परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII" | अंश 167

कहानी 1. एक बीज, पृथ्वी, एक पेड़, धूप, गानेवाली चिड़िया, एवं मनुष्य

एक छोटा सा बीज पृथ्वी पर गिरा। जब वहाँ भारी बारिश हुई उसके बाद, उस बीज ने एक कोमल अंकुर को प्रस्फुटित किया और इसकी जड़ों ने धीरे से मिट्टी के नीचे गहरी छानबीन की। वह अंकुर समय में, निर्दयी प्रचण्ड हवाओं एवं भारी वर्षा में, ऋतुओं के परिवर्तन को देखते हुए जब चाँद बढ़ता एवं फीका होता था उंचाई की ओर बढ़ता गया। गर्मियों में, पृथ्वी जल के उपहारों को लेकर आई ताकि अंकुर झुलसा देनेवाली गर्मी को सहन कर सके। और पृथ्वी के कारण, अंकुर ने गर्मी को महसूस नहीं किया और इस प्रकार वह गर्मियों की तपन में जीवित बच गया। जब जाड़ा आया, तो पृथ्वी ने उस अंकुर को अपने गर्म आलिंगन में ढंप लिया और उन्होंने एक दूसरे को कसकर जकड़े रखा। और पृथ्वी की गर्माहट के कारण, अंकुर कड़कड़ाती हुई ठण्ड से जीवित बच गया, और उस मौसम के शीतकालीन तूफानों एवं बर्फबारी से होकर बिना किसी नुकसान के गुज़र गया। पृथ्वी के द्वारा आश्रय पाकर, अंकुर बहादुरी से बढ़ा और वह खुश था। उस निःस्वार्थ पोषण से जिसे पृथ्वी ने प्रदान किया था वह अंकुर ऊँचाई की ओर बढ़ा एवं गौरवान्वित हुआ। अंकुर आनन्द से बढ़ा। जब पानी छलछलाकर नीचे गिरा तो वह गीत गाने लगा और जब हवा बही तो वह नृत्य करने और डोलने लगा। और इस प्रकार, अंकुर एवं पृथ्वी एक दूसरे पर निर्भर होते हैं...।

सालों बीत गए, और वह अंकुर अब एक गगनचुंबी वृक्ष था। उसने मोटी मोटी शाखाओं को बढ़ाया था जिनके छोर पर अनगिनत पत्तियाँ थीं और वह पृथ्वी पर मज़बूती से खड़ा था। वृक्ष की जड़ें पृथ्वी के नीचे तक धसी हुई थीं जैसे वे पहले थीं, लेकिन वे अब मिट्टी के नीचे गहराई में घुसी हुई थीं। जिसने किसी समय अंकुर की सुरक्षा की थी अब वह उस शक्तिशाली वृक्ष की नींव था।

सूर्य की एक किरण नीचे उस वृक्ष पर पड़ी और तना हिल गया। वृक्ष ने अपनी डालियाँ विस्तार से फैलाईं और रोशनी को भरपूरी से सोखा। नीचे की पृथ्वी वृक्षों के साथ सुर में सुर मिलाकर सांस लेने लगी, और पृथ्वी ने नयापन महसूस किया, और बिलकुल उसी वक्त, एक ताज़ा हवा का झोंका शाखाओं के बीच में बहा, और वृक्ष खुशी से हिल उठा, और ऊर्जा से भर गया। और इस प्रकार, वृक्ष और धूप एक दूसरे पर निर्भर होते हैं...।

लोग वृक्ष की ठण्डी छांव में बैठ गए और उन्होंने स्फूर्तिदायक एवं सुगंधित हवा का आनन्द लिया। उस हवा ने उनके दिलों एवं फेफड़ों को शुद्ध किया, और इसने भीतर के रक्त को शुद्ध किया। लोगों ने अब आगे से थका मांदा या बोझिल महसूस नहीं किया। और इस प्रकार, लोग और वृक्ष एक दूसरे पर निर्भर होते हैं...।

गानेवाली चिड़ियों का एक झुण्ड चहचहाने लगा जब वे वृक्ष की शाखाओं पर उतरे। कदाचित् वे किसी शत्रु से बच रहे थे, या वे प्रजनन कर रहे थे और अपने बच्चों का पोषण कर रहे थे, या शायद वे बस थोड़ा आराम कर रहे थे। और इस प्रकार, चिड़िया और वृक्ष एक दूसरे पर निर्भर होते हैं...।

वृक्ष की जड़ें, टेढ़ी मेढ़ी और उलझी हुई, पृथ्वी में गहरी धंस गईं। इसके तने ने हवा एवं वर्षा से पृथ्वी को आश्रय दिया था, और उसने अपनी विशाल शाखाओं को फैलाया और पृथ्वी की रक्षा की जो उसके नीचे थी, और वृक्ष ने ऐसा किया क्योंकि पृथ्वी उसकी माँ है। वे साथ में रहते हैं, एक दूसरे पर निर्भर होते हैं, और वे कभी अलग होकर नहीं रहेंगे...।

सभी चीज़ें जिस पर मैंने अभी अभी बात की है वे ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम लोगों ने पहले ही देख लिया है, बीजों के समान, तुम लोग इसके विषय में जानते हो, सही है? एक बीज जो एक वृक्ष के रूप में बढ़ जाता है वह शायद ऐसी प्रक्रिया नहीं है जिसे तुम विस्तार से देखते हो, किन्तु तुम जानते हो कि यह एक तथ्य है, सही है? (हाँ।) तुम पृथ्वी एवं सूर्य के प्रकाश के बारे में जानते हो, सही है? गाने वाली पक्षियों की तस्वीर जो वृक्ष पर बैठे हुए हैं वह ऐसी चीज़ है जिसे सभी लोगों ने देखा है, सही है? (हाँ।) और लोग वृक्ष की छाया में आराम करते हैं, क्या तुम लोगों ने उसे देखा है, सही है? (हमने उसे देखा है।) अतः तुम लोगों को क्या महसूस होता है जब तुम सभी इन समस्त उदाहरणों को एक तस्वीर में देखते हो? (सामंजस्यता।) सभी उदाहरण जो इस तस्वीर में मौजूद हैं क्या वे परमेश्वर से आए हैं? (हाँ।) चूँकि वे परमेश्वर से आते हैं, इसलिए परमेश्वर इन अनेक उदाहरणों का मूल्य एवं महत्व जानता है जो एक साथ मिलकार पृथ्वी पर मौजूद हैं। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी, उसके पास हर एक मद के लिए एक योजना थी, और हर चीज़ जिसे उसने सृजा था वह उसके इरादों को दर्शाता है और वह उन्हें जीवन से भर देता है। उसने मानवजाति के लिए जीवन्त वातावरण को सृजा था, जिसकी चर्चा इस कहानी में की गई है जिसे हमने अभी अभी सुना था। इसने उस पारस्परिक निर्भरता की चर्चा की थी जो बीज एवं पृथ्वी में है; पृथ्वी बीज का पोषण करती है और बीज पृथ्वी के प्रति बाध्य है। इन दोनों के बीच के रिश्ते को बिलकुल शुरुआत से ही परमेश्वर के द्वारा पहले से निर्धारित किया गया था, सही है? (हाँ।) इस तस्वीर में वृक्ष, धूप, गानेवाली चिड़िया एवं मनुष्य, क्या वे उस जीवन्त वातावरण के उदाहरण हैं जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए सृजा था? (हाँ।) पहला, क्या वृक्ष पृथ्वी को छोड़ सकता है? (नहीं।) क्या वृक्ष बिना धूप के रह सकता है? (नहीं।) तो वृक्ष को बनाने का परमेश्वर का क्या मकसद था, क्या हम कह सकते हैं कि यह बस पृथ्वी के लिए था? क्या हम कह सकते हैं कि यह बस गानेवाली चिड़ियों के लिए था? क्या हम कह सकते हैं कि यह बस लोगों के लिए था? (नहीं।) उनके बीच में क्या सम्बन्ध है? उनके बीच का सम्बन्ध एक प्रकार से पारस्परिक निर्भरता का है जिसके अंतर्गत उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। पृथ्वी, पेड़, धूप, गाने वाली चिड़िया और लोग अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर आश्रित होते हैं और एक दूसरे का पोषण करते हैं। वृक्ष पृथ्वी (मिट्टी) की रक्षा करता है जबकि पृथ्वी वृक्ष का पोषण करती है; धूप वृक्ष के लिए आपूर्ति करता है, जबकि वृक्ष धूप से शुद्ध हवा उत्पन्न करता है और धूप की तपन से पृथ्वी को नम होने में सहायता करता है। अन्त में इससे कौन लाभ उठता है? इससे मानवजाति लाभ उठाती है, सही है? (हाँ।) और परमेश्वर ने किस लिए मानवजाति के लिए जीवन्त वातावरण बनाया था यह इसके पीछे का एक सिद्धान्त है और यह इसका एक प्राथमिक उद्देश्य है। हालाँकि यह एक साधारण तस्वीर है, फिर भी हम परमेश्वर की बुद्धि और उसके इरादों को देख सकते हैं। मानवजाति पृथ्वी के बिना, या पेड़ों के बिना, या गीत गानेवाली चिड़ियों एवं सूर्य के प्रकाश के बिना नहीं रह सकती है, सही है? हालाँकि यह एक कहानी थी, फिर भी यह जगत की परमेश्वर की रचना का सूक्ष्म संसार है और मनुष्य को दिया गया जीवन्त वातावरण का उसका दान है।

