुक्त दिखे और वे इसकी असलियत नहीं देख पाते कि किस तरह का व्यक्ति कौन-सा कर्तव्य करने के लिए उपयुक्त है। ये लोग किस तरह के काम का बोझ उठा सकते हैं? वे बिल्कुल कोई काम नहीं कर सकते। वे अपने रहन-सहन के परिवेश को भी प्रबंधित नहीं कर सकते—उन्हें प्रतिभाशाली लोग कैसे माना जा सकता है? इन लोगों में इतनी-सी भी बुद्धि नहीं होती, वे स्पष्ट रूप से बात नहीं कर सकते, वे चीजों को गलत नजरिए से देखते हैं और उनमें स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती। इससे पता चलता है कि वे केवल कहने के लिए “प्रतिभाशाली लोग” हैं, न कि असली प्रतिभा और वास्तविक ज्ञान वाले लोग। प्रतिभाशाली लोगों की मानवता में सबसे पहले कुछ गुण होने चाहिए, जैसे चीजों की कद्र करने की क्षमता, चीजों का मूल्यांकन और उनकी कद्र करने की क्षमता और अंतर्दृष्टि। यदि उनमें ये गुण नहीं हैं, तो वे विशिष्ट मामलों को सँभालते समय केवल खुद को शर्मिंदा करते हैं और वे एक अदद बगीचे या एक-दो भूखंडों का प्रबंधन भी नहीं कर सकते और न ही योजना बना सकते हैं—और न ही इसका प्रभावी उपयोग कर सकते हैं—तो ऐसे लोगों में प्रतिभा जैसी कोई बात नहीं होती है। तुमसे पूरी पृथ्वी का प्रबंधन करने की अपेक्षा नहीं की जाती है, तुम्हें बस एक-दो भूखंडों को अच्छी तरह से प्रबंधित करने के लिए दिया गया है, यानी इन्हें इस तरह सँवारना कि ये सुंदर और साफ हो जाएँ और एक आकर्षक परिवेश में बदल जाएँ—लोगों के लिए वहाँ रहना कितना अद्भुत होगा, यहाँ तक कि पक्षी भी एक बार आने के बाद वहाँ से जाना नहीं चाहेंगे। ये तथाकथित प्रतिभाशाली लोग कतई कुछ नहीं हैं। ये कोई ठोस काम नहीं कर सकते। उनमें प्रतिभा जैसी कोई बात बिल्कुल नहीं है—उनकी मानवता में कमियाँ हैं। वे कुछ भी अच्छी तरह से नहीं कर सकते हैं, फिर भी वे अपना दिखावा करना चाहते हैं, अगुआ और कार्यकर्ता बनना चाहते हैं और अभी भी प्रमुख पद ग्रहण करना और पर्यवेक्षक बनना चाहते हैं। यह किस तरह का स्वभाव है? यह एक घमंडी स्वभाव है।
आओ, व्यापार करते समय लोगों के साथ धोखाधड़ी और फरेब करने का शौक होने के विषय पर वापस लौटें। लोगों के साथ धोखाधड़ी और फरेब करना किस तरह की समस्या है? समस्या का एक पहलू यह है कि ऐसे लोगों की मानवता खराब होती है; उनमें अंतरात्मा या विवेक नहीं होता है। उनके व्यवहार के आधार पर देखा जाए, तो वे कौन-से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं? सबसे पहले, ऐसे लोगों का स्वभाव धूर्त और दुष्ट होता है; दूसरा, वे सत्य से विमुख होते हैं और अड़ियल होते हैं। जब वे दूसरों को धोखा देते हैं, तो वे जो निर्दयता दिखाते हैं वह क्रूरता है—चाहे उनका शिकार अमीर हो या गरीब, चाहे शिकार के पास पैसा हो या नहीं, वे उन सभी को एक समान रूप से धोखा देते हैं, कोई दया नहीं दिखाते। ऐसे लोगों के भ्रष्ट स्वभाव हर पहलू में काफी गंभीर होते हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों के लिए उद्धार पाना आसान है? (नहीं।) उनके भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर देखा जाए, तो उनके लिए उद्धार पाना आसान नहीं है। फिर, उनकी मानवता के संदर्भ में, कौन-सा पहलू उनके लिए उद्धार पाना कठिन बनाता है? क्या इसका कोई मूल कारण है? (उनमें कोई अंतरात्मा नहीं होती है।) सही कहा, जिन लोगों में कोई अंतरात्मा नहीं होती है, उनके लिए उद्धार पाना आसान नहीं है। उनमें अंतरात्मा की क्षमता