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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

10. फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना

(मरकुस 3:21-22) जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, कि "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

11. यीशु फरीसियों को डाँटता है

(मत्ती12:31-32) इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निंदा क्षमा की जाएगी, पर पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

(मत्ती23:13-15) हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो तुम स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उसमें प्रवेश करने वालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा। हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिए सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

ऊपर दो अलग अलग अंश हैं—आओ पहले प्रथम पर एक नज़र डालें: फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना।

बाइबल में, फरीसियों के द्वारा स्वयं यीशु का मूल्याँकन और वे चीज़ें जो उसने की थी वे थेः क्योंकि वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाना रट्टू तोते की तरह बोलना या हवा के हल्के बयार में कल्पना करना नहीं था—जो कुछ उन्होंने देखा और उसके कार्यों के विषय में सुना था उसके आधार पर यह प्रभु यीशु के लिए उनका निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष व्यर्थ दिखावे के रूप में न्याय के नाम पर लिया गया था और लोगों को ऐसा दिखता था मानो उन्हें अच्छे प्रमाणों से स्थापित किया गया है, फिर भी वह अहंकार जिसके तहत उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाया था उस पर काबू पाना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के लिए उनकी नफरत की आवेग से भरी हुई ऊर्जा ने स्वयं उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षा और उन के बुरे शैतानी चेहरे, साथ ही साथ परमेश्वर का विरोध करने के उनके द्रोही स्वभाव का भी का खुलासा कर दिया था। ये बातें उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाते हुए कही थीं जो उनके खतरनाक महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर एवं सच्चाई के प्रति उनकी शत्रुता के गंदे और द्रोही स्वभाव से प्रेरित थी। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, और ना ही उन्होंने जो कुछ उसने कहा था या किया था उसके सार की खोज की। परन्तु उन्होंने असावधानी, अधीरता, सनक और जानबूझकर की गई ईर्ष्या के साथ जो कुछ उसने किया था उस पर आक्रमण किया और उस पर विश्वास नहीं किया। यह इस बिंदु तक था कि उन्होंने बिना सोचे विचारे उसके आत्मा पर, अर्थात् पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा पर कलंक लगाया। यही उनका मतलब था जब उन्होंने कहा था "उसका चित ठिकाने नहीं है," "बील्ज़ेबूब और दुष्टात्माओं का सरदार।" ऐसा कहना चाहिए, उन्होंने कहा कि परमेश्वर की आत्मा बील्ज़ेबूब और दुष्टात्माओं की सरदार है। उन्होंने उस देहधारी शरीर के कार्य को पागलपन कहा जिसे परमेश्वर की आत्मा ने धारण किया था। उन्होंने ना केवल बील्ज़ेबूब और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर की आत्मा की निंदा की, परन्तु उन्होंने परमेश्वर के कार्य पर दोष भी लगाया था। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी निंदा की। उनके प्रतिरोध और परमेश्वर की निंदा का सार बिल्कुल शैतान और परमेश्वर के प्रति दुष्टात्माओं के प्रतिरोध और ईश निंदा के सार के समान ही था। वे ना केवल भ्रष्ट मनुष्यों को दर्शाते हैं, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा वे शैतान के मूर्त रूप है। वे मानवजाति के मध्य एक माध्यम थे, और वे शैतान के सहअपराधी और सन्देशवाहक थे। उनकी ईश निंदा का निचोड़ और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह के चरित्र को दूषित किया जाना यह सब परमेश्वर के साथ पद को लेकर उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा, और परमेश्वर को परखने की उनकी कभी ना खत्म होने वाली इच्छा थी। परमेश्वर के प्रति उनके प्रतिरोध का निचोड़ और उसके प्रति उनकी शत्रुता की मनोवृत्तियाँ, साथ ही साथ उनके शब्द और उनके विचारों ने सीधे सीधे परमेश्वर के आत्मा की निंदा की और उसे क्रोधित किया था। इस प्रकार, परमेश्वर ने जो कुछ उन्होंने कहा था और किया था उसके लिए एक उचित दण्ड का निर्धारण किया, और उनके कार्यो को पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप के रूप में निर्धारित किया था। यह पाप इस संसार और आने वाले संसार में भी क्षमा करने योग्य नहीं है बिल्कुल वैसा ही जैसा निम्नलिखित अंश कहता हैः "मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निंदा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" आज, आओ हम परमेश्वर के इन शब्दों के सच्चे अर्थ के बारे में बातें करें "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" यह सरल रीति से समझना है कि परमेश्वर किस प्रकार वचनों को पूरा करता है "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।"

