परमेश्वर के दैनिक वचन | "विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" | अंश 29

मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करनी बंद कर दी है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, तो यहोवा की महिमा और साक्ष्य सर्वदा उपस्थित था। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस महिमा और साक्ष्य को खो दिया, क्योंकि सभी ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और उसके प्रति श्रद्धा दिखाना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज का विजय कार्य उस सम्पूर्ण साक्ष्य और उस सम्पूर्ण महिमा को पुनः प्राप्त करने और सभी मनुष्यों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, जिससे सृजित जीवों के बीच साक्ष्य हो; कार्य के इस चरण के दौरान यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति किस प्रकार जीती जानी है? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए इस चरण के वचनों के कार्य का प्रयोग करके; उसे पूर्णत: अधीन बनाने के लिए, खुलासे, न्याय, ताड़ना और निर्मम शाप का प्रयोग करके; मनुष्य के विद्रोहीपन के खुलासे और उसके विरोध का न्याय करके, ताकि वह मानवजाति की अधार्मिकता और मलिनता को जान सके और इस तरह वह इनका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विषमता के रूप में कर सके। मुख्यतः, मनुष्य को इन्हीं वचनों से जीता और पूर्णत: कायल किया जाता है। वचन मनुष्यजाति को अन्तिम रूप से जीत लेने के साधन हैं, और वे सभी जो परमेश्वर की जीत को स्वीकार करते हैं, उन्हें उसके वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना चाहिए। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की ही प्रक्रिया है। और लोगों को किस प्रकार सहयोग देना चाहिए? यह जानकर कि इन वचनों को कैसे खाना-पीना है और उनकी समझ हासिल करके। जहाँ तक लोग कैसे जीते जाते हैं इस की बात है, इसे इंसान खुद नहीं कर सकता। तुम सिर्फ इतना कर सकते हो कि इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अपनी अधार्मिकता को जानकर, परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो सकते हो। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझकर, इसे अभ्यास में ला सको, और अगर तुम्हारे पास दर्शन हों, और इन वचनों के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो सकते हो, और खुद कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम जीत लिए जाओगे और ये उन वचनों का परिणाम होगा। मनुष्यजाति ने साक्ष्य क्यों खो दिया? क्योंकि कोई भी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, क्योंकि लोगों के हृदयों में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। मनुष्यजाति की जीत लोगों के विश्वास की बहाली है। लोग हमेशा अंधाधुंध लौकिक संसार की ओर भागना चाहते हैं, वे अनेक आशाएँ रखते हैं, अपने भविष्य के लिए बहुत अधिक चाहते हैं और उनकी अनेक अनावश्यक मांगें हैं। वे हमेशा अपने शरीर के विषय में सोचते, शरीर के लिए योजनाएं बनाते रहते हैं, उनकी रुचि कभी भी परमेश्वर में विश्वास रखने के मार्ग की खोज में नहीं होती। उनके हृदय को शैतान के द्वारा छीन लिया गया है, उन्होंने परमेश्वर के लिए अपने सम्मान को खो दिया है, और उनका हृदय शैतान की ओर टकटकी लगाए रहता है परन्तु मनुष्य की सृष्टि परमेश्वर के द्वारा की गई थी। इसलिए, मनुष्य परमेश्वर के साक्ष्य को खो चुका है, अर्थात वह परमेश्वर की महिमा को खो चुका है। मनुष्य को जीतने का उद्देश्य परमेश्वर के लिए मनुष्य की श्रद्धा की महिमा को पुनः प्राप्त करना है। इसे इस प्रकार कहा जा सकता है : ऐसे अनेक लोग हैं जो जीवन की खोज नहीं करते; यदि कुछ हैं भी तो, उनकी संख्या को उँगलियों पर गिना जा सकता है। लोग अपने भविष्य के विषय में चिन्तित रहते हैं और जीवन की ओर ज़रा-सा भी ध्यान नहीं देते। कुछ लोग परमेश्वर से विद्रोह और उसका विरोध करते हैं, उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाते हैं और सत्य का अभ्यास नहीं करते। इन लोगों को फिलहाल अनदेखा कर दिया गया है; फिलहाल विद्रोह के इन पुत्रों का कुछ नहीं किया जाता है, लेकिन भविष्य में तुम विलाप करते और दाँत पीसते हुए अन्धकार में रहोगे। जब तुम ज्योति में रह रहे होते हो तो उसकी बहूमूल्यता का अनुभव नहीं करते, परन्तु जब तुम अँधेरी रात में रहने लगोगे, तब तुम इसकी बहुमूल्यता को जान जाओगे। तब तुम्हें अफसोस होगा। अभी तुम्हें अच्छा लगता है, परन्तु वह दिन आएगा जब तुम्हें अफसोस होगा। जब वह दिन आएगा और अन्धकार नीचे उतरेगा और रोशनी फिर कभी नहीं होगी, तब तुम्हारे पास अफसोस करने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। क्योंकि तुम अभी भी आज के कार्य को नहीं समझते हो, इसलिए तुम अभी तुम्हारे पास जो समय है उसे संजोने में असफल हो। एक बार जब सम्पूर्ण कायनात का कार्य आरम्भ हो जाएगा अर्थात जो कुछ मैं आज कह रहा हूँ, जब वह पूर्ण हो चुका होगा, तो अनेक लोग अपना सर पकड़कर दु:ख के आँसू बहाएँगे। ऐसा करते समय, क्या वे रोते और दांत पीसते हुए अन्धकार में नहीं गिर चुके होंगे? जो लोग वास्तव में जीवन की खोज करते हैं और जिन्हें पूर्ण बना दिया गया है, उनका उपयोग किया जा सकता है, जबकि विद्रोह के समस्त पुत्र, जो उपयोग किए जाने के लिए अनुपयुक्त हैं, अन्धकार में गिरेंगे। उन्हें पवित्र आत्मा का कोई भी कार्य प्राप्त नहीं होगा, और वे किसी भी चीज़ का अर्थ समझने में असक्षम होंगे। रो-रोकर उनका बुरा हाल होगा, वे दंड में झोंक दिये जाएँगे। कार्य के इस चरण में यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित हो और तुम जीवन में विकसित हो चुके हो, तब तुम उपयोग किए जाने के उपयुक्त हो। यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित नहीं हो, तब अगर तुम्हें कार्य के अगले चरण के लिए बुलाया भी गया है, तो भी इस मुकाम पर इस्तेमाल के लिए अनुपयुक्त ही रहोगे, यदि तुम स्वयं को तैयार करना भी चाहोगे, तो भी तुम्हें दूसरा अवसर नहीं मिलेगा। परमेश्वर जा चुका होगा; तब तुम इस प्रकार का अवसर प्राप्त करने के लिए कहाँ जाओगे, जो अभी तुम्हारे समक्ष है? तब तुम उस अभ्यास को प्राप्त करने कहाँ जाओगे, जो परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध करवाया गया है? उस समय तक, परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से बात नहीं करेगा, और न ही अपनी वाणी प्रदान करेगा; तुम मात्र वही पढ़ने के योग्य होगे जो आज कहा जा रहा है; तो फिर सरलता से समझ कैसे मिलेगी? भविष्य का जीवन आज के जीवन से किस प्रकार बेहतर बन पायेगा? उस समय, क्या रोते और दाँत पीसते हुए तुम एक जीवित मृत्यु की पीड़ा नहीं झेल रहे होगे? अभी तुम्हें आशीष प्रदान की जा रही है; परन्तु तुम नहीं जानते कि उसका आनन्द कैसे उठाना है; तुम आशीष में जीवनयापन कर रहे हो; फिर भी तुम अनजान हो। यह प्रमाणित करता है कि तुम पीड़ा उठाने के लिए अभिशप्त हो! आज कुछ लोग विरोध करते हैं, कुछ विद्रोह करते हैं, और कुछ यह या वह करते हैं। मैं बस तुम्हें अनदेखा करता हूँ, लेकिन यह मत सोचना कि मैं तुम सबके कार्यों से अनभिज्ञ हूँ। क्या मैं तुम सबके सार को नहीं समझता? मुझसे लड़ने में क्यों लगे रहते हो? क्या तुम अपने हित की खातिर जीवन और आशीष की खोज के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? तुम्हारे अंदर आस्था का होना क्या तुम्हारे अपने हित में नहीं है? फिलहाल मैं केवल बोलकर जीतने का कार्य कर रहा हूँ और जब जीतने का यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो तुम्हारा अन्त साफ हो जाएगा। क्या मुझे और स्पष्ट रूप से बताने की आवश्यकता है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

