परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 161

अब अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के साथ, वह मनुष्य को सिर्फ अनुग्रह एवं आशीषें ही नहीं देता है जैसा उसने शुरुआत में किया था, न ही वह लोगों को आगे बढ़ने के लिए फुसलाता है—यह अनुग्रह के युग में कार्य की उस नींव के कारण है। इन अंत के दिनों के कार्य के दौरान, परमेश्वर के कार्य के सभी पहलुओं से मनुष्य ने क्या देखा जिन्हें उन्होंने अनुभव किया है? उन्होंने न केवल परमेश्वर के प्रेम को देखा है, बल्कि परमेश्वर के न्याय एवं ताड़ना को भी देखा है। इस समय, परमेश्वर मनुष्य को और अधिक प्रदान करता है, सहारा देता है, और मनुष्य को प्रकाशन एवं मार्गदर्शन देता है, जिससे वे धीरे-धीरे उसके इरादों को जानने लगें, उन वचनों को जानने लगें जिन्हें वह बोलता है और उस सच्चाई को जानने लगें जिसे वह मनुष्य को प्रदान करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब वे हतोत्साहित होते हैं, जब उनके पास कहीं और जाने के लिए कोई स्थान नहीं होता है, तब परमेश्वर उन्हें राहत, सलाह, एवं प्रोत्साहन देने के लिए अपने वचनों का उपयोग करेगा, ताकि कम हैसियत वाला मनुष्य धीरे-धीरे अपनी सामर्थ्य को पा सके, सकारात्मकता में खड़ा हो जाए और परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो जाए। परन्तु जब मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है या उसका विरोध करता है, या जब वे अपनी स्वयं की भ्रष्टता को प्रगट करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं, तब परमेश्वर उनको ताड़ना देने में और उन्हें अनुशासित करने में कोई दया नहीं दिखाएगा। फिर भी, मनुष्य की मूर्खता, अज्ञानता, दुर्बलता, एवं अपरिपक्वता के प्रति परमेश्वर सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाएगा। इस रीति से, उस समस्त कार्य के माध्यम से जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए करता है, मनुष्य धीरे-धीरे परिपक्व होता है, बढ़ता है, और परमेश्वर के इरादों को जानने लगता है, कुछ सच्चाई जानने लगता है, सकारात्मक चीज़ें क्या हैं और नकारात्मक चीज़ें क्या हैं, उनको जानने लगता है, और यह जानने लगता है कि बुराई क्या है और अंधकार क्या है। परमेश्वर हमेशा मनुष्य को प्रताड़ित एवं अनुशासित नहीं करता रहता है, न ही वह हमेशा सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाता है। बल्कि उनकी विभिन्न अवस्थाओं में और उनके अलग-अलग हैसियत एवं क्षमता के अनुसार वह विभिन्न तरीकों से प्रत्येक व्यक्ति के लिए आपूर्ति करता है। वह मनुष्य के लिए अनेक कार्य करता है और बड़ी कीमत पर करता है; मनुष्य इस कीमत के विषय में या इन कार्यों के विषय में जिन्हें परमेश्वर करता है कुछ भी एहसास नहीं करता है, फिर भी वह जो कुछ करता है उसे वास्तविकता में हर एक व्यक्ति के लिये सम्पन्न किया जाता है। परमेश्वर का प्रेम सच्चा हैः परमेश्वर के अनुग्रह के माध्यम से मनुष्य एक के बाद एक आपदा को टालता है, जबकि मनुष्य की दुर्बलता के लिए, परमेश्वर समय-समय पर अपनी सहिष्णुता दिखाता है। परमेश्वर का न्याय एवं ताड़ना लोगों को मानवजाति की भ्रष्टता और उनके भ्रष्ट शैतानी सार को धीरे-धीरे जानने की अनुमति देते हैं। जो कुछ परमेश्वर प्रदान करता है, मनुष्य के लिए उसका प्रकाशन एवं उसका मार्गदर्शन वे सब मानवजाति को अनुमति देते हैं कि वे सत्य के सार को और भी अधिक जानें, और लगातार यह जानें कि लोगों की क्या आवश्यकता है, उन्हें कौन-सा मार्ग लेना चाहिए, उन्हें किसके लिए जीना है, उनकी ज़िंदगी का मूल्य एवं अर्थ क्या है, और आगे के मार्ग पर कैसे चलना है। ये सभी कार्य जिन्हें परमेश्वर करता है वे उसके एकमात्र मूल उद्देश्य से अभिन्न हैं। तो यह उद्देश्य क्या है? क्या तुम लोग जानते हो? परमेश्वर मनुष्य पर अपने कार्य को क्रियान्वित करने के लिए इन तरीकों का उपयोग क्यों करता है? वह क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है? दूसरे शब्दों में, वह मनुष्य में क्या देखना चाहता है और उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है? जो कुछ परमेश्वर देखना चाहता है वह यह है कि मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जा सके। दूसरे शब्दों में, ये तरीके जिन्हें वह मनुष्य में कार्य करने के लिए उपयोग करता है वे मनुष्य के हृदय को निरन्तर जागृत करने के लिए हैं, मनुष्य के आत्मा को जागृत करने के लिए हैं, मनुष्य को यह जानने के लिए हैं कि वे कहाँ से आए हैं, कौन उन्हें मार्गदर्शन दे रहा है, उनकी सहायता कर रहा है, उनके लिए आपूर्ति कर रहा है, और किसकी बदौलत मनुष्य अब तक जीवित है; वे मनुष्य को यह जानने देने के लिए हैं कि सृष्टिकर्ता कौन है, उन्हें किसकी आराधना करनी चाहिए, उन्हें किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, और मनुष्य को किस रीति से परमेश्वर के सामने आना चाहिए; मनुष्य के हृदय को धीरे-धीरे पुनर्जीवित करने के लिए उनका उपयोग किया जाता है, इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के हृदय को जान पाता है, परमेश्वर के हृदय को समझ पाता है, और मनुष्य को बचाने के लिए उसके कार्य के पीछे की बड़ी देखभाल एवं विचार को समझ पाता है। जब मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जाता है, तब वे आगे से एक पतित एवं भ्रष्ट स्वभाव के जीवन को जीने की इच्छा नहीं करते हैं, बल्कि परमेश्वर की संतुष्टि के लिये सत्य की खोज करने की इच्छा करते हैं। जब मनुष्य के हृदय को जागृत कर दिया जाता है, तो वे शैतान के साथ स्थायी रूप से सम्बन्ध तोड़ने में सक्षम हो जाते हैं, शैतान उन्हेंअब आगे से कोई हानि नहीं पहुँचा पाता है, उन्हें अब आगे से नियंत्रित नहीं कर पाता या मूर्ख नहीं बना पाता है। बल्कि, मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए परमेश्वर के कार्य में और उसके वचन में सकारात्मक रूप से सहयोग कर सकता है, इस प्रकार परमेश्वर के भय को प्राप्त करता है और बुराई से दूर रहता है। यह परमेश्वर के कार्य का मूल उद्देश्य है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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