परमेश्वर के दैनिक वचन | "विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" | अंश 204

तुम कहते हो कि तुम देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करते हो और तुम स्वीकार करते हो कि वह वचन देह में प्रकट हुआ, फिर भी उसकी पीठ पीछे तुम कुछ चीज़ें करते हो, और तुम उस प्रकार कार्य नहीं करते जैसा वह चाहता है कि तुम करो, और उसका भय नहीं मानते। क्या यह परमेश्वर को स्वीकार करना है? जो वह कहता है, उसे तुम स्वीकार करते हो परन्तु तुम उन बातों को भी अभ्यास में लाने से इन्कार करते हो, उन्हें भी जो करने के तुम योग्य हो और तुम उसके मार्ग पर बने नहीं रहते हो। क्या यह स्वीकार करना है? तुम उसे स्वीकार करते हो, परन्तु तुम्हारा पूर्वग्रह तो उससे बचकर रहना, कभी भी उसका सम्मान नहीं करना है। यदि तुम ने उसके कार्य को देखा और स्वीकार किया और तुम जानते हो कि वह परमेश्वर है, फिर भी तुम निरुत्साही और पूर्णतः अपरिवर्तित रहते हो, तो तुम अभी भी एक जीते गए व्यक्ति नहीं हो। एक जीत लिए गए व्यक्ति को वह सब कुछ करना है जो वह कर सकता है; वह गहन सत्यों में प्रवेश करना और उन तक पहुँचना चाहता है, यद्यपि अभी वह योग्य नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जितना आत्मसात कर सकता है उसमें सीमित है और उसके अभ्यास बंधे हुए और सीमित हैं। परन्तु कम से कम उसे वो प्रत्येक बात करनी है जिसके वह योग्य है। यदि तुम ये बातें कर सकते हो, तो यह जीत लिए जाने के कार्य के कारण होगा। कल्पना करो कि तुम कहते हो, "मान लीजिए कि वह अनेक वचन सामने रख सकता है, जो मनुष्य नहीं कर सकता, यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो और कौन है?" इस प्रकार की मानसिकता रखने का अर्थ यह नहीं है कि तुम परमेश्वर को स्वीकार करते हो। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार करते हो, तो तुम्हें यह अपने कार्यों के द्वारा प्रदर्शित करना है। एक कलीसिया की अगुवाई करना, परन्तु धार्मिकता करने में अयोग्य होना, और धन का लालच करना और कलीसिया के पैसे को हमेशा अपनी जेब में डालना-क्या यह स्वीकार करना है कि एक परमेश्वर है? परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और उसका भय मानना है। तुम भयभीत कैसे नहीं हो सकते यदि तुम वास्तव में स्वीकार करते हो कि एक परमेश्वर है? तुम ऐसे भयानक काम कैसे कर सकते हो? क्या उसे विश्वास करना कहा जा सकता है? क्या तुम वास्तव में उसे स्वीकार करते हो? क्या वह परमेश्वर ही है जिसमें तुम विश्वास करते हो? जिसमें तुम विश्वास करते हो वह एक अस्पष्ट परमेश्वर है; इसीलिए तुम भयभीत नहीं हो! वे जो वास्तव में परमेश्वर को स्वीकार करते और जानते हैं वे सभी उसका भय मानते और ऐसा कुछ भी करने से डरते हैं जो उसका विरोध करता है या जो उनके विवेक के विरुद्ध जाता है; वे विशेषतः ऐसा कुछ भी करने से भयभीत होते हैं, जो वे जानते हैं कि परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध है। मात्र इसे ही परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना समझा जा सकता है। तुम्हें क्या करना चाहिए जब तुम्हारे माता-पिता तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने से रोकते हैं? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए जब तुम्हारा अविश्वासी पति तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करता है? और तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए जब भाई और बहन तुम से घृणा करते हैं? यदि तुम उसे स्वीकार करते हो, तब तुम उचित ढंग से व्यवहार करोगे और इन समस्त परीस्थितियों में वास्तविकता में जीवनयापन करोगे। यदि तुम ठोस रीति से कार्य करने में असफल होते हो परन्तु मात्र कहते हो कि तुम परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हो, तब तुम मात्र एक बकवादी व्यक्ति हो! तुम कहते हो कि तुम उसमें विश्वास करते और उसे स्वीकार करते हो। परन्तु तुम उसे किस रीति से स्वीकार करते हो? तुम किस रीति से उसमें विश्वास करते हो? क्या तुम उसका भय मानते हो? क्या तुम उसका सम्मान करते हो? क्या तुम बहुत गहराई से प्रेम करते हो? जब तुम व्यथित होते हो और तुम्हारे पास सहारे के लिए कोई नहीं होता, तो तुम अनुभव करते हो कि परमेश्वर से प्रेम करना है, और बाद में तुम इसके विषय में सबकुछ विस्मृत कर देते हो। यह परमेश्वर से प्रेम करना या उसमें विश्वास करना नहीं है! अन्ततः परमेश्वर मनुष्य से क्या प्राप्त करवाना चाहता है? समस्त अवस्थाएँ, जिनका मैंने उल्लेख किया, जैसे कि विचार करना कि तुम एक प्रसिद्ध व्यक्ति हो, अनुभव करना कि तुम बातों को अतिशीघ्र समझ लेते हो, अन्य लोगों को नियन्त्रित करना, दूसरों को नीचा देखना, लोगों को उनकी दिखावट के द्वारा आँकना, निष्कपट लोगों को डराना-धमकाना, कलीसिया के धन का लोभ करना, और ऐसी अनेक बातें-इस प्रकार के भ्रष्ट शैतानी स्वभावों के एक अंश से भी मुक्त होना ही वह बात है जो तुम में जीत लिए जाने के पश्चात दिखाई देनी चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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