सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी
वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

श्रेणियाँ

Recital-the-word-appears-in-the-flesh-1
अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर की मनोवृत्ति को समझना और परमेश्वर के विषय में सभी गलत अवधारणाओं को छोड़ देना

यह परमेश्वर जिस पर तुम लोग वर्तमान में विश्वास करते हो, क्या तुम सब ने इसके विषय में कभी सोचा है कि यह किस प्रकार का परमेश्वर है? जब वह किसी बुरे व्यक्ति को बुरे कार्य करते हुए देखता है, तो क्या वह उससे घृणा करता है? (वह उससे घृणा करता है।) जब वह अज्ञानी लोगों की गलतियों को देखता है, तो उसकी मनोवृत्ति क्या होती है? (उदासी।) जब वह लोगों को अपनी भेटों को चुराते हुए देखता है, तो उसकी मनोवृत्ति क्या होती है? (वह उनसे घृणा करता है।) यह सब बिलकुल साफ है, सही है? जब वह किसी व्यक्ति को परमेश्वर के प्रति विश्वास में लापरवाह होते हुए, और किसी भी रीति से सत्य की खोज करते हुए नहीं देखता है, तो परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या होती है? तुम लोग इस पर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो, सही है? लापरवाही ऐसी मनोवृत्ति है जो पाप नहीं है, और यह परमेश्वर को ठेस नहीं पहुंचाती है। लोग मानते हैं कि इसे एक गहरी भूल नहीं मानना चाहिए। तब तू क्या सोचता है कि परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है? (वह इसका प्रत्युत्तर देने के लिए तैयार नहीं है।) इसका प्रत्युत्तर देने के लिए तैयार नहीं है—यह मनोवृत्ति क्या है? यह ऐसा है कि परमेश्वर इन लोगों को तुच्छ मानता है, और इन लोगों का उपहास करता है! परमेश्वर जानबूझकर कोई ध्यान न देने के द्वारा ऐसे लोगों से निपटता है। उसका तरीका है कि उन्हें दरकिनार कर दे, उनके प्रति किसी भी कार्य में, जिसमें प्रबुद्धता, रोशनी, ताड़ना या अनुशासन शामिल है, संलग्न न हो। इस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर के कार्य में शुमार नहीं किया जाता है। ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करते हैं, और उसके प्रशासनिक आदेशों को ठेस पहुंचाते हैं? अत्यंत घृणा! परमेश्वर ऐसे लोगों के द्वारा अत्यंत क्रोधित होता है जो उसके स्वभाव को क्रोधित करने के विषय में पश्चातापी नहीं हैं! "क्रोधित होना" बस एक एहसास है, एक मिजाज़ है; यह एक स्पष्ट मनोवृत्ति को प्रदर्शित नहीं कर सकता है। परन्तु यह एहसास, यह मिजाज़ इस व्यक्ति के लिए एक परिणाम को उत्पन्न करता है: यह परमेश्वर को अत्यंत घृणा से भर देगा। इस अत्यंत घृणा का परिणाम क्या है? यह ऐसा है कि परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को दरकिनार कर देगा, और कुछ समय के लिए उन्हें कोई प्रत्युत्तर नहीं देगा। वह उनके लिए इंतज़ार करेगा कि प्रतिशोध के दौरान उन्हें छांटकर अलग किया जाए। यह क्या सूचित करता है? क्या इस व्यक्ति के पास अभी भी कोई परिणाम है? परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्ति को कभी कोई परिणाम देने का इरादा नहीं किया था! अतः तब क्या यह सामान्य बात नहीं है कि परमेश्वर वर्तमान में इस प्रकार के व्यक्ति को कोई प्रत्युत्तर नहीं देता है? (हाँ।) अब इस