परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 182

परमेश्वर ने सभी चीज़ों की रचना की और उनके लिए सीमाएँ निर्धारित कीं; उनके मध्य उसने सभी प्रकार के जीवित प्राणियों का पालन-पोषण किया। इसी दौरान उसने मनुष्यों के जीवित रहने के लिए विभिन्न साधन भी तैयार किए, अतः तुम देख सकते हो कि मनुष्यों के पास जीवित रहने के लिये बस एक तरीका नहीं है, न ही उनके पास जीवित रहने के लिए एक ही प्रकार का वातावरण है। हमने पहले परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों के लिए विभिन्न प्रकार के आहार और जल स्रोतों को तैयार करने के विषय में बात की थी, ये चीज़ें मानवजाति के जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण हैं। बहरहाल, इस मानवजाति के सभी लोग अनाज पर ही नहीं जीते। भौगोलिक वातावरण और भूभागों की भिन्नताओं के कारण लोगों के पास ज़िन्दा रहने के लिए अलग-अलग साधन हैं। ज़िन्दा रहने के इन सभी साधनों को परमेश्वर ने तैयार किया है। अतः सभी मनुष्य मुख्य तौर पर खेती में नहीं लगे हुए हैं। अर्थात्, सभी लोग फसल पैदा कर अपना भोजन प्राप्त नहीं करते हैं। यह तीसरा भाग है जिसके बारे में हम बात करने जा रहे हैं : मानवजाति की विभिन्न जीवनशैलियों के कारण सीमाएँ विकसित हुई हैं। तो मनुष्यों के पास और कौन-कौन से प्रकार की जीवनशैलियां हैं? भोजन के विभिन्न स्रोतों के आधार पर और कौन से प्रकार के लोग हैं? कई प्राथमिक प्रकार हैं।

पहला है शिकारी जीवनशैली। इसके बारे में हर कोई जानता है। जो लोग शिकार करके ज़िन्दा रहते हैं वे क्या खाते हैं? (गेम।) वे जंगल के पशु-पक्षियों को खाते हैं। "गेम" या शिकार एक आधुनिक शब्द है। शिकारी इसे शिकार के रूप में नहीं देखते; वे इसे भोजन के रूप में, और अपने दैनिक जीवन आहार के रूप में देखते हैं। उदाहरण के लिए, मानो उन्हें एक हिरण मिल जाता है। उनके लिये हिरण का मिलना बिलकुल वैसा ही है जैसे किसी किसान को मिट्टी से फसलें मिल जाती हैं। एक किसान मिट्टी से फसल प्राप्त करता है, और जब वह अपनी फसल को देखता है, तो वह खुश होता है और सुकून महसूस करता है। खाने के लिए अनाज के होने से परिवार भूखा नहीं होगा। उसका हृदय सुकून और सन्तुष्टि महसूस करता है। एक शिकारी भी अपनी पकड़ में आए शिकार को देखकर सुकून और संतुष्टि का एहसास करता है, क्योंकि उसे भोजन के विषय में अब कोई चिन्ता नहीं करनी है। अगली बार के भोजन के लिए कुछ तो है, भूखे रहने की ज़रूरत नहीं है। यह ऐसा व्यक्ति है जो जीवन-यापन के लिए शिकार करता है। शिकार पर निर्भर रहने वाले अधिकांश लोग पहाड़ी जंगलों में रहते हैं। वे खेती नहीं करते। वहाँ कृषि योग्य भूमि पाना आसान नहीं है, अतः वे विभिन्न प्रकार के जीवों और शिकार पर ज़िन्दा रहते हैं। यह पहली प्रकार की जीवनशैली है जो सामान्य लोगों से अलग है।

