परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII" | अंश 172

(3) आवाज़

तीसरी चीज़ है आवाज़। साथ ही यह कुछ ऐसा भी है जिसे मनुष्यों के लिए एक सामान्य सजीव वातावरण में होना चाहिए। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी तब आवाज़ अस्तित्व में आया था। उस समय परमेश्वर उससे बहुत अच्छी तरह से निपटा। यह कुछ ऐसा है जो परमेश्वर के लिए और मानवजाति के जीवित रहने के लिए भी अति महत्वपूर्ण है। यदि परमेश्वर ने आवाज़ के मसले को अच्छे से संभाला न होता, तो यह मानवजति के जीवित रहने के लिए एक बहुत बड़ी बाधा बन जाता। दूसरे शब्दों में यह कि इसका मनुष्य के शरीर एवं उसके जीवन पर बहुत जरूरी प्रभाव पड़ता, इस हद तक कि मानवजाति ऐसे वातावरण में जीवित रहने के काबिल नहीं होता। ऐसा भी कहा जा सकता है कि सभी जीवित प्राणी ऐसे वातावरण में जीवित नहीं रह सकते हैं। अतः यह चीज़ क्या है? यह आवाज़ है। परमेश्वर ने हर एक चीज़ को बनाया है, और हर एक चीज़ परमेश्वर के हाथों में जीवित रहता है। परमेश्वर की निगाहों में, सभी चीज़ें गतिमान एवं जीवित हैं। परमेश्वर ने सभी चीज़ों को बनाया है, और उनमें से हर एक के अस्तित्व का मूल्य एवं अर्थ है। अर्थात्, उन सभी की उनके अस्तित्व के पीछे एक जरूरत है। फिर भी, परमेश्वर के द्वारा बनाई गई सभी चीज़ों के मध्य, प्रत्येक चीज़ के पास एक जीवन है; चूँकि वे सभी जीवित एवं गतिमान हैं, वे स्वभाविक रीति से आवाज़ उत्पन्न करेंगे। उदाहरण के लिए, पृथ्वी लगातार घूम रही है, सूर्य निरन्तर घूम रहा है, और चाँद भी लगातार घूम रहा है। सभी चीज़ों के जीवन एवं उनकी गति में निरन्तर आवाज़ उत्पन्न हो रहा है। पृथ्वी की चीज़ें भी निरन्तर आगे बढ़ रही हैं और विकसित हो रही हैं और गतिमान हैं। उदाहरण के लिए, पहाड़ों के आधार खिसक रहे हैं और बदल रहे हैं, जबकि समुद्र की गहराईयों में सभी जीवित चीज़ें गतिमान हैं और तैर रही हैं। परमेश्वर की निगाहों में ये जीवित चीज़ें एवं सभी चीज़ें लगातार, सामान्य रूप से और नियमित रूप से गतिमान हैं। अतः इन चीज़ों की छलयुक्त बढ़ौतरी और विकास और गति क्या लेकर आती है? शक्तिशाली आवाज़ों को। पृथ्वी के अलावा भी, सभी प्रकार के ग्रह लगातार गतिमान हैं, और इन ग्रहों पर जीवित प्राणी एवं जीवाश्म भी निरन्तर बढ़ रहे हैं, और विकसित हो रहे हैं एवं गतिमान हैं। अर्थात्, सभी चीज़ें जिनमें जीवन है और जिनमें जीवन नहीं है वे परमेश्वर की निगाहों में निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं, और जब सभी प्रकार की चीज़ें गतिमान होती हैं तो उस समय वे आवाज़ भी उत्पन्न करते हैं। परमेश्वर ने इन आवाज़ों का भी बन्दोबस्त किया है। क्यों? तुम लोगों को यह जानना चाहिए, सही है? जब तू एक हवाई जहाज़ के करीब जाता है, तो हवाई जहाज़ की गरजती हुई आवाज़ तेरे साथ क्या करती है? (कान बहरे हो जाएँगे।) क्या यह लोगों की सुनने की शक्ति को नुकसान पहुँचाएगी? क्या उनका हृदय उस आवाज़ का सामना कर पाएगा? (नहीं।) कुछ लोग जिनके पास कमज़ोर हृदय है वे उसे सहन नहीं कर सकेंगे। हाँ वास्तव में, जिनके पास मज़बूत हृदय है वे भी इसे सहन नहीं कर पाएँगे यदि यह काफी देर तक होता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के शरीर पर आवाज़ का असर, चाहे वह कानों पर हो या हृदय पर, हर एक व्यक्ति के लिए बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण है, और ऐसी आवाजें जो बहुत ही ऊँची हैं वे लोगों को नुकसान पहुँचाएँगी। इसलिए, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की और उसके बाद जब उन्होंने सामान्य रीति से कार्य करना शुरू कर दिया, तब परमेश्वर ने इन आवाज़ों को—सभी गतिमान चीज़ों की आवाजें—उचित उपचार के जरिए स्थापित किया। यह एक जरूरी विचार भी है जो परमेश्वर के पास था जब वह मनुष्य के लिए एक वातावरण बना रहा था।