पहले ही खत्म हो चुकी है, यह अब मौजूद नहीं है। अंतरात्मा के कार्य के बिना, व्यक्ति के पास सत्य को स्वीकार करने और सत्य का अभ्यास करने की मूलभूत शर्त नहीं होती है। इस प्रकार, उनके लिए उद्धार पाना बहुत कठिन है; यह भी कहा जा सकता है कि वे उद्धार नहीं पा सकते हैं। यह भी संभव है कि इस प्रकार का व्यक्ति श्रम करने का इच्छुक हो और कुछ हद तक ऐसा कर सके और अंततः, क्योंकि उसका श्रम मानक स्तर का है और वह परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करता है, वह वफादार श्रमिक बन जाएगा और जीवित बचेगा। यह भी परमेश्वर का अनुग्रह है। यद्यपि वफादार श्रमिक जीवित बच सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने उद्धार पा लिया है। जीवित बचना और उद्धार पाना दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। उनके बीच एक अंतर और भेद है। किसी व्यक्ति के क्रियाकलापों के सिद्धांत, सीमाएँ, दिशा और लक्ष्य काफी हद तक इस बात से संबंधित होते हैं कि उसकी मानवता अच्छी है या खराब। यदि कोई व्यक्ति सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है या उसमें न्याय की कुछ भावना है, तो यह दर्शाता है कि उसकी अंतरात्मा में जागरूकता है—यह दर्शाता है कि इस व्यक्ति में थोड़ी अंतरात्मा है। अपने आचरण में, कुछ लोगों में न्याय की कोई भावना नहीं होती है, न ही वे कोई सकारात्मक चुनाव करते हैं। वे बस दुष्ट चीजें करना पसंद करते हैं और सकारात्मक चीजों से बहुत घृणा करते हैं। विशेष रूप से जब कोई कार्य करने के सकारात्मक तरीकों के बारे में थोड़ी बात करता है, इस बारे में कि कैसे किसी को अपने आचरण में मानवता, अंतरात्मा और नैतिक सीमाएँ रखनी चाहिए और नियमों का पालन करना चाहिए, तो वे इसे उपदेश देना मानते हैं। इसे “उपदेश देना” कहना तो बहुत अच्छे से कहना हुआ; वास्तव में, वे तुम्हारा तिरस्कार करते हैं और तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं। उनका मानना है कि इस तरह से आचरण करना एक विफलता है : “देखो तुम्हारा जीवन कितना दयनीय है। तुम्हें हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करना नहीं आता, न ही तुम चालाकी से फायदा उठाना जानते हो। अपने आचरण में, तुम हमेशा इतने नियमबद्ध, इतने डरपोक रहते हो। आज के इस युग में, निडर लोग छककर खाते हैं जबकि डरपोक भूखे मरते हैं। अगर तुम डरपोक हो, तो तुम सफल नहीं होगे!” उनका मानना है कि अंतरात्मा और सिद्धांतों के साथ आचरण करके तुम बस डरपोक बन रहे हो और हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करने का साहस करके वे निडर बन रहे हैं। लेकिन क्या यह वास्तव में इसलिए है क्योंकि वे निडर हैं? बड़े लाल अजगर के देश में परमेश्वर में विश्वास करने वाले कुछ लोग उत्पीड़न सहने और गिरफ्तार होने से नहीं डरते हैं और फिर भी परमेश्वर में विश्वास करने में दृढ़ रहते हैं। क्या इसका निडर या डरपोक होने से कोई लेना-देना है? (नहीं।) यह उनके अनुसरण से संबंधित है—उनकी मानवता में, परमेश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता और लालसा है। यह निडर या डरपोक होने का मामला नहीं है। कुछ लोग व्यापार करते समय हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करते हैं। कई बार उन्हें पीछा किए जाने और गिरफ्तार होने, अपनी संपत्ति जब्त होने या दिवालिया होने और काम बंद होने के जोखिम का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे फिर भी लोगों को धोखा देना जारी रखते हैं। भले ही उनकी धोखाधड़ी के कारण जान का नुकसान होने वाला हो, वे कोई परवाह नहीं करते हैं। कुछ लोग व्यापार करते समय एक फर्जी कंपनी बनाकर दूसरों को धोखा देते हैं—वास्तव में, यह कंपनी बिल्कुल मौजूद नहीं होती है और इसका कोई वास्तविक व्यापार नहीं होता है, न ही यह कोई उत्पाद बनाती है। वे हर जगह लोगों को अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में फँसाकर उनसे ऑर्डर ऐंठते हैं। एक बार जब दूसरे लोग उन्हें अग्रिम राशि दे देते हैं, तो वे तुरंत बिना कोई सुराग छोड़े भाग जाते हैं। वे लोगों को इस तरह धोखा देते हैं, एक के बाद एक लेन-देन करते हैं और पैसे ऐंठने के बाद, उनका पूरा परिवार विलासिता में रहता है, बेहतरीन खाने-पीने का आनंद लेता है। कुछ लोग किस हद तक धोखाधड़ी करते हैं? वे उच्च-स्तरीय संस्थानों और एजेंसियों से भी धोखाधड़ी करते हैं। कभी-कभी वे खतरे की कगार पर होते हैं और यह संभव है कि कोई उनकी चालों की असलियत देख ले और उन्हें उजागर कर दे। वे वास्तव में अपने दिलों में जानते हैं कि उनके क्रियाकलाप उन्हें जोखिम में डाल देंगे, लेकिन वे परवाह नहीं करते। यदि किसी संयोग से वे बच निकलते हैं, तो वे अगले अवसर पर लोगों को धोखा देना जारी रखेंगे। अगर वे अपनी धोखाधड़ी के माध्यम से पैसा कमा लेते हैं, तो वे सोचते हैं कि वे जीत गए हैं, उन्होंने “प्रसिद्धि और सफलता प्राप्त कर ली है।” जब वे सभी तरह की छल-कपट और धोखाधड़ी में शामिल होते हैं, तो उन्हें खतरे का या गिरफ्तार होने का डर नहीं होता, लेकिन अगर तुम उनसे परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कहो, तो वे ऐसा करने की हिम्मत नहीं करते। वे कहते हैं, “परमेश्वर में विश्वास करने से सरकार मुझे दोषी ठहराएगी और गिरफ्तार कर लेगी। मैं विश्वास करने की हिम्मत नहीं करता!” यदि तुम सभाओं में जाते हो, तो वे यहाँ तक कहते हैं, “तुम सच में बहुत निडर हो। सरकार अभी विश्वासियों को बेहद क्रूरता से गिरफ्तार कर रही है और सता रही है; तुम अभी भी सभाओं में जाने की हिम्मत कैसे कर सकते हो?” तुम कहते हो, “हम जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं, गिरफ्तार होने से नहीं डरते। तुम लोगों के लिए फर्जी कंपनियाँ चलाना और धोखाधड़ी करना बेहद खतरनाक है—तुम क्यों नहीं डरते?” वे कहते हैं, “हम पैसा कमाने के लिए व्यापार करते हैं। हम खतरे से नहीं डरते। अगर कुछ हो भी जाए, तो ज्यादा से ज्यादा हम पर जुर्माना लग जाएगा और बात वहीं खत्म हो जाएगी। अगर परमेश्वर में विश्वास करने वाले तुम लोग गिरफ्तार हो जाते हो, तो भले ही तुम्हें पीट-पीटकर मार न डाला जाए, फिर भी तुम्हारी चमड़ी तो उधेड़ ही दी जाएगी और न जाने कितने साल तुम्हें जेल में बिताने पड़ें। तुम लोगों में बहुत ज्यादा हिम्मत है!” जब वे देखते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है, तो वे विश्वास करने की हिम्मत नहीं करते, लेकिन वे व्यापार करते समय धोखाधड़ी करने के लिए गिरफ्तार होने से नहीं डरते। वे किस तरह के नीच इंसान हैं? क्या यह लोगों की मानवता में अंतर नहीं दिखाता है? लोगों के बीच ठीक यही अंतर होता है। लोगों के भ्रष्ट स्वभाव एक जैसे होते हैं—उन सभी में वही भ्रष्ट स्वभाव होते हैं—लेकिन उनकी मानवता में अंतर के आधार पर देखा जाए, तो कुछ लोग कभी भी परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाएँगे; वे कभी परमेश्वर के घर के सदस्य नहीं बन सकते। भले ही ऐसे लोग परमेश्वर में विश्वास कर लें, वे कभी उद्धार नहीं पा सकते। इसे किस पहलू से देखा जा सकता है? इसे उनकी मानवता से देखा जा सकता है। कुछ लोग अपनी पत्नियों के परमेश्वर में विश्वास करने का समर्थन करते हैं, लेकिन जब उनकी पत्नियाँ उनसे विश्वास करने का आग्रह करती हैं, तो वे कहते हैं कि यह बहुत खतरनाक है और वे ऐसा करने की हिम्मत नहीं करते। फिर भी व्यापार करते समय वे हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करते हैं और चाहे उन्हें कितने भी खतरे का सामना क्यों न करना पड़े, उन्हें कोई परवाह नहीं होती। वे कोई भी कानून तोड़ सकते हैं और किसी भी हथकंडे का उपयोग करने की हिम्मत कर सकते हैं। सरकार चाहे कितनी भी कड़ी निगरानी क्यों न रखे या कानून के तहत कैसी भी दोषसिद्धि और सजा क्यों न दी जाए, उन्हें कोई परवाह नहीं होती। उनके आचरण की कोई सीमाएँ नहीं होतीं, काम करते समय उन्हें परिणामों की कोई परवाह नहीं होती और वे सोचते हैं कि जब तक मुनाफा हो रहा है, तब तक सब कुछ ठीक है। यदि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है, तो वह सत्य प्राप्त नहीं कर सकता और वह उद्धार नहीं पा सकता—ऐसा इसलिए है क्योंकि वह सत्य से नहीं, बल्कि केवल पैसे से प्रेम करता है। जब तक वह व्यापार करता है, वह दूसरों को ठगेगा और धोखा देगा और चीजों में हेराफेरी करेगा—उसका काला दिल खुद को अभिव्यक्त कर देता है। इस तरह के चरित्र वाला व्यक्ति पूरी तरह से बर्बाद है; परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति को नहीं बचाता है। कुछ लोग कहते हैं, “यदि इस तरह का व्यक्ति बहुत पैसा कमाता है और उसे परमेश्वर के घर को भेंट कर देता है, तो क्या होगा?” परमेश्वर का घर ऐसे पैसे को स्वीकार नहीं करता; परमेश्वर का घर वह पैसा स्वीकार नहीं करता जो वैध साधनों से न कमाया गया हो। उस तरह का व्यक्ति व्यापार करते ही हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करेगा—उसकी मानवता बहुत खराब होती है। यह कितनी खराब होती है? यदि तुम उससे अपनी अंतरात्मा को टटोलने के लिए कहते हो, तो वह कहता है, “मुझे कुछ भी महसूस नहीं होता। मुझे नहीं पता कि मेरी अंतरात्मा कहाँ है। मुझे यह भी नहीं पता कि अंतरात्मा क्या होती है या यह किस भाव में बिकती है।” उस क्षण तुम समझ जाते हो : “तभी तो वह उसी व्यापार में लगे अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा तेजी से पैसा कमाता है। तभी तो सभी ग्राहक उसी से सामान खरीदने जाते हैं। यह व्यक्ति कुटिल हथकंडों का उपयोग करता है—व्यापार करते समय वह धूर्त तरीके आजमाता है और उसका धोखाधड़ी वाला व्यवहार वाकई बहुत गंभीर है!” लेकिन वह न केवल इसे शर्मनाक नहीं मानता, बल्कि वह डींगें मारते और शेखी बघारते हुए कहता है, “तुम लोगों को देखो, जो पूरी गंभीरता से और सही तरीके से व्यापार करते हो। तुम एक बार किसी को धोखा देते हो और इतने डर जाते हो कि तुम्हारा दिल धक-धक करने लगता है। मुझे देखो—मैं नहीं डरता! जब तक उद्योग और वाणिज्य ब्यूरो और पुलिस को कोई सबूत नहीं मिलता, तब तक सब ठीक है। मुझ पर मुकदमा करना चाहते हो? तुम्हारे पास कोई सबूत नहीं है! देखो मैं कितनी चतुराई से लोगों को धोखा देता हूँ! क्या तुम ऐसा कर सकते हो? तुम नहीं कर सकते! जैसे ही तुम किसी को धोखा देते हो, तुम अपनी पोल खोल देते हो। तुम्हारे पास मेरे जैसे हथकंडे नहीं हैं। तुम्हारी काबिलियत खराब है!” यह किस तरह का व्यक्ति है? वह एक दुष्ट व्यक्ति है। क्या ऐसे लोगों के छुटकारे की कोई उम्मीद है? उनके छुटकारे की कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसा इसलिए नहीं है कि ऐसे लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होने के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सकता, बल्कि इसलिए है क्योंकि उनकी मानवता बहुत खराब होती है। किस तरह से खराब होती है? इस तरह से खराब कि उनमें कोई मानवता और कोई अंतरात्मा नहीं होती; उन्होंने अपनी अंतरात्मा खो दी है। अपनी अंतरात्मा खो देने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अंतरात्मा की सीमाओं के बिना काम करना। ये सीमाएँ अंतरात्मा की नींव पर बनी होती हैं—अंतरात्मा ही सीमाएँ तय करती है। व्यापार करते समय हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करके तुम चाहे जिसे भी ठगो, चाहे वह बुरा व्यक्ति हो या अच्छा व्यक्ति, किसी भी स्थिति में, यह काम अपने आप में नैतिकता, अंतरात्मा और मानवता के खिलाफ जाता है। एक बार ऐसा काम हो जाने पर, तुम हमेशा के लिए अपनी अंतरात्मा में आत्म-ग्लानि महसूस करोगे। यह जीवन भर का कलंक बन जाएगा। यदि तुम वास्तव में इंसान हो, तो तुम्हें ऐसा काम कभी नहीं करना चाहिए। तुम्हारी धोखाधड़ी का शिकार चाहे जो भी हो और तुम चाहे कितने भी पैसे की धोखाधड़ी करो—भले ही तुम दुष्ट लोगों और बुरे लोगों के साथ धोखाधड़ी करो—यह फिर भी धोखाधड़ी ही है। इसलिए परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों या तुम चाहे जिससे भी व्यवहार कर रहे हो, तुम्हें कभी लोगों को धोखा नहीं देना चाहिए। यह अपने आचरण में अंतरात्मा की सीमाएँ रखना है और यह वह संयम रखने वाली शक्ति है जो अंतरात्मा के कार्य से आती है। यदि तुममें अंतरात्मा का कार्य है, तो तुम जो भी करते हो उसमें तुम्हारी सीमाएँ होंगी। यदि तुममें अंतरात्मा का कार्य नहीं है, तो तुम उन सीमाओं को पार कर जाओगे और कुछ भी करने में सक्षम होगे। यह कहा जा सकता है कि इस तरह के व्यक्तियों में रत्ती भर भी अंतरात्मा और विवेक नहीं होता है और वे जानवरों से भी बदतर होते हैं। यदि कुछ लोगों को लगता है कि यह कथन बहुत अतिवादी है, तो आओ इसे दूसरे तरीके से कहें : रत्ती भर भी विवेक न रखने वाला व्यक्ति जानवर के समान है। क्या मानवता से रहित लोग जानवर नहीं हैं? यदि कोई इंसान है फिर भी उसमें कोई मानवता नहीं है, तो उसका सार क्या है? क्या यह किसी जानवर का सार नहीं है? उनके और जानवर के बीच का अंतर यह है कि वे सीधे चल सकते हैं और उनकी एक भाषा है, जबकि जानवरों में मानवीय भाषा की क्षमता नहीं होती है। मुनाफा कमाने के लिए तुम हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करने के वास्ते सभी प्रकार के साधनों और तरीकों का उपयोग करने में सक्षम हो, जबकि जानवरों के पास ऐसा कोई साधन नहीं होता है। इसलिए यह कहना कि इस तरह के लोग जानवरों के बराबर हैं, वास्तव में उनके साथ नरमी बरतना है—असल में ऐसे लोग वाकई जानवरों से भी बदतर होते हैं। क्या जानवरों से भी बदतर लोग उद्धार पा सकते हैं? वे रत्ती भर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं—वे केवल पैसे से प्रेम करते हैं। यह उनकी प्रकृति की समस्या है और कोई इसे बदल नहीं सकता। ऐसे लोगों