परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X" | अंश 194

विभिन्न आस्था वाले लोगों का जीवन और मृत्यु का चक्र

हमने अभी-अभी पहली श्रेणी के लोगों, यानी अविश्वासियों के जीवन और मृत्यु के चक्र के बारे में चर्चा की। अब आओ हम द्वितीय श्रेणी के, यानी विभिन्न आस्था वाले लोगों के बारे में चर्चा करें। "विभिन्न आस्था वाले लोगों का जीवन और मृत्यु चक्र" एक अन्य महत्वपूर्ण विषय है, और यह अत्यंत आवश्यक है कि तुम लोग इस बारे में कुछ समझो। पहले, आओ हम इस बारे में बात करें कि "आस्था वाले लोगों" में "आस्था" यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, कैथोलिक धर्म, इस्लाम और बौद्ध धर्म, इन पाँच प्रमुख धर्मों को संदर्भित करती है। अविश्वासियों के अतिरिक्त, जो लोग इन पाँच धर्मों में विश्वास करते हैं, उनका विश्व की जनसंख्या में एक बड़ा अनुपात है। इन पाँच धर्मों के बीच, जिन्होंने अपने विश्वास से आजीविका बनाई है, वे बहुत थोड़े-से हैं, फिर भी इन धर्मों के बहुत अनुयायी हैं। जब वे मरते हैं, तो भिन्न स्थान पर जाते हैं। किससे "भिन्न"? अविश्वासियों से, यानी उन लोगों से, जिनकी कोई आस्था नहीं है, जिनके बारे में हम अभी-अभी बात कर रहे थे। मरने के बाद, इन पाँचों धर्मों के विश्वासी किसी अन्य स्थान पर जाते हैं, अविश्वासियों के स्थान से भिन्न किसी स्थान पर। किंतु प्रक्रिया एकसमान होती है; आध्यात्मिक दुनिया उनके बारे में उस सबके आधार पर निर्णय करेगी, जो उन्होंने मरने से पहले किया था, उसके पश्चात् तदनुसार उनकी प्रक्रिया की जाएगी। परंतु प्रक्रिया करने के लिए इन लोगों को किसी अन्य स्थान पर क्यों भेजा जाता है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। क्या है वह कारण? मैं तुम लोगों को इसे एक उदाहरण से समझाऊँगा। किंतु इससे पहले कि मैं बताऊँ, तुम स्वयं सोच रहे होगे : "ऐसा शायद इसलिए होगा, क्योंकि परमेश्वर में उनका कम विश्वास होगा! वे पूर्ण विश्वासी नहीं होंगे।" किंतु यह कारण नहीं है। उन्हें दूसरों से अलग रखने का एक महत्वपूर्ण कारण है।

उदाहरण के लिए, बौद्ध धर्म को लो : मैं तुम्हें एक तथ्य बताता हूँ। एक बौद्ध, सबसे पहले, वह व्यक्ति है, जो बौद्ध धर्म में धर्मांतरित हो गया है, और वह ऐसा व्यक्ति है, जो जानता है कि उसका विश्वास क्या है। जब बौद्ध अपने बाल कटवाते हैं और भिक्षु या भिक्षुणी बनते हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अपने आपको लौकिक संसार से पृथक कर लिया है और मानव-जगत के कोलाहल को बहुत पीछे छोड़ दिया है। प्रतिदिन वे सूत्रों का उच्चारण करते हैं और बुद्ध के नामों का जाप करते हैं, केवल शाकाहारी भोजन करते हैं, तपस्वी का जीवन व्यतीत करते हैं, और अपने दिन तेल के दीये की ठंडी, क्षीण रोशनी में गुजारते हैं। वे अपना सारा जीवन इसी प्रकार व्यतीत करते हैं। जब उनका भौतिक जीवन समाप्त होता है, वे अपने जीवन का सारांश बनाते हैं, परंतु अपने हृदय में उन्हें पता नहीं होता कि मरने के बाद वे कहाँ जाएँगे, किससे मिलेंगे, या उनका अंत क्या होगा—अपने हृदय की गहराई में उन्हें इन चीज़ों के बारे स्पष्ट ज्ञान नहीं होता। उन्होंने अपने पूरे जीवन में आँख मूँदकर एक प्रकार का विश्वास करने से अधिक कुछ नहीं किया होता, जिसके पश्चात् वे अपनी अंधी इच्छाओं और आदर्शों के साथ इस संसार से चले जाते हैं। ऐसा होता है एक बौद्ध के भौतिक जीवन का अंत, जब