परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर के कार्य को जानना | अंश 214

परमेश्वर मनुष्य को कैसे सिद्ध बनाता है? परमेश्वर का स्वभाव क्या है? उसके स्वभाव में क्या-क्या पाया जाता है? इन सभी बातों को समझना होगा; यह परमेश्वर के नाम को फैलाना है, यह परमेश्वर की गवाही देना है, और परमेश्वर की प्रशंसा करना है, और परमेश्वर के बारे में ज्ञान की आधारशिला पर मनुष्य अंततः अपने जीवन-स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त कर लेगा। जितने अधिक व्यवहार और शोधन से मनुष्य होकर जाता है, उतनी ही अधिक उसकी शक्ति होती है और परमेश्वर के कार्य के चरण जितने अधिक होते हैं, उतना ही अधिक मनुष्य सिद्ध बनता है। आज, मनुष्य के अनुभव में, परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण मनुष्य की धारणाओं पर वापस चोट करता है, और प्रत्येक चरण मनुष्य की बुद्धि के द्वारा अकल्पनीय होता है, और उसकी उम्मीद से परे होता है। परमेश्वर मनुष्य की प्रत्येक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, और प्रत्येक विषय में मनुष्यों की धारणाओं के विषम होता है, और जब तुम कमज़ोर होते हो, तब परमेश्वर अपने वचनों का उच्चारण करता है; केवल इसी प्रकार से वह तुम्हें जीवन प्रदान कर सकता है। अपनी धारणाओं पर हमला करके, तुम परमेश्वर के साथ व्यवहार को स्वीकार करते हो और केवल इसी प्रकार से तुम अपने भ्रष्टाचार से छुटकारा पा सकते हो। आज, एक सम्बन्ध में देहधारी परमेश्वर दिव्यता में कार्य करता है, और दूसरे सम्बन्ध में, वह सामान्य मानवता में कार्य करता है। तुम्हें परमेश्वर के द्वारा किए गए किसी भी कार्य को इन्कार नहीं करना चाहिए, और जो कुछ परमेश्वर कहे या सामान्य मानवता में करे उसका तुम्हें पालन करना चाहिए, और इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता कि वह कितना सामान्य है, तुम्हें समझना और आज्ञापालन करना चाहिए। एक बार जब तुम्हें वास्तव अनुभव होता है तभी तुम यह जान सकते हो कि यह परमेश्वर है, और धारणाएँ बनाना बंद कर सकते हो और अंत तक उसका अनुसरण कर सकते हो। परमेश्वर के कार्य में ज्ञान होता है, और वह जानता है कि मनुष्य उसकी गवाही किस प्रकार से दे सकता है। वह जानता है कि मनुष्य की सबसे अधिक कमज़ोरी कहाँ है, और उसके कहे वचन तुम्हारी अत्याधिक कमज़ोरी पर सीधे प्रहार कर सकते हैं, परन्तु वह परमेश्वर के तेजस्वी और ज्ञानपूर्ण वचनों का उपयोग तुमसे परमेश्वर की गवाही दिलाने के लिए करता है। परमेश्वर के अद्भुत कार्य ऐसे ही हैं। परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य मनुष्य की बुद्धि के द्वारा अकल्पनीय हैं। परमेश्वर का न्याय मनुष्य के, देह में होने के कारण, भ्रष्टता के प्रकार को और यह प्रकट करता है कि किस प्रकार की बातें मनुष्य के सार में हैं, और यह मनुष्य को अपने शर्म से छिपने की कोई जगह कहीं नहीं छोड़ता।

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य उसे जाने, और उसकी गवाही को जाने। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव पर परमेश्वर के न्याय के बिना, मनुष्य परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को नहीं जानेगा जो कोई भी अपराध की अनुमति नहीं देता है, और परमेश्वर के बारे में अपनी पुरानी जानकारी को नई जानकारी में बदल नहीं सकता है। परमेश्वर की गवाही के लिए, और परमेश्वर के प्रबंधन की ख़ातिर, परमेश्वर अपनी सम्पूर्णता को सार्वजनिक बनाता है, इस प्रकार से मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान हासिल करने, अपने स्वभाव को बदलने, और परमेश्वर के सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम बनाता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन परमेश्वर के विभिन्न कार्यों के द्वारा प्राप्त होता है; मनुष्य के स्वभाव में इस प्रकार के परिवर्तन के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होगा, और परमेश्वर के हृदय के अनुसार नहीं बन सकता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधनों से मुक्त करा लिया है, अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और परमेश्वर के कार्य के लिए वास्तव में एक मॉडल और नमूना बन गया है, सचमुच परमेश्वर के लिए गवाह बन गया है और परमेश्वर के हृदय के अनुसार व्यक्ति बन गया है। आज, देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है, और वह चाहता है कि मनुष्य उसका ज्ञान रखे, आज्ञापालन करे, उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके सम्पूर्ण वचन और कार्य का पालन करे जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होते हैं और मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के सभी कार्य, और उऩ सभी कार्यों की गवाही दे जो परमेश्वर मनुष्य को जीतने के लिए करता है। जो परमेश्वर के लिए गवाही देते हैं उनके पास परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस प्रकार की ही गवाही यथार्थ और वास्तविक होती है, और केवल इस प्रकार की गवाही ही शैतान को शर्मसार कर सकती है। परमेश्वर उन्हें इस्तेमाल करता है जो उसके न्याय और ताड़ना, व्यवहार और कांट-छांट से गुजर कर उसे जानने आए हैं ताकि परमेश्वर की गवाही दे सकें। वह उनका इस्तेमाल करता है जो शैतान द्वारा भ्रष्ट बना दिए गए हैं ताकि वे पमेश्वर की गवाही दे सकें, और उन्हें भी इस्तेमाल करता है जिनके स्वभाव बदल चुके होते हैं, और जिन्होंने उसकी आशीषें प्राप्त कर ली हों, ताकि उसकी गवाही दे सकें। उसे मनुष्यों की इसलिए जरूरत नहीं है कि वे केवल शब्दों से उसकी तारीफ करें, न ही वह शैतान किस्म के लोगों द्वारा अपनी प्रशंसा और गवाही चाहता है, जो परमेश्वर के द्वारा बचाए न गए हों। जो कोई परमेश्वर को जानते हैं केवल वे उसकी गवाही देने के योग्य हैं और जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हों केवल वे ही उसकी गवाही के लिए योग्य हैं, और परमेश्वर मनुष्य को अनुमति नहीं देगा कि वे जानबूझ कर उसके नाम को शर्मसार करें।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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