स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V

परमेश्वर की पवित्रता (II)     भाग एक

आज, भाइयो और बहनो, आओ हम एक भजन गाएँ। जो तुम लोगों को पसंद हो और जिसे तुम लोग नियमित रूप से गाते हो, उसे चुन लो। (हम परमेश्वर के वचन का भजन : "शुद्ध निर्दोष प्रेम" गाना चाहेंगे।)

1. "प्रेम" उस भावना को संदर्भित करता है, जो शुद्ध और निर्दोष होती है, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई अवरोध या कोई दूरी नहीं होती। प्रेम में कोई संदेह, कोई धोखा और कोई चालाकी नहीं होती। प्रेम में व्यापार और कुछ भी अशुद्ध नहीं होता। यदि तुम प्रेम करते हो, तो तुम धोखा नहीं दोगे, शिकायत, विश्वासघात, विद्रोह नहीं करोगे, कुछ छीनने या हासिल करने या कोई निश्चित राशि प्राप्त करने की कोशिश नहीं करोगे।

2. "प्रेम" उस भावना को संदर्भित करता है, जो शुद्ध और निर्दोष होती है, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई अवरोध और कोई दूरी नहीं होती। प्रेम में कोई संदेह, कोई धोखा और कोई चालाकी नहीं होती। प्रेम में कोई व्यापार और कुछ भी अशुद्ध नहीं होता। यदि तुम प्रेम करते हो, तो तुम ख़ुशी से अपने आपको समर्पित करोगे, ख़ुशी से कष्ट सहन करोगे, तुम मेरे अनुकूल हो जाओगे, तुम अपना वह सब-कुछ त्याग दोगे जो मेरे लिए तुम्हारे पास है, तुम अपना परिवार, अपना भविष्य, अपनी जवानी और अपना विवाह, सब त्याग दोगे। अगर नहीं, तो तुम्हारा प्रेम बिलकुल भी प्रेम नहीं होगा, बल्कि केवल धोखा और विश्वासघात होगा!

यह भजन एक अच्छा चुनाव था। क्या तुम सबको इसे गाने में मज़ा आता है? (हाँ।) इसे गाने के बाद तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम इस तरह के प्रेम को अपने भीतर महसूस कर पाते हो? (अभी तक नहीं।) इसके कौन-से शब्द तुम्हें सबसे ज्यादा गहराई तक प्रेरित करते हैं? (प्रेम में कोई शर्त, कोई अवरोध और कोई दूरी नहीं होती। प्रेम में कोई संदेह, कोई धोखा, कोई सौदेबाजी और कोई चालाकी नहीं होती। प्रेम में कोई विकल्प और कुछ अशुद्ध नहीं होता। लेकिन अपने अंदर मैं अभी भी कई अशुद्धताएँ देखती हूँ, और मेरे कई अंग परमेश्वर से सौदेबाजी करने की कोशिश करते हैं। मुझे वास्तव में वैसा प्रेम नहीं हुआ, जो शुद्ध और निर्दोष हो।) अगर तुम्हें वैसा प्रेम नहीं हुआ, जो शुद्ध और निर्दोष हो, तब तुम्‍हारे प्रेम की मात्रा क्या है? (मैं मात्र उस चरण पर हूँ, जहाँ मैं खोजने की अभिलाषा रखती हूँ, जहाँ मैं तड़प रही हूँ।) अपने आध्यात्मिक कद के आधार पर और अपने स्वयं के अनुभव से बोलते हुए, तुमने प्रेम की कितनी मात्रा प्राप्त की है? क्या तुम्‍हारे पास धोखा है? क्या तुम्‍हारे पास शिकायतें हैं? (हाँ।) क्या तुम्‍हारे हृदय में माँगें हैं? क्या कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें तुम परमेश्वर से चाहते और माँगते हो? (हाँ, मेरे भीतर ये ख़राब चीज़ें हैं।) वे किन परिस्थितियों में बाहर आती हैं? (जब परमेश्वर द्वारा मेरे लिए व्यवस्थित की गई स्थिति मेरे विचारों से मेल नहीं खाती, या जब मेरी इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं : ऐसे क्षणों में मेरा इस प्रकार का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होता है।) तुम भाई-बहनें, जो ताइवान से आते हो, क्या तुम लोग भी अकसर इस भजन को गाते हो? क्या तुम थोड़ा बता सकते हो कि तुम लोग "शुद्ध निर्दोष प्रेम" से क्या समझते हो? परमेश्वर क्यों प्रेम को इस तरह परिभाषित करता है? (यह भजन मुझे बहुत ज्यादा पसंद है, क्योंकि मैं इससे देख सकता हूँ कि यह प्रेम एक पूर्ण प्रेम है। हालाँकि उस मानक को पूरा करने के लिए मुझे अभी भी काफी लंबी दूरी तय करनी है, और मैं सच्चा प्रेम करने से अभी भी बहुत दूर हूँ। कुछ चीज़ें हैं, जिनमें मैं उस शक्ति के माध्यम से जो उसके वचन मुझे देते हैं, और प्रार्थना के माध्यम से प्रगति और सहयोग करने में सक्षम रहा हूँ। हालाँकि जब कुछ परीक्षण और प्रकटन सामने आते हैं, तो मुझे लगता है कि मेरा कोई भविष्य या भाग्य नहीं है, कि मेरे पास कोई गंतव्य नहीं है। ऐसे क्षणों में मैं बहुत कमजोर महसूस करता हूँ और यह मुद्दा मुझे प्रायः परेशान करता है।) जब तुम "भविष्य और नियति" की बात करते हो, तब तुम अंतत: किस चीज़ का उल्लेख करते हो? क्या तुम किसी ख़ास चीज़ का उल्लेख करते हो? क्या यह कोई तसवीर है या कोई ऐसी चीज़ है, जिसकी तुमने कल्पना की है या क्या तुम्हारा भविष्य और नियति कोई ऐसी चीज़ है, जिसे तुम वास्तव में देख सकते हो? क्या यह कोई वास्तविक चीज़ है? मैं चाहता हूँ कि तुम लोगों में से प्रत्येक इस बारे में विचार करे : अपने भविष्य और नियति को लेकर तुम लोगों के हृदय में जो चिंताएँ हैं, वे किसे संदर्भित करती हैं? (यह बचाए जाने योग्य होना है, ताकि मैं जीवित रह सकूँ।) अन्य भाई-बहनो, तुम भी थोड़ा बताओ कि तुम "शुद्ध निर्दोष प्रेम" से क्या समझते हो? (जब यह किसी व्यक्ति के पास होता है, तो उसके व्यक्तिगत स्व से कोई अशुद्धि नहीं आती, और वे अपने भविष्य और भाग्य द्वारा नियंत्रित नहीं होते। भले ही परमेश्वर उनके साथ कैसा भी बरताव करता हो, वे परमेश्वर के कार्य और आयोजनों का पूर्णतः पालन करने और अंत तक उसका अनुसरण करने में सक्षम होते हैं। परमेश्वर के लिए केवल इस प्रकार का प्रेम ही शुद्ध निर्दोष प्रेम होता है। अपने को इसकी तुलना में मापने पर मैंने पाया है कि, हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में परमेश्वर पर विश्वास करते हुए मैंने अपने को खपाया है और कुछ चीज़ों का त्याग किया है, पर मैं वास्तव में परमेश्वर को अपना हृदय देने में सक्षम नहीं रहा हूँ। जब परमेश्वर मुझे उजागर करता है, तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मुझे बचाया नहीं जा सकता, और मैं एक नकारात्मक अवस्था में रहता हूँ। मैं स्वयं को अपना कर्तव्य करते हुए देखता हूँ, किंतु साथ ही मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाज़ी करने की कोशिश भी कर रहा होता हूँ, और मैं अपने संपूर्ण हृदय से परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ हूँ, और मेरा गंतव्य, मेरा भविष्य और मेरी नियति हमेशा मेरे मन में रहते हैं।)

