परमेश्वर के देहधारण को जानने के बारे में वचन (अंश 28)
परमेश्वर को जानना परमेश्वर के वचनों को पढ़ने, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने, और साथ ही कई परीक्षणों, शोधनों और काट-छाँट का अनुभव करने के द्वारा होना चाहिए; केवल तभी परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव का सच्चा ज्ञान होना संभव है। कुछ लोग कहते हैं : “मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मुझे परमेश्वर को कैसे जानना चाहिए?” वास्तव में, परमेश्वर के वचन उसके स्वभाव की एक अभिव्यक्ति हैं। परमेश्वर के वचनों से तुम मनुष्यों के लिए उसके प्रेम और उद्धार के साथ-साथ उन्हें बचाने के उसके तरीके को भी देख सकते हो...। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के वचन स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए जाते हैं, वे मनुष्यों द्वारा लिखे नहीं जाते। उन्हें परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से व्यक्त किया गया है; स्वयं परमेश्वर अपने वचनों और अपने दिल की आवाज़ व्यक्त कर रहा है, जिन्हें उसके दिल से निकले वचन भी कहा जा सकता है। उन्हें उसके दिल से निकले वचन क्यों कहा जाता है? वह इसलिए, क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उसके इरादों, उसके मतों और विचारों, मानवजाति के लिए उसके प्रेम, उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं को व्यक्त करते हैं...। परमेश्वर के कथनों में कठोर वचन, कोमल और विचारशील वचन, और साथ ही प्रकाशनात्मक वचन भी शामिल हैं, जो इंसान की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखते हैं। यदि तुम केवल प्रकाशनात्मक वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर बहुत कठोर है। यदि तुम केवल कोमल वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर ज़्यादा अधिकार-संपन्न नहीं है। इसलिए तुम्हें उन्हें संदर्भ से अलग करके नहीं देखना चाहिए; बल्कि उन्हें हर कोण से देखो। कभी-कभी परमेश्वर दयापूर्ण परिप्रेक्ष्य से बोलता है, और तब लोग मानवजाति के लिए उसके प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग देखते हैं कि उसका स्वभाव कोई अपमान सहन नहीं करता, कि मनुष्य अत्यधिक गंदा है, और वह परमेश्वर के मुख को देखने या परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है, और यह पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह की बदौलत है कि उसे अब परमेश्वर के सामने आने की जो अनुमति है। परमेश्वर के कार्य करने के तरीके और उसके कार्य के अर्थ से उसकी बुद्धि को देखा जा सकता है। लोग इन चीजों को परमेश्वर के वचनों में भी देख सकते हैं, यहाँ तक कि उसके सीधे संपर्क में आए बिना भी। जब परमेश्वर की सच्ची समझ रखने वाले व्यक्ति मसीह के संपर्क में आते हैं, तो मसीह के साथ उनका अनुभव परमेश्वर के बारे में उनकी मौजूदा समझ के साथ मेल खा सकता है, किंतु जब केवल सैद्धांतिक समझ वाले व्यक्ति मसीह के संपर्क में आते हैं, तो वे इस पारस्परिक संबंध को नहीं देख सकते। देहधारण का सत्य सबसे गंभीर रहस्य है; मनुष्य के लिए उसकी थाह पाना कठिन है। देहधारण का रहस्य समझने के लिए मिलकर परमेश्वर के वचनों का उपयोग करो, उन्हें विभिन्न कोणों से देखो, और फिर मिलकर प्रार्थना करो, विचार करो और सत्य के इस पहलू पर आगे और सहभागिता करो। इससे तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त करने और इसे समझने में सक्षम हो जाओगे। चूँकि मनुष्यों के पास परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई अवसर नहीं है, इसलिए उन्हें आगे बढ़ने के लिए इस तरह के अनुभव पर भरोसा करना चाहिए और अगर उन्हें अंततः परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना है, तो एक बार में थोड़ा-सा प्रवेश करना चाहिए।