दूसरे प्रकार की जीवनशैली चरवाही है। जो लोग जीविका के लिए मवेशी चराते हैं, क्या वे खेती भी करते हैं? (नहीं।) तो वे क्या करते हैं? वे कैसे जीते हैं? (अधिकांशतः, वे जीवन-यापन के लिए मवेशियों और भेड़ों के झुण्ड चराते हैं, और शीत ऋतु में वे अपने पालतू पशुओं को मारकर खाते हैं। उनका प्रमुख भोजन गाय और भेड़ का मांस होता है, और वे दूध की चाय पीते हैं। यद्यपि चरवाहे, चारों ऋतुओं में व्यस्त रहते हैं, वे अच्छी तरह खाते हैं। उनके पास प्रचुर मात्रा में दूध, दुग्ध-उत्पाद और मांस होता है।) जो लोग जीवन-यापन के लिए पशु चराते हैं वे मुख्य रूप से बीफ और मटन खाते हैं, भेड़ और गाय का दूध पीते हैं, और हवा में लहराते बालों और धूप में चमचमाते चेहरों के साथ खेतों में अपने पशुओं को चराते हुए गाय-बैलों और घोड़ों की सवारी करते हैं। उनके जीवन में आधुनिक जीवन का कोई तनाव नहीं होता। पूरे दिन वे नीले आसमान और घास के मैदानों के व्यापक विस्तार को निहारते हैं। मवेशी चराने वाले लोग घास के मैदानों में रहते हैं और वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी खानाबदोश जीवनशैली को बरकरार रख पाये हैं। हालांकि घास के मैदानों पर जीवन थोड़ा एकाकी होता है, फिर भी यह एक बहुत खुशहाल जीवन है। यह कोई बुरी जीवनशैली नहीं है!

तीसरे प्रकार की जीवनशैली मछली पकड़ने की है। मनुष्यों का एक छोटा-सा समूह ऐसा भी है जो महासागर के समीप या छोटे द्वीपों पर रहता है। वे चारों ओर पानी से घिरे हुए हैं, समुद्र के सामने हैं। ये लोग आजीविका के लिए मछली पकड़ते हैं। जो लोग जीविका के लिए मछली पकड़ते हैं, उनके भोजन का स्रोत क्या है? उनके भोजन के स्रोतों में सब प्रकार की मछलियाँ, समुद्री भोजन, और समुद्र के अन्य उत्पाद शामिल हैं। जो लोग जीविका के लिए मछली पकड़ते हैं वे जमीन में खेती-बाड़ी नहीं करते, बल्कि इसके बजाय हर दिन मछली पकड़ने में बिताते हैं। उनके प्रमुख भोजन में विभिन्न प्रकार की मछलियां और समुद्र के उत्पाद शामिल हैं। वे कभी-कभार चावल, आटा और दैनिक ज़रूरतों के लिए इन चीज़ों का व्यापार करते हैं। यह उन लोगों की एक अलग प्रकार की जीवनशैली है, जो पानी के समीप रहते हैं। जो लोग पानी के समीप रहते हैं वे अपने आहार के लिये पानी पर निर्भर रहते हैं और मछली उनकी जीविका होती है। मछली पकड़ना उनके भोजन का स्रोत ही नहीं, बल्कि उनकी जीविका का भी स्रोत है।

जीविका के लिए खेती-बाड़ी के अलावा, मानवजाति मुख्य रूप से तीन अलग-अलग जीवनशैलियों पर निर्भर है, जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है। मवेशी चराने, मछली पकड़ने, और शिकार से जीवन निर्वाह करने वाले केवल कुछ समूहों को छोड़कर, अधिकतर लोग जीविका के लिए खेती-बाड़ी करते हैं। और ऐसे लोग जो जीविका के लिए खेती-बाड़ी करते हैं, उन्हें किस चीज की आवश्यकता है? उन्हें खेत की आवश्यकता है। ऐसे लोग जीविका के लिये पीढ़ियों से फसल उगाते रहे हैं। चाहे वे सब्‍ज़ियाँ, फल या अनाज उगाएँ, किन्तु वे सभी पृथ्वी से भोजन और अपनी दैनिक ज़रुरतों को प्राप्त करते हैं।

