परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई" | अंश 150

सबसे पहले, परमेश्वर ने आदम और हव्वा का सृजन किया, और उसने साँप का भी सृजन किया। सभी चीज़ों में साँप सर्वाधिक विषैला था; उसकी देह में विष था, और शैतान उस विष का उपयोग करता था। यह साँप ही था जिसने पाप करने के लिए हव्वा को प्रलोभित किया। हव्वा के बाद आदम ने पाप किया, और तब वे दोनों अच्छे और बुरे के बीच भेद करने में समर्थ हो गए थे। यदि यहोवा जानता था कि साँप हव्वा को प्रलोभित करेगा और हव्वा आदम को प्रलोभित करेगी, तो उसने उन सबको एक ही वाटिका के भीतर क्यों रखा? यदि वह इन चीज़ों का पूर्वानुमान करने में समर्थ था, तो उसने क्यों साँप की रचना की और उसे अदन की वाटिका के भीतर रखा? अदन की वाटिका में अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल क्यों था? क्या वह चाहता था कि वे उस फल को खाएँ? जब यहोवा आया, तब न आदम को और न हव्वा को उसका सामना करने का साहस हुआ, और केवल इसी समय यहोवा को पता चला कि उन्होंने अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया है और वे साँप के छल-कपट का शिकार बन गए हैं। अंत में, उसने साँप को शाप दिया, और उसने आदम और हव्वा को शाप दिया। जब उन दोनों ने उस वृक्ष के फल को खाया तब यहोवा को पता नहीं था। मानवजाति दुष्ट बनने और यौन रूप से स्वच्छंदता होने की सीमा तक भ्रष्ट हो गयी, यहाँ तक कि इस स्थिति तक कि उन्होंने जिन चीज़ों को अपने हृदयों में आश्रय दिया हुआ था वे भी बुरी और अधार्मिक थीं; वे सब गंदगियाँ थीं। इसलिए, यहोवा मानवजाति का सृजन करके पछताया। उसके बाद उसने संसार को जलप्रलय के द्वारा नाश करने का अपना कार्य सम्पन्न किया, जिसमें नूह और उसके पुत्र बच गए। कुछ चीज़ें वास्तव में इतनी अधिक उन्नत और अलौकिक नहीं हैं जितनी लोग कल्पना कर सकते हैं। कुछ लोग पूछते हैं: "चूँकि परमेश्वर जानता था कि प्रधान स्वर्गदूत उसके साथ विश्वासघात करेगा, तो परमेश्वर ने उसका सृजन क्यों किया?" तथ्य ये हैं: जब अभी तक इस पृथ्वी का अस्तित्व नहीं था, तब प्रधान स्वर्गदूत स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सबसे महान् था। स्वर्ग के सभी स्वर्गदूतों पर उसका अधिकार क्षेत्र था; और यही अधिकार उसे परमेश्वर ने दिया था। परमेश्वर के अपवाद के साथ, वह स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सर्वोच्च था। बाद में जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया तब प्रधान स्वर्गदूत ने पृथ्वी पर परमेश्वर के विरुद्ध और भी बड़ा विश्वासघात किया। मैं कहता हूँ कि उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात इसलिए किया क्योंकि वह मानवजाति का प्रबंधन करना और परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर होना चाहता था। यह प्रधान स्वर्गदूत ही था जिसने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया; उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करना और मानवजाति द्वारा परमेश्वर के साथ विश्वासघात करवाना और परमेश्वर के बजाय अपना आज्ञापालन करवाना चाहता था। उसने देखा कि बहुत सी चीज़ें हैं जो उसका आज्ञापालन करती थीं; स्वर्गदूत उसकी आज्ञा मानते थे, ऐसे ही पृथ्वी पर लोग भी उसकी आज्ञा मानते थे। पृथ्वी पर पक्षी और पशु, वृक्ष और जंगल, पर्वत और नदियाँ और सभी वस्तुएँ मनुष्य—अर्थात्, आदम और हव्वा—की देखभाल के अधीन थी जबकि आदम और हव्वा उसका आज्ञापालन करते थे। इसलिए प्रधान स्वर्गदूत परमेश्वर के अधिकार से अधिक बढ़कर होना और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चाहता था। बाद में उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए बहुत से स्वर्गदूतों की अगुआई की, जो तब विभिन्न अशुद्ध आत्माएँ बन गए। क्या आज के दिन तक मानवजाति का विकास प्रधान स्वर्गदूत की भ्रष्टता के कारण नहीं है? मानवजाति जैसी आज है केवल इसलिए है क्योंकि प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया और मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया। यह कदम-दर-कदम