परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारण का रहस्य (1)" | अंश 166

अनुग्रह के युग में यूहन्ना ने यीशु का मार्ग प्रशस्त किया। यूहन्ना स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकता था और उसने मात्र मनुष्य का कर्तव्य पूरा किया था। यद्यपि यूहन्ना प्रभु का अग्रदूत था, फिर भी वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था; वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया मात्र एक मनुष्य था। यीशु के बपतिस्मा लेने के बाद पवित्र आत्मा कबूतर के समान उस पर उतरा। तब यीशु ने अपना काम शुरू किया, अर्थात् उसने मसीह की सेवकाई करनी प्रारंभ की। इसीलिए उसने परमेश्वर की पहचान अपनाई, क्योंकि वह परमेश्वर से ही आया था। भले ही इससे पहले उसका विश्वास कैसा भी रहा हो—वह कई बार दुर्बल रहा होगा, या कई बार मज़बूत रहा होगा—यह सब अपनी सेवकाई करने से पहले के उसके सामान्य मानव-जीवन से संबंधित था। उसका बपतिस्मा (अभिषेक) होने के पश्चात्, उसके पास तुरंत ही परमेश्वर का सामर्थ्य और महिमा आ गई, और इस प्रकार उसने अपनी सेवकाई करनी आरंभ की। वह चिह्नों का प्रदर्शन और अद्भुत काम कर सकता था, चमत्कार कर सकता था, और उसके पास सामर्थ्य और अधिकार था, क्योंकि वह सीधे स्वयं परमेश्वर की ओर से काम कर रहा था; वह पवित्रात्मा के स्थान पर उसका काम कर रहा था और पवित्रात्मा की आवाज़ व्यक्त कर रहा था। इसलिए, वह स्वयं परमेश्वर था; यह निर्विवाद है। यूहन्ना वह व्यक्ति था, जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, न ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना उसके लिए संभव था। यदि वह ऐसा करना चाहता, तो पवित्र आत्मा ने इसकी अनुमति नहीं दी होती, क्योंकि वह उस काम को करने में असमर्थ था, जिसे स्वयं परमेश्वर संपन्न करने का इरादा रखता था। कदाचित् उसमें बहुत-कुछ ऐसा था, जो मनुष्य की इच्छा का था, या कुछ ऐसा, जो विचलन भरा था; वह किसी भी परिस्थिति में प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। उसकी ग़लतियाँ और त्रुटिपूर्णता केवल उसका ही प्रतिनिधित्व करती थीं, किंतु उसका काम पवित्र आत्मा का प्रतिनिधि था। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि उसका सब-कुछ परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। क्या उसका विचलन और त्रुटिपूर्णता भी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते थे? मनुष्य का प्रतिनिधित्व करने में गलत होना सामान्य है, परंतु यदि कोई परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में विचलित होता है, तो क्या यह परमेश्वर के प्रति अनादर नहीं होगा? क्या यह पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा नहीं होगी? पवित्र आत्मा मनुष्य को आसानी से परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने की अनुमति नहीं देता, भले ही दूसरों के द्वारा उसे ऊँचा स्थान दिया गया हो। यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो वह अंत में खड़े रहने में असमर्थ होगा। पवित्र आत्मा मनुष्य को, जैसे मनुष्य चाहे वैसे, परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं देता! उदाहरण के लिए, पवित्र आत्मा ने ही यूहन्ना की गवाही दी और उसी ने उसे यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले व्यक्ति के रूप में भी प्रकट किया, परंतु पवित्र आत्मा द्वारा उस पर किया गया कार्य अच्छी तरह से मापा हुआ था। यूहन्ना से कुल इतना कहा गया था कि वह यीशु के लिए मार्ग तैयार करने वाला बने, उसके लिए मार्ग तैयार करे। कहने का अभिप्राय यह है कि पवित्र आत्मा ने केवल मार्ग बनाने में उसके कार्य का समर्थन किया और उसे केवल इसी प्रकार का कार्य करने की अनुमति दी—उसे कोई अन्य कार्य करने की अनुमति नहीं दी गई थी। यूहन्ना ने एलिय्याह का प्रतिनिधित्व किया था, और वह उस नबी का प्रतिनिधित्व करता था, जिसने मार्ग तैयार किया था। पवित्र आत्मा ने इसमें उसका समर्थन किया था; जब तक उसका कार्य मार्ग तैयार करना था, तब तक पवित्र आत्मा ने उसका समर्थन