परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII" | अंश 175

क्या अब तुम लोग परमेश्वर एवं मानवजाति के बीच के बड़े अन्तर का आभास करते हो? सभी चीज़ों का स्वामी कौन है? क्या मनुष्य है? (नहीं।) तो क्या तुम लोग जानते हो कि जिस प्रकार परमेश्वर और मनुष्य सभी चीज़ों के साथ व्यवहार करते हैं उनके बीच क्या अन्तर है? (परमेश्वर सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है और सभी चीज़ों का बंदोबस्त करता है, जबकि मनुष्य उन सबका आनन्द उठाता है।) क्या तुम लोग उन वचनों से सहमत हो? (हाँ।) परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में सबसे बड़ा अन्तर है कि परमेश्वर सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है और सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है। परमेश्वर प्रत्येक चीज़ का स्रोत है, और मानवजाति सभी चीज़ों का आनन्द उठाता है जबकि परमेश्वर उनकी आपूर्ति करता है। दूसरे शब्दों में, मानवजाति तब सभी चीज़ों का आनन्द उठाता है जब वह उस जीवन का स्वीकार कर लेता है जिसे परमेश्वर सभी चीज़ों को प्रदान करता है। मानवजाति परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि के परिणामों का आनन्द उठाता है, जबकि परमेश्वर स्वामी है। सही है? तो सभी चीज़ों के दृष्टिकोण से, परमेश्वर और मानवजाति के बीच क्या अन्तर है? परमेश्वर सभी चीज़ों की बढ़ौतरी के श्रेणियों को साफ साफ देख सकता है, और सभी चीज़ों की बढ़ौतरी के नमूनों को नियन्त्रित करता है और उन पर शासन करता है। अर्थात्, सभी चीज़ें परमेश्वर की दृष्टि में हैं और उसके निरीक्षण के दायरे के भीतर हैं। क्या मानवजाति सभी चीज़ों को देख सकता है? (नहीं।) जो मानवजाति देखता है वह सीमित है। तुम नहीं कह सकते हो कि "सभी चीज़ें"—वे ही हैं जिन्हें वे अपनी आँखों के सामने देखते हैं। यदि तुम इस पर्वत पर चढ़ते हो, तो जो तुम देखते हो वह यह पर्वत है। पर्वत के उस पार क्या है तुम उसे नहीं देख सकते गो। यदि तुम समुद्र के किनारे जाते हो, तो तुम महासागर के इस भाग को देखते हो, परन्तु तुम नहीं जानते हो कि महासागर का दूसरा भाग किसके समान है। यदि तुम इस जंगल में आते हो, तो तुम उन पेड़ पौधों को देख सकते हो जो तुम्हारी आँखों के सामने और तुम्हारे चारों ओर हैं, किन्तु जो कुछ और आगे है उसे तुम नहीं देख सकते हो। मनुष्य उन स्थानों को नहीं देख सकते हैं जो अधिक ऊँचे, अधिक दूर और अधिक गहरे हैं। वे वह सब कुछ जो उनकी आँखों के सामने हैं और उनकी दृष्टि के भीतर है उन्हें ही देख सकते हैं। यद्यपि मनुष्य एक वर्ष की चार ऋतुओं के श्रेणियों और सभी चीज़ों की बढ़ौतरी के श्रेणियों को जानता है, फिर भी वे सभी चीज़ों का प्रबन्ध करने या उन पर शासन करने में असमर्थ है। दूसरे रूप में, जिस तरह से परमेश्वर सभी चीज़ों को देखता है वह ऐसा है जैसे परमेश्वर एक मशीन को देखता है जिसे उसने व्यक्तिगत रीति से बनाया है। वह हर एक तत्व को बहुत ही अच्छी रीति से जानता है। उसके सिद्धांत क्या हैं, उसके नमूने क्या हैं, और उसका उद्देश्य क्या है—परमेश्वर इन सभी चीज़ों को सरलता एवं स्पष्टता से जानता है। इस प्रकार परमेश्वर परमेश्वर है, और मनुष्य मनुष्य है! भले ही मनुष्य लगातार विज्ञान एवं सभी चीज़ों के नियमों पर अनुसन्धान करता रहे, फिर भी यह एक सीमित दायरे में होता है, जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों को नियन्त्रित करता है। मनुष्य के लिए, यह असीमित है। यदि मनुष्य किसी छोटी सी चीज़ पर अनुसन्धान करता है जिसे परमेश्वर ने किया था, तो वे उस पर अनुसन्धान करते हुए बिना किसी सच्चे परिणाम को हासिल किए अपने पूरे जीवन को बिता सकते हैं। इसीलिए यदि तुम ज्ञान का इस्तेमाल करते हो और परमेश्वर का अध्ययन करने के लिए जो कुछ भी तुमने सीखा है उसे इस्तेमाल करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर को जानने या समझने के योग्य नहीं होगे। किन्तु यदि तुम सत्य के मार्ग का उपयोग करते हो और परमेश्वर को खोजते हो, और परमेश्वर को जानने के दृष्टिकोण से परमेश्वर की ओर देखते हो, तो एक दिन तुम स्वीकर करोगे कि परमेश्वर के कार्य और उसकी बुद्धि हर जगह है, और तुम यह भी जानोगे कि क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का स्वामी और सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत कहा जाता है। तुम्हारे पास जितना अधिक ऐसा ज्ञान होगा, तुम उतना ही अधिक समझोगे कि क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का स्वामी कहा जाता है। सभी चीज़ें एवं प्रत्येक चीज़, जिसमें तुम भी शामिल हो, निरन्तर परमेश्वर की आपूर्ति के नियमित बहाव को प्राप्त कर रहे हैं। तुम भी स्पष्ट रूप से आभास कर सकोगे कि इस संसार में, और इस मानवजाति के बीच में, परमेश्वर के अलावा कोई नहीं है जिसके पास सभी चीज़ों के अस्तित्व के ऊपर शासन करने, उसका प्रबन्ध करने, और उसको बरकरार रखने के लिए ऐसी सामर्थ और ऐसा सार तत्व हो सकता है। जब तुम ऐसी समझ प्राप्त कर लेते हो, तब तुम सचमुच में स्वीकार करते हो कि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर है। जब तुम इस बिन्दु तक पहुँच जाते हो, तब तुमने सचमुच में परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है और तुमने उसे अपना परमेश्वर एवं अपना स्वामी बनने की अनुमति दी है। जब तुम्हारे पास ऐसी समझ होती है और तुम्हारा जीवन एक ऐसे बिन्दु पर पहुँच जाता है, तो परमेश्वर आगे से तुम्हारी परीक्षा नहीं लेगा और तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, और न ही वह तुमसे कोई माँग करेगा, क्योंकि तुम परमेश्वर को समझते हो, उसके हृदय को जानते हो और तुमने सचमुच में परमेश्वर के हृदय को स्वीकार कर लिया है। सभी चीज़ों पर परमेश्वर के शासन और प्रबंधन के विषय में इन शीर्षकों पर बातचीत करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारण है। यह लोगों को और अधिक ज्ञान एवं समझ देने के लिए है; मात्र तुमसे स्वीकार करवाने के लिए नहीं, लेकिन तुम्हें परमेश्वर के कार्यों का और अधिक व्यावहारिक ज्ञान एवं समझ देने के लिए है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर है सभी चीज़ों का शासक