अंत के दिनों में विजय-कार्य का सत्य

भ्रष्ट इंसान ईश्वर को न जानता न पूजता। जब आदम और हव्वा को बनाया गया, गौरव तब यहोवा का कायम था। लेकिन इंसान भ्रष्ट हो गया, इंसान ने जब विद्रोह किया ईश्वर को पूजना उसने छोड़ दिया, महिमा और साक्ष्य खो दिया। सारी महिमा को फिर से पाना आज का काम है, ताकि सब पूजें ईश्वर को, रचे प्राणियों में गवाही दें। इसे किया जाएगा, कार्य के इस चरण में, अंत के दिनों के विजय-कार्य में।

कैसे जीता जा सकता है इंसान को? इंसान को वचनों के काम से विश्वास दिलाया जाएगा, न्याय, ताड़ना, शाप से वश में किया जाएगा, इंसान के विद्रोह को उजागर और विरोध का न्याय किया जाएगा, ताकि इंसान जान सके वो है अधर्मी, मलिन, और देख सके ईश्वर धार्मिक है। सारी महिमा को फिर से पाना आज का काम है, ताकि पूजें सभी ईश्वर को, रचे प्राणियों में गवाही दें। इसे किया जाएगा, कार्य के इस चरण में, अंत के दिनों के विजय-कार्य में।

ईश्वर के वचन इंसान को जीत लेंगे और आश्वस्त कर देंगे। जो इसे मानते हैं उन्हें, ईश्वर के वचनों का न्याय मानना चाहिए। गर तुम अपनी राह पर न चल के, इन वचनों का पालन कर सको, तो ईश्वर के वचनों से तुम जीत लिए जाओगे। सारी महिमा को फिर से पाना आज का काम है, ताकि सब पूजें ईश्वर को, रचे प्राणियों में गवाही दें। इसे किया जाएगा, कार्य के इस चरण में, अंत के दिनों के विजय-कार्य में, अंत के दिनों के विजय-कार्य में।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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