परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X" | अंश 192

जब अविश्वासियों की बात आती है, तो क्या परमेश्वर की कार्यवाइयों की पृष्ठभूमि में भलों को प्रतिफल देने और दुष्टों को दण्ड देने का सिद्धांत है? क्या तुम देखते हो कि परमेश्वर की कार्यवाई के लिये एक सिद्धांत है? तुम्हें यह देखने योग्य होना चाहिये कि एक सिद्धांत है। वास्तव में अविश्वासी परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, वे परमेश्वर के आयोजन को नहीं मानते और वे परमेश्वर के प्रभुत्व से अनभिज्ञ हैं, परमेश्वर को स्वीकारने की तो बात ही क्या है। अधिक गंभीर बात यह है कि वे परमेश्वर की निन्दा करते हैं और उसे बुरा भला कहते हैं, और उन लोगों के प्रति हिंसक हैं जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। यद्यपि इन लोगों का परमेश्वर के प्रति ऐसा रवैया है, फिर भी उनके प्रति परमेश्वर की व्यवस्था अपने सिद्धांतो से विचलित नहीं होती; वह अपने सिद्धांतों और स्वभाव के अनुरूप व्यवस्थित रूप से उनका प्रबंधन करता है। परमेश्वर उनके हिंसात्मक रवैये को किस प्रकार लेता है? नादानी की तरह! और इसलिए उसने इन लोगों को-अविश्वासियों में से अधिकतर को—एक बार पशु के रूप में जन्म दिया है। तो अविश्वासी परमेश्वर की दृष्टि में क्या है? (मवेशी।) परमेश्वर की दृष्टि में वे इसी प्रकार के हैं, वे मवेशी हैं। परमेश्वर मवेशियों का बंदोबस्त करता है, और वह मनुष्यों का बंदोबस्त करता है और इस प्रकार के लोगों के लिये उसके सिद्धांत एक समान हैं। इन लोगों के प्रशासन में और उनके प्रति परमेश्वर की कार्यवाइयों में, अभी भी परमेश्वर के स्वभाव को और सभी चीज़ों पर उसकी प्रभुता के विषय में कानून को देखा जा सकता है। अत:, क्या तुम उन सिद्धांतों में परमेश्वर की प्रभुता देखते हो जिनके द्वारा वह अविश्वासियों का बन्दोबस्त करता है जिसके विषय में मैंने अभी बताया? क्या तुम परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को देखते हो? (हां, हम देखते हैं।) तुम उसके प्रभुत्व और उसके स्वभाव को देखते हो। और कहने का अर्थ है कि वह किसी भी चीज़ से निपटे, परमेश्वर अपने ही सिद्धांतों और स्वभाव के अनुसार कार्य करता है। यही परमेश्वर का तत्व है। वह आमतौर पर अपने सिद्धांतों या स्वर्गीय नियमों को नहीं तोड़ता जो उसने स्थापित किए हैं, क्योंकि वह ऐसे लोगों को मवेशी के रूप में देखता है; परमेश्वर ज़रा भी इधर-उधर भटके बिना, सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, किसी भी कारण का उसकी कार्यवाइयों पर बिल्कुल भी प्रभाव नहीं पड़ता, और चाहे वह कुछ भी करे, वह सब उसके सिद्धांतों के अन्तर्गत होता है। इस बात का निर्णय इस तथ्य के द्वारा होता है कि परमेश्वर के पास स्वयं परमेश्वर का तत्व है, जो एक अद्वितीय तत्व, जो किसी रचे गए जीव के पास नहीं होता। परमेश्वर हर वस्तु, हर व्यक्ति, और जो कुछ भी उसने रचा है, उन सभी चीज़ों के मध्य जीव की देखभाल में, नज़रिये में, उनके प्रबंधन में, प्रशासन में न्यायपरायण और उत्तरदायी है, और इसमें वह कभी भी लापरवाह नहीं रहा है। जो अच्छे हैं, वह उनके प्रति अनुग्रही और दयावान है; जो दुष्ट हैं, उन्हें वह निर्ममता से दंड देता है; और विभिन्न जीवों के लिये, वह समयानुकूल और नियमित रूप से, विभिन्न समयों पर मानवजाति के संसार की आवश्यकता अनुसार उचित प्रबंध करता है इस प्रकार करता है कि विभिन्न जीव व्यवस्थित रूप से अपनी-अपनी भूमिकाओं के अनुसार जन्म लेते रहें, और व्यवस्थित रूप से भौतिक जगत और आत्मिक जगत के मध्य आवागमन करते रहें।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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