स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V

परमेश्वर की पवित्रता (II)     भाग एक

आज, भाइयो और बहनो, आइए हम एक गीत गाएं। जो आपको पसंद हो और आप ने उसे पहले लगातार गाया हो। (हम परमेश्वर के वचन का गीत गाना चाहेंगे "बिना दाग का पवित्र प्रेम"।)

1. प्रेम एक शुद्ध भावना है, शुद्ध बिना किसी भी दोष के। अपने हृदय का प्रयोग करो, प्रेम के लिए, अनुभूति के लिए और परवाह करने के लिए। प्रेम नियत नहीं करता, शर्तें, बाधाएँ या दूरी। अपने हृदय का प्रयोग करो, प्रेम के लिए, अनुभूति के लिए और परवाह करने के लिए। यदि तुम प्रेम करते हो, तो धोखा नहीं देते हो, शिकायत नहीं करते, ना मुँह फेरते हो, बदले में कुछ पाने की, चाह नहीं रखते हो। यदि तुम प्रेम करते हो, तो बलिदान करोगे, मुश्किलों को स्वीकार करोगे और परमेश्वर के साथ एक हो जाओगे, परमेश्वर के साथ एक हो जाओगे। प्रेम में दूरी नहीं है और अशुद्ध कुछ भी नहीं। अपने हृदय का प्रयोग करो, प्रेम के लिए, अनुभूति के लिए और परवाह करने के लिए।

2. तुम त्याग दोगे अपना यौवन, परिजन और भविष्य जो दिखायी देता, त्याग दोगे अपना विवाह, परमेश्वर के लिए सब कुछ दे दोगे। वरना तुम्हारा प्रेम, प्रेम नहीं है, बल्कि धोखा है, परमेश्वर का विश्वासघात है। प्रेम में नहीं है संदेह, चालाकी या धोखा। अपने हृदय का प्रयोग करो, प्रेम के लिए, अनुभूति के लिए और परवाह करने के लिए।

यह चुनने के लिए अच्छा गीत था। क्या आप यह गीत गाना पसंद करेंगे? (हां।) यह गीत गाने के पश्चात् आप क्या महसूस करते हैं? क्या आप इस तरह के प्रेम को अपने भीतर महसूस करने के योग्य हैं? (अभी तक पूर्णतः नहीं।) गीत में से कौन से शब्दों ने आपको भीतर तक हिला दिया? (वे होंगेः प्रेम में और कोई शर्त नहीं, कोई बाधा नहीं, कोई दूरी नहीं होती है। प्रेम में कोई संदेह, धोखा, समझौता, या कोई चालाकी नहीं होती है। प्रेम में कोई दूरी नहीं और कुछ अशुद्धता नहीं होती है। परन्तु मैं अपने अंदर अशुद्धता देखती हूं। मैं यह भी देखती हूं कि कहां मैंने परमेश्वर के साथ समझौता किया, किन क्षेत्रों में मैं कम पाया गई, इसलिए जब मैं आज अपने बारे में सोचती हूं तो पाती हूं कि मैंने उस प्रकार का प्रेम अब तक हासिल नहीं किया जो शुद्ध और दागरहित है।) अगर आपने उस प्रकार का प्रेम अब तक हासिल नहीं किया जो शुद्ध और दागरहित है। आपके पास कैसा प्रेम है? आपके भीतर प्रेम का स्तर क्या है? (मैं पूर्णतः उस स्तर को खोजने की चाह रखता हूं और तरसता भी हूं।) आपके स्वयं की महत्ता और शब्दों के आधार पर अपने अनुभवों से, आपने कौन सा स्तर प्राप्त किया है? क्या आपके पास धोखा है, क्या आपके पास शिकायतें हैं? (हां।) क्या आपके हृदय में मांगे हैं, कुछ चीज़ें हैं जिन्हें आप परमेश्वर से चाहते और इच्छा रखते हैं? (हां, ये मिलावटी चीज़ें हैं।) किन परिस्थितियों में वे बाहर आती हैं? (जब परिस्थिति जो परमेश्वर ने मेरे लिए बनाई हैं मेरे ख्यालों से मेल नहीं खाती कि कैसा होना चाहिए, या जब मेरी इच्छा पूरी न हुई हो, तब मैं इस प्रकार का कलुषित स्वभाव दिखाऊंगा।) क्या आप अक्सर