प्रत्येक चीज़ जिसके बारे में हम बात कर चुके हैं वह परमेश्वर के स्वभाव, और लोगों, प्रकरणों, और चीज़ों के प्रति उसकी मनोवृत्तियाँ से जुड़ा हुआ है। स्वाभाविक रीति से, ऊपर दिए गए दोनों अंश अपवाद नहीं हैं। क्या तुम लोगों ने पवित्र शास्त्र के इन दोनों अंशों में कुछ ध्यान दिया था? कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के क्रोध को देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं जो मानवजाति के अपराध को सहन नहीं कर सकता है, और यह कि यदि लोग कुछ ऐसा करें जिससे परमेश्वर की निंदा हो, तो वे उसकी क्षमा को प्राप्त नहीं करेंगे। इस सच्चाई के अतिरिक्त कि लोग इन दोनों अंशों में परमेश्वर के क्रोध और असहिष्णुता को देखते हैं और महसूस करते हैं, फिर भी वे अभी तक उसकी प्रवृत्ति को सचमुच में समझ नहीं पाए हैं। ये दोनों अंश उनके प्रति जो उसकी निंदा करते हैं और उसे क्रोधित करते है परमेश्वर की सच्ची प्रवृत्ति और पहुँच के अर्थ को धारण किए हुए है। पवित्र शास्त्र का यह अंश उसकी सच्ची प्रवृत्ति और पहुँच के अर्थ को थामे हुए हैः "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की निंदा करते हैं, जब वे उसे क्रोध दिलाते हैं, वह एक आदेश जारी करता है, और उसका आदेश उसका अंतिम परिणाम होता है। इसे बाइबल मे इस प्रकार से वर्णित किया गया हैः "इसलिए मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निंदा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12: 31-32), और "हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय!" (मत्ती 23: 13)। फिर भी, यह बाइबल में दर्ज है कि शास्त्रियों और फरीसियों का, साथ ही साथ उन लोगों का क्या परिणाम हुआ था जिन्होंने प्रभु यीशु के द्वारा इन बातों को कहने के बाद कहा था कि वह पागल है? यदि उन्होंने किसी प्रकार का दण्ड सहा तो क्या यह पवित्र शास्त्र में दर्ज है? यह निश्चित है कि यह दर्ज नहीं था। यहाँ यह कहना कि "दर्ज नहीं था" यह नहीं है कि इसे दर्ज नहीं किया गया था, किन्तु वास्तव मे वहाँ कोई परिणाम नहीं था जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था। यह "दर्ज नहीं था" एक मसले की व्याख्या करता है, अर्थात् कुछ चीज़ों को सँभालने के लिए परमेश्वर की मनोवृत्तियाँ एवं सिद्धांत। जो परमेश्वर की निंदा करते हैं या उसे कोसते हैं उन लोगों के प्रति उसका उपचार, या वे जो उस पर कलंक लगाते हैं—लोग जो जानबूझकर उस पर हमला करते हैं, कलंक लगाते हैं, और उसे कोसते हैं—वह उनकी आँखों को अँधा या कान को बहरा नहीं करता है। उनके प्रति उसके पास एक साफ मनोवृत्ति है। वह इन लोगों से घृणा करता है, अपने हृदय में उनकी भ्रत्सना करता है। वह खुलकर उनके लिए परिणामों की घोषणा भी करता है, ताकि लोग जान सकें कि जो उसकी निंदा करते हैं उनके प्रति उसके पास एक स्पष्ट मनोवृत्ति है, और ताकि वे यह भी जान सकें कि वह किस प्रकार उनके नतीजों को निर्धारित करता है। फिर भी, परमेश्वर के ऐसा कहने के बाद, बहुत मुश्किल से ही लोग उस सच्चाई को देख पाते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार ऐसे लोगों से निपटता है, और वे परमेश्वर के नतीजों के पीछे के सिद्धांतों, और उनके लिए उसकी आज्ञा को समझ नहीं सकते हैं। ऐसा कहना चाहिए, मानवजाति उस विशेष मनोवृत्ति और पद्धति को देख नहीं सकते हैं जो उनसे निपटने के लिए परमेश्वर के पास है। कुछ चीज़ो को करने के लिए इसे परमेश्वर के सिद्धांतों से ताल्लुक रखना है। कुछ लोगों के बुरे व्यवहार से निपटने के लिए परमेश्वर कुछ प्रमाणित तथ्यों की खोज का प्रयोग करता है। अर्थात्, वह उनके पापों की घोषणा नहीं करता है