प्रकार के व्यक्ति को किस प्रकार तैयारी करनी चाहिए? उन्हें उन नकारात्मक परिणामों को लेने के लिए तैयार रहना चाहिए जो उनके व्यवहार एवं उस बुराई के द्वारा उत्पन्न हुए हैं जिन्हें उन्होंने किया है। इस प्रकार के व्यक्ति के लिए यह परमेश्वर का प्रत्युत्तर है। अतः अब मैं इस प्रकार के व्यक्ति से साफ साफ कहता हूँ: भ्रान्तियों को अब और पकड़े न रहो, और ख्याली पुलाव पकाने में अब और लगे न रहो। परमेश्वर अनिश्चित काल तक लोगों के प्रति सहनशील नहीं होगा। वह अनिश्चित काल तक उनके अपराधों एवं अनाज्ञाकारिता को सहन नहीं करेगा। कुछ लोग कहेंगे: "मैं ने इस प्रकार के कुछ लोगों को भी देखा है। जब वे प्रार्थना करते हैं तो उन्हें विशेष रूप से परमेश्वर द्वारा स्पर्श किया जाता है, और वे फूट फूट कर रोते हैं? सामान्यतया वे बहुत खुश भी होते हैं; ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास परमेश्वर की उपस्थिति है और परमेश्वर का मार्गदर्शन है।" ऐसी बेतुकी बातें न करो! फूट फूट कर रोना आवश्यक रूप से परमेश्वर के द्वारा स्पर्श किया जाना या परमेश्वर की उपस्थिति नहीं है, परमेश्वर के मार्गदर्शन की तो बात ही छोड़ दो। यदि लोग परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं, तो क्या परमेश्वर तब भी उनका मार्गदर्शन करेगा? संक्षेप में, जब परमेश्वर ने किसी व्यक्ति को बहिष्कृत करने के लिए, एवं उन्हें त्यागने के लिए निर्णय लिया है, तो उस व्यक्ति के पास पहले से ही कोई परिणाम नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जब वे प्रार्थना करते हैं तो वे स्वयं में कितनी आत्मसंतुष्टि का एहसास करते हैं, और उनके हृदय में परमेश्वर के प्रति कितना आत्मविश्वास है; यह पहले से ही महत्वहीन है। महत्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर को इस प्रकार के आत्मविश्वास की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने इस व्यक्ति को पहले से ही ठुकरा दिया है। उनके साथ बाद में कैसा व्यवहार करना है यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। जो महत्वपूर्ण है वह यह है कि जिस क्षण वह व्यक्ति परमेश्वर को क्रोध दिलाता है, उनका परिणाम पहले ही निर्धारित हो जाता है। यदि परमेश्वर ने तय कर लिया है कि इस प्रकार के व्यक्ति को नहीं बचाना है, तब दण्डित होने के लिए उन्हें पीछे छोड़ दिया जाएगा। यह परमेश्वर की मनोवृत्ति है।

यद्यपि परमेश्वर के सार का एक भाग प्रेम है, और वह हर एक को दया प्रदान करता है, फिर भी लोग उस बिन्दु (मुख्य बात) की अनदेखी करते हैं और भूल जाते हैं कि उसका सार प्रतिष्ठा भी है। यह कि उसके पास प्रेम है इसका अर्थ यह नहीं है कि लोग उसे खुलकर ठेस पहुंचा सकते हैं और उसके पास कोई एहसास या कोई प्रतिक्रिया नहीं है। उसके पास दया है इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके पास कोई सिद्धान्त नहीं है कि किस प्रकार लोगों से व्यवहार करे। परमेश्वर जीवित है; वह सचमुच में अस्तित्व में है। वह कोई काल्पनिक कठपुतली या कुछ और नहीं है। अब चूँकि वह अस्तित्व में है, हमें सावधानीपूर्वक हर समय उसके हृदय की आवाज़ को सुनना चाहिए, उसकी मनोवृत्ति पर ध्यान देना चाहिए, और उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए हमें लोगों की कल्पनाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, और हमें लोगों के विचारों एवं इच्छाओं को परमेश्वर के ऊपर नहीं थोपना चाहिए, और जिस प्रकार परमेश्वर मानवजाति से व्यवहार करता है उसमें मनुष्य की शैली एवं सोच को काम में लाने के लिए परमेश्वर को बाध्य नहीं करना चाहिए। यदि तू ऐसा करता है, तो तू परमेश्वर को क्रोध दिला रहा है, तू परमेश्वर के प्रचण्ड क्रोध की परीक्षा ले रहा है, और तू परमेश्वर की प्रतिष्ठा को चुनौती दे रहा है! इस प्रकार, जब तुम सब ने इस मसले की गंभीरता को समझ लिया हो उसके पश्चात्, मैं तुम लोगों में से हर एक एवं प्रत्येक से आग्रह करता हूँ कि तुम सब अपने कार्यों में सावधान और बुद्धिमान हो। अपने बोलने में सावधान और बुद्धिमान हो। और जिस तरह तुम लोग परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो उसके सम्बन्ध में, तुम सब जितना अधिक सावधान और बुद्धिमान रहो, उतना ही बेहतर है! जब तू नहीं समझता है कि परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है, तो लापरवाही से बात न कर, अपने कामों में लापरवाह न हो, और लापरवाही से नाम पट्टी (लेबल) न लगा। इससे भी अधिक, मनमाने ढंग से निष्कर्षों पर न पहुंच। इसके बदले, तुझे प्रतीक्षा एवं खोज करनी चाहिए; यह भी परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का प्रकटीकरण है। यदि तू सब बातों से बढ़कर इस मुकाम को हासिल कर सकता है, और सब से बढ़कर इस मनोवृत्ति को धारण कर सकता है, तब परमेश्वर तेरी मूर्खता, तेरी अनभिज्ञता, और तर्कहीनता के लिए तुझे दोष नहीं देगा। इसके बदले, परमेश्वर को ठेस पहुंचाने के विषय में तेरे भय के कारण, परमेश्वर के इरादों के प्रति तेरे सम्मान के कारण, और परमेश्वर की आज्ञा मानने के विषय में तेरी सहमति की मनोवृत्ति कारण, परमेश्वर तुझे स्मरण करेगा, तुझे मार्गदर्शन एवं प्रबुद्धता देगा, या तेरी अपरिपक्वता एवं अज्ञानता को सहन करेगा। इसके विपरीत, क्या परमेश्वर के प्रति तेरी मनोवृत्ति को श्रद्धा विहीन होना चाहिए—मनमाने ढंग से परमेश्वर पर दोष लगाना, मनमाने ढंग से अनुमान लगाना और परमेश्वर के विचारों की परिभाषा करना—परमेश्वर तुझे दृढ़ विश्वास, अनुशासन, और यहाँ तक कि दण्ड भी देगा; या वह तुझे एक कथन देगा। कदाचित् यह कथन तेरे परिणाम को सम्मिलित करता हो। इसलिए, मैं एक बार फिर से इस पर जोर देना एवं उपस्थित हर एक व्यक्ति को सूचित करना चाहता हूँ कि हर वह चीज़ जो परमेश्वर की ओर से आती है उसके प्रति सावधान एवं बुद्धिमान रहें। लापरवाही से न बोलें, और अपने कामों में लापरवाह न हों। इससे पहले कि तू कुछ कहे, तुझे सोचना चाहिए: क्या ऐसा करना परमेश्वर को क्रोधित करेगा? क्या ऐसा करना परमेश्वर का भय मानना है? यहाँ तक कि साधारण मामलों के लिए भी, तुझे वास्तव में अभी भी इन प्रश्नों का हिसाब लगाना चाहिए, और वास्तव में उन पर विचार करना चाहिए। यदि तू हर जगह, सभी हालातों एवं सभी समयों में इन सिद्धान्तों के अनुसार सचमुच में अभ्यास कर सकता है, विशेषकर उन मामलों के लिहाज से जिन्हें तू नहीं समझता है, तब परमेश्वर हमेशा तेरा मार्गदर्शन करेगा, और तुझे हमेशा अनुसरण करने के लिए एक पथ देगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या