परमेश्वर के दैनिक वचन : कार्य के तीन चरण | अंश 3

परमेश्वर को सृष्टि के प्राणियों के प्रति कोई द्वेष नहीं है; वह केवल शैतान को पराजित करना चाहता है। उसका समस्त कार्य—चाहे वह ताड़ना हो या न्याय—शैतान की ओर निर्देशित है; इसे मानव-जाति के उद्धार के वास्ते किया जाता है, यह सब शैतान को पराजित करने के लिए है, और इसका एक ही उद्देश्य है : शैतान के विरुद्ध बिलकुल अंत तक युद्ध करना! परमेश्वर जब तक शैतान पर विजय प्राप्त न कर ले, तब तक कभी विश्राम नहीं करेगा! वह केवल तभी विश्राम करेगा, जब वह शैतान को हरा देगा। चूँकि परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य शैतान की ओर निर्देशित है, और चूँकि वे सभी लोग जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, शैतान के अधिकार-क्षेत्र के नियंत्रण में हैं और सभी शैतान के अधिकार-क्षेत्र में जीवन बिताते हैं, इसलिए शैतान के विरुद्ध युद्ध किए बिना और उससे संबंध-विच्छेद किए बिना शैतान इन लोगों पर से अपना शिकंजा ढीला नहीं करेगा, और उन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकेगा। यदि उन्हें प्राप्त नहीं किया गया, तो यह साबित करेगा कि शैतान को पराजित नहीं किया गया है, कि उसे वश में नहीं किया गया है। और इसलिए, अपनी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना में परमेश्वर ने प्रथम चरण के दौरान व्यवस्था का कार्य किया, दूसरे चरण के दौरान उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, अर्थात् सलीब पर चढ़ने का कार्य, और तीसरे चरण के दौरान वह मानव-जाति पर विजय प्राप्त करने का कार्य करता है। यह समस्त कार्य उस सीमा पर निर्देशित है, जिस तक शैतान ने मानव-जाति को भ्रष्ट किया है, यह सब शैतान को पराजित करने के लिए है, और इन चरणों में से प्रत्येक चरण शैतान को पराजित करने के वास्ते है। परमेश्वर के प्रबंधन के 6,000 वर्ष के कार्य का सार बड़े लाल अजगर के विरुद्ध युद्ध है, और मानव-जाति का प्रबंधन करने का कार्य भी शैतान को हराने का कार्य है, शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य है। परमेश्वर ने 6,000 वर्षों तक युद्ध किया है, और इस प्रकार उसने अंततः मनुष्य को नए क्षेत्र में लाने के लिए 6,000 वर्षों तक कार्य किया है। जब शैतान पराजित हो जाएगा, तो मनुष्य पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा। क्या यह आज परमेश्वर के कार्य की दिशा नहीं है? यह निश्चित रूप से आज के कार्य की दिशा है : मनुष्य की पूर्ण मुक्ति और स्वतंत्रता, ताकि वह किसी नियम के अधीन न हो, न ही वह किसी प्रकार के बंधनों या प्रतिबंधों द्वारा सीमित हो। यह समस्त कार्य तुम लोगों की कद-काठी के अनुसार और तुम लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार किया जाता है, जिसका अर्थ है कि जो कुछ तुम लोग पूरा कर सकते हो, वही तुम लोगों को प्रदान किया जाता है। यह "किसी बतख़ को मचान पर हाँकने" का मामला नहीं है, या तुम लोगों पर कुछ थोपने का मामला नहीं है; इसके बजाय, यह समस्त कार्य तुम लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार किया जाता है। कार्य का प्रत्येक चरण मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के अनुसार कार्यान्वित किया जाता है, और यह शैतान को हराने के वास्ते है। वास्तव में, आरंभ में सृजनकर्ता और उसके प्राणियों के बीच किसी प्रकार की बाधाएँ नहीं थीं। ये सब अवरोध शैतान द्वारा उत्पन्न किए गए। शैतान ने मनुष्य को इतना परेशान और भ्रष्ट किया है कि वह किसी भी चीज़ को देखने या छूने में असमर्थ हो गया है। मनुष्य पीड़ित है, जिसे धोखा दिया गया है। जब शैतान को हरा दिया जाएगा, तो सृजित प्राणी सृजनकर्ता को देखेंगे, और सृजनकर्ता सृजित प्राणियों को देखेगा और व्यक्तिगत रूप से उनकी अगुआई करने में समर्थ होगा। केवल यही वह जीवन है, जो पृथ्वी पर मनुष्य के पास होना चाहिए। और इसलिए, परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से शैतान को हराना है, और जब शैतान को हरा दिया जाएगा, तो हर चीज़ का समाधान हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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