ऐसा लगता है कि तुम लोगों ने इस भजन की कुछ समझ प्राप्त कर ली है, और इसके तथा अपने वास्तविक अनुभवों के बीच कुछ संबंध बना लिए हैं। हालाँकि इस "शुद्ध निर्दोष प्रेम" नामक भजन के प्रत्येक पद तुम भिन्न-भिन्न मात्रा में स्वीकार करते हो। कुछ लोग सोचते हैं कि यह स्वेच्छा के बारे में है, कुछ लोग अपना भविष्य एक तरफ रख देने के इच्छुक हैं, कुछ लोग अपने परिवार को अलग कर देना चाहते हैं, कुछ लोग कुछ भी प्राप्त नहीं करना चाहते। कुछ अन्य लोग परमेश्वर को धोखा न देना, कोई शिकायत न करना और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह न करना अपने लिए आवश्यक मानते हैं। परमेश्वर क्यों इस प्रकार का प्रेम करने की सलाह देना चाहेगा, और यह चाहेगा कि लोग उसे इस तरह से प्रेम करें? क्या यह उस प्रकार का प्रेम है, जिसे लोग प्राप्त कर सकते हैं? अर्थात्, क्या लोग इस प्रकार से प्रेम करने में समर्थ हैं? लोग देख सकते हैं कि वे ऐसा प्रेम नहीं कर सकते, क्योंकि उनमें इस प्रकार का प्रेम होने का कोई संकेत नहीं है। जब लोगों के पास यह नहीं है, और वे प्रेम के बारे में बुनियादी रूप से नहीं जानते, तो परमेश्वर इन वचनों को कहता है, और ये वचन उनके लिए अनजाने हैं। चूँकि लोग इस दुनिया में रहते हैं और एक भ्रष्ट स्वभाव में जीते हैं, इसलिए अगर लोगों के पास इस प्रकार का प्रेम होता या अगर कोई व्यक्ति इस प्रकार का प्रेम कर सकता, ऐसा प्रेम जो कोई अनुरोध और माँग नहीं करता, ऐसा प्रेम जिसके साथ वे अपने आपको समर्पित करने, कष्ट सहने और अपना सब-कुछ त्यागने के लिए तैयार हों, तो इस प्रकार का प्रेम करने वाले के बारे में अन्य लोग क्या सोचेंगे? क्या ऐसा व्यक्ति पूर्ण नहीं होगा? (हाँ, होगा।) क्या इस तरह का कोई पूर्ण व्यक्ति इस जगत में विद्यमान है? नहीं, इस तरह का कोई व्यक्ति विद्यमान नहीं है, है ना? इस तरह का कोई व्यक्ति दुनिया में बिलकुल विद्यमान नहीं है, जब तक कि वह निर्वात में न जीता हो। क्या ऐसा नहीं है? इसलिए, कुछ लोग अपने अनुभवों के द्वारा, इन वचनों पर खुद को मापने का बहुत प्रयास करते हैं। वे स्वयं से निपटते हैं, स्वयं को संयमित करते हैं, यहाँ तक कि वे स्वयं को भी लगातार त्यागते रहते हैं : वे कष्ट सहते हैं और अपनी धारणाओं का त्याग कर देते हैं। वे अपनी विद्रोहशीलता छोड़ देते हैं और अपनी इच्छाओं तथा अभिलाषाओं का त्याग कर देते हैं। किंतु अंतत: वे फिर भी माप नहीं पाते। ऐसा क्यों होता है? परमेश्वर लोगों द्वारा पालन किए जाने के लिए एक मानक प्रदान करने हेतु इन बातों को कहता है, ताकि लोग परमेश्वर द्वारा उनसे माँगे गए मानक को जानें। पर क्या परमेश्वर कभी कहता है कि लोगों को इसे तुरंत प्राप्त करना चाहिए? क्या कभी परमेश्वर कहता है कि कितने समय में लोगों को इसे प्राप्त करना है? (नहीं।) क्या कभी परमेश्वर कहता है कि लोगों को उसे इस तरह से प्रेम करना है? क्या भजन के इस अंश में ऐसा कहा गया है? नहीं, इसमें ऐसा नहीं कहा गया है। परमेश्वर लोगों को बस उस प्रेम के बारे में बता रहा है, जिसका वह उल्लेख कर रहा था। जहाँ तक लोगों के परमेश्वर को इस तरह से प्रेम करने और परमेश्वर से इस तरह से व्यवहार करने में सक्षम होने की बात है, तो मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं? उन्हें तत्क्षण पूरा करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह लोगों के सामर्थ्य से परे होगा। क्या तुम लोगों ने कभी इस बारे में सोचा है कि इस प्रकार से प्रेम करने के लिए लोगों को किस तरह की शर्तें पूरी करनी आवश्यक हैं? अगर लोग बार-बार इन वचनों को पढ़ेंगे, तो क्या वे धीरे-धीरे इस प्रेम को पा लेंगे? (नहीं।) तब क्या शर्तें हैं? पहली बात, लोग परमेश्वर के प्रति संशय से कैसे मुक्त हो सकते हैं? (केवल ईमानदार लोग ही इसे प्राप्त कर सकते हैं।) धोखे से मुक्त होने के बारे में क्या कहोगे? (यह भी ईमानदार लोग ही कर सकते हैं।) ऐसा व्यक्ति होने के बारे में क्या ख़याल है, जो परमेश्वर से सौदेबाज़ी नहीं करता? यह भी ईमानदार व्यक्ति होने का एक हिस्सा है। चालाकी से रहित होने के बारे में क्या कहोगे? प्रेम में कोई चुनाव न होने का क्या अर्थ है? क्या ये सब चीज़ें ईमानदार व्यक्ति होने से संबंध रखती हैं? यहाँ इसका बहुत सारा विवरण है। इससे क्या साबित होता है कि परमेश्वर इस प्रकार के प्रेम को इस तरह से बताने और परिभाषित करने में सक्षम है? क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर के पास ऐसा प्रेम है? (हाँ।) तुम लोग इसे कहाँ देखते हो? (मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम में।) क्या मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम सशर्त है? (नहीं।) क्या परमेश्वर और मनुष्य के बीच में अवरोध या दूरी है? (नहीं।) क्या परमेश्वर को मनुष्यों के बारे में संदेह हैं? (नहीं।) परमेश्वर मनुष्य को देखता है और उसे समझता है; वह मनुष्य को सचमुच समझता है। क्या परमेश्वर मनुष्य के प्रति कपटपूर्ण है? (नहीं।) चूँकि परमेश्वर इस प्रेम के बारे में इतनी पूर्णता से कहता है, तो क्या उसका हृदय या उसका सार भी इतना ही पूर्ण हो सकता है? (हाँ।) क्या लोगों ने कभी प्रेम को इस तरह से परिभाषित किया है? मनुष्य ने किन परिस्थितियों में प्रेम को परिभाषित किया है? मनुष्य प्रेम के बारे में कैसे बात करता है? क्या मनुष्य प्रेम के बारे में देने या अर्पित करने के रूप में बात नहीं करता? (हाँ।) प्रेम की यह परिभाषा सरलीकृत है; इसमें सार का अभाव है।