किया। किंतु यदि उसने दावा किया होता कि वह स्वयं परमेश्वर है और यह कहा होता कि वह छुटकारे का कार्य पूरा करने के लिए आया है, तो पवित्र आत्मा को उसे अनुशासित करना पड़ता। यूहन्ना का काम चाहे जितना भी बड़ा रहा हो, और चाहे पवित्र आत्मा ने उसे समर्थन दिया हो, फिर भी उसका काम असीम नहीं था। माना कि पवित्र आत्मा द्वारा उसके कार्य का समर्थन किया गया था, परंतु उस समय उसे दिया गया सामर्थ्य केवल उसके द्वारा मार्ग तैयार किए जाने तक ही सीमित था। वह कोई अन्य काम बिलकुल नहीं कर सकता था, क्योंकि वह सिर्फ यूहन्ना था जिसने मार्ग तैयार किया था, वह यीशु नहीं था। इसलिए, पवित्र आत्मा की गवाही महत्वपूर्ण है, किंतु पवित्र आत्मा जो कार्य मनुष्य को करने की अनुमति देता है, वह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। क्या यूहन्ना ने उस समय ज़बरदस्त गवाही प्राप्त नहीं की थी? क्या उसका काम भी महान नहीं था? किंतु जो काम उसने किया, वह यीशु के काम से बढ़कर नहीं हो सका, क्योंकि वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए व्यक्ति से अधिक नहीं था और वह सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, और इसलिए उसने जो काम किया, वह सीमित था। जब उसने मार्ग तैयार करने का काम समाप्त कर लिया, पवित्र आत्मा ने उसके बाद उसकी गवाही बरक़रार नहीं रखी, कोई नया काम उसके पीछे नहीं आया, और स्वयं परमेश्वर का काम शुरू होते ही वह चला गया।

कुछ ऐसे लोग हैं, जो दुष्टात्माओं से ग्रस्त हैं और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, "मैं परमेश्‍वर हूँ!" लेकिन अंत में, उनका भेद खुल जाता है, क्योंकि वे गलत चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितना भी जोर से चिल्लाओ, तुम फिर भी एक सृजित प्राणी ही रहते हो और एक ऐसा प्राणी, जो शैतान से संबंधित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता, "मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!" परंतु जो कार्य मैं करता हूँ, वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? मुझे ऊँचा उठाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और वह नहीं चाहता कि मनुष्य उसे हैसियत या सम्मानजनक उपाधि प्रदान करे : उसका काम उसकी पहचान और हैसियत का प्रतिनिधित्व करता है। अपने बपतिस्मा से पहले क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर द्वारा धारित देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि केवल गवाही मिलने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना। क्या उसके द्वारा काम शुरू करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग लाने या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उसके द्वारा बोले जाने वाले वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते। तुम स्वयं परमेश्वर का या पवित्रात्मा का कार्य करने में असमर्थ हो। परमेश्वर की बुद्धि, चमत्कार और अगाधता, और उसके स्वभाव की समग्रता, जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है—इन सबको व्यक्त करना तुम्हारी क्षमता के बाहर है। इसलिए परमेश्वर होने का दावा करने की कोशिश करना व्यर्थ होगा; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और कोई सार नहीं होगा। स्वयं परमेश्वर आ गया है, किंतु कोई उसे नहीं पहचानता, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और ऐसा वह पवित्रात्मा के प्रतिनिधित्व में करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। परंतु जो कार्य वह करता है, वह पवित्रात्मा का है और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य उसे किस नाम से पुकारता है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? चाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी स्वरूप है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते, या पुराने युग का समापन नहीं कर सकते, या एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते, तो तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें