परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 185

लोगों के हृदय में परमेश्वर की समझ जितनी अधिक होती है, उतनी ही उनके हृदय में उसके लिए जगह होती है। उनके हृदय में परमेश्वर का ज्ञान जितना विशाल होता है उनके हृदय में परमेश्वर की हैसियत उतनी ही बड़ी होती है। यदि जिस परमेश्वर को तुम जानते हो वह खोखला और अस्पष्ट है, तो जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो वह भी खोखला और अस्पष्ट होगा। जिस परमेश्वर को तुम जानते हो वह तुम्हारी स्वयं की व्यक्तिगत ज़िंदगी के दायरे तक ही सीमित है, और उसका सच्चे परमेश्वर स्वयं से कुछ लेना-देना नहीं है। इस तरह, परमेश्वर के व्यावहारिक कार्यों को जानना, परमेश्वर की वास्तविकता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता को जानना, परमेश्वर स्वयं की सच्ची पहचान को जानना, जो उसके पास है और जो वह है उसे जानना, सभी सृजित चीज़ों के बीच प्रदर्शित उसके कार्य-कलाप को जानना—ये चीजें हर उस व्यक्ति के लिए अति महत्वपूर्ण हैं जो परमेश्वर को जानने की कोशिश में लगा है। इनका सीधा संबंध इस बात से है कि लोग सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं। यदि तुम परमेश्वर के विषय में अपनी समझ को केवल शब्दों तक ही सीमित रखते हो, यदि तुम इसे अपने छोटे-छोटे अनुभवों, परमेश्वर के अनुग्रह के बारे में अपनी समझ तक, या परमेश्वर के लिए अपनी छोटी-छोटी गवाहियों तक ही सीमित रखते हो, तब मैं कहता हूँ कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो वह सच्चा परमेश्वर स्वयं बिलकुल नहीं है। इतना ही नहीं, यह भी कहा जा सकता है कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो वह एक काल्पनिक परमेश्वर है, न कि सच्चा परमेश्वर। क्योंकि सच्चा परमेश्वर हर चीज़ पर शासन करता है, जो हर चीज़ के मध्य चलता है, और हर चीज़ का प्रबंध करता है। सारी मानवजाति और सारी चीजों की नियति उसकी मुट्ठी में है। जिस परमेश्वर के बारे में मैं बात कर रहा हूँ उसके कार्य और कृत्‍य, मात्र लोगों के एक छोटे से भाग तक ही सीमित नहीं हैं। अर्थात्, वे केवल उन लोगों तक ही सीमित नहीं हैं जो वर्तमान में उसका अनुसरण करते हैं। उसके कर्म सभी चीज़ों में, सभी चीज़ों के अस्तित्व में, और सभी वस्तुओं के परिवर्तन के नियमों में नज़र आते हैं।

यदि तुम परमेश्वर द्वारा रची गयी सभी चीज़ों में परमेश्वर के किसी भी कर्म की पहचान नहीं कर सकते, तो तुम उसके किसी भी कर्म की गवाही नहीं दे सकते। यदि तुम परमेश्वर के लिए कोई गवाही नहीं दे सकते, यदि तुम निरन्तर उस छोटे तथाकथित परमेश्वर की बात करते रहे जिसे तुम जानते हो, वह परमेश्वर जो तुम्हारे स्वयं के विचारों तक ही सीमित है, और तुम्हारे मस्तिष्क के संकीर्ण दायरे में रहता है, यदि तुम उसी किस्म के परमेश्वर के बारे में बोलते रहे, तो परमेश्वर कभी तुम्हारी आस्था की प्रशंसा नहीं करेगा। जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, और यदि तुम ऐसा सिर्फ इस संदर्भ में करते हो कि तुम परमेश्वर के अनुग्रह का कितना आनन्द लेते हो, परमेश्वर के अनुशासन और उसकी ताड़ना को कैसे स्वीकार करते हो, और उसके लिए अपनी गवाही में उसके आशीषों का आनन्द कैसे लेते हो, तो यह बिलकुल ही अपर्याप्त है, और यह उसको कतई संतुष्ट नहीं कर सकता। यदि तुम परमेश्वर के लिए इस तरह गवाही देना चाहते हो जो उसकी इच्छा के अनुरूप हो, और सच्चे परमेश्वर स्वयं के लिए गवाही देना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्यों से उसके स्वरूप को समझना होगा। हर चीज़ पर उसके नियंत्रण से तुम्हें उसका अधिकार देखना चाहिये, और उस सत्य को देखना चाहिये कि कैसे वह समस्त मानवजाति का पालन-पोषण करता है। यदि तुम केवल यह स्वीकार करते हो कि तुम्हारा दैनिक भोजन और पेय और जीवन की तुम्हारी ज़रूरत की चीज़ें परमेश्वर से आती हैं, लेकिन तुम उस सत्य को नहीं देख पाते कि परमेश्वर अपनी रचना की सभी चीज़ों के माध्यम से संपूर्ण मानवजाति का संपोषण करता है, कि सभी चीज़ों पर अपने शासन के माध्यम से, वह संपूर्ण मानवजाति की अगुवाई करता है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाही देने में कभी भी सक्षम नहीं होगे। यह सब कहने का मेरा क्या उद्देश्य है? उद्देश्य यह है कि तुम सब इसे हल्के में न लो, कि तुम ऐसा न समझो कि ये विषय जिनके बारे में मैंने बात की है, वे जीवन में तुम लोगों के व्यक्तिगत प्रवेश से असंबद्ध हैं, कि तुम लोग इन विषयों को मात्र एक प्रकार के ज्ञान या सिद्धांत के रूप में न लो। यदि मैं जो कह रहा हूँ उसे तुम उस तरह के रवैये से सुनते हो, तो तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। तुम लोग परमेश्वर को जानने के इस महान अवसर को खो दोगे।

इन सब चीज़ों के बारे में बात करने के पीछे मेरा लक्ष्य क्या है? मेरा लक्ष्य है कि लोग परमेश्वर को जानें, और लोग परमेश्वर के व्यावहारिक कार्यों को समझें। जब एक बार तुम परमेश्वर को समझ जाते हो और उसके कार्यों को जान जाते हो, केवल तभी तुम्हारे पास उसे जानने का अवसर या संभावना होती है। उदाहरण के लिए, यदि तुम किसी व्यक्ति को समझना चाहते हो, तो तुम उसे कैसे समझोगे? क्या उसके बाहरी रूप को देखकर उसे समझोगे? क्या वह जो पहनता है और जैसे तैयार होता है, यह देखकर उसे समझोगे? या उसके चलने के ढंग से समझोगे? क्या यह उसके ज्ञान के दायरे को देखकर समझोगे? (नहीं।) तो तुम किसी व्यक्ति को कैसे समझते हो? तुम उस व्यक्ति का आकलन उसकी बातचीत उसके व्‍यवहार, उसके विचार, वह स्वयं के बारे में जो कुछ व्यक्त और प्रकट करता है, उसके आधार पर करते हो। इस तरह से तुम किसी व्यक्ति को जानते हो, समझते हो। उसी प्रकार, यदि तुम लोग परमेश्वर को जानना चाहते हो, यदि तुम उसके व्यावहारिक पक्ष, उसके सच्चे पक्ष को समझना चाहते हो, तो तुम्हें उसे, उसके कर्मों से और उसके हर एक व्यावहारिक कृत्य के माध्यम से जानना होगा। यह सबसे अच्छा तरीका है, और यही एकमात्र तरीका है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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