यह गीत गाते हैं? क्या आप व्याख्या कर सकेंगे कि आप इसे किस तरह समझते हैं "शुद्ध प्रेम बिना दाग"? और परमेश्वर प्रेम को इस तरह क्यों परिभाषित करते हैं? (मैं सचमुच इस गीत को स्वयं पसंद करता हूँ क्योंकि मैं वास्तव में देख सकता हूं कि यह प्रेम एक पूर्ण प्रेम है। हालांकि मैं उस मानक से खुद को बहुत दूर महसूस करता हूँ।) (अब मैं यह महसूस करता हूँ कि सच्चे प्रेम को पाने से मैं अब भी काफी दूर हूं, पर कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर मैं उस तक बढ़ने के काबिल रहा हूं, एक तरीका जो मैं करता हूं कि उस सामर्थ के द्वारा जो परमेश्वर का वचन मुझे देता है और दूसरा तरीका यह कि इन परिस्थितियों में, मैं प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर से सहभागिता करता हूं। हालांकि, जब यह अस्तित्व के विषय में मेरे विचारों को शामिल करता है, तो मुझे महसूस होता है कि मैं उन पर विजय नहीं पा सकता।) क्या आपने कभी उन चीज़ों के बारे में सोचा है जो आपको तब रोकती थी जब आप उन पर काबू नहीं कर पा रहे थे? क्या आपने इन विषयों पर आत्मनिरीक्षण किया है? (हां, मैं आत्मनिरीक्षण करता आया हूं और अधिकतर मेरे स्वयं का घमण्ड और गर्व के साथ साथ भविष्य और नियति की अपेक्षाएं मेरे सबसे बड़े व्यवधान हैं।) जब आपका भविष्य और नियति की अपेक्षाएं सबसे बड़े व्यवधान हैं, तब क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों यह बड़ा अवरोध है? कैसे यह भविष्य और नियति एक अवरोध बन सकते हैं? आप अपने भविष्य और नियति से क्या चाहते हैं? (मैं इस संदर्भ में पूर्णतः स्पष्ट नहीं हूं, कभी मैं ऐसी परिस्थितियों में आ जाता हूं जहां कि मैं महसूस करता हूं कि मेरा कोई भविष्य या नियति नहीं है या कभी-कभी मैं ऐसा सोचता हूं कि जो परमेश्वर ने मुझ पर प्रगट किया मेरे पास कोई लक्ष्य नहीं है। ऐसे समय में मैं बहुत कमजोर महसूस करता हूं और अनुभव करता हूं कि यह मेरी स्वयं की बड़ी रूकावट बन गई है। हालांकि अनुभव और प्रार्थना के एक समय के बाद परिस्थिति एक घुमाव-बिन्दु तक पहुंच सकती है, परन्तु अभी भी इस विषय में मैं विचलित महसूस करता हूं।) जब आप "भविष्य और नियति" कहते हैं, तब उससे सच में आपका क्या तात्पर्य है? क्या ऐसा कुछ है जिसकी ओर आप इशारा कर सकें? क्या यह कोई तस्वीर है या कुछ ऐसा जिसकी आपने कल्पना कर ली या ऐसा कुछ है जिसे आप वास्तव में देख सकते हैं? क्या यह वास्तविक वस्तु है? (यह लक्ष्य है।) लक्ष्य क्या है? आपका भविष्य क्या है? आपमें से प्रत्येक को अपने मन में यह सोचना चाहिए कि आपके भविष्य और नियति को लेकर आपके दिल में जो चिंतायें हैं, वे किस ओर इशारा कर रही हैं? (इसे बचाये और जीवित रखना चाहिये और यह आशा रखनी चाहिए कि यह धीरे-धीरे परमेश्वर के उपयोग में लाने के योग्य बन सके और मेरे कर्तव्य को उस स्तर तक पूरा करने की प्रक्रिया में आ सके जहां मेरा कर्तव्य पूरा हो। अक्सर ये बातें परमेश्वर द्वारा प्रगट की जाती हैं और मैं यह सोचता हूं कि मैं अभी उसके योग्य नहीं हूं।) अन्य भाई बहनों को विचार-विमर्श करना चाहिए। आप "बेदाग़ शुद्ध प्रेम" को कैसे समझते हैं? (व्यक्तिगत स्तर पर कुछ भी अशुद्ध नहीं और वे उनके भविष्य और भाग्य द्वारा नियंत्रित नहीं किए जाते हैं। लिहाज़ा, परमेश्वर के बर्ताव से निरपेक्ष, वे पूर्णतः परमेश्वर के कार्यों को मानने के योग्य होते हैं इसके साथ-साथ परमेश्वर के आयोजन के आज्ञाकारी और अंत तक उसका अनुसरण करने वाले होते हैं। केवल इस प्रकार का प्रेम परमेश्वर की नज़र में शुद्ध प्रेम, बिना दाग का है। केवल जब मैं अपने आप की तुलना उससे करता हूं तो यह पाता हूं कि इन कुछ वर्षों में जब से मैंने परमेश्वर पर विश्वास किया है, मुझे सहज तौर पर कुछ वस्तुओं का बलिदान करना पड़ा और कुछ खर्च भी वहन करना होगा, परन्तु मैं वास्तव में परमेश्वर को अपना दिल देने के योग्य नहीं बन सका। जब परमेश्वर मुझे प्रकाशित करते हैं, तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मुझे ऐसा बनाया गया है जिसे कभी बचाया नहीं जा सकता और मैं उन्हीं नकारात्मक परिस्थितियों में पड़ा रहता हूं। मैं स्वयं को अपना कर्तव्य निर्वाह करते देखता हूं, परन्तु उसी के साथ साथ मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाज़ी करने का प्रयत्न भी करता हूं, और सम्पूर्ण मन से परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ रहता हूं और मेरी मंज़िल, मेरा भविष्य और मेरी नियति मेरे मन में हमेशा बने रहते हैं।)

ऐसा लगता है कि आप इस गीत को अक्सर गा चुके हैं और इसकी कुछ समझ है और इसका आपके वास्तविक अनुभव के साथ कुछ रिश्ता है। हालांकि इस गीत के प्रत्येक पद के साथ लगभग हर एक की स्वीकृति का अलग स्तर है "शुद्ध प्रेम बिना दाग" कुछ लोग इच्छुक हैं, कुछ लोग अपने भविष्य को अलग करने की तलाश में हैं, कुछ लोग अपने परिवार को दरकिनार करने की फिराक में हैं, कुछ लोग कुछ भी पाने की तलाश में नहीं हैं। अभी भी कुछ लोगों को आवश्यकता है कि उनमें धोखा न हो, कोई शिकायत न हो और परमेश्वर के विरुद्ध बलवा न हो। क्यों परमेश्वर इस तरह प्रेम करने की सलाह देना चाहते हैं और यह चाहते हैं कि लोग उनसे इसी तरह से प्रेम करें? क्या यह इस प्रकार का प्रेम है कि लोग इसे प्राप्त कर सकें? कहने का तात्पर्य यह है कि क्या लोग इस प्रकार के प्रेम करने के योग्य हैं? शायद लोग यह देखें कि वे ऐसा प्रेम नहीं कर सकते, क्योंकि उनके पास ऐसा प्रेम है ही नहीं, और जब उनके पास ऐसा प्रेम है ही नहीं जब वे प्रेम के विषय में आधारभूत बातें जानते ही नहीं, तो परमेश्वर ये बातें कहते हैं, जो उनके लिए अनजान हैं। क्योंकि लोग इस दुनिया में रहते हैं, वे अपनी बिगड़ी हुई दशा में जीते हैं, यदि लोगों के पास इस प्रकार का प्रेम होता और यदि कोई अपने में इस प्रकार का प्रेम रख पाता, कि कोई याचना नहीं, कोई मांग नहीं, अपने आप को समर्पित करने के इच्छुक, और दुख सहने को तैयार और जो कुछ उनका अपना है उसे त्याग देने को तैयार, ऐसा व्यक्ति जो इस प्रकार का प्रेम रखता हो, वह अन्य लोगों की नज़रों में कैसा दिखेगा? क्या वह पूर्ण व्यक्ति नहीं होगा? (हाँ।) क्या ऐसा कोई आदर्श व्यक्ति इस जगत में है? वह