परमेश्वर के दैनिक वचन | "विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" | अंश 31

अंत के दिन वे होते हैं जब सभी वस्तुएँ जीतने के द्वारा किस्म के अनुसार वर्गीकृत की जाएँगी। जीतना, अंत के दिनों का कार्य है; दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अंत के दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों का वर्गीकरण किस प्रकार किया जाएगा? तुम सब में किया जाने वाला वर्गीकरण का कार्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसे कार्य का आरम्भ है। इसके पश्चात, समस्त देशों को और सभी लोगों में भी विजय-कार्य किया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, वह न्याय किए जाने के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आएगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकती और न ही कोई व्यक्ति और वस्तु ऐसी है जिसका किस्म के अनुसार वर्गीकरण नहीं किया जाता; प्रत्येक को वर्गीकृत किया जाएगा, क्योंकि समस्त वस्तुओं का अन्त निकट आ रहा है और जो भी स्वर्ग में और पृथ्वी पर है, वह अपने अंत पर पहुँच गया है। मनुष्य मानवीय अस्तित्व के अंतिम दिनों से कैसे बच सकता है? और इस प्रकार, तुम सब और कितनी देर तक अपनी अनाज्ञाकारिता के कार्य को जारी रख सकते हो? क्या तुम सब नहीं देखते कि तुम्हारे अन्तिम दिन सन्निकट हैं। वे जो परमेश्वर का सम्मान करते हैं और उसके प्रकट होने की प्रतीक्षा करते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के प्रकटन के दिन को कैसे नहीं देख सकते? वे नेकी के लिए अन्तिम पुरस्कार कैसे नहीं प्राप्त कर सकते? क्या तुम वह व्यक्ति हो, जो भला करता है या वह जो बुरा करता है? क्या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है और फिर आज्ञापालन करता है या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है फिर शापित किया जाता है? क्या तुम न्याय के सिंहासन के समक्ष प्रकाश में जीते हो या तुम अधोलोक के अन्धकार के बीच जीते हो? क्या तुम्हीं साफ तौर पर नहीं जानते हो कि तुम्हारा अंत पुरस्कार पाने का होगा या दंड? क्या तुम बहुत साफ तौर पर एवं गहराई से नहीं समझते हो कि परमेश्वर धार्मिक है? तो तुम्हारा आचरण और तुम्हारा हृदय किस प्रकार का है? आज जब मैं तुम्हें जीतता हूँ, तो क्या मुझे तुम्हें वास्तव में यह बताने की आवश्यकता है कि तुम्हारा आचरण भला है या बुरा? तुमने मेरे लिए कितना त्याग किया है? तुम मेरी आराधना कितनी गहराई से करते हो? क्या तुम स्वयं अच्छी तरह से नहीं जानते कि तुम मेरे प्रति कैसा व्यवहार करते हो? किसी और से ज़्यादा खुद तुम्हें अच्छी तरह ज्ञात होना चाहिए कि आखिरकार तुम्हारा अन्त क्या होगा! मैं तुम्हें सच कहता हूँ : मैंने ही मनुष्यजाति को सृजा है और मैंने ही तुम्हें सृजा है; परन्तु मैंने तुम लोगों को शैतान के हाथों में नहीं दिया; और न ही मैंने जानबूझकर तुम्हें अपने विरुद्ध किया या मेरा विरोध करने दिया और इस प्रकार तुम्हें दण्डित किया। क्या ये सब विपत्तियाँ और पीड़ाएँ तुमने इसलिए नहीं सहीं हैं, क्योंकि तुम्हारे हृदय अत्यधिक कठोर और तुम्हारा आचरण अत्यधिक घृणित है। अत:, क्या तुम सबने अपना अन्त स्वयं निर्धारित नहीं किया है? क्या तुम अपने हृदय में, इस बात को दूसरों से बेहतर नहीं जानते कि तुम सब का अंत कैसा होगा? मैं लोगों को इसलिए जीतता हूँ, क्योंकि मैं उन्हें प्रकट करना और तुम्हारा उद्धार करना चाहता हूँ। यह तुम से बुरा करवाने या जानबूझकर तुम्हें विनाश के नरक में ले जाने के लिए नहीं है। समय आने पर, तुम्हारी समस्त भयानक पीड़ाएँ, तुम्हारा रोना और दाँत पीसना—क्या यह सब तुम्हारे पापों के कारण नहीं होगा? इस प्रकार, क्या तुम्हारी अपनी भलाई या तुम्हारी अपनी बुराई ही तुम्हारा सर्वोत्तम न्याय नहीं है? क्या यह उसका सर्वोत्तम प्रमाण नहीं है कि तुम्हारा अन्त क्या होगा?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

जीत का अंतिम चरण है इंसान को बचाने के लिए

है आख़िरी चरण जीत का, इंसान को बचाने के लिये, उसके अंत को ज़ाहिर करने के लिये, न्याय के ज़रिये उसके पतन का खुलासा करने के लिये। इस तरह पश्चाताप करने और ऊपर उठने में मदद के लिये, जीवन और इंसानी ज़िंदगी की सही राह पर चलने के लिये। है आख़िरी चरण की जीत बेसुध लोगों के दिलों को जगाने के लिये, न्याय के ज़रिये उनके विद्रोहीपन को दिखाने के लिये। अगर नहीं कर पाते पश्चाताप, भ्रष्टता को दर-किनार अब भी, और नहीं कर पाते हैं इंसानी ज़िंदगी की सही राह का अनुसरण अब भी, तो बन जाएँगे वो लोग ऐसे, बचाया न जा सकेगा जिन्हें, शैतान निगल जाएगा जिन्हें। जीत के मायने हैं इंसान को बचाना, और उसे उसका अंत दिखाना, अच्छा हो, बुरा हो, बचाया गया हो या अभिशप्त हो, व्यक्त होता है सबकुछ जीत के काम से।

अंत के दिन होते हैं जब जीत के ज़रिये, वर्गीकरण किया जाता है उनके स्वभाव के अनुसार चीज़ों का। इंसान को जीतना और उसके पापों का न्याय करना, काम है ये अंत के दिनों का। पूरी कायनात में ये वर्गीकृत करता है इंसान को। पूरी दुनिया के लोगों को जीत के काम से गुज़रना होगा, न्याय-पीठ के सामने आना होगा। जीत के मायने हैं इंसान को बचाना, और उसे उसका अंत दिखाना, अच्छा हो, बुरा हो, बचाया गया हो या अभिशप्त हो, व्यक्त होता है सबकुछ जीत के काम से।

सृजित जीवों का उनके स्वभाव के अनुसार वर्गीकरण होगा। न्याय-पीठ के सामने उनका न्याय होगा। न्याय से कोई चीज़, कोई इंसान बच नहीं सकता। स्वभाव के अनुसार इस वर्गीकरण से कोई चीज़, कोई इंसान बच नहीं सकता। सभी छाँटे जाएँगे चूँकि अंत निकट है हर चीज़ का। तमाम स्वर्ग, धरती तमाम, अपने परिणाम पर पहुँचेंगे। जीत के मायने हैं इंसान को बचाना, और उसे उसका अंत दिखाना, अच्छा हो, बुरा हो, बचाया गया हो या अभिशप्त हो, व्यक्त होता है सबकुछ जीत के काम से।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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