इन अलग-अलग मानवीय जीवनशैलियों से जुड़ी मूल शर्तें क्या हैं? जिस वातावरण ने उनका जीवित रहना संभव बनाया है, क्या उसे मूलभूत रूप से संरक्षित करने की आवश्यकता नहीं है? अर्थात, यदि शिकार के भरोसे रहने वालों को पहाड़ी जंगलों या पशु-पक्षियों को खोना पड़े, तो उनकी जीविका का स्रोत ख़त्म हो जाएगा। इस जाति और प्रकार के लोग किस दिशा में जाएँगे, यह अनिश्चित हो जाएगा और वे लुप्त भी हो सकते हैं। और ऐसे लोग जो अपनी जीविका के लिए मवेशी चराते हैं, वे किस चीज पर आश्रित हैं? वास्तव में वे जिस पर निर्भर हैं वह उनके पालतू पशुओं का झुण्ड नहीं है, बल्कि वह वातावरण है, जिसमें उनके पालतू पशुओं का झुण्ड जीवित रहता है—घास के मैदान। यदि कहीं कोई घास के मैदान नहीं होते, तो वे अपने पालतू पशुओं के झुण्ड को कहाँ चराते? मवेशी और भेड़ क्या खाते? पालतू पशुओं के झुण्ड के बिना, इन खानाबदोश लोगों के पास कोई जीविका नहीं होती। अपनी जीविका के स्रोत के बिना, ऐसे लोग कहाँ जाते? उनके लिए ज़िन्दा रहना बहुत ही कठिन हो जाता; उनके पास कोई भविष्य नहीं होता। अगर पानी के स्रोत नहीं होते, और नदियां और झीलें सूख जातीं, तो क्या वे सभी मछलियां, जो अपनी जिंदगी के लिए पानी पर निर्भर हैं, तब भी जीवित रहतीं? वे मछलियां जीवित नहीं रहतीं। वे लोग जो अपनी जीविका के लिए उस जल और उन मछलियों पर आश्रित हैं, क्या वे जीवित रह पाते? यदि उनके पास भोजन नही होता, यदि उनके पास अपनी जीविका का स्रोत नहीं होता, तो क्या वे लोग जीवित रह पाते? यदि उनकी जीविका या उनके जीवित रहने में कोई समस्या आती है, तो वे जातियाँ आगे अपना वंश नहीं चला पातीं। वे लुप्त हो सकती थीं, पृथ्वी से मिट गई होतीं। और जो लोग अपनी जीविका के लिए खेती-बाड़ी करते हैं यदि वे अपनी भूमि खो देते, फसलें नहीं उगा पाते, और विभिन्न पेड़-पौधों से अपना भोजन प्राप्त नहीं कर पाते तो इसका परिणाम क्या होता? भोजन के बिना, क्या लोग भूख से मर नहीं जाते? यदि लोग भूख से मर रहे हों, तो क्या मानवजाति की उस नस्ल का सफाया नहीं हो जाएगा? अतः विभिन्न वातावरण को बनाए रखने के पीछे यही परमेश्वर का उद्देश्य है। विभिन्न वातावरण और पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने, और प्रत्येक वातावरण के अंतर्गत विभिन्न जीवित प्राणियों को बनाए रखने में परमेश्वर का सिर्फ एक ही उद्देश्य है—और वह है हर तरह के लोगों का पालन-पोषण करना, विभिन्न भौगोलिक वातावरण में जीने वाले लोगों का पालन-पोषण करना।

यदि सृष्टि की सभी चीज़ें अपने नियमों को गँवा दें, तो उनका अस्तित्व न रहे; यदि सभी चीज़ों के नियम लुप्त हो जाएँ, तो सभी चीज़ों के बीच जीवित प्राणी क़ायम नहीं रह पाएँगे। मनुष्यजाति अपने उस वातावरण को भी गँवा देगी जिस पर वह जीवित रहने के लिए निर्भर है। यदि मनुष्य वह सब कुछ गँवा देता, तो वह आगे जीवित नहीं रह पाएगा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंश-वृद्धि नहीं कर पाएगा। मनुष्य आज तक ज़िन्दा बचा हुआ है तो उसका कारण है कि परमेश्वर ने मनुष्य का पोषण करने और, विभिन्न तरीकों से मानवजाति का पोषण करने के लिए उन्हें सृष्टि की सभी चीज़ें प्रदान की हैं। चूँकि परमेश्वर विभिन्न तरीकों से मानवजाति का पालन-पोषण करता है, इसीलिये वह आज तक, जीवित बची हुई है। जीवित रहने के ऐसे अनुकूल और स्वाभाविक नियमों से सुव्यवस्थित वातावरण के साथ में पृथ्वी पर सभी प्रकार के लोग, और सभी प्रकार की नस्लें अपने निर्दिष्ट दायरों के भीतर जीवित रह सकती हैं। कोई भी इन दायरों या इन सीमाओं से बाहर नहीं जा सकता है क्योंकि परमेश्वर ने सबकी सीमा-रेखाएँ खींच दी हैं। परमेश्वर ने सीमा-रेखाओं को इस तरह क्यों खींचा? यह सचमुच पूरी मानवजाति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है—सचमुच बेहद महत्वपूर्ण!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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