प्रदर्शित कर रहे हैं, परमेश्वर उसे बिलकुल स्पष्ट रूप से एवं सरल रूप से देखता है, और वह तुझे इन प्रदर्शनों का सटीक एवं समुचित मूल्यांकन प्रदान करेगा। जब तू अंतिम परीक्षा का अनुभव कर लेता है उसके पश्चात्, परमेश्वर तेरे समस्त आचरण को लेगा और तेरे परिणाम को निर्धारित करने के लिए पूरी तरह से इसका सार प्रस्तुत करेगा। यह परिणाम बिना किसी लेशमात्र सन्देह के हर एक को आश्वस्त करेगा। जो कुछ मैं तुम सब को बताना चाहता हूँ वह यह है कि तुम लोगों का प्रत्येक काम, तुम सब का प्रत्येक कार्य, और तुम लोगों का प्रत्येक विचार तुम लोगों की नियति को निर्धारित करेगा।

मनुष्य के परिणाम को कौन निर्धारित करता है

एक और अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है, और यह परमेश्वर के प्रति तेरी मनोवृत्ति है। यह मनोवृत्ति निर्णायक है! यह निर्धारित करती है कि अन्ततः तुम लोग विनाश की ओर जाओगे, या फिर एक सुन्दर मंज़िल की ओर जाओगे जिसे परमेश्वर ने तुम सब के लिए तैयार किया है। राज्य के युग में, परमेश्वर ने पहले से ही 20 से अधिक वर्षों से कार्य किया है, और इन 20 वर्षों के समयक्रम के दौरान कदाचित् तुम लोगों का हृदय अपने अपने प्रदर्शन को लेकर थोड़ा बहुत अनिश्चित रहा है। फिर भी, परमेश्वर के हृदय में, उसने तुम लोगों में से हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति का एक वास्तविक एवं सच्चा लिखित दस्तावेज़ बनाया है। शुरुआत में उस समय से लेकर जब हर एक व्यक्ति ने परमेश्वर का अनुसरण करना और उसके प्रचार को ध्यान से सुनना शुरू किया था, अधिक से अधिक सच्चाई को समझना शुरू किया था, उस समय तक जब उन्होंने अपने कर्तव्य को निभाया था—परमेश्वर के पास इन प्रदर्शनों में से हर एक एवं प्रत्येक प्रदर्शन का हिसाब है। जब कोई अपने कर्तव्य को निभाता है, जब उनका सामना सभी प्रकार की परिस्थितियों एवं सभी प्रकार की परीक्षाओं से होता है, तो उस व्यक्ति की मनोवृत्ति क्या होती है? वे किस प्रकार प्रदर्शन करते हैं? वे अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति कैसा महसूस करते हैं? परमेश्वर के पास इन सभी का लेखा है और इन सबका हिसाब है? कदाचित् तुम लोगों के दृष्टिकोण से, ये मामले भ्रमित करनेवाले हैं। फिर भी, जहाँ परमेश्वर खड़ा है वहाँ से, वे सभी मामले बिलकुल स्पष्ट हैं, और लापरवाही का जरा सा भी संकेत नहीं है। यह ऐसा मामला है जो हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम को, और साथ ही उनकी नियति एवं भविष्य की संभावनाओं को सम्मिलित करता है। इससे भी बढ़कर, यह वह स्थान है जहाँ परमेश्वर अपने सभी श्रमसाध्य प्रयासों को खर्च करता है। इस प्रकार परमेश्वर हिम्मत नहीं करता है कि इसकी जरा सी भी उपेक्षा करे, और वह किसी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं करेगा। शुरुआत से लेकर बिलकुल अन्त तक परमेश्वर मानवजाति के इस लेख को दर्ज कर रहा है, और मनुष्य जो परमेश्वर का अनुसरण कर रहा है उसके सम्पूर्ण पथक्रम के लेख को दर्ज कर रहा है। इस समय परमेश्वर के प्रति तेरी मनोवृत्ति तेरी नियति को तय करेगी। क्या यह सही नहीं है? अब, क्या तुम लोग विश्वास करते हो कि परमेश्वर धर्मी है? क्या परमेश्वर के कार्य उचित