वह जीवित संसार को छोड़ता है; उसके बाद वह आध्यात्मिक दुनिया में अपने मूल स्थान पर वापस लौट जाता है। पृथ्वी पर वापस लौटने और अपनी स्व-साधना करते रहने के लिए इस व्यक्ति का पुनर्जन्म होगा या नहीं, यह मृत्यु से पहले के उसके आचरण और अभ्यास पर निर्भर करता है। यदि अपने जीवन-काल में उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया, तो शीघ्र ही उनका पुनर्जन्म हो जाएगा और उन्हें पृथ्वी पर वापस भेज दिया जाएगा, जहाँ वे एक बार फिर भिक्षु या भिक्षुणी बनेंगे। अर्थात्, वे स्वयं द्वारा अपने भौतिक जीवन में पहली बार की गई स्व-साधना के अनुरूप स्व-साधना का अभ्यास करते हैं, और अपने भौतिक जीवन की समाप्ति के बाद वे फिर आध्यात्मिक दुनिया में लौट जाते हैं, जहाँ उनकी जाँच की जाती है। इसके बाद यदि कोई समस्या नहीं पाई जाती, तो वे एक बार फिर मनुष्यों के संसार में लौट सकते हैं, और फिर से बौद्ध धर्म में धर्मांतरित हो सकते हैं और इस प्रकार अपना अभ्यास जारी रख सकते हैं। तीन से सात बार तक पुनर्जन्म लेने के बाद वे एक बार फिर से आध्यात्मिक दुनिया में लौटते हैं, जहाँ अपने भौतिक जीवन की समाप्ति पर वे हर बार जाते हैं। यदि मानव-जगत में उनकी विभिन्न योग्यताएँ और उनके व्यवहार आध्यात्मिक दुनिया की स्वर्गिक आज्ञाओं के मुताबिक होते हैं, तो इसके बाद वे वहीं रहेंगे; उनका फिर मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म नहीं होगा, न ही उन्हें पृथ्वी पर बुरे कार्यों के लिए दंडित किए जाने का कोई जोखिम होगा। उन्हें फिर कभी इस प्रक्रिया से नहीं गुजरना होगा। इसके बजाय, अपनी परिस्थितियों के अनुसार, वे आध्यात्मिक राज्य में कोई पद ग्रहण करेंगे। इसे ही बौद्ध लोग "बुद्धत्व की प्राप्ति" कहते हैं। बुद्धत्व की प्राप्ति का मुख्य रूप से अर्थ है आध्यात्मिक दुनिया के एक पदाधिकारी के रूप में कर्मफल प्राप्त करना, और उसके बाद पुनर्जन्म लेने या दंड भोगने का कोई जोखिम न होना। इसके अतिरिक्त, इसका अर्थ है कि पुनर्जन्म के बाद मनुष्य होने के कष्ट अब और न भोगना। तो क्या अभी भी उनका पशु के रूप में पुनर्जन्म होने की कोई संभावना है? (नहीं।) इसका मतलब है कि वे कोई भूमिका ग्रहण करने के लिए आध्यात्मिक दुनिया में ही बने रहेंगे और उनका पुनर्जन्म नहीं होगा। बौद्ध धर्म में बुद्धत्व के कर्मफल की प्राप्ति का यह एक उदाहरण है। जहाँ तक यह कर्मफल प्राप्त न करने वालों की बात है, आध्यात्मिक दुनिया में उनके लौटने पर वे संबंधित पदाधिकारी द्वारा जाँच और सत्यापन के भागी होते हैं, जो यह पता लगाता है कि जीवित रहते हुए उन्होंने परिश्रमपूर्वक स्व-साधना का अभ्यास नहीं किया था या ईमानदारी से बौद्ध धर्म द्वारा निर्धारित सूत्रों का पाठ और बुद्ध के नामों का जाप नहीं किया था; इसके बजाय, उन्होंने कई दुष्कर्म किए थे, और वे बहुत सारे दुष्ट आचरणों में संलग्न रहे थे। तब आध्यात्मिक दुनिया में उनके बुरे कार्यों के बारे में निर्णय लिया जाता है, जिसके बाद उन्हें दंडित किया जाना निश्चित होता है। इसमें कोई अपवाद नहीं होता। तो इस प्रकार का व्यक्ति कब कर्मफल प्राप्त कर सकता है? उस जीवन-काल में, जब वे कोई बुरा कार्य नहीं करते—जब आध्यात्मिक दुनिया में लौटने के पश्चात् यह देखा जाता है कि उन्होंने मृत्यु से पूर्व कुछ ग़लत नहीं किया था। तब वे पुनर्जन्म लेते रहते हैं, सूत्रों का पाठ और बुद्ध के नामों का जाप करते