परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 177

ऐसे लोगों के कार्य में बहुत कम विचलन होता है, जो काट-छाँट, निपटने, न्याय और ताड़ना से होकर गुज़र चुके हैं, और उनके कार्य की अभिव्यक्ति बहुत अधिक सटीक होती है। जो लोग कार्य करने के लिए अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हैं, वे काफी बड़ी ग़लतियाँ करते हैं। पूर्ण न किए गए लोगों के कार्य में उनकी बहुत अधिक स्वाभाविकता अभिव्यक्त होती है, जो पवित्र आत्मा के कार्य में बड़ा अवरोध उत्पन्न करती है। व्यक्ति की क्षमता कितनी ही अच्छी क्यों न हो, उसे परमेश्वर के आदेश का कार्य कर सकने से पहले काट-छाँट, निपटने और न्याय से भी अवश्य गुज़रना चाहिए। यदि वे ऐसे न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, तो उनका कार्य, चाहे वह कितनी भी अच्छी तरह से किया गया हो, सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता, और वह हमेशा उनकी स्वाभाविकता और मानवीय भलाई का उत्पाद होता है। काट-छाँट, निपटने और न्याय से होकर गुज़र चुके लोगों का कार्य उन लोगों के कार्य से कहीं अधिक सटीक होता है, जिनकी काट-छाँट, निपटना और न्याय नहीं किया गया है। जो लोग न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, वे मानव-देह और विचारों के सिवाय और कुछ भी व्यक्त नहीं करते, जिनमें बहुत सारी मानव-बुद्धि और जन्मजात प्रतिभा मिली होती है। यह मनुष्य द्वारा परमेश्वर के कार्य की सटीक अभिव्यक्ति नहीं है। जो लोग उनका अनुसरण करते हैं, वे उनकी जन्मजात क्षमता द्वारा उनके सामने लाए जाते हैं। चूँकि वे मनुष्य की अंतर्दृष्टि और अनुभव को बहुत अधिक व्यक्त करते हैं, जो परमेश्वर के मूल इरादे से लगभग कटे हुए और उससे बहुत अलग हो गए होते हैं, इसलिए इस प्रकार के व्यक्ति का कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख लाने में असमर्थ होता है, परंतु इसके बजाय वह उन्हें उसके सामने ले आता है। इसलिए जो लोग न्याय और ताड़ना से होकर नहीं गुज़रे हैं, वे परमेश्वर के आदेश के कार्य को करने के लिए अयोग्य हैं। योग्य कार्यकर्ता का कार्य लोगों को सही मार्ग पर ला सकता है और उन्हें सत्य में अधिक प्रवेश प्रदान कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है, और वह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता तथा जीवन में क्रमश: आगे बढ़ने और सत्य में अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। अयोग्य कार्यकर्ता का कार्य हलका पड़ता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों के भीतर ला सकता है; और लोगों से उसकी माँगें भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक नियम और बहुत अधिक वाद होते हैं, और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ही ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों का पालन करने में सक्षम बना सकता है। इस प्रकार के दिशानिर्देश लोगों को केवल भटका सकते हैं। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने के लिए तुम्हारी अगुआई करता है; वह तुम्हें उसी में ला सकता है, जो उसके पास है और जो वह है। अनुयायियों के लिए यह समझने की कुंजी, कि अगुआ योग्य हैं या नहीं, उनके द्वारा अगुआई किए जाने वाले मार्ग और उनके कार्य के परिणामों को देखना है, और यह भी कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुम्हें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद करना चाहिए; तुम्हें एक मूर्ख अनुयायी नहीं होना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डाल सकता है। यदि तुम यह भेद करने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई के पास मार्ग है और किसकी अगुआई के पास नहीं है, तो तुम आसानी से धोखा खा जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है। पूर्ण न किए गए लोगों के कार्य में बहुत अधिक स्वाभाविकता होती है; उसमें बहुत अधिक मानव-इच्छा मिली हुई होती है। उनका अस्तित्व स्वाभाविकता है—जिसके साथ वे पैदा हुए हैं। वह निपटने के बाद का जीवन या रूपांतरित किए जाने के बाद की वास्तविकता नहीं है। ऐसा व्यक्ति उन्हें सहारा कैसे दे सकता है, जो जीवन की खोज कर रहे हैं? मनुष्य का जीवन मूलत: उसकी जन्मजात बुद्धि या प्रतिभा है। इस प्रकार की बुद्धि या प्रतिभा मनुष्य से परमेश्वर की सही-सही माँगों से काफी दूर है। यदि किसी मनुष्य को पूर्ण नहीं किया गया है और उसके भ्रष्ट स्वभाव की काट-छाँट नहीं की गई है और उससे निपटा नहीं गया है, तो उसकी अभिव्यक्ति और सत्य के बीच एक बहुत बड़ा अंतराल होगा; उसकी अभिव्यक्ति में अस्पष्ट चीज़ों, जैसे कि उसकी कल्पना और एकतरफा अनुभव, का मिश्रण होगा। इतना ही नहीं, भले ही वह कैसे भी कार्य करे, लोग महसूस करते हैं कि उसमें ऐसा कोई समग्र लक्ष्य और ऐसा कोई सत्य नहीं है, जो सभी लोगों के प्रवेश के लिए उपयुक्त हो। लोगों से जो माँग की जाती है, उसमें से अधिकांश उनकी योग्यता से परे होती हैं, मानो वे मचान पर बैठने के लिए मजबूर की जा रही बतख़ें हों। यह मनुष्य की इच्छा का कार्य है। मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव, उसके विचार और उसकी धारणाएँ उसके शरीर के सभी अंगों में व्याप्त हैं। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने की प्रवृत्ति के साथ पैदा नहीं होता, न ही उसके पास सीधे तौर पर सत्य को समझने की प्रवृत्ति होती है। उसमें मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव जोड़ दो—जब इस प्रकार का प्राकृतिक व्यक्ति कार्य करता है, तो क्या इससे व्यवधान नहीं होते? परंतु जो मनुष्य पूर्ण किया जा चुका है, उसके पास सत्य का अनुभव होता है जिसे लोग समझ सकते हैं, और उनके भ्रष्ट स्वभाव का ज्ञान होता है, जिससे उसके कार्य की अस्पष्ट और अवास्तविक चीज़ें धीरे-धीरे कम हो जाती हैं, मानवीय मिलावटें पहले से कम हो जाती हैं, और उसका काम और सेवा परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के अधिक करीब पहुँच जाता है। इस प्रकार, उसका काम सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर जाता है और वह वास्तविक भी बन जाता है। मनुष्य के मन के विचार विशेष रूप से पवित्र आत्मा के कार्य को अवरुद्ध करते हैं। मनुष्य के पास समृद्ध कल्पना और उचित तर्क है, और उसके पास मामलों से निपटने का लंबा अनुभव है। यदि ये पहलू काट-छाँट और सुधार से होकर नहीं गुज़रते, तो वे सभी कार्य की बाधाएँ हैं। इसलिए मनुष्य का कार्य सटीकता के सर्वोच्च स्तर तक नहीं पहुँच सकता, विशेषकर ऐसे लोगों का कार्य, जो पूर्ण नहीं किए गए हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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