हैं? क्या तुम लोगों के दिमाग में अभी भी परमेश्वर की कोई दूसरी तस्वीर है? (नहीं।) फिर क्या तुम लोग कहते हो कि मनुष्य का परिणाम ऐसा है कि उसे परमेश्वर तय करता है या मनुष्य स्वयं तय करता है? (इसे परमेश्वर तय करता है।) वह कौन है जो उसे तय करता है? (परमेश्वर।) तुम लोग निश्चित नहीं हो, क्या तुम लोग हो? हांग कांग की कलीसियाओं के भाईयों एवं बहनों, बोलो—यह कौन तय करता है? (मनुष्य स्वयं इसे तय करता है।) मनुष्य स्वयं इसे तय करता है? तब क्या इस का अर्थ यह नहीं है कि इसका परमेश्वर के साथ कोई लेना देना नहीं है? कोरिया की कलीसियाओं की ओर से कौन बोलना चाहता है? (परमेश्वर मनुष्य के सभी कामों एवं कार्यों के आधार पर, और उस पथ के आधार पर जिस पर वे चलते हैं उनके परिणाम को निर्धारित करना चाहता है।) यह बिलकुल वस्तुनिष्ठ प्रत्युत्तर है। यहाँ एक तथ्य है जिसे मैं तुम सब को सूचित करना चाहता हूँ: परमेश्वर के उद्धार के कार्य के पथक्रम में, वह मनुष्य के लिए एक मानक (मानदण्ड) निश्चित करता है। यह मानक ऐसा है कि मनुष्य परमेश्वर के वचन का पालन कर सकता है, और परमेश्वर के मार्ग में चल सकता है? यही वह मानक है जिसे मनुष्य के परिणाम को तौलने के लिए उपयोग किया जाता है। यदि तू परमेश्वर के इस मानक के अनुसार अभ्यास करता है, तो तू एक अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है; यदि तू नहीं करता है, तो तू एक अच्छा परिणाम नहीं प्राप्त कर सकता है। तब वह कौन है जिसके लिए तू कहता है कि वह इस परिणाम को तय करता है? यह केवल परमेश्वर ही नहीं है जो इसे तय करता है, परन्तु इसके बजाय परमेश्वर एवं मनुष्य साथ मिलकर तय करते हैं। क्या यह सही है? (हाँ।) ऐसा क्यों है? क्योंकि यह परमेश्वर ही है जो मानवजाति के उद्धार के कार्य में सक्रियता से शामिल होना चाहता है, और उसके लिए एक खूबसूरत मंज़िल को तैयार करना चाहता है; मनुष्य परमेश्वर के कार्य का लक्ष्य है, और यह परिणाम एवं यह मंज़िल ऐसा है जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है। यदि उसके कार्य का कोई लक्ष्य नहीं होता, तो परमेश्वर को इस कार्य को करने की कोई आवश्यकता नहीं होती; यदि परमेश्वर ने इस कार्य को नहीं किया होता, तो मनुष्य के पास उद्धार पाने के लिए कोई अवसर नहीं होता। मनुष्य ही उद्धार का लक्ष्य है, और यद्यपि इस प्रक्रिया में मनुष्य निष्क्रिय पक्ष है, फिर भी इस पक्ष की मनोवृत्ति ही है जो यह निर्धारित करती है कि मानवजाति का उद्धार करने के अपने कार्य में परमेश्वर सफल होगा या नहीं? यदि वह मार्गदर्शन नहीं होता जिसे परमेश्वर तुझे देता है, तो तू उसके मानक को नहीं जान पाता, और तेरे पास कोई उद्देश्य नहीं होता। यदि तेरे पास यह मानक एवं यह लक्ष्य है, फिर भी तू सहयोग नहीं करता है, तू इसका अभ्यास नहीं करता है, तू वह दाम नहीं चुकाता है, तो तू अभी भी इस परिणाम को प्राप्त नहीं करेगा। इसीलिए हम कहते हैं कि इस परिणाम को परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता है, और इसे मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता है। और अब तुम लोग जानते हो कि मनुष्य के परिणाम को कौन तय करता है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

00:00
00:00

0खोज परिणाम