कार्य कहीं भी लगभग उतना अमूर्त और आसान नहीं है जैसा लोग कल्पना करते हैं। शैतान ने एक कारणवश विश्वासघात किया, फिर भी लोग इतनी आसान सी बात को समझने में असमर्थ हैं। परमेश्वर ने क्यों स्वर्ग और पृथ्वी और सब वस्तुओं का सृजन किया, और शैतान का भी सृजन किया? चूँकि परमेश्वर शैतान से बहुत अधिक घृणा करता है, और शैतान परमेश्वर का शत्रु है, तो परमेश्वर ने उसका सृजन क्यों किया? शैतान का सृजन करके, क्या वह एक शत्रु का सृजन नहीं कर रहा था? परमेश्वर ने वास्तव में एक शत्रु का सृजन नहीं किया था; बल्कि उसने एक स्वर्गदूत का सृजन किया था, और बाद में इस स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया। इसकी हैसियत इतनी बड़ी थी कि उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की इच्छा की। कोई कह सकता है कि यह मात्र एक संयोग था, परंतु यह एक अपरिहार्य प्रवृत्ति भी थी। यह उस बात के समान है कि कैसे कोई व्यक्ति एक निश्चित आयु पर अपरिहार्य रूप से मरेगा; चीज़ें पहले ही एक निश्चित स्तर तक विकसित हो चुकी है। कुछ ऐसे बेहूदे लोग हैं, जो कहते हैं: "चूँकि शैतान तुम्हारा शत्रु है, तो तुमने उसका सृजन क्यों किया? क्या तुम नहीं जानते थे कि प्रधान स्वर्गदूत तुम्हारे साथ विश्वासघात करेगा? क्या तुम अनंतकाल से अनंतकाल में नहीं झाँक सकते हो? क्या तुम उसका स्वभाव नहीं जानते हो? चूँकि तुम्हें स्पष्ट रूप से पता था कि वह तुम्हारे साथ विश्वासघात करेगा, तो तुमने उसे प्रधान स्वर्गदूत क्यों बनाया? भले ही कोई उसके विश्वासघात की बात की अनदेखी भी करे, तब भी उसने कितने ही स्वर्गदूतों की अगुआई की और मनुष्यजाति को भ्रष्ट करने के लिए नश्वर संसार में उतरा; आज के दिन तक, तुम अपनी छः—हजार—वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में असमर्थ रहे हो। क्या यह सही है?" क्या तुम अपने आपको आवश्यकता से अधिक तकलीफों में नहीं डाल रहे हो? तब भी अन्य लोग कहते हैं: "यदि शैतान ने वर्तमान समय तक मानवजाति को भ्रष्ट नहीं किया होता, तो परमेश्वर ने मानवजाति को इस प्रकार से नहीं बचाया होता। इस मामले में परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता अदृश्य रहे होते; उसकी बुद्धि कहाँ अभिव्यक्त होती? इसलिए परमेश्वर ने शैतान के लिये मानवजाति का सृजन किया; भविष्य में परमेश्वर अपना सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करेगा—अन्यथा मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि को कैसे खोजेगा? यदि मनुष्य ने परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं किया और उसके प्रति विद्रोहशील क्रिया नहीं की, तो उसकी क्रियाओं को स्वयं को अभिव्यक्त करना अनावश्यक होगा। यदि सम्पूर्ण सृष्टि उसकी आराधना और उसका आज्ञापालन करे, तो उसके पास करने के लिए कोई कार्य नहीं होगा।" और यह चीज़ों की वास्तविकता से भी आगे है, क्योंकि परमेश्वर में कुछ भी गंदगी नहीं है, और इसलिए वह गंदगी का सृजन नहीं कर सकता है। वह केवल अपने शत्रु को परास्त करने, मानव जाति को बचाने, जिसका इसने सृजन किया है, दुष्टात्माओं और शैतान को पराजित करने, जो उससे घृणा करते हैं, विश्वासघात करते हैं, और उसका प्रतिरोध करते हैं, जो उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन थे और बिल्कुल आरम्भ में उसी से संबंधित थे, के लिए अब अपने कार्यों को प्रकट करता है; वह इन दुष्टात्माओं को पराजित करना चाहता है और ऐसा करने में वह सभी चीज़ों पर अपनी सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करता है। मानवजाति और पृथ्वी पर सभी वस्तुएँ अब शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं और दुष्ट के अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं। परमेश्वर अपने कार्यों को सभी चीज़ों के ऊपर प्रकट करना चाहता है ताकि लोग उसे जान सकें, और परिणामस्वरूप शैतान को पराजित और परमेश्वर के शत्रुओं को सर्वथा परास्त कर सकें। उसके इस कार्य की समग्रता उसके कार्यों के प्रकट होने के माध्यम से सम्पन्न होती है। उसके सभी प्राणी शैतान के