से सत्य को स्वीकार करने की उम्मीद करना मुर्गे से अंडे देने की उम्मीद करने जैसा है—ऐसा कभी नहीं होगा। इसलिए भ्रष्ट मानवजाति के बीच, उन लोगों को छोड़कर जो मुनाफे के लिए हत्या करते हैं या आपराधिक कृत्य करते हैं और कानून तोड़ते हैं, हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करने वाले इन लोगों की मानवता सबसे खराब मानी जा सकती है—वे मानवजाति का कचरा हैं, मानवजाति के पतित लोग हैं। महान आर्थिक समृद्धि के इस वर्तमान युग में, व्यापार करते समय हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करने वाले ऐसे लोगों की संख्या असाधारण रूप से अधिक है। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या चाहे कितनी भी क्यों न हो, किसी भी स्थिति में, ऐसी अभिव्यक्तियाँ मानवता की समस्या को दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं। किसी व्यक्ति की अंतरात्मा कैसी है, साथ ही क्या उसमें अंतरात्मा की सीमाएँ हैं—यह उसकी मानवता को मापने का एक पैमाना है। जिस व्यक्ति में मानवता ही नहीं है, उसे भला कैसे बचाया जा सकता है? कम से कम, किसी व्यक्ति की मानवता में सत्य को स्वीकार करने की स्थितियाँ होनी चाहिए। जो लोग हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करते हैं, उनकी मानवता में मूल रूप से सत्य को स्वीकार करने की स्थितियाँ नहीं होती हैं। इसलिए यदि तुम उनसे अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागने के लिए सत्य को स्वीकार करने को कहते हो, तो उनके लिए ऐसा कर पाना असंभव होगा। केवल अंतरात्मा और विवेक वाले लोग ही सत्य को स्वीकार कर सकते हैं और अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्याग सकते हैं और इस प्रकार उद्धार पा सकते हैं, क्योंकि उनकी अंतरात्मा में एक निश्चित स्तर की जागरूकता होती है और जब वे आचरण और कार्य करते हैं, तो उनकी अंतरात्मा एक निश्चित कार्य कर सकती है। जब तुम ऐसे लोगों के साथ सत्य पर संगति करते हो और इस बारे में बात करते हो कि सत्य में प्रवेश कैसे करें, भ्रष्ट स्वभावों को कैसे त्यागें, कौन-सी चीजें परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हैं और कौन-सी नहीं और लोगों को कैसे कार्य करना चाहिए, तो वे स्वीकार और समर्पण कर सकते हैं। ऐसे लोगों के साथ सत्य पर संगति करना उचित है—वे सही प्राप्तकर्ता हैं। यदि तुम उन लोगों के साथ सत्य पर संगति करते हो जिनका व्यापार करने का प्राथमिक साधन दूसरों से धोखाधड़ी और फरेब करना है, तो यह दीवार से बात करने के समान है। इसलिए जब व्यापार करने वाले ऐसे लोगों की बात आती है, तो बस यह देखो कि क्या वे व्यापार करने में और लोगों के साथ अपने लेन-देन और व्यवहार में वैध साधनों का उपयोग करते हैं, क्या उनमें अंतरात्मा का संयम और सीमाएँ हैं और क्या लोगों के साथ उनके लेन-देन और व्यवहार में उनकी अंतरात्मा कार्य कर सकती है। यदि किसी व्यक्ति की अंतरात्मा कार्य कर सकती है और उस पर संयम रख सकती है, तो वह स्वीकार्य है और उसके साथ मेल-जोल रखना सार्थक है। ऐसे लोगों को सुसमाचार का उपदेश दिया जा सकता है और सत्य पर संगति की जा सकती है। यदि वे सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, तो उनके लिए उद्धार पाने की उम्मीद है। व्यापार करने का शौक होने के विषय पर हमारी चर्चा के लिए बस इतना ही।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?