सत्य का सबसे गहरा पहलू मसीह को जानना और व्यावहारिक परमेश्वर को जानना है। वे सभी जो सत्य के इस पहलू की खोज को महत्त्व देते हैं, वे अपने दिलों में शांति महसूस करेंगे और उनके पास अनुसरण करने का मार्ग होगा। सत्य के इस पहलू की तुलना मानव हृदय से की जा सकती है—जब किसी का दिल स्वस्थ होता है, तो वह ऊर्जावान महसूस करता है, लेकिन जब किसी का दिल बीमार होता है, तो वह थकामांदा महसूस करता है। इसी तरह, जब कोई परमेश्वर के देहधारण को बेहतर समझता है, वह परमेश्वर के विश्वास में अधिक उत्साही और प्रेरित होगा। कुछ नए विश्वासी जो परमेश्वर का वचन पढ़ते हैं और मानते हैं कि यह परमेश्वर की आवाज है, लेकिन वे फिर भी संदेह करते हैं : “क्या उसका इन वचनों को कहना यह साबित करता है कि वह देहधारी परमेश्वर है? क्या उसकी इन सत्यों को व्यक्त करने की क्षमता से वास्तव में साबित होता है कि वह स्वयं परमेश्वर है?” अधिकतर, वही लोग देहधारी परमेश्वर पर संदेह करते हैं जो सत्य को नहीं समझ पाते हैं। वास्तव में, देहधारी परमेश्वर के पास दिव्य सार है और चाहे वह कितने भी वचन व्यक्त करे, वह स्वयं परमेश्वर है। चाहे वह अधिक बोले या कम बोले, उनका दिव्य सार बदल नहीं सकता। जब प्रभु यीशु आया, तो उसने बहुत ज्यादा वचन नहीं बोले और सिर्फ छुटकारे का काम किया—तो क्या वे स्वयं परमेश्वर नहीं है? जब यह कहा जाता है कि वह परमेश्वर है, तो यह असल में कैसे निर्धारित किया जाता है? क्या सिर्फ इन वचन और सत्यों पर ही निर्णय होता है? यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। कुछ लोग गलत ढंग से विश्वास करते हैं कि ये वचन पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से बोले गए हैं, जब वह मार्गदर्शन का काम पूरा कर लेता है तो वह चला जाता है और काम करना बंद कर देता है। उन्हें लगता है कि यह साधारण और आम देह है, इसलिए उसे परमेश्वर नहीं कहा जा सकता—उसे “मनुष्य का पुत्र” बोला जा सकता है, पर परमेश्वर नहीं। कुछ लोग ऐसी गलतफहमी रखते हैं। उनमें ऐसी गलतफहमी के पैदा होने का असल कारण क्या है? इसका कारण परमेश्वर के देहधारण को लोगों ने पूरी तरह से नहीं समझा है—वे इसे गहराई से नहीं खोद पाए और देहधारण के बारे में जो कुछ वे जानते हैं, वह सिर्फ सतही है, वे बस ऊपर-ऊपर की बातें जानते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि परमेश्वर निश्चित रूप से परमेश्वर है क्योंकि वह कई सत्य प्रकट करता है। अगर परमेश्वर अधिक नहीं बल्कि कम वचन बोलता तो क्या वह परमेश्वर होता? असल में यदि वह केवल कुछ वचन ही बोलता, फिर भी यह उसकी दिव्यता को व्यक्त करता है और वह परमेश्वर है। परमेश्वर कितने वचन बोलता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह फिर भी परमेश्वर ही है। यदि वह बिल्कुल नहीं बोलता, तो भी वह परमेश्वर ही है—यह सच है और कोई भी इसे अस्वीकार नहीं कर सकता। परमेश्वर का अनुसरण करने वाले अधिकांश लोगों पर आज विजय पा ली गई है और हर कोई दृढ़तापूर्वक उसका अनुसरण करने और अपने कार्य निष्ठापूर्वक करने में सक्षम है। परमेश्वर ने चीन में लोगों के एक समूह को प्राप्त कर लिया है; लोगों को परमेश्वर के देहधारण का ज्ञान है, और उन्होंने देखा है कि देहधारी देह स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर है। लेकिन, अगर कार्य का यह चरण अभी भी अधूरा है, क्या लोग पहचान सकते हैं कि देहधारी शरीर स्वयं वास्तविक और असली परमेश्वर है? पहले, जब कुछ लोगों ने देखा कि परमेश्वर हमेशा वचन बोलकर और उन्हें व्यक्त कर कार्य करता है, तो वे सोचते थे, “वह परमेश्वर है या नहीं? क्या देहधारी परमेश्वर ऐसा होता है? क्या परमेश्वर का हर वचन पूरा हो सकता है?” परमेश्वर के कार्य के इस चरण के प्रति उनका रवैया हमेशा से संदेह करने का रहा है। यदि तुम उस देह पर संदेह करते हो जिसमें परमेश्वर ने देहधारण किया है, तो इससे साबित होता है कि तुम देहधारी शरीर या इस बात पर विश्वास नहीं करते कि वह परमेश्वर है, कि उसके पास