परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V" | अंश 151

शैतान सामाजिक चलन को मनुष्य को दूषित करने के लिए कैसे उपयोग करता है

क्या सामाजिक चलन एक नई घटना है? (नहीं।) तो फिर वे कब प्रारम्भ हुए? क्या यह कहा जा सकता है कि जब से शैतान ने मनुष्य को दूषित करना आरंभ किया तभी से सामाजिक चलन शुरु हुआ? (हां।) सामाजिक चलन में क्या शामिल है? (कपड़ों की शैली और श्रृंगार।) यह ऐसी कुछ चीज़ें हैं जिनसे लोगों का अक्सर सामना होता है। कपड़ों की शैली, फैशन, चलन यह एक छोटा पहलू है। क्या और भी कुछ है? क्या वह कहावत भी कुछ मायने रखती है जिसकी लोग अक्सर चर्चा करते हैं? क्या वह जीवनशैली भी मायने रखती है जिसकी लोग कामना करते हैं? क्या संगीत सितारे, विख्यात लोग, पत्रिकाएं और उपन्यास जिन्हें लोग पसंद करते हैं मायने रखती हैं? (हां।) आपके विचार में इस चलन का कौन सा पहलू लोगों को दूषित करने के योग्य है? इन चलनों में से कौन सा आपके लिए बहुत मोहक है? कुछ लोग कहते हैं कि हम इतनी उम्र में पहुंच गए है। हम चालीस, पचास, साठ, सत्तर या अस्सी के हैं अब हम इस चलन में कहां जमते हैं और अब उन चीज़ों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। क्या यह सही है? (नहीं।) दूसरे कहते हैं कि हम विख्यात लोगों के पीछे नहीं भागते, यह सबकुछ किशोरों और नौजवानों के लिए है; हम फैशनवाले कपड़े भी नहीं पहनते, यह उन लोगों के लिये है जो अपनी छवि को लेकर काफी सतर्क रहते हैं। तो फिर इन में से कौन मनुष्य को दूषित करने के योग्य है? (मशहूर कहावत।) क्या ये कहावतें लोगों को दूषित कर सकती हैं? मैं आपको एक बताता हूं आप देखिये कि यह लोगों को दूषित करती है या नहीं, "दाम संवारे सारे काम।" क्या यह चलन है? क्या यह चीज़ उस फैशन और स्वादिष्ट भोजन के चलन से भी ज़्यादा खराब नहीं है जिसका ज़िक्र आप कर चुके हैं? (हां।) "दाम संवारे सारे काम।" यह शैतान की विचारधारा है और यह हर मानव समाज के प्रचलन में है। आप कह सकते हैं कि यह एक चलन है क्योंकि यह प्रत्येक के अंदर डाला गया और अब उनके हृदय में पैठ गया है। लोगों ने आरंभ में इसे स्वीकार नहीं किया लेकिन फिर धीरे-धीरे इसके आदी होते चले गये और जब उनका वास्तविक जीवन से सम्पर्क हुआ, तब उन्होंने धीरे-धीरे इसे मौन सहमति दे दी, उसके अस्तित्व को माना और आखिरकार अपनी सहमति की भी मुहर लगा दी। क्या यह सही है? (हां।) क्या यही तरीका नहीं है जिससे शैतान मनुष्य को बर्बाद कर रहा है? शायद आप जो यहां बैठे हैं इस कहावत को उस परिमाण में नहीं समझते, लेकिन इस कहावत को देखने और समझने का प्रत्येक का अपना नज़रिया है, जो इस बात पर निर्भर है कि उनके आसपास किस प्रकार की चीज़े घटित हुई हैं और इस विषय में उनका अपना अनुभव क्या कहता है, सही है न? चाहे इस कहावत से किसी का कितना ही अनुभव रहा हो, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? (लोग सोचेंगे कि पैसा कुछ भी कर सकता है और वे पैसे का आदर करेंगे।) इस संसार में इंसानी स्वभाव के ज़रिये, इसमें यहां बैठे लोग भी शामिल हैं, लोगों की कुछ चीज़ें प्रकट होती हैं। इसकी व्याख्या कैसे की जायेगी? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के दिल में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा जान पड़ता है कि शैतान का मनुष्य को दूषित करना सचमुच व्यापक है। क्या हम ऐसा कह सकते हैं? (हां।) तो जब शैतान मनुष्य को इस चलन के ज़रिये दूषित कर लेता है, यह चीज़ उनमें कैसे अभिव्यक्त होती है? क्या आपको नहीं लगता कि बिना पैसे के इस दुनिया में आप एक दिन भी जीवित नहीं रह सकते, एक दिन भी असम्भव होगा? (हां।) लोगों की हैसियत और सम्मान इस बात पर निर्भर करता है कि उनके पास कितना पैसा है, गरीब की कमर शर्म से झुकी हुई है जबकि धनी अपने उच्च स्तर का मजा लेते रहते हैं। वे ऊंचे पर घमंड से खड़े होकर, ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और चलन लोगों को क्या देते हैं? क्या बहुत से लोग पैसा पाने को ही सबकुछ नहीं समझते? क्या बहुत से लोग और पैसा कमाने के पीछे अपनी प्रतिष्ठा और ईमानदारी का बलिदान नहीं कर देते? क्या और बहुत से लोग अपने काम को अंजाम देने और परमेश्वर को खोजने का अवसर पैसे के लिए नहीं खो देते हैं? क्या यह लोगों के लिए हानि नहीं है? (हां।) क्या यह शैतान का अशुभ कार्य नहीं है कि इस तरीके से कहावत के उपयोग से मनुष्य को इस हद तक दूषित करे? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे आप इस कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः उसे सच स्वीकार करने तक बहते जाते हैं, आपका दिल पूरी तरह से शैतान की गिरफ्त में आ जाता है, और इस तरह आप अनजाने में उसी के साथ जीने लगते हैं। इस कहावत ने आप पर किस हद तक असर डाला है? हो सकता है कि आप सच्चा मार्ग जानते हों, हो सकता है आप सत्य को जानते हों, परन्तु आपमें इतनी शक्ति नहीं कि आप उसका पालन कर सको। हो सकता है आप परमेश्वर के वचन को स्पष्टता से जानते हैं, पर आप कीमत चुकाने को तैयार नहीं, कीमत चुकाने के लिये दुख उठाने को तैयार नहीं। बल्कि अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध जाने के लिये आप अपना भविष्य और नियति त्यागने को भी तैयार हो जाएँगे। परमेश्वर क्या कहता है इससे कोई मतलब नहीं, परमेश्वर क्या करता है, उससे कोई सरोकार नहीं, भले ही आपको इसका कितना भी अहसास हो कि परमेश्वर आपसे कितना गहरा और महान प्रेम करता है, आप अपने ही रास्ते चलते रहेंगे और इस कहावत की कीमत चुकाएंगे। इसका मतलब यह है कि यह कहावत पहले से ही आप के विचारों और व्यवहारों पर नियंत्रण करती है और आप अपना भाग्य भी इसी कहावत से नियंत्रित कराते हैं और इस कहावत के लिए आप सब कुछ त्याग सकते हैं। लोग ऐसा करते हैं, वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं और इस के द्वारा चलाए जाते हैं। क्या यह शैतान का मनुष्यों को दूषित करने का प्रभाव नहीं है? क्या यह शैतान की अवधारणा और दूषित स्वभाव आपके हृदय में जड़ नहीं पकड‌ते जा रहे हैं? यदि आप ऐसा करते हैं, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हां।) क्या आप देख सकते हैं कि शैतान ने मनुष्य को किस तरह से दूषित किया है? (नहीं।) आपने यह नहीं देखा। क्या आप इसे महसूस कर सकते हैं? (नहीं।) आपने इसे महसूस नहीं किया। क्या आप यहां शैतान की बुराई देखते हैं? (हां।) शैतान हर समय और हर जगह मनुष्यों को दूषित करता है। शैतान मनुष्य के लिए अपना विरोध करना, असम्भव बना देता है और इसके लिए मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान आपसे अपने विचार, अपने दृष्टिकोण, और उनसे जो बुरी बातें आती हैं, इन परिस्थितियों में जहां आप अज्ञानता में हैं, और जब आपको यह भी मालूम नहीं है कि आपके साथ क्या हो रहा है, उन्हें स्वीकार करवाता है। लोग बिना किसी अपवाद के इन बातों को पूरी तरह ग्रहण करते हैं। वे खुश होते हैं और उन बातों को धरोहर की तरह रखते हैं, वे उन चालाकियों में आ जाते हैं और उनके हाथों में खिलौनों की तरह खेलते हैं। और इस प्रकार शैतान का मनुष्य को दूषित करना और गहरा होता जाता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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