रहते हैं, अपने दिन तेल के दीये के ठंडे और क्षीण प्रकाश में गुज़ारते रहते हैं, किसी जीव की हत्या नहीं करते या मांस नहीं खाते। वे मनुष्य के संसार में हिस्सा नहीं लेते, उसकी समस्याओं को बहुत पीछे छोड़ देते हैं, और दूसरों के साथ कोई विवाद नहीं करते। इस प्रक्रिया में, यदि उन्होंने कोई बुरा कार्य नहीं किया होता, तो आध्यात्मिक दुनिया में उनके लौटकर आने और उनके समस्त क्रियाकलापों और व्यवहार की जाँच हो चुकने के बाद उन्हें तीन से सात बार तक चलने वाले जीवन-चक्र के लिए एक बार पुनः मनुष्य के संसार में भेजा जाता है। यदि इस दौरान कोई कदाचार नहीं किया गया होता, तो बुद्धत्व की उनकी प्राप्ति अप्रभावित रहेगी, और विलंबित नहीं होगी। यह समस्त आस्था वाले लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र का एक लक्षण है : वे "कर्मफल प्राप्त" करने और आध्यात्मिक संसार में कोई पद प्राप्त करने में समर्थ होते हैं; यही बात है, जो उन्हें अविश्वासियों से अलग बनाती है। पहली बात, जब वे अभी भी पृथ्वी पर जी रहे होते हैं, तो आध्यात्मिक दुनिया में पद ग्रहण करने में सक्षम रहने वाले लोग कैसा आचरण करते हैं? उन्हें निश्चित करना चाहिए कि वे कोई भी बुरा कार्य बिल्कुल न करें : उन्हें हत्या, आगजनी, बलात्कार या लूटपाट नहीं करनी चाहिए; यदि वे कपट, धोखाधड़ी, चोरी या डकैती में संलग्न होते हैं, तो वे कर्मफल प्राप्त नहीं कर सकते। कहने का अर्थ है कि, यदि कुकर्म से उनका कोई भी संबंध या संबद्धता है, तो वे आध्यात्मिक दुनिया द्वारा उन्हें दिए जाने वाले दंड से बच नहीं पाएँगे। आध्यात्मिक दुनिया उन बौद्धों के लिए उचित प्रबंध करती है, जो बुद्धत्व प्राप्त करते हैं : उन्हें उन लोगों को प्रशासित करने के लिए नियुक्त किया जा सकता है, जो बौद्ध धर्म में और आकाश के वृद्ध मनुष्य पर विश्वास करते प्रतीत होते हैं—उन्हें एक अधिकार-क्षेत्र आबंटित किया जा सकता है। वे केवल अविश्वासियों के प्रभारी भी हो सकते हैं, या बहुत गौण कर्तव्यों वाले पदों पर भी हो सकते हैं। ऐसा आबंटन उनकी आत्माओं की विभिन्न प्रकृतियों के अनुसार होता है। यह बौद्ध धर्म का एक उदाहरण है।

हमने जिन पाँच धर्मों की बात की है, उनमें ईसाई धर्म अपेक्षाकृत विशेष है। ईसाइयों को विशेष क्या बनाता है? ये वे लोग हैं, जो सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं। जो लोग सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें यहाँ कैसे सूचीबद्ध किया जा सकता है? यह कहने पर कि ईसाइयत एक प्रकार की आस्था है, निःसंदेह यह केवल आस्था से करनी होगी; वह केवल एक प्रकार का अनुष्ठान, एक प्रकार का धर्म होगी, और उन लोगों की आस्था से बिलकुल अलग चीज़ होगी, जो ईमानदारी से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। मेरे द्वारा ईसाइयत को पाँच प्रमुख "धर्मों" के बीच सूचीबद्ध किए जाने का कारण यह है, कि इसे भी यहूदी, बौद्ध और इस्लाम धर्मों के स्तर तक घटा दिया गया है। यहाँ अधिकतर लोग इस बात पर विश्वास नहीं करते कि कोई परमेश्वर है, या यह कि वह सभी चीज़ों पर शासन करता है, उसके अस्तित्व पर तो वे बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते। इसके बजाय, वे मात्र धर्मशास्त्र की चर्चा करने के लिए केवल धर्मग्रंथों का उपयोग करते हैं, और लोगों को दयालु बनना, कष्ट सहना और अच्छे कार्य करना सिखाने के लिए धर्मशास्त्र का उपयोग