परमेश्वर की प्रेम की परिभाषा और जिस तरह से परमेश्वर प्रेम के बारे में बोलता है, वे उसके सार के एक पहलू से संबंधित हैं, किंतु वह कौन-सा पहलू है? पिछली बार हमने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय के बारे में संगति की थी, एक ऐसा विषय, जिस पर लोगों ने अकसर पहले चर्चा की है। इस विषय में एक शब्द है, जो परमेश्वर पर विश्वास करने के दौरान अकसर बोला जाता है, लेकिन फिर भी जो ऐसा शब्द है, जिससे हर कोई परिचित और अपरिचित दोनों महसूस करता है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? वह एक ऐसा शब्द है, जो मनुष्य की भाषाओं से आता है; हालाँकि लोगों के बीच इसकी परिभाषा स्पष्ट और अस्पष्ट दोनों है। वह शब्द क्या है? ("पवित्रता"।) पवित्रता : यह पिछली बार संगति का हमारा विषय था। हमने इस विषय के एक भाग के बारे में संगति की थी। अपनी पिछली संगति के माध्यम से क्या हर किसी ने परमेश्वर की पवित्रता के सार के बारे में कोई नई समझ प्राप्त की? इस समझ के कौन-से पहलू तुम लोगों को पूरी तरह से नए लगते हैं? अर्थात्, इस समझ या उन वचनों के भीतर ऐसा क्या है, जिससे तुम लोगों को महसूस हुआ कि परमेश्वर की पवित्रता की तुम्हारी समझ मेरे द्वारा संगति के दौरान बताई गई परमेश्वर की पवित्रता से भिन्न या अलग थी? क्या तुम पर उसका कोई प्रभाव है? (परमेश्वर वह कहता है, जो वह अपने हृदय में महसूस करता है; उसके वचन निष्कलंक हैं। यह पवित्रता के एक पहलू की अभिव्यक्ति है।) (पवित्रता तब भी होती है, जब परमेश्वर मनुष्य के प्रति कुपित होता है; उसका कोप दोष-रहित होता है।) (जहाँ तक परमेश्वर की पवित्रता की बात है, मैं समझता हूँ कि परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव में उसका क्रोध और दया दोनों शामिल हैं। इसने मुझ पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला है। हमारी पिछली संगति में यह भी उल्लेख किया गया था कि ईश्वर का धार्मिक स्वभाव अद्वितीय है—मुझे अतीत में यह समझ नहीं आया था। परमेश्वर ने जो संगति की थी, उसे सुनकर ही मेरी समझ में आया कि परमेश्वर का क्रोध मनुष्य के क्रोध से अलग है। परमेश्वर का क्रोध एक सकारात्मक चीज़ है और वह सिद्धांत पर आधारित है; वह ईश्वर के अंतर्निहित सार के कारण किया जाता है। परमेश्वर कुछ नकारात्मक देखता है, इसलिए क्रोध करता है। यह एक ऐसी चीज़ है, जो किसी सृजित प्राणी में नहीं है।) आज का हमारा विषय परमेश्वर की पवित्रता है। सभी लोगों ने परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के बारे में कुछ न कुछ सुना और जाना है। इतना ही नहीं, कई लोग प्रायः एक ही साँस में परमेश्वर की पवित्रता और परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के बारे में बात करते हैं; वे कहते हैं कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव पवित्र है। "पवित्र" शब्द निश्चित रूप से किसी के लिए अपरिचित नहीं है—यह एक आम तौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। लेकिन शब्द के भीतर के अर्थों के संबंध में, परमेश्वर की पवित्रता की कौन-सी अभिव्यक्ति देखने में लोग सक्षम हैं? परमेश्वर ने क्या प्रकट किया है, जिसे लोग पहचान सकते हैं? मेरा ख़याल है कि यह कुछ ऐसा है, जिसे कोई नहीं जानता। परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, किंतु अगर तुम परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को लो और कहो कि यह पवित्र है, तो यह थोड़ा अस्पष्ट, थोड़ा भ्रामक प्रतीत होता है; ऐसा क्यों है? तुम कहते हो, परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, या तुम कहते हो, उसका धार्मिक स्वभाव पवित्र है, तो अपने हृदय में तुम लोग परमेश्वर की पवित्रता का कैसे चित्रण करते हो, तुम लोग उसे कैसे समझते हो? अर्थात्, परमेश्वर ने जो प्रकट किया, उसके बारे में क्या ख़याल है, या परमेश्वर के स्वरूप के बारे में, क्या उन्हें लोग पवित्र मानेंगे? क्या तुमने इसके बारे में पहले सोचा है? मैंने जो देखा है, वह यह है कि लोग प्रायः सामान्य रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों के साथ सामने आते हैं या उनके पास ऐसे मुहावरे होते हैं, जो बार-बार कहे जा चुके हैं, पर वे यह तक नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं। यह ठीक वैसा ही होता है, जैसा हर कोई कहता है, और वे इसे आदतन कहते हैं, इसलिए यह उनके लिए एक निश्चित शब्द बन जाता है। लेकिन अगर वे जाँच करें और वास्तव में विवरणों का अध्ययन करें, तो वे यह पाएँगे कि उन्हें नहीं पता कि उसका वास्तविक अर्थ क्या है या वह किसका उल्लेख करता है। ठीक "पवित्र" शब्द की तरह, कोई ठीक-ठीक नहीं जानता कि परमेश्वर की जिस पवित्रता के बारे में वे बात करते हैं, उसके संबंध में परमेश्वर के सार के किस पहलू का उल्लेख किया जा रहा है, और कोई नहीं जानता कि परमेश्वर के साथ "पवित्र" शब्द का सामंजस्य कैसे बैठाना है। लोग अपने हृदयों में भ्रमित हैं, और परमेश्वर की पवित्रता की उनकी पहचान अनिश्चित और अस्पष्ट है। परमेश्वर पवित्र कैसे है, इस बारे में कोई पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। आज हम परमेश्वर के साथ "पवित्र" शब्द का सामंजस्य स्थापित करने के लिए इस विषय पर संगति करेंगे, ताकि लोग परमेश्वर की पवित्रता के सार की वास्तविक अंतर्वस्तु देख सकें। यह कुछ लोगों को इस शब्द के आदतन और लापरवाही के साथ इस्तेमाल करने और चीज़ों को जैसे चाहे, वैसे कहने से रोकेगा, जबकि वे नहीं जानते कि उनका क्या अर्थ है या वे सही और सटीक हैं या नहीं। लोगों ने हमेशा इसी तरह कहा है; तुमने कहा है, उसने कहा है, और इस प्रकार यह बोलने की एक आदत बन गई है। यह अनजाने ही ऐसे शब्द को दूषित कर देता है।