परमेश्वर का सार है और जो वचन वह बोलता है, वे परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ हैं, और तुम यह तो बिल्कुल भी नहीं मानते कि उसके वचन परमेश्वर के स्वभाव के प्रकाशन और परमेश्वर के सार की अभिव्यक्ति हैं। कुछ लोग मन में सोचते हैं : “पहले पवित्र आत्मा ने प्रत्यक्ष रूप में कथन कहे और अब देहधारी परमेश्वर बोलता है। भविष्य में परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए और क्या रूप लेगा?” अभी भी ये लोग जाँच कर रहे हैं, वे अभी तक यह जाँच कर रहे हैं कि असल में मामला क्या है। कई लोग जो सच्चे मार्ग की जाँच करते हैं, स्वीकार करते हैं कि ये वचन सत्य हैं और ये परमेश्वर के हैं, फिर भी उन्हें स्वीकार करने से पहले निरीक्षण करना चाहते हैं और मामले की तह तक जाना चाहते हैं। ये सभी लोग परमेश्वर की जाँच कर रहे हैं, वे अवसरवादी हैं। कुछ लोग बस यह देखना चाहते हैं कि परमेश्वर और कितने सत्य व्यक्त करेगा और क्या वह तीसरे स्वर्ग की भाषा में बात करेगा। यदि उनके पास एक्स-रे मशीन होती, तो वे परमेश्वर पर उसका उपयोग करना चाहते : “मुझे देखने दो कि क्या उसके हृदय में अभी भी कोई सत्य है, क्या परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर कार्य करता है, क्या परमेश्वर का आत्मा उसकी सहायता करता है और जो कुछ वह कहता है उसे निर्देशित करता है? यदि उसमें सत्य नहीं है और वह सिर्फ एक सामान्य व्यक्ति है, तो मैं उस पर विश्वास नहीं करूँगा।” कुछ लोगों के मन में इस प्रकार के संदेह होते हैं, और वे हमेशा इस बारे में सोचते रहते हैं। उनकी ऐसी दशा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें परमेश्वर के देहधारण की पूरी समझ नहीं है—वे सत्य के इस पहलू को पूरी तरह ना जान पाए और ना वास्तव में इसे समझ पाए हैं। आजकल, लोग केवल यह स्वीकार करते हैं कि इस व्यक्ति के भीतर परमेश्वर का आत्मा है, लेकिन जब इस तथ्य की बात आती है कि उसके पास परमेश्वर का सार और स्वभाव है, और उसके भीतर परमेश्वर का स्वरूप और परमेश्वर का सब कुछ है, कि वह परमेश्वर ही है, तो कुछ लोग इसे समझ ही नहीं पाते हैं, और कुछ मामलों में संबंधों को समझ नहीं पाते। मनुष्य परमेश्वर में जिसे देखता है और परमेश्वर के बारे में जो विश्वास करता है, वह परमेश्वर का सार नहीं है—यानी, मनुष्य केवल परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन और उसके द्वारा किए गए व्यावहारिक कार्यों को देखता है। वह केवल यह मानता है कि परमेश्वर ने काम का एक हिस्सा किया है, और यह एकमात्र ऐसा काम है जिसे देहधारी परमेश्वर करने में सक्षम है। एक भी व्यक्ति यह नहीं मानता कि भले ही देहधारी परमेश्वर अभी यह कार्य विशेष कर रहा है, लेकिन वास्तव में उसके पास दिव्यता का पूरा सार है। इस पर कोई विश्वास नहीं करता।
कुछ लोग कहते हैं : “देहधारी परमेश्वर को जानना बहुत मुश्किल है। अगर परमेश्वर का आत्मा प्रत्यक्ष रूप से काम करता, और हम परमेश्वर की शक्ति और अधिकार को सीधे देख पाते, तो हमारे लिए परमेश्वर को जानना आसान होता।” क्या यह संभव है? मैं तुम लोगों से एक सवाल पूछता हूँ : “देहधारी परमेश्वर को जानना आसान है या परमेश्वर के आत्मा को? अगर देहधारी परमेश्वर और यहोवा समान मात्रा में काम करते, तो किसे जानना आसान होता?” यह कहा जा सकता है कि उनमें से किसी को भी जानना आसान नहीं है। जब देहधारी परमेश्वर ने पहली बार काम किया और वचन सुनाया, तो क्या लोग उसे समझने में असफल नहीं हुए? क्या सभी ने उसे गलत नहीं समझा? कोई नहीं जानता कि परमेश्वर अपना काम क्यों कर रहा है। अगर लोगों में आध्यात्मिक समझ हो, तो उनके लिए परमेश्वर को जानना आसान होता है, लेकिन अगर उनमें आध्यात्मिक समझ की कमी है, और वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझ सकते, तो उन्हें परमेश्वर को जानना कठिन लगता है। यह तथ्य है। हालाँकि, परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने, उसके