करते हैं। ईसाइयत इसी प्रकार का धर्म बन गया है : यह केवल धर्मशास्त्र संबंधी सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित करता है, मनुष्य का प्रबंधन करने या उसे बचाने के परमेश्वर के कार्य से इसका बिल्कुल भी कोई संबंध नहीं है। यह उन लोगों का धर्म बन गया है, जो परमेश्वर का अनुसरण तो करते हैं, पर जिन्हें वास्तव में परमेश्वर द्वारा अंगीकार नहीं किया जाता। ऐसे लोगों के प्रति अपने दृष्टिकोण में परमेश्वर के पास भी एक सिद्धांत है। वह उन्हें अपनी मर्जी से उसी तरह बेमन से नहीं सँभालता या उनसे उसी तरह बेमन से नहीं निपटता, जैसा कि वह अविश्वासियों के साथ करता है। वह उनके साथ वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा कि वह बौद्धों के साथ करता है : यदि जीवित रहते हुए कोई ईसाई आत्मानुशासन का पालन कर पाता है, कठोरता से दस आज्ञाओं का पालन करता है और व्यवस्थाओं और आज्ञाओं के अनुसार परिश्रमपूर्वक व्यवहार करता है, और जीवन भर इन पर दृढ़ रह सकता है, तो उन्हें भी वास्तव में तथाकथित "स्वर्गारोहण" प्राप्त कर पाने से पहले उतना ही समय जीवन और मृत्यु के चक्र से गुज़ारना होगा। इस स्वर्गारोहण को प्राप्त करने के पश्चात्, वे आध्यात्मिक दुनिया में बने रहते हैं, जहाँ वे कोई पद लेते हैं और उसके एक पदाधिकारी बन जाते हैं। इसी प्रकार, यदि वे पृथ्वी पर बुराई करते हैं, यदि वे बहुत पापी हैं और बहुत पाप करते हैं, तब वे भिन्न-भिन्न तीव्रता से दंडित और अनुशासित किए जाएँगे। बौद्ध धर्म में कर्मफल की प्राप्ति का अर्थ है परमानंद की शुद्ध भूमि पर से गुज़रना, किंतु ईसाइयत में इसे क्या कहा जाता है? इसे "स्वर्ग में प्रवेश करना" और "स्वर्गारोहण करवाया जाना" कहते हैं। जिन्हें वास्तव में स्वर्गारोहण करवाया जाता है, वे भी जीवन और मृत्यु के चक्र से तीन से सात बार तक गुज़रते हैं, जिसके पश्चात्, मर जाने पर, वे आध्यात्मिक दुनिया में आते हैं, मानो वे सो गए थे। यदि वे मानक के अनुरूप होते हैं, तो वे कोई पद ग्रहण करने के लिए वहाँ बने रह सकते हैं, और पृथ्वी पर मौजूद लोगों के विपरीत, साधारण तरीके से, या परिपाटी के अनुसार, उनका पुनर्जन्म नहीं होगा।

इन सब धर्मों में, जिस अंत के बारे में लोग बात करते हैं और जिसके लिए वे प्रयास करते हैं, वह वैसा ही है जैसा कि बौद्ध धर्म में कर्मफल प्राप्त करना; फर्क सिर्फ यह है कि इसे भिन्न-भिन्न साधनों के द्वारा प्राप्त किया जाता है। वे सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। इन धर्मों के अनुयायियों के इस भाग के लिए, जो अपने आचरण में धार्मिक नियमों का कड़ाई से पालन करने में समर्थ होते हैं, परमेश्वर एक उचित गंतव्य, जाने के लिए एक उचित स्थान उपलब्ध कराता है, और उन्हें उचित प्रकार से सँभालता है। यह सब तर्कसंगत है, किंतु यह वैसा नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं, है न? अब, ईसाइयत में लोगों का क्या होता है, इस बारे में सुनने के बाद, तुम लोग कैसा अनुभव करते हो? क्या तुम्हें लगता है कि उनकी दुर्दशा उचित है? क्या तुम उनके साथ सहानुभूति रखते हो? (थोड़ी-सी।) उनके मामले में कुछ नहीं किया सकता; वे केवल स्वयं को ही दोष दे सकते हैं। मै ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर का कार्य सच्चा है; वह जीवित और वास्तविक है, और उसका कार्य संपूर्ण मानवजाति और प्रत्येक व्यक्ति पर लक्षित है। तो