परमेश्वर ने मानवजाति के लिए आकाश एवं पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि की थी और साथ ही उसने जीवन्त वातावरण की भी सृष्टि की थी। पहला, वह मुख्य बिन्दु जिसकी चर्चा हमने कहानी में की थी वह सभी चीज़ों का परस्पर जुड़ा हुआ सम्बन्ध है और पारस्परिक निर्भरता है। इस सिद्धान्त के अंतर्गत, मानवजाति के लिए जीवन्त वातावरण को सुरक्षित किया जाता है, यह अस्तित्व में बना हुआ है और निरन्तर जारी है; इस जीवन्त वातावरण के अस्तित्व के कारण, मानवजाति पनप और प्रजनन कर सकती है। हमने दृश्य में पेड़, पृथ्वी, धूप, गीत गानेवाली चिड़ियों और लोगों को देखा था। क्या परमेश्वर भी वहाँ था? शायद लोग इसे नहीं देख सकते हैं, सही है? सतही तौर पर ऐसा लगता है कि परमेश्वर वहाँ नहीं था, लेकिन लोग दृश्य में चीज़ों के बीच में परस्पर जु़ड़े हुए सम्बन्धों के नियमों को देख सकते हैं; इन नियमों के माध्यम से ही ऐसा होता है कि लोग देख सकते हैं कि परमेश्वर मौजूद है और वह शासक है। सही है? परमेश्वर जीवन एवं सभी चीज़ों के अस्तित्व का संरक्षण करने के लिए इन सिद्धान्तों एवं नियमों का उपयोग करता है। यह इसी रीति से होता है कि वह सभी चीज़ों के लिए आपूर्ति करता है और वह मानवजाति के लिए आपूर्ति करता है। क्या इस कहानी का उस मुख्य विषय से कोई सम्बन्ध है जिस पर हमने अभी चर्चा की थी? (हाँ।) सतही तौर पर ऐसा लगता है कि एक भी सम्बन्ध नहीं है, लेकिन वास्तविकता में ऐसे नियम जिन्हें परमेश्वर ने सृष्टिकर्ता के रूप में बनाया है और सभी चीज़ों के ऊपर उसकी प्रभुता इस बात से मज़बूती से जुड़े हुए हैं कि वह सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है और वे जटिल रूप से जुड़े हुए हैं। सही है? (हाँ।) तुम लोगों ने थोड़ा बहुत सीख लिया है, सही है?