अधिकार क्षेत्र में है, और इसलिए वह उन पर अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करना चाहता है, और परिणामस्वरूप शैतान को पराजित करना चाहता है। यदि कोई शैतान नहीं होता, तो उसे अपने कार्यों को प्रकट करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि शैतान के उत्पीड़न के कारण नहीं होता, तो उसने मानवजाति का सृजन किया होता और अदन की वाटिका में उनके रहने के लिए अगुवाई की होती। उसने शैतान के विश्वासघात से पहले स्वर्गदूतों या प्रधान स्वर्गदूत के लिए अपने सभी क्रिया-कलापों को प्रकट क्यों नहीं किया? यदि स्वर्गदूतों और प्रधान स्वर्गदूत ने उसको जान लिया होता, और आरम्भ में ही उसका आज्ञापालन भी किया होता, तो उसने कार्य के उन निरर्थक क्रिया-कलापों को नहीं किया होता। शैतान और दुष्टात्माओं के अस्तित्व की वजह से, लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और विद्रोह करने वाले स्वभाव से लबालब भरे हुए हैं, और इसलिए परमेश्वर अपने क्रिया-कलापों को प्रकट करना चाहता है। क्योंकि वह शैतान से युद्ध करना चाहता है, इसलिए शैतान को पराजित करने के लिए उसे अवश्य अपने स्वयं के अधिकार का उपयोग करना चाहिए और अपने सभी क्रिया-कलापों का उपयोग करना चाहिए; इस तरह से, उसके उद्धार का कार्य जिसे वह मनुष्यों के बीच सम्पन्न करता है लोगों को उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को देखने देगा। आज परमेश्वर जो कार्य करता है, वह अर्थपूर्ण है, और किसी भी तरह से वैसा नहीं है, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं: "क्या तुम जो कार्य करते हो वह विरोधाभासी नहीं हैं? क्या कार्य का यह सिलसिला अपने आप को थकाने का एक व्यायाम मात्र नहीं है? तुमने शैतान का सृजन किया, फिर उसे तुम्हारे साथ विश्वासघात करने और तुम्हारा प्रतिरोध करने दिया। तुमने मानवजाति का सृजन किया, और फिर उसे शैतान को सौंप दिया, और तुमने आदम और हव्वा को प्रलोभित किए जाने की अनुमति दी। चूँकि तुमने यह सब कुछ जानबूझ कर किया है, तो तुम मानवजाति से नफ़रत क्यों करते हो? तुम शैतान से नफ़रत क्यों करते हो? क्या ये चीजें तुम्हारे स्वयं के द्वारा नहीं बनायी गई हैं? इसमें तुम्हारे लिए घृणा करने वाली क्या बात है?" बहुत से बेहूदा लोग ऐसा कहेंगे। वे परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, परन्तु वे अपने हृदयों में परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हैं—कितनी विरोधाभासी बात है! तुम सत्य को नहीं समझते हो, तुम्हारे बहुत से अलौकिक विचार हैं, और तुम यहाँ तक भी दावा करते हो कि यह परमेश्वर की गलती है—तुम कितने बेहूदा हो! यह तुम ही हो जो सत्य के साथ हेराफेरी करते हो; यह परमेश्वर की गलती नहीं है! कुछ लोग तो यहाँ तक कि बार-बार शिकायत भी करते हैं: "यह तुम ही थे जिसने शैतान का सृजन किया, और तुमने ही मानवजाति को शैतान को दिया। मानवजाति शैतानी स्वभाव को धारण करती है; उन्हें क्षमा करने के बजाय, तुम उनसे एक हद तक नफ़रत करते हो। आरंभ में तुमने मनुष्य जाति को एक हद तक प्रेम किया। तुमने शैतान को मनुष्यों के संसार में गिराया, और अब तुम मानवजाति से नफरत करते हो। यह तुम ही हो जो मानवजाति से नफ़रत और प्रेम करते हो—इसका क्या स्ष्टीकरण है? क्या यह एक विरोधाभास नहीं हैं?" इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग इसे कैसे देखते हो, स्वर्ग में यही हुआ था; प्रधान स्वर्गदूत ने इसी तरीके से परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया, और मानवजाति को इसी प्रकार भ्रष्ट किया गया, और आज के दिन तक इसी तरीके से की जा रही है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि तुम किन शब्दों में व्यक्त करते हो, पूरी कहानी यही है। हालाँकि, तुम लोगों को यह अवश्य समझना चाहिए कि परमेश्वर वर्तमान में जो कार्य करता है, वह तुम लोगों को बचाने के लिए, और शैतान को पराजित करने के लिए करता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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