न्याय, ताड़ना और काट-छाँट से गुजरकर, सत्य के प्रेमी अंततः सत्य समझ पाते हैं, वे अपना स्वभाव बदल लेते हैं और देहधारी परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। यह साबित होता है कि उस देहधारी परमेश्वर को जानना अपेक्षाकृत आसान है, जो सीधे सत्य प्रकट कर रहा है, लेकिन इसके लिए कुछ अनुभवों से गुजरना जरूरी है। जब आत्मा कार्य करता है, तो वह इतने सारे सत्य व्यक्त नहीं कर सकता, वह केवल लोगों को प्रेरित या प्रबुद्ध कर सकता है। इस परिस्थिति में लोग कितना सत्य समझ सकते हैं, इसकी सीमा होगी। लोग चाहे कितने ही वर्षों तक आत्मा के कार्य का अनुभव करें, उन्हें उतने महत्वपूर्ण लाभ नहीं मिलेंगे जितने कि वे देहधारी परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने से प्राप्त करेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि देहधारी परमेश्वर का कार्य मूर्त है और सभी को दिखाई देता है, देहधारी परमेश्वर कभी भी और कहीं भी खुद को व्यक्त कर सकता है। उसके वचन वास्तव में असंख्य और स्पष्ट हैं, और सभी उन्हें समझ सकते हैं। यह एक अत्यंत स्पष्ट लाभ है और लोग इसे स्वयं अनुभव कर सकते हैं। जब आत्मा कार्य करता है, तो वह कुछ वचन बोलने के बाद चला जाता है—सभी लोग बस उनका पालन करते हैं और उन्हें क्रियान्वित करते हैं, लेकिन क्या लोग जानते हैं कि वास्तव में क्या हो रहा है? क्या लोग इन वचनों से यहोवा के स्वभाव को जान सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं : “आत्मा को जानना आसान है, आत्मा परमेश्वर की सच्ची छवि लिए हुए कार्य करने आता है। उसे समझना आसान कैसे नहीं है?” बेशक तुम उसकी बाहरी छवि को जानते हो, परन्तु क्या तुम परमेश्वर के सार को जान सकते हो? अब देहधारी परमेश्वर एक साधारण एवं सामान्य व्यक्ति है, जिससे संपर्क करना लोगों को आसान महसूस होता है। लेकिन, जब उसका सार एवं स्वभाव प्रकट होता है, तो क्या लोग उन चीजों को आसानी से जान लेते हैं? क्या लोग आसानी से उसके कहे उन वचनों को स्वीकार लेते हैं जो उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं होते? कुछ लोग कहते हैं : “देहधारी परमेश्वर को जानना कठिन है। यदि बाद में परमेश्वर रूपान्तरित हो जाता, तो परमेश्वर को जानना बहुत आसान होता।” जो लोग ऐसा कहते हैं वे पूरी जिम्मेदारी देहधारी परमेश्वर पर डाल देते हैं। क्या वास्तव में बात ऐसी ही है? अगर परमेश्वर का आत्मा आ भी जाता तब भी तुम उसे न समझ पाते। जब आत्मा कार्य करता है, तो वह लोगों से बातचीत समाप्त करने के तुरन्त बाद चला जाता है, और उन्हें ज्यादा कुछ नहीं समझाता, और एक सामान्य तरीके से उनके साथ जुड़ता या रहता नहीं है, इसलिए लोगों के पास परमेश्वर से सीधा संपर्क करने या उसे जानने का अवसर नहीं होता। लोगों के लिए देहधारी परमेश्वर के कार्य का लाभ अति विशाल है। वे सत्य जो वह लोगों के लिए लेकर आता है, अधिक व्यावहारिक हैं। यह स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को देखने में लोगों की सहायता करता है। हालाँकि, देहधारण के सार को जानना और आत्मा के सार को जानना समान रूप से मुश्किल है। इन्हें जानना समान रूप से कठिन है।
परमेश्वर को जानने का क्या अभिप्राय है? इसका अभिप्राय है परमेश्वर के आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को जानना, और इस प्रकार उसके स्वभाव को जानना—यही है परमेश्वर को वास्तव में जानना। तुम दावा करते हो कि तुमने उसे देखा है, फिर भी तुम उसके आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को नहीं जानते हो, उसके स्वभाव को नहीं जानते हो। न उसकी धार्मिकता को जानते हो, न ही उसकी दयालुता को, न ही तुम ये जानते हो कि वह किसे पसंद करता है और किससे घृणा करता है। इसे परमेश्वर को जानना नहीं कहा जा सकता है। कुछ लोग परमेश्वर का अनुसरण करने में सक्षम