फिर वे इसे स्वीकार क्यों नहीं करते? क्यों वे पागलों की तरह परमेश्वर का विरोध करते हैं और उसे यातना देते हैं? इस तरह का परिणाम पाकर भी उन्हें स्वयं को भाग्यशाली समझना चाहिए, तो तुम उनके लिए खेद क्यों महसूस करते हो? उन्हें इस प्रकार से सँभाला जाना बड़ी सहिष्णुता दर्शाता है। जिस हद तक वे परमेश्वर का विरोध करते हैं, उसके हिसाब से तो उन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए, फिर भी परमेश्वर ऐसा नहीं करता, वह बस ईसाइयत को किसी साधारण धर्म की तरह ही सँभालता है। तो क्या अन्य धर्मों के बारे में विस्तार से जाने की कोई आवश्यकता है? इन सभी धर्मों की प्रकृति है कि लोग अधिक कठिनाइयाँ सहन करें, कोई बुराई न करें, अच्छे कर्म करें, दूसरों को गाली न दें, दूसरों के बारे में निर्णय न दें, विवादों से दूर रहें, और सज्जन बनें—अधिकांश धार्मिक शिक्षाएँ इसी प्रकार की हैं। और इसलिए, यदि ये आस्था वाले लोग‌—ये विभिन्न धर्मों और पंथों वाले लोग—यदि अपने धार्मिक नियमों का कडाई से पालन कर पाते हैं, तो वे पृथ्वी पर अपने समय के दौरान बड़ी त्रुटियाँ या पाप नहीं करेंगे, और तीन से सात बार तक पुनर्जन्म लेने के बाद, सामान्यत: ये लोग—जो धार्मिक नीतियों का कड़ाई से पालन करने में सक्षम रहते हैं—आम तौर पर, आध्यात्मिक दुनिया में कोई पद लेने के लिए बने रहेंगे। क्या ऐसे बहुत लोग हैं? (नहीं, अधिक नहीं हैं।) तुम्हारा उत्तर किस बात पर आधारित है? भलाई करना या धार्मिक नियमों और व्यवस्थाओं का पालन करना आसान नहीं है। बौद्ध धर्म लोगों को मांस खाने की अनुमति नहीं देता—क्या तुम ऐसा कर सकते हो? यदि तुम्हें भूरे वस्त्र पहनकर किसी बौद्ध मंदिर में पूरे दिन मंत्रों का उच्चारण और बुद्ध के नामों का जाप करना पड़े, तो क्या तुम ऐसा कर सकोगे? यह आसान नहीं होगा। ईसाइयत में दस आज्ञाएँ, आज्ञाएँ और व्यवस्थाएँ हैं, क्या उनका पालन करना आसान है? वह आसान नहीं है। उदाहरण के लिए, दूसरों को गाली न देने को लो : लोग इस नियम का पालन करने में एकदम अक्षम हैं। स्वयं को रोक पाने में असमर्थ होकर वे गाली देते हैं—और गाली देने के बाद वे उन शब्दों को वापस नहीं ले सकते, तो वे क्या करते हैं? रात्रि में वे अपने पाप स्वीकार करते हैं! कभी-कभी दूसरों को गाली देने के बाद भी वे अपने दिल में घृणा को आश्रय दिए रहते हैं, और वे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि वे उन लोगों को किसी समय और ज्यादा नुकसान पहुँचाने की योजना बना लेते हैं। संक्षेप में, जो लोग इस जड़ धर्मांधता के बीच जीते हैं, उनके लिए पाप करने से बचना या बुराई करने से दूर रहना आसान नहीं है। इसलिए, हर धर्म में केवल कुछ लोग ही कर्मफल प्राप्त कर पाते हैं। तुम्हें लगता है कि चूँकि इतने अधिक लोग इन धर्मों का अनुसरण करते हैं, इसलिए उनका एक बड़ा भाग आध्यात्मिक राज्य में कोई भूमिका ग्रहण करने के लिए बने रहने में सक्षम रहता होगा। लेकिन ऐसे लोग उतने अधिक नहीं हैं; वास्तव में केवल कुछ ही इसे प्राप्त कर पाते हैं। आस्था वाले लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र में सामान्यतः ऐसा ही होता है। जो चीज उन्हें अलग करती है, वह यह है कि वे कर्मफल प्राप्त कर सकते हैं, और यही बात उन्हें अविश्वासियों से अलग करती है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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