ऊपर से "पवित्र" शब्द समझने में बहुत आसान लगता है, है न? कम से कम, लोग "पवित्र" शब्द का अर्थ स्वच्छ, निर्मल, पावन और शुद्ध मानते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो "शुद्ध निर्दोष प्रेम" भजन में, जिसे हमने अभी गाया है, "पवित्रता" को "प्रेम" के साथ जोड़ते हैं। यह सही है; यह इसका एक भाग है। परमेश्वर का प्रेम उसके सार का भाग है, किंतु यह उसकी समग्रता नहीं है। हालाँकि लोग अपनी धारणाओं में शब्द को देखते हैं और उसे उन चीज़ों के साथ जोड़ने में प्रवृत्त हो जाते हैं, जिन्हें वे स्वयं शुद्ध और साफ़ समझते हैं या उन चीज़ों के साथ, जिनके बारे में वे व्यक्तिगत रूप से सोचते हैं कि वे निर्मल और निष्कलंक हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों ने कहा कि कमल का फूल स्वच्छ है, और कि वह कीचड़ में भी निष्कलंक खिलता है। इसलिए लोग कमल के फूल के लिए "पवित्र" शब्द का प्रयोग करने लगे। कुछ लोग मनगढ़ंत प्रेम-कथाओं को पवित्र समझते हैं, या वे कुछ कल्पित, विस्मयकारी चरित्रों को पवित्र समझ सकते हैं। इसके अलावा, कुछ लोग बाइबल या अन्य आध्यात्मिक पुस्तकों में दर्ज लोगों को—जैसे कि संत, प्रेरित या अन्य, जिन्होंने कभी परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के दौरान उसका अनुसरण किया था—आध्यात्मिक अनुभव पाए हुए लोग मानते हैं, जो पवित्र था। ये सब चीज़ें लोगों द्वारा कल्पित की गई हैं और ये सब उनकी धारणाएँ हैं। लोग इस तरह की धारणाएँ क्यों रखते हैं? इसका कारण बहुत सरल है : ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोग भ्रष्ट स्वभाव के बीच जीते हैं और बुराई तथा गंदगी की दुनिया में रहते हैं। वे जो कुछ भी देखते हैं, वे जो कुछ भी छूते हैं, वे जो कुछ भी अनुभव करते हैं, वह शैतान की दुष्टता और शैतान की भ्रष्टता है और साथ ही ऐसे कुचक्र, अंतर्कलह और युद्ध हैं, जो शैतान के प्रभाव से ग्रस्त लोगों के बीच होते हैं। इसलिए, जब परमेश्वर लोगों में अपना कार्य करता है, या जब वह उनसे बात करता है और अपना स्वभाव और सार प्रकट करता है, तब भी वे परमेश्वर की पवित्रता और सार को देखने या जानने में सक्षम नहीं होते। लोग प्रायः कहते हैं कि परमेश्वर पवित्र है, किंतु उनमें सच्ची समझ का अभाव है; वे बस खोखले शब्द कहते हैं। चूँकि लोग गंदगी और भ्रष्टता में रहते हैं और शैतान के अधिकार-क्षेत्र में हैं, और वे प्रकाश को नहीं देखते, सकारात्मक मामलों के बारे में कुछ नहीं जानते, और इसके अलावा, सत्य को नहीं जानते, इसलिए कोई भी वास्तव में नहीं जानता कि "पवित्र" का क्या अर्थ है। तो क्या इस भ्रष्ट मानवजाति के बीच कोई पवित्र वस्तुएँ या पवित्र लोग हैं? हम निश्चित रूप से कह सकते हैं : नहीं, कोई नहीं है, क्योंकि केवल परमेश्वर का सार ही पवित्र है।

पिछली बार हमने, परमेश्वर का सार किस तरह पवित्र है, इसके एक पहलू के बारे में संगति की थी। उसने लोगों को परमेश्वर की पवित्रता का ज्ञान प्राप्त करने की कुछ प्रेरणा प्रदान की थी, लेकिन यह काफी नहीं है। यह लोगों को परमेश्वर की पवित्रता को पूरी तरह से जानने में पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं कर सकता, और न ही यह समझने में उन्हें सक्षम कर सकता है कि परमेश्वर की पवित्रता अद्वितीय है। इतना ही नहीं, यह लोगों को पवित्रता का सही अर्थ समझने में भी पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं बना सकता, जो कि परमेश्वर में पूरी तरह से सन्निहित है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम इस विषय पर अपनी संगति जारी रखें। पिछली बार हमारी संगति में तीन मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया था, इसलिए अब हमें चौथे मुद्दे पर विचार-विमर्श करना चाहिए। हम पवित्र शास्त्र को पढ़ने से शुरुआत करेंगे।

शैतान का प्रलोभन

मत्ती 4:1-4 तब आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इब्लीस से उस की परीक्षा हो। वह चालीस दिन, और चालीस रात, निराहार रहा, तब उसे भूख लगी। तब परखनेवाले ने पास आकर उससे कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।" यीशु ने उत्तर दिया: "लिखा है, 'मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।'"

ये वे वचन हैं, जिनसे शैतान ने पहली बार प्रभु यीशु को प्रलोभित करने का प्रयास किया था। इब्लीस ने जो कहा था, उसकी विषयवस्तु क्या है? ("यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।") इब्लीस द्वारा कहे गए ये शब्द काफी साधारण हैं, किंतु क्या इनके सार के साथ कोई समस्या है? इब्लीस ने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है," लेकिन अपने दिल में वह जानता था या नहीं कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है? वह जानता था या नहीं कि वह मसीह है? (वह जानता था।) तो उसने ऐसा क्यों कहा "यदि तू है"? (वह परमेश्वर को प्रलोभित करने का प्रयास कर रहा था।) किंतु ऐसा करने में उसका क्या उद्देश्य था? उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है।" अपने दिल में वह जानता था कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, यह उसके दिल में बहुत स्पष्ट था, किंतु यह जानने के बावजूद, क्या उसने उसके सामने समर्पण किया या उसकी आराधना की? (नहीं।) वह क्या करना चाहता था? वह मसीह को क्रोध दिलाने और फिर अपने इरादों के अनुसार कार्य करवाने में प्रभु यीशु को मूर्ख बनाने के लिए इस पद्धति और इन वचनों का उपयोग करना चाहता था। क्या इब्लीस के शब्दों के पीछे यही अर्थ नहीं था? अपने दिल में शैतान स्पष्ट रूप से जानता था कि यह प्रभु यीशु मसीह है, किंतु उसने फिर भी ये शब्द कहे। क्या यह शैतान की प्रकृति नहीं है? शैतान की प्रकृति क्या है? (धूर्त, दुष्ट होना और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा न रखना।) परमेश्वर के प्रति कोई श्रद्धा न होने के क्या परिणाम होंगे? क्या वह परमेश्वर पर हमला नहीं करना चाहता था? वह इस तरीके का उपयोग परमेश्वर पर हमला करने के लिए करना चाहता था, और इसलिए उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ"; क्या यह शैतान की बुरी नीयत नहीं है? वह वास्तव में क्या करने का प्रयास कर रहा था? उसका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है : वह इस तरीके का उपयोग प्रभु यीशु मसीह के पद और पहचान को नकारने के लिए करने की कोशिश कर रहा था। उन शब्दों से शैतान का आशय यह था कि, "अगर तू परमेश्वर का पुत्र है, तो इन पत्थरों को रोटियों में बदल दे। अगर तू ऐसा नहीं कर सकता, तो तू परमेश्वर का पुत्र नहीं है, इसलिए तुझे अपना काम अब और नहीं करना चाहिए।" क्या ऐसा नहीं है? वह इस तरीके का उपयोग परमेश्वर पर हमला करने के लिए करना चाहता था, और वह परमेश्वर के काम को खंडित और नष्ट करना चाहता था; यह शैतान का द्वेष है। उसका द्वेष उसकी प्रकृति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यद्यपि वह जानता था कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र, स्वयं परमेश्वर का ही देहधारण है, फिर भी वह परमेश्वर का पीछा करते हुए, उस पर लगातार आक्रमण करते हुए और उसके कार्य को अस्त-व्यस्त और नष्ट करने का भरसक प्रयास करते हुए इस प्रकार का काम करने से बाज नहीं आता।