और उनके परिणामों को निर्धारित नहीं करता है, परन्तु वह प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित तथ्यों की खोज का प्रयोग करता है जिससे उन्हें दण्डित करने, और उनका उचित बदला देने की अनुमति दे सके। जब ये प्रमाणित तथ्य घटित होते हैं, इससे लोगों को शरीर में कष्ट उठाना पड़ता है; यह सब कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता है। कुछ लोगों के बुरे व्यवहार से निपटते समय, परमेश्वर बस वचनों से षाप देता है, परन्तु उसी समय, परमेश्वर का क्रोध उनके ऊपर आ जाता है, और वह दण्ड जिसे वे प्राप्त करते हैं वह शायद कुछ ऐसा होता है जिसे लोग देख नहीं सकते हैं, परन्तु इस प्रकार के नतीजे शायद उन नतीज़ों से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं जब लोग देख सकते हैं कि उन्हें दण्डित किया या मारा जा रहा है। यह इसलिए है क्योंकि उस परिस्थिति के अन्तर्गत जिसमें परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि इस प्रकार के व्यक्ति को बचाना नहीं है, और आगे से उनके लिए कोई दया और सहनशीलता नहीं दिखाना है, और उन्हें कोई और अवसर नहीं देना है, तो उनके लिए उसकी मनोवृत्तियाँ होती है कि उन्हें अलग कर दिया जाए। "अलग कर दिया जाए" का अर्थ क्या होता है? अपने आप में इस शब्दावली का अर्थ होता है किसी चीज़ को एक तरफ रख दिया जाए, और आगे से उस पर कोई ध्यान ना दिया जाए। यहाँ, जब परमेश्वर "अलग कर देता है" तो उसके अर्थ की दो अलग अलग व्याख्याएँ होती हैं: पहली व्याख्या है कि उसने उस व्यक्ति के जीवन, और उस व्यक्ति की हर चीज़ को शैतान को दे दिया गया है ताकि वह उसके साथ निपटे। परमेश्वर अब आगे से उत्तरदायित्व नहीं लेगा और आगे से उसका प्रबन्ध भी नहीं करेगा। भले ही वह व्यक्ति पागल या मूर्ख हो जाए, और चाहे जीवित रहे या मर जाए, या भले ही वे अपने दण्ड के लिए नरक में नीचे चले जाएँ, फिर भी इससे परमेश्वर का कोई लेना देना नहीं होगा। इसका यह मतलब होगा कि उस जीवधारी का परमेश्वर के साथ कोई रिश्ता नहीं होगा। दूसरी व्याख्या यह है कि परमेश्वर ने यह निर्धारित किया है कि वह स्वयं इस व्यक्ति के साथ, अपने हाथों से कुछ करना चाहता है। यह संभव है कि वह इस प्रकार के व्यक्ति की सेवा का उपयोग करेगा, या यह कि वह इस व्यक्ति को एक विषमता के रूप में उपयोग करेगा। यह संभव है कि इस प्रकार के इंसान से निपटने के लिए, परमेश्वर के पास एक विशेष तरीका होगा—बिल्कुल पौलुस के समान। यह परमेश्वर के हृदय का सिद्धांत और मनोवृत्ति है कि उसने किस तरह इस प्रकार के व्यक्ति से निपटने का निर्णय लिया है। इस प्रकार जब लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और उस पर दोश और कलंक लगाते हैं, और यदि वे उसके स्वभाव को उत्तेजित करते हैं, या यदि वे परमेश्वर के निर्णायक बिंदु तक पहुँच जाते हैं, तो परिणाम अकल्पनीय हो जाते हैं। सबसे कठोर परिणाम यह है कि परमेश्वर हमेशा हमेशा के लिए उनकी ज़िन्दगियों और उनकी हर चीज़ को शैतान को सौंप देता है। वे पूरी अनंतता के लिए क्षमा नहीं किए जाएँगे। इसका यह मतलब है कि यह व्यक्ति शैतान के मुँह का निवाला, और उसके हाथ का खिलौना बन चुका है, और उस समय के बाद से परमेश्वर का उनके साथ कुछ लेना देना नहीं है। क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि जब शैतान ने अय्यूब की परीक्षा ली थी तो वह किस प्रकार की दुर्दशा थी? उस शर्त के अंतर्गत जिसमें शैतान को अय्यूब के प्राण को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं दी गई थी, अय्यूब ने तब भी बड़ा कठिन दुःख सहा था। और क्या शैतान की क्रूरता की कल्पना करना और ज़्यादा कठिन नहीं