परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" | अंश 41

अपने समस्त प्रबंधन में परमेश्वर का कार्य पूर्णतः स्पष्ट है : अनुग्रह का युग अनुग्रह का युग है, और अंत के दिन अंत के दिन हैं। प्रत्येक युग के बीच सुस्पष्ट भिन्नताएँ हैं, क्योंकि प्रत्येक युग में परमेश्वर उस कार्य को करता है, जो उस युग का प्रतिनिधि होता है। अंत के दिनों का कार्य किए जाने के लिए, युग का अंत करने के लिए ज्वलन, न्याय, ताड़ना, कोप और विनाश होने आवश्यक हैं। अंत के दिन अंतिम युग को संदर्भित करते हैं। अंतिम युग के दौरान क्या परमेश्वर युग का अंत नहीं करेगा? युग समाप्त करने के लिए परमेश्वर को अपने साथ ताड़ना और न्याय लाने आवश्यक हैं। केवल इसी तरह से वह युग को समाप्त कर सकता है। यीशु का प्रयोजन यह था कि मनुष्य का अस्तित्व बचा रह सके, वह जीवित रह सके और एक बेहतर तरीके से विद्यमान रह सके। उसने मनुष्य को पाप से बचाया, ताकि उसका अनैतिकता में डूबना रुक सके और वह अब और अधोलोक व नरक में न रहे, और मनुष्य को अधोलोक व नरक से बचाकर यीशु ने मनुष्य को जीते रहने दिया। अब अंत के दिन आ गए हैं। परमेश्वर मनुष्य का विनाश कर देगा और मानवजाति को पूरी तरह से नष्ट कर देगा, अर्थात्, वह मानवजाति की विद्रोहशीलता को रूपांतरित कर देगा। इस कारण से, अतीत के करुणामय और प्रेममय स्वभाव के साथ परमेश्वर के लिए युग को समाप्त करना या प्रबंधऩ की अपनी छह-हजार-वर्षीय योजना को सफल बनाना असंभव होगा। हर युग में परमेश्वर के स्वभाव का एक विशिष्ट प्रतिनिधित्व होता है, और हर युग में ऐसा कार्य होता है, जिसे परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए, प्रत्येक युग में स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य में उसके सच्चे स्वभाव की अभिव्यक्ति शामिल रहती है, और उसका नाम और उसका कार्य दोनों युग के साथ बदल जाते हैं—वे सब नए होते हैं। व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा के नाम से मानवजाति का मार्गदर्शन करने का कार्य किया गया था, और पृथ्वी पर कार्य का पहला चरण आरंभ किया गया था। इस चरण के कार्य में मंदिर और वेदी का निर्माण करना, और इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था का उपयोग करना और उनके बीच कार्य करना शामिल था। इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करके उसने पृथ्वी पर अपने कार्य के लिए एक आधार स्थापित किया। इस आधार से उसने अपने कार्य का विस्तार इस्राएल से बाहर किया, जिसका अर्थ है कि इस्राएल से शुरू करके उसने अपने कार्य का बाहर विस्तार किया, जिससे बाद की पीढ़ियों को धीरे-धीरे पता चला कि यहोवा परमेश्वर था, और कि वह यहोवा ही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का निर्माण किया, और कि वह यहोवा ही था, जिसने सभी प्राणियों को सिरजा था। उसने इस्राएल के लोगों के माध्यम से अपने कार्य को उनसे परे फैलाया। इस्राएल की भूमि पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का पहला पवित्र स्थान थी, और इस्राएल की भूमि पर ही परमेश्वर पृथ्वी पर सबसे पहले कार्य करने गया। वह व्यवस्था के युग का कार्य था। अनुग्रह के युग के दौरान, यीशु परमेश्वर था, जिसने मनुष्य को बचाया। उसका स्वरूप अनुग्रह, प्रेम, करुणा, संयम, धैर्य, विनम्रता, देखभाल और सहिष्णुता का था, और उसने जो इतना अधिक कार्य किया, वह मनुष्य के छुटकारे की खातिर किया। उसका स्वभाव करुणा और प्रेम का था, और चूँकि वह करुणामय और प्रेममय था, इसलिए उसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ना पड़ा, यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर मनुष्य से उसी प्रकार प्रेम करता है, जैसे वह स्वयं से करता है, यहाँ तक कि उसने स्वयं को अपनी संपूर्णता में बलिदान कर दिया। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यीशु था, अर्थात्, परमेश्वर ऐसा परमेश्वर था जिसने मनुष्य को बचाया, और वह एक करुणामय और प्रेममय परमेश्वर था। परमेश्वर मनुष्य के साथ था। उसका प्रेम, उसकी करुणा और उसका उद्धार प्रत्येक व्यक्ति के साथ था। केवल यीशु के नाम और उसकी उपस्थिति को स्वीकार करके ही मनुष्य शांति और आनंद प्राप्त करने, उसका आशीष, उसके व्यापक और विपुल अनुग्रह तथा उसका उद्धार प्राप्त करने में समर्थ था। यीशु को सलीब पर चढ़ाने के माध्यम से, उसका अनुसरण करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्राप्त हो गया और उनके पाप क्षमा कर दिए गए। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यीशु था। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग का कार्य मुख्यतः यीशु के नाम से किया गया था। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर को यीशु कहा गया। उसने पुराने विधान से परे नए कार्य का एक चरण शुरू किया, और उसका कार्य सलीब पर चढ़ाए जाने के साथ समाप्त हो गया। यह उसके कार्य की संपूर्णता थी। इसलिए, व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यहोवा था, और अनुग्रह के युग में यीशु के नाम ने परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। अंत के दिनों के दौरान उसका नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर—सर्वशक्तिमान है, जो अपने सामर्थ्य का उपयोग मनुष्य का मार्गदर्शन करने, मनुष्य को जीतने, मनुष्य को प्राप्त करने, और अंत में, युग का समापन करने के लिए करता है। हर युग में, कार्य के उसके हर चरण में, परमेश्वर का स्वभाव प्रकट होता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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