अब, आओ शैतान द्वारा बोले गए इस वाक्यांश का विश्लेषण करें : "तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।" पत्थरों को रोटी में बदलना—क्या इसका कुछ अर्थ है? अगर वहाँ भोजन है, तो क्यों न उसे खाया जाए? पत्थरों को भोजन में बदलना क्यों आवश्यक है? क्या यह कहा जा सकता है कि यहाँ कोई अर्थ नहीं है? यद्यपि वह उस समय उपवास कर रहा था, फिर भी क्या निश्चित रूप से प्रभु यीशु के पास खाने को भोजन था? (उसके पास भोजन था।) तो हम यहाँ शैतान के शब्दों की असंगति देख सकते हैं। शैतान की सारी दुष्टता और कपट के बावजूद हम उसकी असंगति और बेतुकापन देख सकते हैं। शैतान बहुत सारी चीज़ें करता है, जिसके माध्यम से तुम उसकी द्वेषपूर्ण प्रकृति को देख सकते हो; तुम उसे वैसी चीज़ें करते देख सकते हो, जो परमेश्वर के कार्य को खंडित करती हैं, और यह देखकर तुम अनुभव करते हो कि वह घृणित और कुपित करने वाला है। किंतु दूसरी ओर, क्या तुम उसके शब्दों और कार्यों के पीछे एक बचकानी और बेहूदी प्रकृति नहीं देखते? यह शैतान की प्रकृति के बारे में एक प्रकाशन है; चूँकि उसकी ऐसी प्रकृति है, इसलिए वह ऐसे ही काम करेगा। आज लोगों के लिए शैतान के ये शब्द असंगत और हास्यास्पद हैं। किंतु शैतान बेशक ऐसे शब्द कहने में सक्षम है। क्या हम कह सकते हैं कि वह अज्ञानी और बेतुका है? शैतान की दुष्टता हर जगह है और लगातार प्रकट हो रही है। और प्रभु यीशु ने उसे कैसे उत्तर दिया? ("मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।") क्या इन वचनों में कोई सामर्थ्य है? (उनमें सामर्थ्य है।) हम क्यों कहते हैं कि उनमें सामर्थ्य है? वह इसलिए, क्योंकि ये वचन सत्य हैं। अब, क्या मनुष्य केवल रोटी से जीवित रहता है? प्रभु यीशु ने चालीस दिन और रात उपवास किया। क्या वह भूख से मर गया? (नहीं।) वह भूख से नहीं मरा, इसलिए शैतान उसके पास गया और उसे इस तरह की बातें कहते हुए पत्थरों को भोजन में बदलने के लिए उकसाया : "अगर तू पत्थरों को खाने में बदल देगा, तो क्या तब तेरे पास खाने की चीज़ें नहीं होंगी? तब तुझे उपवास नहीं करना पड़ेगा, भूखा नहीं रहना पड़ेगा!" किंतु प्रभु यीशु ने कहा, "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहेगा," जिसका अर्थ है कि, यद्यपि मनुष्य भौतिक शरीर में रहता है, किंतु उसका भौतिक शरीर भोजन से नहीं, बल्कि परमेश्वर के मुख से निकले प्रत्येक वचन से जीवित रहता और साँस लेता है। एक ओर, ये वचन सत्य हैं; ये लोगों को विश्वास देते हैं, उन्हें यह महसूस कराते हैं कि वे परमेश्वर पर निर्भर रह सकते हैं और कि वह सत्य है। दूसरी ओर, क्या इन वचनों का कोई व्यावहारिक पहलू है? क्या प्रभु यीशु चालीस दिन और रात उपवास करने के बाद भी खड़ा नहीं था, जीवित नहीं था? क्या यह एक वास्तविक उदाहरण नहीं है? उसने चालीस दिन और रात कोई भोजन नहीं किया था, और वह फिर भी ज़िंदा था। यह सशक्त गवाही है, जो उसके वचनों की सच्चाई की पुष्टि करती है। ये वचन सरल है, किंतु क्या प्रभु यीशु ने इन्हें केवल तभी बोला जब शैतान ने उसे प्रलोभित किया, या ये पहले से ही प्राकृतिक रूप से उसका एक हिस्सा थे? इसे दूसरी तरह से कहें तो, परमेश्वर सत्य है, और परमेश्वर जीवन है, लेकिन क्या परमेश्वर का सत्य और जीवन बाद के जोड़ थे? क्या वे बाद के अनुभव से उत्पन्न हुए थे? नहीं—वे परमेश्वर में जन्मजात थे। कहने का तात्पर्य यह है कि सत्य और जीवन परमेश्वर के सार हैं। उस पर चाहे जो भी बीते, वह सब सत्य ही प्रकट करता है। यह सत्य, ये वचन—चाहे उसकी वाणी की अंतर्वस्तु लंबी हो या छोटी—वे मनुष्य को जीने में सक्षम बना सकते हैं और उसे जीवन दे सकते हैं; वे लोगों को मानव-जीवन के मार्ग के बारे में सत्य और स्पष्टता हासिल करने में सक्षम बना सकते हैं, और उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने में सक्षम बना सकते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा इन वचनों के प्रयोग का स्रोत सकारात्मक है। तो क्या हम कह सकते हैं कि यह सकारात्मक चीज़ पवित्र है? (हाँ।) शैतान के वे शब्द शैतान की प्रकृति से आते हैं। शैतान हर जगह लगातार अपनी दुष्ट और द्वेषपूर्ण प्रकृति प्रकट करता रहता है। अब, क्या शैतान ये प्रकाशन स्वाभाविक रूप से करता है? क्या कोई उसे ऐसा करने का निर्देश देता है? क्या कोई उसकी सहायता करता है? क्या कोई उसे विवश करता है? (नहीं।) ये सब प्रकाशन वह स्वत: करता है। यह शैतान की दुष्ट प्रकृति है। जो कुछ भी परमेश्वर करता है और जैसे भी करता है, शैतान उसके पीछे-पीछे चलता है। शैतान द्वारा कही और की जाने वाली इन चीज़ों का सार और उनकी वास्तविक प्रकृति शैतान का सार है—ऐसा सार, जो दुष्ट और द्वेषपूर्ण है। अब, जब हम आगे पढ़ते हैं, तो शैतान और क्या कहता है? आओ, पढ़ें।

मत्ती 4:5-7 तब इब्लीस उसे पवित्र नगर में ले गया और मन्दिर के कंगूरे पर खड़ा किया, और उससे कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे; क्योंकि लिखा है: 'वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे।'" यीशु ने उससे कहा, "यह भी लिखा है: 'तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।'"

