परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 136

जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन होने की इच्छा रखता है उसके लिए उचित मनोवृत्ति एवं अभ्यास

किस मनोवृत्ति के साथ अब मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार, और मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य (सच्चाई) को जानना एवं मानना चाहिए? यह एक वास्तविक समस्या है जो प्रत्येक व्यक्ति के सामने खड़ी होती है। जब वास्तविक जीवन की समस्याओं का सामना किया जाता है, तब तुम्हें किस प्रकार परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता को जानना एवं समझना चाहिए? जब तुम नहीं जानते हो कि किस प्रकार इन समस्याओं को समझना, सम्भालना और अनुभव करना है, तो तुम्हारे इरादे, तुम्हारी इच्छा, और परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों के अधीन होने की अपनी वास्तविकता को दिखाने के लिए तुम्हें किस प्रकार की मनोवृत्ति अपनानी चाहिए? पहले तुम्हें इंतज़ार करना सीखना होगा; फिर तुम्हें खोजना सीखना होगा; तब तुम्हें अधीन होना सीखना होगा। "इंतज़ार" का अर्थ है परमेश्वर के समय का इंतज़ार करना, तथा उन लोगों, घटनाओं एवं चीज़ों का इंतज़ार करना जिन्हें उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है, और उसकी इच्छा के लिए इंतज़ार करना कि वह आहिस्ता आहिस्ता अपनी इच्छा को आप पर प्रकट करे। "खोजने" का अर्थ है उन लोगों, घटना और चीज़ों के माध्यम से तुम्हारे लिए परमेश्वर के विचारशील इरादों का अवलोकन करना एवं समझना जिन्हें उसने बनाया है, उनके माध्यम से सत्य को समझना, जो मनुष्यों को पूरा करना होगा उसे और उन मार्गों को समझना जिनका उन्हें पालन करना होगा, इस बात को समझना कि परमेश्वर मनुष्यों में किन परिणामों को हासिल करने की इच्छा करता है और वह उनमें किन उपलब्धियों को देखने की इच्छा करता है। "समर्पण", वास्तव में, उन लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों को स्वीकार करने की ओर संकेत करता है जिन्हें परमेश्वर ने आयोजित किया है, उसकी संप्रभुता को स्वीकार करने की ओर संकेत करता है और, इसके माध्यम से, यह जानना है कि किस प्रकार सृष्टिकर्ता मानव की नियति को नियन्त्रित करता है, कि वह किस प्रकार अपने जीवन से मनुष्य की आपूर्ति करता है, कि वह किस प्रकार मनुष्यों के भीतर सच्चाई का काम करता है। सभी चीज़ें परमेश्वर के इंतज़ामों एवं संप्रभुता के अधीन प्राकृतिक नियमों का पालन करती हैं, और यदि तुमने ठान लिया है कि तुम परमेश्वर को अपने लिए हर एक चीज़ का इंतज़ाम करने एवं नियन्त्रण करने की अनुमति देते हो, तो तुम्हें इंतज़ार करना सीखना होगा, तुम्हें खोजना सीखना होगा, और तुम्हें अधीन होना सीखना होगा। यह वही मनोवृत्ति है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपनाना होगा जो परमेश्वर में अधिकार के अधीन होना चाहता है, और यह वही मूल योग्यता है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को धारण करना होगा जो परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंत ज़ामों को स्वीकार करना चाहता है। इस प्रकार की मनोवृत्ति रखने के लिए, इस प्रकार की योग्यता धारण करने के लिए, तुम लोगों को और भी अधिक कठिन परिश्रम करना होगा; और केवल इस प्रकार से ही तुम लोग सच्ची वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर के अधिकार के अधीन कैसे हों

इंसान की तकदीर पर, परमेश्वर के अधिकार को, प्रभुत्व को, कैसे जाने और माने इंसान? इसी सवाल का सामना, करता है हर इंसान। जब आए परेशानी तुम्हारी ज़िंदगी में, कैसे थाह पाओगे, अनुभव करोगे परमेश्वर के अधिकार को, प्रभुत्व को? जब इन मसलों को समझ न पाओ, संभाल न पाओ, और न तुम अनुभव कर पाओ, तो परमेश्वर के प्रभुत्व और योजना के पालन में, अपनी इच्छा, अभिलाषा दर्शाने को, कैसा रुख़ अपनाओगे तुम?

परमेश्वर के समय का, लोगों का, घटनाओं का, उसके द्वारा आयोजित चीज़ों का, तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार। परमेश्वर की इच्छाओं का इंतज़ार, तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार, जिन्हें वो रफ़्ता-रफ़्ता ज़ाहिर तुम पर करेगा। लोगों और चीज़ों के ज़रिये खोजना चाहिये तुम्हें, कितने दयालु हैं इरादे परमेश्वर के, समझनी चाहिये सच्चाई उसकी, चलना चाहिये उसकी राह पर, जानना चाहिये उन नतीजों को, नतीजों को, उपलब्धियों को जानना चाहिये, जिन्हें वो करना चाहता है इंसान में हासिल। तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार, परमेश्वर की इच्छाओं का इंतज़ार, तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार, वो रफ़्ता-रफ़्ता ज़ाहिर तुम पर करेगा।

अधीन हो जाओ, स्वीकार लो परमेश्वर का प्रभुत्व और तमाम चीज़ें जिनकी, व्यवस्था की है उसने। जान लो किस तरह नियति पर चलता हुक्म उसका, जान लो किस तरह इंसान का, अपने जीवन से पोषण वो करता, किस तरह सच्चाई को इंसान का जीवन है बनाता। हर चीज़ परमेश्वर की योजना और प्रभुत्व के अधीन, चलती कुदरती कानून से। अगर तुम ठान लो कि परमेश्वर ही राह दिखलाए, व्यवस्था करे, हर चीज़ तुम्हारे लिये वो ही चलाए, तो तुम्हें रुकना, खोजना और अधीन होना होगा। तो तुम्हें रुकना, खोजना और अधीन होना होगा। जो समर्पित होते हैं उसके आगे उन्हें, यही रवैया अख़्तियार करना होगा। जिनमें लगन है इस हुनर को पाने की, वही पहुँचेंगे असल सच्चाई पर। तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार, परमेश्वर की इच्छाओं का इंतज़ार, तुम्हें करना चाहिये इंतज़ार, वो रफ़्ता-रफ़्ता ज़ाहिर तुम पर करेगा।

"मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना" से

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