विद्यमान नहीं है, है क्या? इस प्रकार का कोई व्यक्ति दुनिया में विद्यमान नहीं है, जब तक कि वह शून्यता में न जीता हो, सही है न? इसलिए कुछ लोग अपने अनुभवों के द्वारा जैसा इन शब्दों में विवरण दिया गया है वैसा ही बनने के लिए बहुत मेहनत करते हैं, वे स्वयं से लड़ते हैं, स्वयं पर अंकुश लगाते हैं और स्वयं को लगातार त्यागे या भुलाये रखते हैं: वे दुख सहते और उन गलतफहमियों को जिन में वे पड़े थे, उन्हें छोड़ते हैं। उन तरीकों को छोड़ते हैं जिनके द्वारा वे परमेश्वर से बगावत करते रहे थे। अपनी इच्छाओं और मांग का त्याग करते हैं। परन्तु अंतत:, उन आवश्यकताओं को अभी भी पूर्ण नहीं कर पाते। ऐसा क्यों होता है? परमेश्वर लोगों को ये बातें पालन करने हेतु एक पैमाना प्रदान करने के लिये कहते हैं ताकि लोग जानें कि परमेश्वर लोगों से किस स्तर की मांग करते हैं। पर क्या परमेश्वर ने कभी कहा कि लोगों को यह अभी प्राप्त करना चाहिए? क्या कभी परमेश्वर ने कहा कि इतने समय में लोगों को यह प्राप्त कर लेना चाहिए? (नहीं।) क्या कभी परमेश्वर ने कहा कि लोग उसे इस तरह से प्रेम करें? क्या यह अध्याय ऐसा कहता है? नहीं, यह ऐसा नहीं कहता। परमेश्वर लोगों से बस उस "प्रेम" के विषय में बता रहा है जिसकी वह चर्चा कर रहा था। जहां तक इस बात का प्रश्न है कि लोग परमेश्वर को इस तरह से प्यार करें और परमेश्वर से ऐसे व्यवहार करें, परमेश्वर की मांग क्या हैं? तो यह आवश्यक नहीं कि उन्हें तुरन्त या एकदम अभी पूरा किया जाए क्योंकि लोग ऐसा नहीं कर सकते। क्या आपने कभी सोचा है कि लोगों को इस तरह प्रेम करने के लिए किन परिस्थितियों की आवश्यकता है, यदि लोग इसे बार-बार पढ़ेंगे तो क्या वे धीरे-धीरे इस प्यार को पा लेंगे? (नहीं।) तब क्या शर्तें हैं? पहली, लोग परमेश्वर के प्रति अविश्वास से कैसे मुक्त हो सकते हैं? (केवल ईमानदार व्यक्ति ही इसे प्राप्त कर सकते हैं।) धोखे से छुटकारे के विषय में क्या किया जाये? (उन्हें भी ईमानदार लोग होना चाहिए।) एक ऐसा व्यक्ति होना जो परमेश्वर से सौदेबाज़ी न करे? उसे भी एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए। चालाकी न रखने वाले के विषय में क्या? "प्रेम में कोई चुनाव नहीं होता" ऐसा कहने का क्या तात्पर्य है? क्या यह सब एक ईमानदार व्यक्ति होने की तरफ इशारा कर रहे हैं। यहां पर इनकी कई विस्तृत व्याख्याएं हैं; इस प्रकार के प्रेम को लाने के लिए परमेश्वर की योग्यता या इस प्रकार के प्रेम की व्याख्या के लिए परमेश्वर की योग्यता, इसे इस प्रकार कहने से किस बात की पुष्टि होती है? क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर इस प्रकार का प्रेम रखता है? (हाँ।) इसे कहाँ आप देखते हैं? (परमेश्वर का मनुष्यों के प्रति प्रेम में।) क्या परमेश्वर का मनुष्यों के लिए प्रेम सशर्त है? (नहीं।) क्या परमेश्वर और मनुष्य के मध्य में बाधाएं या दूरियां हैं? (नहीं।) क्या परमेश्वर मनुष्यों पर संदेह करता है? (नहीं।) परमेश्वर मनुष्यों को देखता है, मनुष्य को समझता है, है न? (हां।) वह सचमुच मनुष्य को समझता है। क्या परमेश्वर मनुष्य के प्रति धोखेबाज़ है? (नहीं।) चूंकि परमेश्वर इस प्रेम के विषय में इतनी पूर्णता से कहते हैं, तो क्या उनका हृदय या उनका सार भी इतना ही पूर्ण होगा? क्या लोगों ने प्रेम को कभी इस तरह से परिभाषित किया है? (नहीं।) इंसान ने किन परिस्थितियों में प्रेम को परिभाषित किया है? इंसान प्रेम के विषय में क्या कहता है? क्या यह देना या अर्पण करना नहीं है? (हां।) मनुष्य की प्रेम की परिभाषा सरल है और उसमें तत्व का अभाव है।

परमेश्वर के प्रेम की परिभाषा और जिस तरह से परमेश्वर प्रेम के लिए बोलता है, वे आपस में उसके तत्व के पहलू से सम्बन्धित हैं, पर उसके तत्व के किस पहलू से? पिछली बार हमने एक महत्वपूर्ण विषय पर सहभागिता की थी, यह ऐसा विषय है जिस पर लोगों ने अक्सर चर्चा की है और जिसे आगे लाये हैं, और यह एक शब्द है जो अक्सर परमेश्वर पर विश्वास रखने के वक्त आता है, फिर भी यह एक ऐसा शब्द है जो लोगों में परिचित और अपरिचित दोनों जान पड़ता है, मनुष्य में इसकी परिभाषा बहुत उच्च और निम्न दोनों जान पड़ती हैं, पर ऐसा क्यों है? यह एक ऐसा शब्द है जो मनुष्यों की भाषा से आया है, लोगों में इसकी परिभाषा विशिष्ट भी है और धुंधली भी, लेकिन वह शब्द है क्या? ("पवित्रता"।) ओह पवित्रताः यह वह विषय है जिस पर हमने पिछली बार संगति की थी। हमने इस विषय के बारे में कुछ संगति की थी। पर हमारी बात अधूरी थी। पिछली बार हमने जो चर्चा की थी उसके आधार पर क्या किसी ने परमेश्वर की पवित्रता के तत्व के विषय में कोई नई समझ प्राप्त की? (हां।) आपके विचार में वह नई समझ क्या थी? यानी उस समझ या उन शब्दों में आपको ऐसा क्या लगा जिससे आपको लगा कि मैंने जो संगति में परमेश्वर की पवित्रता की बात बताई थी, उससे वह भिन्न थी? क्या आपको याद है? क्या उसने कुछ प्रभाव डाला? (परमेश्वर कहता है कि वह जो अपने हृदय में महसूस करता है; वह शुद्ध है। यह पवित्रता का एक पहलू है।) यह उसका एक अंश है, क्या इसमें और कुछ भी जोड़ने को है? (जब परमेश्वर मनुष्य पर क्रोधित होता है तो वहां पवित्रता होती है और यह दाग रहित है।) (जहां तक परमेश्वर की पवित्रता की बात है, मैं समझता हूं कि परमेश्वर का क्रोध और दया उनके धर्मी स्वभाव में हैं। इसने मुझ पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला है। यह भी बात आती है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव अनोखा है। पहले मुझे ऐसी समझ नहीं थी या इसकी ऐसी परिभाषा नहीं जानता था। पर अपनी संगति में आपने बताया कि परमेश्वर का क्रोध मनुष्य के गुस्से से अलग है। यह एक ऐसी वस्तु है जो किसी भी सृजन में नहीं है। परमेश्वर का क्रोध एक सकारात्मक बात है और यह सैद्धांतिक है; यह परमेश्वर के अंतर्निहित तत्व द्वारा भेजा जाता है। यह इसलिए है कि वह कुछ नकारात्मक बातें देखता है और इसलिए परमेश्वर अपना क्रोध प्रदर्शित करते हैं। परमेश्वर की दया में, मैं यह भी देखता हूं कि किसी भी सृजन में इसका अस्तित्व नहीं है।) हमारे वर्तमान विषय पर मैं इस विषय पर चर्चा करूंगा, जो परमेश्वर की पवित्रता का ज्ञान है। लोग अक्सर परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को उसकी पवित्रता के साथ जोड‌ देते हैं और वे सब जानते हैं और उनकी धार्मिक स्वभाव के विषय में कुछ विस्तार से सुना है। और तो और, कई लोग अक्सर परमेश्वर की पवित्रता और उनके धार्मिक स्वभाव को अपनी संगति में यह कहते हुए जोड़ते हैं कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव पवित्र है। हर कोई "पवित्र" शब्द से अच्छी तरह परिचित है और यह आमतौर पर उपयोग किया जाने वाला शब्द है, परन्तु उस शब्द के गुणार्थों के सम्बन्ध में, परमेश्वर की पवित्रता की किन अभिव्यक्तियों को लोग देख पाने के योग्य हैं? परमेश्वर ने ऐसा क्या प्रकाशित किया है जिसे लोग मान सकें? मैं सोचता हूँ कि यह कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं जानता। हम कहते हैं कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है, परन्तु यदि आप परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को लेकर यह कहते हैं कि यह पवित्र है, यह कुछ अस्पष्ट मालूम पड़ता है, थोड़ा संशय में डालने वाला, ऐसा क्यों है? आप कहते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, या आप कहते हैं कि उनका धार्मिक स्वभाव पवित्र है तो अपने मनों में आप परमेश्वर की पवित्रता को कैसे चित्रित करते हैं? आप उसे कैसे समझते हैं? कहने का तात्पर्य यह कि परमेश्वर ने क्या प्रगट किया या कि परमेश्वर के पास क्या है और क्या वे लोग उसे पवित्र मानेंगे? क्या आपने इसके बारे में पहले सोचा था? मैंने यह देखा है कि लोग सामान्य तौर से उपयोग में लाए जाने वाले शब्द कहते या उन मुहावरों को बोलते हैं जो बार-बार दोहराए जाते हैं, फिर भी वे यह नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं? यह ठीक वैसे ही है जैसे हर कोई कहता है, और वे आदत के अनुसार यह कहते हैं, और यह एक मुहावरा बन जाता है। यद्यपि यदि उन्हें इस बात को खोजना और वास्तव में अध्ययन करना होता, वे यह पाते कि उसकी पवित्रता के सम्बन्ध में वास्तविक अर्थ क्या है या यह किसके विषय में है। "पवित्र" शब्द की ही तरह, कोई नहीं जानता कि परमेश्वर की पवित्रता के विषय में परमेश्वर के किस पहलू की बात की जा रही है। जहां तक "पवित्र" शब्द से परमेश्वर के साथ सामंजस्य की बात है, कोई भी नहीं जानता और लोगों के हृदय संशय में हैं और वे इस बात में खुलें हैं कि वे परमेश्वर को पवित्र कैसे मानते हैं। परन्तु जब आप इसकी गहराई में जाते हैं तब परमेश्वर कैसे पवित्र है? क्या कोई जानता है? मैं सोचता हूं कि कोई इस विषय पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। आज हम "पवित्र" शब्द का परमेश्वर के साथ सामंजस्य विषय पर चर्चा करेंगे कि ताकि लोग परमेश्वर की पवित्रता के सार के वास्तविक अंश को देख सके, इस से कुछ लोगों को आदतानुसार लापरवाही से शब्द का प्रयोग करने और उन बातों को अंधाधुंध तरीके से कहने से रोका जा सकेगा जिसके बारे में जानते ही नहीं कि वे क्या कह रहे हैं या नहीं समझते कि वे सही और परिशुद्ध हैं या नहीं। लोग हमेशा इस तरह कहते हैं, आपने यह कहा है, मैंने यह कहा, है और यह कहने का एक तरीका बन गया है और लोगों ने इस तरह "पवित्र" शब्द को अनजाने में कलंकित कर दिया है।