आओ, पहले शैतान द्वारा यहाँ कहे गए शब्दों को देखें। शैतान ने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे," और तब उसने पवित्र शास्त्र से उद्धृत किया, "वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे।" शैतान के शब्द सुनकर तुम्हें कैसा लगता है? क्या वे बहुत बचकाने नहीं हैं? वे बचकाने, असंगत और घृणास्पद हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? शैतान अकसर मूर्खतापूर्ण बातें करता रहता है, और वह स्वयं को बहुत चतुर मानता है। वह प्रायः पवित्र शास्त्र के उद्धरण—यहाँ तक कि परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन भी—उद्धृत करता है—वह परमेश्वर पर आक्रमण करने और उसे प्रलोभित करने के लिए इन वचनों का उपयोग परमेश्वर के विरुद्ध करने का प्रयास करता है, ताकि उसकी कार्य-योजना को खंडित करने का अपना उद्देश्य पूरा कर सके। क्या तुम शैतान द्वारा कहे गए इन शब्दों में कुछ देख पाते हो? (शैतान बुरे इरादे रखता है।) शैतान ने अपने समस्त कार्यों में हमेशा मानवजाति को प्रलोभित करने की कोशिश की है। वह सीधे तौर पर नहीं बोलता, बल्कि प्रलोभन, छल और फरेब का उपयोग करते हुए गोल-मोल तरीके से बोलता है। शैतान परमेश्वर को भी प्रलोभन देने की कोशिश करता है, मानो वह कोई साधारण मनुष्य हो, और वह यह मानता है कि परमेश्वर भी मनुष्य की ही तरह अज्ञानी, मूर्ख और चीज़ों के सही रूप को स्पष्ट रूप से पहचानने में असमर्थ है। शैतान सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य समान रूप से उसके सार, उसकी चालाकी और उसके कुटिल इरादे को आर-पार देख पाने में असमर्थ हैं। क्या यह शैतान की मूर्खता नहीं है? इतना ही नहीं, शैतान खुल्लम-खुल्ला पवित्र शास्त्र को उद्धृत करता है, और यह विश्वास करता है कि ऐसा करने से उसे विश्वसनीयता मिलती है, और तुम उसके शब्दों में कोई गलती नहीं पकड़ पाओगे या मूर्ख बनाए जाने से नहीं बच पाओगे। क्या यह शैतान की मूर्खता और बचकानापन नहीं है? यह ठीक वैसा ही है, जैसा जब लोग सुसमाचार को फैलाते हैं और परमेश्वर की गवाही देते हैं : तो क्या अविश्वासी कुछ ऐसा ही नहीं कहते, जैसा शैतान ने कहा था? क्या तुम लोगों ने लोगों को वैसा ही कुछ कहते हुए सुना है? ऐसी बातें सुनकर तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम घृणा महसूस करते हो? (हाँ।) जब तुम घृणा महसूस करते हो, तो क्या तुम अरुचि और विरक्ति भी महसूस करते हो? जब तुम्हारे भीतर ऐसी भावनाएँ होती हैं, तो क्या तुम यह पहचान पाते हो कि शैतान, और मनुष्य के भीतर काम करने वाला उसका स्वभाव, दुष्ट हैं? क्या अपने दिलों में तुमने कभी ऐसा महसूस किया है : "जब शैतान बोलता है, तो वह ऐसा हमले और प्रलोभन के रूप में करता है; शैतान के शब्द बेतुके, हास्यास्पद, बचकाने और घृणास्पद होते हैं; लेकिन परमेश्वर कभी इस तरह से नहीं बोलता या कार्य करता और वास्तव में उसने कभी ऐसा नहीं किया है"? निस्संदेह, इस स्थिति में लोग इसे बहुत कम समझ पाते हैं और परमेश्वर की पवित्रता को समझने में असमर्थ रहते हैं। क्या ऐसा नहीं है? अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद के साथ तुम लोग मात्र यही महसूस करते हो : "परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, सच कहता है, वह हमारे लिए लाभदायक है, और हमें उसे स्वीकार करना चाहिए।" चाहे तुम इसे स्वीकार करने में सक्षम हो या नहीं, बिना अपवाद के तुम कहते हो कि परमेश्वर का वचन सत्य है और यह कि परमेश्वर सत्य है, किंतु तुम यह नहीं जानते कि सत्य स्वयं पवित्र है और यह कि परमेश्वर पवित्र है।

तो शैतान के इन शब्दों पर यीशु की क्या प्रतिक्रिया थी? यीशु ने उससे कहा, "यह भी लिखा है: 'तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।'" क्या यीशु द्वारा कहे गए इन वचनों में सत्य है? (हाँ।) इनमें सत्य है। ऊपरी तौर पर ये वचन लोगों द्वारा अनुसरण किए जाने के लिए एक आज्ञा हैं, एक सरल वाक्यांश, परंतु फिर भी, मनुष्य और शैतान दोनों ने अकसर इन शब्दों का उल्लंघन किया है। तो, प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, "तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर," क्योंकि शैतान ने प्रायः ऐसा किया था और इसके लिए पूरा प्रयास किया था। यह कहा जा सकता है कि शैतान ने बेशर्मी और ढिठाई से ऐसा किया था। परमेश्वर से न डरना और अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा न रखना यह शैतान की अनिवार्य प्रकृति है। यहाँ तक कि जब शैतान परमेश्वर के पास खड़ा था और उसे देख सकता था, तब भी वह परमेश्वर को प्रलोभन देने से बाज नहीं आया। इसलिए प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, "तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।" ये वे वचन हैं, जो परमेश्वर ने शैतान से प्रायः कहे हैं। तो क्या इस वाक्यांश को वर्तमान समय में लागू किया जाना उपयुक्त है? (हाँ, क्योंकि हम भी अकसर परमेश्वर को प्रलोभन देते हैं।) लोग अकसर परमेश्वर को प्रलोभन क्यों देते हैं? क्या इसका कारण यह है कि लोग भ्रष्ट शैतानी स्वभावों से भरे हुए हैं? (हाँ।) तो क्या शैतान के उपर्युक्त शब्द ऐसे हैं, जिन्हें लोग प्रायः कहते हैं? और लोग इन शब्दों को किन स्थितियों में कहते हैं? कोई यह