परमेश्वर उन नियमों का स्वामी है जो विश्व को नियन्त्रित करते हैं, वह उन नियमों को नियन्त्रित करता है जो सभी प्राणियों के जीवित बचे रहने पर शासन करते हैं, और वह कुछ इस तरह संसार एवं सभी चीज़ों को भी नियन्त्रित करता है कि वे एक साथ मिलकर रह सकते हैं; और इसे ऐसा बनता है ताकि वे विलुप्त या गायब न हों ताकि मानवजाति निरन्तर अस्तित्व में रह सके, और मनुष्य परमेश्वर के नेतृत्व के माध्यम से एक ऐसे वातावरण में रह सकता है। ये नियम जो सभी चीज़ों पर शासन करते हैं वे परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हैं, फिर भी, मानवजाति हस्तक्षेप नहीं कर सकती है और इन्हें बदल नहीं सकती है; केवल स्वयं परमेश्वर ही इन नियमों को जानता है और वह स्वयं ही इनका प्रबंध करता है। वृक्ष कब अंकुरित होगा, बारिश कब होगी, कितना जल एवं कितना पोषण पृथ्वी पौधों को देगी, किस मौसम में पत्ते गिरेंगे, किस मौसम में पेड़ फल उत्पन्न करेंगे, कितनी ऊर्जा सूर्य का प्रकाश पेड़ों को देगा, उस ऊर्जा से वृक्ष श्वास के रूप में क्या छोड़ेंगे जिसे वे सूर्य के प्रकाश से पाते हैं—ये सभी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें परमेश्वर ने पहले से ही व्यवस्थित किया था जब उसने इस संसार की सृष्टि की थी और वे ऐसे नियम हैं जिन्हें मनुष्य के द्वारा तोड़ा नहीं जा सकता है। परमेश्वर के द्वारा बनाई गई सभी चीज़ें—चाहे वे जीवित हों या लोगों के द्वारा निर्जीव प्रतीत होती हों—परमेश्वर के हाथों में हैं और उसके प्रभुत्व में हैं। कोई मनुष्य इस नियम को बदल या तोड़ नहीं सकता है। कहने का तात्पर्य है, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों को सृजा था तब उसने निरुपित किया था कि उन्हें कैसा होना चाहिए। वृक्ष पृथ्वी (मिट्टी) के बिना जड़ों को व्यवस्थित, अंकुरित, एवं बढ़ा नहीं सकता है। पृथ्वी किसके समान होती यदि उसमें कोई वृक्ष ही न होता? यह सूख जाती। क्या यह सही नहीं है? (हाँ।) साथ ही, गाने वाली चिड़ियों के लिए वृक्ष एक आशियाना भी है, यह ऐसी जगह है जहाँ वे हवा से आश्रय पाती हैं। क्या यह ठीक होता यदि वृक्ष धूप के बिना होता? (यह ठीक नहीं होता।) यदि वृक्ष के पास केवल पृथ्वी ही होता तो इससे काम नहीं चलता। यह सब कुछ मानवजाति के लिए है और मानवजाति के ज़िन्दा बचे रहने के लिए है। मनुष्य वृक्ष से ताजी हवा प्राप्त करता है, और उसके द्वारा सुरक्षित होकर पृथ्वी पर जीवन बिताता है। मनुष्य सूर्य की रोशनी के बिना नहीं रह सकता है, मनुष्य समस्त विभिन्न जीवित प्राणियों के बिना नहीं रह सकता है। हालाँकि इन चीज़ों के बीच सम्बन्ध जटिल है, फिर भी लोगों को यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि परमेश्वर ने ऐसे नियमों को बनाया है जो सभी चीज़ों पर शासन करते हैं ताकि वे पारस्परिक सम्बद्धता एवं पारस्परिक निर्भरता की रीति से मौजूद रह सकें; हर एक चीज़ जिसे उसने सृजा है उसका महत्व एवं मूल्य है। यदि परमेश्वर ने किसी चीज़ को बिना किसी महत्व के बनाया होता, तो परमेश्वर उसे लुप्त होने देता। समझे? (हाँ।) यह एक पद्धति है जिसे उसने सभी चीज़ों के प्रयोजन में उपयोग किया था। इस कहानी में "के लिए आपूर्ति करता है" क्या संकेत करता है? क्या परमेश्वर प्रतिदिन बाहर जाता है और वृक्ष को पानी देता है? क्या वृक्ष को सांस लेने के लिए परमेश्वर की मदद की आवश्यकता है? (नहीं।) इस उदाहरण में "के लिए आपूर्ति करता है" सृष्टि के बाद सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर के प्रबंधन की ओर संकेत करता है। चीज़ों को सरलता से निरन्तर चलाने के लिए उसे बस नियमों की आवश्यकता थी। पृथ्वी पर रोपा जाकर वृक्ष अपने आप ही बढ़ा। इसके बढ़ने के लिए सभी स्थितियों को परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था। उसने धूप, जल, मिट्टी, हवा, एवं आस पास का वातावरण, वायु, ठण्ड, बर्फ, एवं वर्षा, एवं चार ऋतुओं को बनाया; ये ऐसी स्थितियाँ हैं जो एक वृक्ष को बढ़ने के लिए आवश्यक हैं, ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें परमेश्वर ने तैयार किया। अतः, क्या परमेश्वर इस जीवन्त वातावरण का स्रोत है? (हाँ।) क्या परमेश्वर को प्रतिदिन जाना पड़ता है और पेड़ों पर की हर एक पत्ती को गिनना पड़ता है? इसकी कोई ज़रूरत नहीं है, सही है? वृक्ष को सांस लेने में परमेश्वर को मदद भी नहीं करना पड़ता है। परमेश्वर को यह कहने के द्वारा सूर्य की रोशनी को जगाना भी नहीं पड़ता है, "अब यह पेड़ों पर चमकने का समय है।" उसे ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है। सूर्य की रोशनी अपने आप ही नीचे चमकती है जैसा नियमों के द्वारा निर्धारित किया गया है, यह वृक्ष पर चमकता है और वृक्ष इसे सोखता है। इसी प्रकार से चीज़ें नियमों के अंतर्गत रहती हैं। कदाचित् यह एक अद्भुत घटना है जिसका तुम लोग स्पष्ट रूप से वर्णन नहीं कर सकते हो, लेकिन यह ऐसा तथ्य है जिसे हर किसी ने देखा है और स्वीकार किया है। तुम्हें बस इतना करना है कि यह पहचानें कि सभी चीज़ों के अस्तित्व के नियम परमेश्वर से आते हैं और यह जानें कि उनकी बढ़ोतरी एवं जीवित बचा रहना परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन है। यह साबित करता है कि परमेश्वर समस्त जीवन का स्रोत है।

