परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" | अंश 14

पवित्र आत्मा के कार्य का प्रत्येक चरण उसी समय मनुष्य की गवाही की भी अपेक्षा करता है। कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर एवं शैतान के मध्य एक युद्ध है, और इस युद्ध का लक्ष्य शैतान है, जबकि वह शख्स जिसे इस कार्य के द्वारा पूर्ण बनाया जाएगा वह मनुष्य है। परमेश्वर का कार्य फलवन्त हो सकता है या नहीं यह परमेश्वर के प्रति मनुष्य की गवाही के तरीके पर निर्भर करता है। यह गवाही वह बात है जिसकी अपेक्षा परमेश्वर उन लोगों से करता जो उसका अनुसरण करते हैं; यह वह गवाही है जिसे शैतान के सामने दी जाती है, और यह उसके कार्य के प्रभावों का प्रमाण भी है। परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन को तीन चरणों में विभक्त किया गया है, और प्रत्येक चरण में, मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएं की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे जैसे युग बीतते एवं आगे बढ़ते जाते हैं, परमेश्वर की समस्त मानवजाति से अपेक्षाएं और अधिक ऊँची होती जाती हैं। इस प्रकार, कदम दर कदम, परमेश्वर का प्रबंधन अपने चरम पर पहुंच जाता है, जब तक मनुष्य "देह में वचन के प्रकट होने" को देख नहीं लेता, और इस तरह से मनुष्य से की गई अपेक्षाएं और अधिक ऊँची हो जाती हैं, और गवाही देने के लिए मनुष्य से अपेक्षाएं और भी अधिक ऊँची हो जाती हैं। मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करने में जितना अधिक समर्थ होता है, उतना ही अधिक वह परमेश्वर को गौरवान्वित करता है। मनुष्य का सहयोग वह गवाही है जिसे देने के लिए उससे अपेक्षा की जाती है, और वह गवाही जिसे वह देता है वह मनुष्य का व्यवहार है। और इस प्रकार, परमेश्वर के कार्य का उचित प्रभाव हो सकता है या नहीं, और वहाँ सच्ची गवाही हो सकती है या नहीं, ये जटिल रूप से मनुष्य के सहयोग एवं गवाही से जुड़े हुए हैं। जब कार्य समाप्त हो जाता है, कहने का अर्थ है, जब परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रबंधन अपनी समाप्ति पर पहुंच जाता है, तब मनुष्य से अपेक्षा की जाएगी कि वह और अधिक ऊँची गवाही दे, और जब परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुंच जाता है, तब मनुष्य का व्यवहार एवं प्रवेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाएगा। अतीत में, मनुष्य से अपेक्षा की गई थी कि वह व्यवस्था एवं आज्ञाओं का पालन करे, और उससे अपेक्षा की गई थी कि वह धैर्यवान एवं विनम्र हो। आज, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का पालन करे और परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम को धारण करे, और अन्ततः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह क्लेश के मध्य भी परमेश्वर से प्रेम करे। ये तीन चरण ऐसी अपेक्षाएं हैं जिन्हें परमेश्वर कदम दर कदम अपने सम्पूर्ण प्रबंधन के दौरान मनुष्य से करता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की तुलना में और अधिक गहरा होता जाता है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से की गई अपेक्षाएं पिछले चरण की तुलना में और अधिक गम्भीर होती हैं, और इस तरह से, परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रबंधन धीरे धीरे अपना आकार लेता है। मनुष्य से की गई अपेक्षाएं हमेशा से कहीं अधिक ऊँची हो जाने के कारण ही मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के द्वारा अपेक्षित उन मापदंडों के कहीं अधिक नज़दीक आ जाता है, और केवल तभी सम्पूर्ण मानवजाति धीरे धीरे शैतान के प्रभाव से अलग होती है, जब परमेश्वर का कार्य पूर्ण समाप्ति पर आ जाता है, तब तक सम्पूर्ण मानवजाति को शैतान के प्रभाव से बचा लिया जाता है। जब वह समय आता है, तो परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुंच चुका होगा, और अपने स्वभाव में परिवर्तनों को हासिल करने के लिए परमेश्वर के साथ मनुष्य का और कोई सहयोग नहीं होगा, और सम्पूर्ण मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश में जीवन बिताएगी, और उसके बाद से, परमेश्वर के प्रति कोई विद्रोही या विरोध नहीं होगा। परमेश्वर भी मनुष्य से कोई माँग नहीं करेगा, और मनुष्य एवं परमेश्वर के मध्य और अधिक सुसंगत सहयोग होगा, एक ऐसा सहयोग जो मनुष्य एवं परमेश्वर दोनों का आपस का जीवन होगा, ऐसा जीवन जो परमेश्वर के प्रबंधन के पूरी तरह से समाप्त होने, और परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को शैतान के शिकंजों से पूरी तरह से बचाए जाने के पश्चात् आता है। ऐसे लोग जो करीब से परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण नहीं कर सकते हैं वे ऐसे जीवन को पाने में असमर्थ हैं। उन्होंने अपने आपको अंधकार में नीचे गिरा दिया होगा, जहाँ वे रोएंगे और अपने दाँत पीसेंगे; वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु उसका अनुसरण नहीं करते हैं, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु उसके सम्पूर्ण कार्य का पालन नहीं करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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