I

जब मानव परमेश्वर द्वारा हर चीज़ को दिये जीवन को स्वीकारता है, वो उनका आनंद लेता है। परमेश्वर की रचना के अंजाम का आनंद लेता है मानव, जबकि परमेश्वर मालिक है। परमेश्वर साफ़ देख सकता है हर चीज़ के विकास के स्वरूप को, और करता है उस पर शासन और नियंत्रण। परमेश्वर हर चीज़ का शासक है। परमेश्वर हर चीज़ का शासक है। परमेश्वर हर चीज़ का उद्गम है। परमेश्वर हर चीज़ का शासक है। परमेश्वर हर चीज़ का प्रदायक है। परमेश्वर हर चीज़ का प्रदायक है, जबकि मानव हर चीज़ का आनंद लेता है। यही है सबसे बड़ा फ़र्क मानव और परमेश्वर के बीच।

II

हर चीज़ है परमेश्वर की नज़रों में और उसके मुआयने के दायरे में। जो भी है मानव की नज़रों के सामने, केवल वही मानव देख सकता है। जो मानव देखता है वो सीमित है, वो नहीं देख सकता है सब कुछ, वो नहीं देख सकता है दूर के और गहरे मक़ामों को।

III

मानव हर चीज़ का प्रबंधन या उन पर शासन नहीं कर सकता, हालांकि वो समझता है ऋतुओं के स्वरूप को, चीज़ों के विकास को। मगर परमेश्वर है देखता हर चीज़ को अपने बनाए हुए यंत्रों की तरह, हर एक हिस्से और उसके स्वरूप को वो साफ़ जानता है।

परमेश्वर है परमेश्वर और मानव है मानव। भले ही करे मानव विज्ञान और चीज़ों के नियमों का अध्ययन, पर सीमित है मानव की खोज। मगर असीम है वो सब परमेश्वर करता है जिनका नियन्त्रण। परमेश्वर है परमेश्वर और मानव है मानव। कोई छोटा-सा कार्य जिसे परमेश्वर ने किया है, मानव उसे ज़िन्दगी भर ढूंढ सकता है पर उसे कभी भी न समझ पाएगा। परमेश्वर हर चीज़ का शासक है। परमेश्वर हर चीज़ का शासक है। परमेश्वर हर चीज़ का उद्गम है। परमेश्वर हर चीज़ का शासक है। परमेश्वर हर चीज़ का प्रदायक है। परमेश्वर हर चीज़ का प्रदायक है, जबकि मानव हर चीज़ का आनंद लेता है। यही है सबसे बड़ा फ़र्क मानव और परमेश्वर के बीच।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

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