सबसे पहले, पृथ्वी की सतह से वायुमण्डल की ऊँचाई आवाज़ों को दूर करेगी और रोकेगी। साथ ही, भूमि के बीच अन्तर का आकार, अर्थात्, मिट्टी में खालीपन का आकार, वे भी आवाज़ को कुशलता से सँभालेंगी और प्रभावित करेंगी। फिर वहाँ विभिन्न भौगोलिक वातावरणों में नदियों का संगम है, वो भी आवाज़ को प्रभावित करते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर कुछ आवाज़ों से छुटकारा पाने के लिए कुछ निश्चित पद्धतियों का इस्तेमाल करता है, ताकि मनुष्य एक ऐसे वातावरण में ज़िन्दा रह सकें जिसमें उनके कान सुन सकें और सह सकें। अन्यथा आवाज़ मानवजाति के जीवित रहने में एक बड़ी रूकावट लाएँगे, और यह उनके जीवनों में एक बड़ी परेशानी पैदा करेंगे। यह एक बड़ी समस्या है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने भूमि, वायुमण्डल और विभिन्न प्रकार की भौगोलिक वातावरण को बनाते समय बहुत ध्यान रखा। इन सभी चीज़ों में परमेश्वर की बुद्धि निहित है। इसके विषय में मानवजाति की समझ को बहुत अधिक विस्तृत होने की आवश्यकता नहीं है। उनको बस यह जानने की आवश्यकता है कि इसमें परमेश्वर का कार्य शामिल है। परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि वास्तव में मानवजाति के जीवित रहने के लिए था। अब तुम लोग मुझे बताओ, क्या आवाज़ का कुशलता से उपयोग करने के लिए परमेश्वर का कार्य जरूरी था? क्या तुम लोग परमेश्वर के द्वारा यह करने की आवश्यकता को महसूस नहीं कर सकते हो? वह कार्य जो परमेश्वर ने किया था वह उचित रीति से आवाज़ का कुशलतापूर्वक उपयोग था। उसने ऐसा मानवजाति के सजीव वातावरण और उनके सामान्य जीवनों को बरकरार रखने के लिए किया था। क्या यह कार्य जरूरी था? (हाँ।) यदि यह कार्य जरूरी था, तो इस दृष्टिकोण से, क्या ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर ने सभी चीज़ों की आपूर्ति के लिए ऐसी पद्धति का उपयोग किया था। परमेश्वर ने मानवजाति को एक शांत वातावरण प्रदान किया था और एक ऐसा शांत वातावरण बनाया गया था, ताकि मानवजाति का शरीर एक ऐसे वातावरण में बिल्कुल सामान्य रीति से रह सके, और जिससे मानवजाति के जीवन में कोई दखल न हो और वह अस्तित्व में बना रहे और सामान्य रूप से जीवन बिताए। क्या यह एक तरीका नहीं है जिसके तहत परमेश्वर मनुष्यों के लिए आपूर्ति करता है? (हाँ।) क्या यह कार्य जो परमेश्वर ने किया अति महत्वपूर्ण था? (हाँ।) यह बहुत जरूरी था। अतः तुम लोग इसकी तारीफ कैसे करते हो? भले ही तुम लोग महसूस नहीं कर सकते हो कि यह परमेश्वर का कार्य था, और न ही तुम लोग जान सकते हो कि उस समय परमेश्वर ने इसे कैसे किया था, क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर के द्वारा इस कार्य को करने की आवश्यकता को महसूस कर सकते हो? क्या तुम लोग परमेश्वर की बुद्धिमत्ता या उस देखरेख और विचार का एहसास कर सकते हो जिन्हें वह इसमें डालता है? (हाँ।) बस उसे महसूस करने के योग्य होना ही काफी है। यह पर्याप्त है। बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें परमेश्वर ने सभी चीज़ों के मध्य किया है जिन्हें लोग महसूस नहीं कर सकते हैं और उनके लिए इन्हें देखना कठिन है। मेरे द्वारा यहाँ इसका जिक्र करने का उद्देश्य है कि बस तुम लोगों को परमेश्वर के कार्यों के बारे में जानकारी दूँ और इस प्रकार तुम लोग परमेश्वर को जान सको। ये संकेत तुम लोगों को परमेश्वर के कार्यों को बेहतर ढंग से जानने एवं समझने देते हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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