कह सकता है कि लोग समय और स्थान की परवाह किए बिना ऐसा कहते आ रहे हैं। यह सिद्ध करता है कि लोगों का स्वभाव शैतान के भ्रष्ट स्वभाव से अलग नहीं है। प्रभु यीशु ने कुछ सरल वचन कहे; वचन, जो सत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं; वचन, जिनकी लोगों को आवश्यकता है। लेकिन इस स्थिति में क्या प्रभु यीशु इस तरह बोल रहा था, जैसे शैतान से बहस कर रहा हो? क्या जो कुछ उसने शैतान से कहा, उसमें टकराव की कोई बात थी? (नहीं।) प्रभु यीशु ने शैतान के प्रलोभन के संबंध में अपने दिल में कैसा महसूस किया? क्या उसने तिरस्कार और घृणा महसूस की? (हाँ।) प्रभु यीशु ने तिरस्कार और घृणा महसूस की, फिर भी उसने शैतान से बहस नहीं की, किन्हीं महान सिद्धांतों के बारे में तो उसने बिलकुल भी बात नहीं की। ऐसा क्यों है? (क्योंकि शैतान हमेशा से ऐसा ही है; वह कभी बदल नहीं सकता।) क्या यह कहा जा सकता है कि शैतान विवेकहीन है? (हाँ।) क्या शैतान मान सकता है कि परमेश्वर सत्य है? शैतान कभी नहीं मानेगा कि परमेश्वर सत्य है और कभी स्वीकार नहीं करेगा कि परमेश्वर सत्य है; यह उसकी प्रकृति है। शैतान के स्वभाव का एक और पहलू है, जो घृणास्पद है। वह क्या है? प्रभु यीशु को प्रलोभित करने के अपने प्रयासों में, शैतान ने सोचा कि भले ही वह असफल हो गया हो, फिर भी वह ऐसा करने का प्रयास करेगा। भले ही उसे दंडित किया जाएगा, फिर भी उसने किसी न किसी प्रकार से कोशिश करने का चयन किया। भले ही ऐसा करने से कुछ लाभ नहीं होगा, फिर भी वह कोशिश करेगा, और अपने प्रयासों में दृढ़ रहते हुए बिलकुल अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा रहेगा। यह किस तरह की प्रकृति है? क्या यह दुष्टता नहीं है? अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर के नाम का उल्लेख किए जाने पर कुपित हो जाता है और क्रोध से फनफना उठता है, तो क्या उसने परमेश्वर को देखा है? क्या वह जानता है कि परमेश्वर कौन है? वह नहीं जानता कि परमेश्वर कौन है, उस पर विश्वास नहीं करता और परमेश्वर ने उससे बात नहीं की है। परमेश्वर ने उसे कभी परेशान नहीं किया है, तो फिर वह गुस्सा क्यों होता है? क्या हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति दुष्ट है? दुनिया के रुझान, खाना, पीना और सुख की खोज करना, और मशहूर हस्तियों के पीछे भागना—इनमें से कोई भी चीज़ ऐसे व्यक्ति को परेशान नहीं करेगी। किंतु "परमेश्वर" शब्द या परमेश्वर के वचनों के सत्य के उल्लेख मात्र से ही वह आक्रोश से भर जाता है। क्या यह दुष्ट प्रकृति का होना नहीं है? यह ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि इस मनुष्य की प्रकृति दुष्ट है। अब, तुम लोगों की बात करें, क्या ऐसे अवसर आए हैं, जब सत्य का उल्लेख हो या परमेश्वर द्वारा मानवजाति के परीक्षणों या मनुष्य के विरुद्ध परमेश्वर के न्याय के वचनों का उल्लेख किया जाए, और तुम्हें अरुचि महसूस हो; तिरस्कार महसूस हो, और तुम ऐसी बातें न सुनना चाहो? तुम्हारा हृदय सोच सकता है : "क्या सभी लोग नहीं कहते कि परमेश्वर सत्य है? इनमें से कुछ वचन सत्य नहीं हैं! ये स्पष्ट रूप से सिर्फ परमेश्वर द्वारा मनुष्य की भर्त्सना के वचन हैं!" कुछ लोग अपने दिलों में अरुचि भी महसूस कर सकते हैं और सोच सकते हैं : "यह हर दिन बोला जाता है—उसके परीक्षण, उसका न्याय, यह कब ख़त्म होगा? हमें अच्छी मंज़िल कब मिलेगी?" पता नहीं, यह अनुचित क्रोध कहाँ से आता है। यह किस प्रकार की प्रकृति है? (दुष्ट प्रकृति।) यह शैतान की दुष्ट प्रकृति से निर्देशित और मार्गदर्शित होती है। परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, शैतान की दुष्ट प्रकृति और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के संबंध में वह कभी बहस नहीं करता या लोगों के प्रति द्वेष नहीं रखता, और जब मनुष्य मूर्खतापूर्ण कार्य करते हैं, तो वह कभी बात का बतंगड़ नहीं बनाता। तुम परमेश्वर को चीज़ों के संबंध में मनुष्यों जैसे विचार रखते नहीं देखोगे, और इतना ही नहीं, उसे तुम चीज़ों को सँभालने के लिए मनुष्य के दृष्टिकोणों, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन या कल्पना का उपयोग करते हुए भी नहीं देखोगे। इसके बजाय, परमेश्वर जो कुछ भी करता है और जो कुछ भी वह प्रकट करता है, वह सत्य से जुड़ा है। अर्थात्, उसका कहा हर वचन और उसका किया हर कार्य सत्य से संबंधित है। यह सत्य किसी आधारहीन कल्पना की उपज नहीं है; यह सत्य और ये वचन परमेश्वर द्वारा अपने सार और अपने जीवन के आधार पर व्यक्त किए जाते हैं। चूँकि ये वचन और परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज़ का सार सत्य हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का सार पवित्र है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहता और करता है, वह लोगों के लिए जीवन-शक्ति और प्रकाश लाती है; वह लोगों को सकारात्मक चीजें और उन सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता देखने में सक्षम बनाती है, और मनुष्यों को राह दिखाती है, ताकि वे सही मार्ग पर चलें। ये सब चीज़ें परमेश्वर के सार और उसकी पवित्रता के सार द्वारा निर्धारित की जाती हैं। तुम लोग अब इसे समझते हो, है न? अब हम पवित्र शास्त्र का एक और अंश पढ़ेंगे।