होते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हों। परमेश्वर में वास्तव में विश्वास करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होना है। जो लोग वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं होते, वे परमेश्वर पर वास्तव में विश्वास नहीं करते—अंतर यहीं पर है। जब तुमने कई वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण किया होता है, और तुम्हें परमेश्वर का ज्ञान और समझ होती है, जब तुम्हें परमेश्वर के इरादों की कुछ समझ-बूझ होती है, जब तुम मनुष्य को बचाने में परमेश्वर के विचारपूर्ण सोच-विचार से अवगत होते हो, तो यह तब होता है, जब तुम वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हो, वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हो, वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हो, और वास्तव में परमेश्वर की आराधना करते हो। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो लेकिन परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते, और परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं रखते, तो तुम सिर्फ एक ऐसे अनुयायी हो, जो परमेश्वर के लिए दौड़-भाग करता है और जो कुछ बहुसंख्यक लोग करते हैं, उसका अनुसरण करता है। इसे सच्चा समर्पण नहीं कहा जा सकता, सच्ची आराधना तो बिलकुल नहीं कहा जा सकता। सच्ची आराधना कैसे उत्पन्न होती है? बिना किसी अपवाद के, जो लोग परमेश्वर को देखते हैं और वास्तव में परमेश्वर को जानते हैं, वे सब उसकी आराधना करते और उसका भय मानते हैं; वे सभी उसके सामने झुककर उसकी आराधना करने के लिए बाध्य होते हैं। वर्तमान में, जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा है, तब लोगों के पास उसके स्वभाव की और उसके स्वरूप की जितनी अधिक समझ होती है, उतना ही अधिक लोग इन बातों को संजोकर रखेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर का भय मानेंगे। आम तौर पर, परमेश्वर की जितनी कम समझ लोगों में होती है, वे उतना ही अधिक लापरवाह होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर से मनुष्य के समान बर्ताव करते हैं। अगर लोग वास्तव में परमेश्वर को जानते और देखते, तो वे भय से काँप उठते और जमीन पर गिरकर दंडवत करते। “जो मेरे बाद आने वाला है, वह मुझ से शक्तिशाली है; मैं उसकी जूती उठाने के योग्य नहीं” (मत्ती 3:11)—यूहन्ना ने ऐसा क्यों कहा? यद्यपि अंतरतम में उसके पास परमेश्वर का बहुत गहरा ज्ञान नहीं था, फिर भी वह जानता था कि परमेश्वर विस्मय की भावना जगाता है। आजकल कितने लोग परमेश्वर का भय मानने में सक्षम हैं? अगर वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो वे किस प्रकार उसका भय मान सकते हैं? अगर लोग न तो मसीह का सार जानते हैं, न ही परमेश्वर के स्वभाव को समझते हैं, तो वे व्यावहारिक परमेश्वर की आराधना करने में और भी कम सक्षम होंगे। अगर वे सिर्फ मसीह के साधारण और सामान्य बाहरी रूप को देखते हैं फिर भी उसके सार को नहीं जानते हैं, तो मसीह के साथ मात्र एक सामान्य मनुष्य की तरह बर्ताव करना लोगों के लिए आसान है। वे उसके प्रति एक अपमानजनक प्रवृत्ति अपना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, उसका प्रतिरोध कर सकते हैं, उसके प्रति विद्रोह कर सकते हैं, उस पर दोष लगा सकते हैं, और दुराग्रही हो सकते हैं। वे दंभी हो सकते हैं और हो सकता है वे उसके वचन को गंभीरता से न लें, वे परमेश्वर के बारे में धारणाएं भी बना सकते हैं, उसकी निंदा और तिरस्कार कर सकते हैं। इन मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यक्ति को मसीह के सार, एवं मसीह की दिव्यता को अवश्य जानना चाहिए। परमेश्वर को जानने का यही मुख्य पहलू है; यही वो है जिसमें व्यवहारिक परमेश्वर में विश्वास करने वाले हर इंसान को प्रवेश और जिसे हासिल करना चाहिए।
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