"पवित्र" शब्द, सतही तौर पर समझने के लिए बहुत आसान जान पड़ता है, है न? कम से कम, लोग "पवित्र" शब्द का अर्थ साफ, मैलरहित, पावन और शुद्ध के रूप में मानते हैं, जैसा कि हमने गीत में अभी गाया, "शुद्ध प्रेम बिना दाग" जहां "पवित्रता" और "प्रेम" दोनों एक साथ रखे गए हैं, जो कि सही है; यह इसका ही भाग है, परमेश्वर का प्रेम उनके तत्व का भाग है, परन्तु यह इसकी पूर्णता नहीं है, जहां तक लोगों का दृष्टिकोण है, वे शब्द को देखते और उसे उन बातों के साथ संगठित करने का प्रयास करते हैं जिन्हें वे स्वयं के नज़रिए से शुद्ध और साफ देखते हैं या वे बातें जिन्हें वे व्यक्तिगत तौर पर सोचते हैं कि वे मैली नहीं हैं और निष्कलंक हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग कहते हैं कि कमल का फूल साफ है, लोग कैसे कमल के फूल को इस तरह परिभाषित कर सके? ("कमल का फूल कीचड़ में खिलता है फिर भी निष्कलंक है।") यह गंदे पानी में निष्कलंक खिलता है, इसलिए लोग कमल के फूल के लिए "पवित्र" शब्द लगाने लगे। कुछ लोगों ने प्रेम कथाएँ जो दूसरों के द्वारा लिखी गई थी और उनकी विषय वस्तु को, देखा और उनका सार "पवित्र" जैसा माना या कल्पित योग्य नायकों को पवित्र देखा। इसके अलावा, कुछ ने बाइबिल या अन्य आध्यात्मिक पुस्तक के लोगों को संत या देवदूत मान लिया जिन्होंने परमेश्वर द्वारा किये जा रहे कार्य के दौरान उनकी आज्ञा का पालन किया जिन्हें आध्यात्मिक अनुभव हुए जो पवित्र थे। ये सब वे बातें हैं जो लोगों ने धारण कर लीं और ये अवधारणाएं लोगों द्वारा अपना ली गई लोग ऐसी अवधारणा क्यों रखते हैं? इसका एक कारण है और यह बहुत सरल हैः यह इसलिए है कि लोग गलत स्वभाव के मध्य जीते और एक बुरे और गंदे जगत में रहते हैं। वे जो कुछ देखते हैं, वे जो कुछ छूते हैं, वे जो कुछ अनुभव करते हैं, वह शैतान की बुराई और शैतान का भ्रष्टाचार है, साथ ही साथ कुचक्र,अंतर्कलह और युद्ध होते हैं, जो उन लोगों के बीच होते हैं जो शैतान के प्रभाव में होते हैं। इसी कारण, जब कभी परमेश्वर लोगों के मध्य में अपना कार्य करते हैं, या जब कभी परमेश्वर लोगों से बात करते हैं और उनके द्वारा अपना स्वभाव और तत्व लोगों पर प्रदर्शित किया जाता है, तब लोग यह देख पाने या ग्रहण करने के योग्य नहीं होते कि पवित्रता क्या है। और यही कारण है कि ये लोग अक्सर कहते हैं कि परमेश्वर पवित्र हैं। क्योंकि लोग गंदगी, भ्रष्टाचार और शैतान के अधीन रहते हैं, वे प्रकाश को नहीं देखते, सकारात्मक बातों और चीज़ों को नहीं जानते, और यहां तक कि वे सत्य को भी नहीं जानते हैं। इसलिए, कोई वास्तविक रूप से नहीं जानता कि पवित्रता क्या है। यह कहने के बाद, क्या कोई पवित्र वस्तु या पवित्र जन इस भ्रष्ट मानवजाति में पाया है? (नहीं।) हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि नहीं है, क्योंकि केवल परमेश्वर का तत्व पवित्र है।

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