क्या इस कहानी में एक रूपक अलंकर का इस्तेमाल किया गया है, जैसे मनुष्य इसे कहेंगे? (नहीं।) क्या यह मानवरूपी है? (नहीं।) जिसके विषय में मैंने बात की थी वह सही है। हर एक चीज़ जो जीवित है, हर एक चीज़ जो अस्तित्व में है वह परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन है। जब परमेश्वर ने इसे सृजा था उसके बाद हर एक चीज़ को जीवन दिया गया था; यह वह जीवन है जिसे परमेश्वर के द्वारा दिया गया था और यह उन नियमों एवं पथ का अनुसरण करता है जिन्हें उसने इसके लिए सृजा था। इसे मनुष्य के द्वारा पलटे जाने की आवश्यकता नहीं है, और मनुष्य से किसी मदद की ज़रूरत नहीं है; इसी तरह से परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए आपूर्ति करता है। तुम लोग समझ गए, ठीक? क्या तुम लोग सोचते हो कि यह लोगों के लिए आवश्यक है कि इसे पहचानें? (हाँ।) अतः, क्या इस कहानी का जीवविज्ञान से कुछ लेना देना है? क्या इसका ज्ञान एवं विज्ञान के किसी क्षेत्र से कोई सम्बन्ध है? (नहीं।) हम यहाँ पर जीवविज्ञान पर चर्चा नहीं कर रहे हैं और हम निश्चित रूप से जीवविज्ञान सम्बन्धी कोई अनुसंधान नहीं कर रहे हैं। वह मुख्य बिन्दु क्या है जिसके विषय में हम यहाँ बात कर रहे हैं? (कि परमेश्वर समस्त जीवन का स्रोत है।) तुम लोग सृष्टि की सभी चीज़ों के बीच क्या देखते हो? क्या तुम लोगों ने पेड़ों को देखा है? क्या तुम लोगों ने पृथ्वी को देखा है? (हाँ।) क्या तुम लोगों ने सूर्य की रोशनी को देखा है, सही है? क्या तुम लोगों ने पक्षियों को पेड़ों पर आराम करते हुए देखा है? (हमने देखा है।) क्या मानवजाति ऐसे वातावरण में रहते हुए प्रसन्न है? (वह प्रसन्न है।) परमेश्वर सभी चीज़ों का उपयोग करता है—ऐसी चीज़ें जिन्हें उसने सृजा था ताकि ज़िन्दा रहने के लिए मानवजाति के निवास को बनाए रखे और मानवजाति के निवास को सुरक्षित रखे, और इसी तरह से वह मनुष्य के लिए आपूर्ति करता है और सभी चीज़ों के लिए आपूर्ति करता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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