मत्ती 4:8-11 फिर इब्लीस उसे एक बहुत ऊँचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाकर उससे कहा, "यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा।" तब यीशु ने उससे कहा, "हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है: तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।" तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।

शैतान इब्लीस ने अपनी पिछली दो चालों में असफल होने के बाद एक और कोशिश की : उसने प्रभु यीशु को दुनिया के समस्त राज्य और उनका वैभव दिखाया और उससे अपनी आराधना करने के लिए कहा। इस स्थिति से तुम शैतान के वास्तविक लक्षणों के बारे में क्या देख सकते हो? क्या इब्लीस शैतान पूरी तरह से बेशर्म नहीं है? (हाँ, है।) वह कैसे बेशर्म है? सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा रची गई थीं, फिर भी शैतान ने पलटकर परमेश्वर को सारी चीज़ें दिखाईं और कहा, "इन सभी राज्यों की संपत्ति और वैभव देख। अगर तू मेरी उपासना करे, तो मैं यह सब तुझे दे दूँगा।" क्या यह पूरी तरह से भूमिका उलटना नहीं है? क्या शैतान बेशर्म नहीं है? परमेश्वर ने सारी चीज़ें बनाईं, पर क्या उसने सारी चीज़ें अपने उपभोग के लिए बनाईं? परमेश्वर ने हर चीज़ मनुष्य को दे दी, लेकिन शैतान उन सबको अपने कब्ज़े में करना चाहता था और उन्हें अपने कब्ज़े में करने के बाद उसने पमेश्वर से कहा, "मेरी आराधना कर! मेरी आराधना कर और मैं यह सब तुझे दे दूँगा।" यह शैतान का बदसूरत चेहरा है; वह पूर्णतः बेशर्म है! यहाँ तक कि शैतान "शर्म" शब्द का मतलब भी नहीं जानता। यह उसकी दुष्टता का सिर्फ एक और उदाहरण है। वह यह भी नहीं जानता कि "शर्म" क्या होती है। शैतान स्पष्ट रूप से जानता है कि परमेश्वर ने सारी चीज़ें बनाईं और कि वह सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है और उन पर उसकी प्रभुता है। सारी चीज़ें मनुष्य की नहीं हैं, शैतान की तो बिलकुल भी नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर की हैं, और फिर भी इब्लीस शैतान ने ढिठाई से कहा कि वह सारी चीज़ें परमेश्वर को दे देगा। क्या यह शैतान के एक बार फिर बेतुकेपन और बेशर्मी से कार्य करने का एक और उदाहरण नहीं है? इसके कारण परमेश्वर को शैतान से और अधिक घृणा होती है, है न? फिर भी, शैतान ने चाहे जो भी कोशिश की, पर क्या प्रभु यीशु उसके झाँसे में आया? प्रभु यीशु ने क्या कहा? ("तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।") क्या इन वचनों का कोई व्यावहारिक अर्थ है? (हाँ, है।) किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? हम शैतान की वाणी में उसकी दुष्टता और बेशर्मी देखते हैं। तो अगर मनुष्य शैतान की उपासना करेंगे, तो क्या परिणाम होगा? क्या उन्हें सभी राज्यों का धन और वैभव मिल जाएगा? (नहीं।) उन्हें क्या मिलेगा? क्या मनुष्य शैतान जितने ही बेशर्म और हास्यास्पद बन जाएँगे? (हाँ।) तब वे शैतान से भिन्न नहीं होंगे। इसलिए, प्रभु यीशु ने ये वचन कहे, जो हर एक इंसान के लिए महत्वपूर्ण हैं : "तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।" इसका अर्थ है कि प्रभु के अलावा, स्वयं परमेश्वर के अलावा, अगर तुम किसी दूसरे की उपासना करते हो, अगर तुम इब्लीस शैतान की उपासना करते हो, तो तुम उसी गंदगी में लोट लगाओगे, जिसमें शैतान लगाता है। तब तुम शैतान की बेशर्मी और उसकी दुष्टता साझा करोगे, और ठीक शैतान की ही तरह तुम परमेश्वर को प्रलोभित करोगे और उस पर हमला करोगे। तब तुम्हारा क्या अंत होगा? परमेश्वर तुमसे घृणा करेगा, परमेश्वर तुम्हें मार गिराएगा, परमेश्वर तुम्हें नष्ट कर देगा। प्रभु यीशु को कई बार प्रलोभन देने में असफल होने के बाद क्या शैतान ने फिर कोशिश की? शैतान ने फिर कोशिश नहीं की और फिर वह चला गया। इससे क्या साबित होता है? इससे यह साबित होता है कि शैतान की दुष्ट प्रकृति, उसकी दुर्भावना, उसकी बेहूदगी और उसकी असंगतता परमेश्वर के सामने उल्लेख करने योग्य भी नहीं है। प्रभु यीशु ने शैतान को केवल तीन वाक्यों से परास्त कर दिया, जिसके बाद वह दुम दबाकर खिसक गया, और इतना शर्मिंदा हुआ कि चेहरा दिखाने लायक भी नहीं रहा, और उसने फिर कभी प्रभु को प्रलोभन नहीं दिया। चूँकि प्रभु यीशु ने शैतान के इस प्रलोभन को परास्त कर दिया, इसलिए अब वह आसानी से अपने उस कार्य को जारी रख सकता था, जो उसे करना था और जो कार्य उसके सामने पड़े थे। क्या इस परिस्थिति में जो कुछ प्रभु यीशु ने कहा और किया, अगर उसे वर्तमान समय में प्रयोग में लाया जाए, तो क्या प्रत्येक मनुष्य के लिए उसका कोई व्यावहारिक अर्थ है? (हाँ, है।) किस प्रकार का व्यावहारिक अर्थ? क्या शैतान को हराना आसान बात है? क्या लोगों को शैतान की दुष्ट प्रकृति की स्पष्ट समझ होनी चाहिए? क्या लोगों को शैतान के प्रलोभनों की सही समझ होनी चाहिए? (हाँ।) जब तुम अपने जीवन में शैतान के प्रलोभनों का अनुभव करते हो, अगर तुम शैतान की दुष्ट प्रकृति को आर-पार देखने में सक्षम हो, तो क्या तुम उसे हराने में सक्षम नहीं होगे? अगर तुम शैतान की बेहूदगी और असंगतता के बारे में जानते हो, तो क्या फिर भी तुम शैतान के साथ खड़े होगे और परमेश्वर पर हमला करोगे? अगर तुम समझ जाओ कि कैसे शैतान की दुर्भावना और बेशर्मी तुम्हारे माध्यम से प्रकट होती हैं—अगर तुम इन चीज़ों को स्पष्ट रूप से पहचान और समझ जाओ—तो क्या तुम फिर भी परमेश्वर पर इस प्रकार हमला करोगे और उसे प्रलोभित करोगे? (नहीं, हम नहीं करेंगे।) तुम क्या करोगे? (हम शैतान के विरुद्ध विद्रोह करेंगे और उसका परित्याग कर देंगे।) क्या यह आसान कार्य है? यह आसान नहीं है। ऐसा करने के लिए लोगों को लगातार प्रार्थना करनी चाहिए, उन्हें स्वयं को बार-बार परमेश्वर के सामने रखना चाहिए और स्वयं को जाँचना चाहिए। और उन्हें परमेश्वर के अनुशासन और उसके न्याय तथा ताड़ना को अपने ऊपर आने देना चाहिए। केवल इसी तरह से लोग धीरे-धीरे अपने आपको शैतान के धोखे और नियंत्रण से मुक्त करेंगे।

अब, शैतान द्वारा बोले गए इन सभी शब्दों को देखकर हम उन चीज़ों को संक्षेप में प्रस्तुत करेंगे, जो शैतान के सार का निर्माण करती हैं। पहली बात, शैतान के सार को सामान्यतया दुष्टता कहा जा सकता है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है। मैं क्यों कहता हूँ कि शैतान का सार दुष्टता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए व्यक्ति को, जो कुछ शैतान लोगों के साथ करता है, उसके परिणामों की जाँच करनी चाहिए। शैतान मनुष्य को भ्रष्ट और नियंत्रित करता है, और मनुष्य शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के तहत काम करता है, और वह शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए लोगों की दुनिया में रहता है। मानवजाति अनजाने ही शैतान द्वारा अधिकृत और आत्मसात कर ली जाती है; इसलिए मनुष्य में शैतान का भ्रष्ट स्वभाव है, जो कि शैतान की प्रकृति है। शैतान द्वारा कही और की गई हर चीज़ से क्या तुमने उसका अंहकार देखा है? क्या तुमने उसका छल और द्वेष देखा है। शैतान का अंहकार मुख्य रूप से कैसे प्रदर्शित होता है? क्या शैतान सदैव परमेश्वर का स्थान लेने की इच्छा रखता है? शैतान हमेशा परमेश्वर के कार्य और पद को खंडित करने और उसे खुद हथियाने की चाह रखता है, ताकि लोग शैतान का अनुसरण, समर्थन और उसकी आराधना करें; यह शैतान की अंहकारी प्रकृति है। जब शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है, तो क्या वह उनसे सीधे कहता है कि उन्हें क्या करना चाहिए? जब शैतान परमेश्वर को प्रलोभित करता है, तो क्या वह सामने आकर कहता है कि, "मैं तुझे प्रलोभित कर रहा हूँ, मैं तुझ पर हमला करने जा रहा हूँ"? वह ऐसा बिलकुल नहीं करता। शैतान कौन-सा तरीका इस्तेमाल करता है? वह बहकाता है, प्रलोभित करता है, हमला करता है, और अपना जाल बिछाता है, यहाँ तक कि पवित्र शास्त्र को भी उद्धृत करता है। अपने कुटिल उद्देश्य हासिल करने और अपने इरादे पूरे करने के लिए शैतान कई तरीकों से बोलता और कार्य करता है। शैतान के ऐसा कर लेने के बाद मनुष्य में जो अभिव्यक्त होता है, उससे क्या देखा जा सकता है? क्या लोग भी अंहकारी़ नहीं हो जाते? हजारों सालों से मनुष्य शैतान की भ्रष्टता से पीड़ित रहा है, इसलिए मनुष्य अहंकारी, धोखेबाज, दुर्भावनाग्रस्त और विवेकहीन हो गया है। ये सभी चीज़ें शैतान की प्रकृति के कारण उत्पन्न हुई हैं। चूँकि शैतान की प्रकृति दुष्ट है, इसलिए इसने मनुष्य को यह दुष्ट प्रकृति दी है और उसे यह दुष्ट, भ्रष्ट स्वभाव प्रदान किया है। इसलिए मनुष्य भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के तहत जीता है और शैतान की ही तरह परमेश्वर का विरोध करता है, परमेश्वर पर हमला करता है, यहाँ तक कि वह परमेश्वर की आराधना नहीं कर सकता, उसके प्रति श्रद्धा रखने वाला हृदय नहीं रखता।

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।