है जिसके अधीन एक व्यक्ति को कर दिया जाएगा, जिसे पूर्णत: शैतान को सौंपा जा चुका है, जो पूर्णत: शैतान के चंगुल में है, जिसने परमेश्वर की देखरेख और दया को पूर्णत: खो दिया है, जो आगे से सृष्टिकर्ता के शासन के अधीन नहीं है, जिससे परमेश्वर की आराधना करने का अधिकार, और परमेश्वर के शासन के अधीन एक जीवधारी होने का अधिकार छिना जा चुका है, जिसका रिश्ता सृष्टि के प्रभु के साथ पूर्णत: अलग कर दिया गया है? शैतान के द्वारा अय्यूब को दुःख देना कुछ ऐसा था जिसे मनुष्य की आँखों से देखा जा सकता था, परन्तु यदि परमेश्वर एक व्यक्ति के जीवन को शैतान को सौंप देता है, तो इसका नतीजा ऐसा होगा जिसके बारे में किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। यह ऐसा है मानो कुछ लोग एक गाय, या एक गधे के रूप में फिर से जन्म लें, या कुछ लोगों पर अशुद्ध, और बुरी आत्माओं के द्वारा कब्जा कर लिया जाए, या वे उनमें समा जाएँ, इत्यादि। यह वह परिणाम है, और उन लोगों का अन्त है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा शैतान को सौंपा जा चुका है। बाहरी तौर पर, ऐसा दिखाई देता है कि वे लोग जिन्होंने प्रभु यीशु का उपहास किया था, उस पर दोष लगाया था, और उसकी निंदा की थी उन्होंने कोई परिणाम नहीं सहा। फिर भी, सच्चाई यह है कि हर एक चीज़ से निपटने के लिए परमेश्वर के पास एक मनोवृत्ति है। वह जिस प्रकार हर तरह के लोगों से निपटता है उसके परिणाम को लोगों को बताने के लिए शायद परमेश्वर स्पष्ट भाषा का प्रयोग ना करे। कई बार वह प्रत्यक्ष रीति से बात नहीं करता है, परन्तु वह प्रत्यक्ष रीति से कार्यों को करता है। वह इसके बारे में बात नहीं करता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वहाँ एक परिणाम नहीं है—यह संभव है कि परिणाम बहुत ही ज़्यादा गंभीर हो। प्रकट रूप से देखने से, ऐसा लगता है कि परमेश्वर अपनी मनोवृत्ति को प्रकाशित करने के लिए कुछ लोगों से बात नहीं करता है; वस्तुतः परमेश्वर लम्बे समय तक उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता है। वह उनको अब और देखना नहीं चाहता है। उन चीज़ों, तथा उनके व्यवहार के कारण जो उन्होंने किया है, और उनके स्वभाव और उनके सार के कारण, परमेश्वर केवल इतना चाहता है कि वे उसकी नज़रों से ओझल हो जाएँ, और वह उन्हें सीधे शैतान को सौंप देना चाहता है, ताकि उन के आत्मा, प्राण, और देह को शैतान के दे दे, ताकि शैतान को अनुमति मिले कि वह जो चाहे वह करे। यह स्पष्ट हो गया कि वह किस हद तक उनसे नफरत करता है, वह किस हद तक उनसे उकता गया है। यदि एक इंसान इस हद तक उसे क्रोधित करता है कि परमेश्वर उसे दुबारा देखना भी नहीं चाहता है, तो वह उन्हें पूर्णत: छोड़ देगा, उस बिंदु तक कि परमेश्वर स्वयं उनसे कोई व्यवहार करना नहीं चाहेगा—यदि यह उस बिंदु तक पहुँच जाता है तो वह उन्हें शैतान को सौंप देगा ताकि वह जैसा चाहे वैसा करे, और वह शैतान को अनुमति देगा कि उन पर नियंत्रण करे, उन्हें भस्म करे, और जैसा चाहे उनसे वैसा व्यवहार करे—इस इंसान का पूर्णत: खात्मा हो गया। मनुष्य होने का उनका अधिकार पूरी रीति से रद्द कर दिया गया है, और एक जीवधारी होने के नाते उनका अधिकार समाप्त हो गया। क्या यह अति गंभीर परिणाम नहीं है?

ऊपरोक्त सभी बातें इन वचनों की पूर्ण व्याख्या हैः "उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा," और यह पवित्र शास्त्र के इन अंशों के ऊपर एक छोटी सी समीक्षा भी है। मैं सोचता हूँ अब तुम लोगों के पास इन बातों की समझ है!

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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