परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 128

केवल वे ही सच्ची स्वतन्त्रता हासिल कर सकते हैं जो सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन हो जाते हैं

क्योंकि लोग सृष्टिकर्ता के आयोजनों एवं इंतज़ामों को नहीं पहचानते हैं, वे हमेशा ढिठाई से एवं विद्रोही मनोवृत्ति के साथ नियति का सामना करते हैं, और हमेशा परमेश्वर की संप्रभुता एवं अधिकार एवं उन चीज़ों को दूर करना चाहते हैं जिन्हें नियति ने संचय करके रखा है, तथा अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदलने और अपनी नियति को पलटने के लिए व्यर्थ में आशा करते हैं। परन्तु वे कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं; हर एक मोड़ पर उनका प्रतिरोध किया जाता है। यह संघर्ष, जो किसी व्यक्ति की आत्मा की गहराई में होता है, कष्टप्रद है; इस दर्द को भुलाया नहीं जा सकता है; और पूरे समय वह अपने जीवन को गंवाते रहता है। इस दर्द का कारण क्या है? क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण है, या इसलिए क्योंकि उस व्यक्ति ने बदनसीबी में जन्म लिया था? स्पष्ट रूप से कोई भी सही नहीं है। सबसे मुख्य बात, यह उन मार्गों के कारण है जिन पर लोग चलते हैं, ऐसे मार्ग जिन्हें लोग अपनी ज़िन्दगियों को जीने के लिए चुनते हैं। शायद कुछ लोगों ने इन चीज़ों का एहसास नहीं किया है। परन्तु जब तू सचमुच में जानता है, जब तू सचमुच में एहसास करता है कि परमेश्वर के पास मनुष्य की नियति के ऊपर संप्रभुता है, जब तू सचमुच समझता है कि हर चीज़ जिसकी परमेश्वर ने तेरे लिए योजना बनाई और निश्चित की है तो उसका बड़ा लाभ है, और वह एक बहुत बड़ी सुरक्षा है, तो तुम महसूस करते हो कि तुम्हारा दर्द आहिस्ता आहिस्ता कम हुआ है, और तुम्हारा सम्पूर्ण अस्तित्व शांत, स्वतंत्र, एवं बन्धन मुक्त हो गया है। अधिकांश लोगों की स्थितियों से आंकलन करते हुए, यद्यपि आत्मनिष्ठ स्तर पर वे निरन्तर वैसा जीवन जीना नहीं चाहते हैं जैसा वे पहले जीते थे, यद्यपि वे अपने दर्द से राहत चाहते हैं, फिर भी वस्तुनिष्ठ रूप से वे मानव की नियति के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के व्यावहारिक मूल्य एवं अर्थ को नहीं समझ सकते हैं; वे सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को वास्तव में समझ नहीं पाते और उसके अधीन नहीं हो पाते हैं। और वे यह तो बिलकुल भी नहीं जानते हैं कि सृष्टिकर्ता के आयोजनों एवं इंतज़ामों को किस प्रकार खोजें एवं स्वीकार करें। अतः यदि लोग सचमुच में इस तथ्य को पहचान नहीं सकते हैं कि सृष्टिकर्ता के पास मानव की नियति एवं मानव की सभी स्थितियों के ऊपर संप्रभुता है, यदि वे सचमुच में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन नहीं हो सकते हैं, तो उनके लिए यह कठिन होगा कि वे इस विचार के द्वारा छलनी न किए जाएँ, और उसके द्वारा जंज़ीरों से जकड़े न जाएँ, कि "किसी की नियति उसके अपने हाथों में होती है," यह उनके लिए कठिन होगा कि वे नियति एवं सृष्टिकर्ता के अधिकार के विरुद्ध अपने भयानक संघर्ष के दर्द से छुटकारा पाएं, और कहने की आवश्यकता नहीं कि सच में बन्धनमुक्त एवं स्वतन्त्र होना भी उनके लिए कठिन होगा, और ऐसे लोग हो जाएँ जो परमेश्वर की आराधना करते हैं। अपने आपको इस स्थिति से स्वतन्त्र करने के लिए एक सबसे आसान रास्ता हैः जीवन जीने के पुराने तरीके को विदा कर दें, जीवन में अपने पुराने लक्ष्यों को अलविदा कह दें, अपनी पुरानी जीवनशैली, दर्शनज्ञान, व्यवसायों, इच्छाओं एवं आदर्शों का सारांश निकालें एवं उनका विश्लेषण करें, और उसके बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा एवं मांग से उनकी तुलना करें, और देखें कि उनमें से कोई परमेश्वर की इच्छा एवं मांग के अनुकूल है या नहीं, उनमें से कोई जीवन के सही मूल्यों को प्रदान करता है या नहीं, सत्य की महान समझ की ओर उसकी अगुवाई करता है या नहीं, और उसे मानवता एवं मानव के रूप में जीवन जीने के लिए अनुमति देता है या नहीं। जब तुम जीवन के विभिन्न लक्ष्यों का जिनका लोग अनुसरण करते हो और जीवन जीने के उनके विभिन्न अलग अलग तरीकों की बारबार जांच-पड़ताल करते हो और सावधानीपूर्वक उनकी कांट-छांट करते हो, तो तुम यह पाओगे कि इनमें से कोई भी सृष्टिकर्ता की मूल इच्छानुसार नहीं जब उसने मानवता की सृष्टि की थी। उनमें से सभी लोगों को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता एवं उसके देखभाल से दूर कर देते हैं; ये सभी ऐसे गड्ढे हैं जिनमें मानवता गिर जाती है, और जो उन्हें नरक की ओर लेकर जाती है। जब तुम इसे पहचान जाते हो उसके पश्चात्, तुम्हारा कार्य है कि जीवन के अपने पुराने दृष्टिकोण को दूर करो, विभिन्न प्रकार के फंदों से दूर रहो, परमेश्वर को अनुमति दें कि वह तुम्हारे जीवन की ज़िम्मेदारी ले और तुम्हारे लिए इंतज़ाम करे, कोशिश करो कि केवल परमेश्वर के आयोजनों एवं मार्गदर्शन के ही अधीन रहो, कोई और विकल्प न रखो, और एक ऐसे इंसान बन जाओ जो परमेश्वर की आराधना करता हो। यह सुनने में आसान लगता है, परन्तु इसे करना बहुत कठिन है। कुछ लोग इसके दर्द को सह सकते हैं, परन्तु दूसरे नहीं सह सकते हैं। कुछ लोग मानने के लिए तैयार हैं, परन्तु कुछ लोग अनिच्छुक हैं। ऐसे लोग जो अनिच्छुक हैं उनमें ऐसा करने की इच्छा एवं दृढ़ संकल्प की कमी होती है; वे स्पष्ट रूप से परमेश्वर की संप्रभुता के विषय में जानकारी रखते हैं, बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि यह परमेश्वर ही है जो मानव की नियति की योजना बनाता है और उसका इंतज़ाम करता है, और फिर भी वे पैर मारते हैं और संघर्ष करते हैं, और वे अभी भी परमेश्वर की हथेली में अपनी नियति को रखने और परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन होने के लिए सहमत नहीं हैं, और इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के आयोजनों एवं इंतज़ामों से नाराज़ होते हैं। अतः हमेशा कुछ ऐसे लोग होंगे जो अपने आपको देखना चाहते हैं कि वे क्या कुछ करने में समर्थ हैं; वे अपने दोनों हाथों से अपनी नियति को बदलना चाहते हैं, या अपनी ही सामर्थ्य के अधीन खुशियाँ हासिल करना चाहते हैं, यह देखने के लिए कि वे परमेश्वर के अधिकार की सीमाओं से आगे बढ़ सकते हैं या नहीं और परमेश्वर की संप्रभुता से ऊपर उठ सकते हैं कि नहीं। मनुष्य की उदासी इसलिए नहीं है कि मनुष्य सुखी जीवन की खोज करता है, इसलिए नहीं हैकि वह प्रसिद्धि एवं सौभाग्य का निरन्तर पीछा करता है या धुंध के बीच अपनी स्वयं की नियति के विरुद्ध संघर्ष करता है, परन्तु इसलिए है कि सृष्टिकर्ता के अस्तित्व को देखने के पश्चात्, उस तथ्य को सीखने के पश्चात् कि सृष्टिकर्ता के पास मानव की नियति के ऊपर संप्रभुता है, वह अभी भी अपने मार्ग को सुधार नहीं सकता है, अपने पैरों को दलदल से बहार नहीं निकाल सकता है, परन्तु अपने हृदय को कठोर कर देता है और अपनी ग़लतियों में निरन्तर बना रहता है। वह कीचड़ में लगातार हाथ पैर मारना, और बिना किसी लेशमात्र पछतावे के, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के विरोध में ढिठाई से निरन्तर प्रतिस्पर्धा करना, एवं कड़वे अंत तक लगातार इसका विरोध करना अधिक पसन्द करता है, और जब वह टूट कर बिखर जाता है और रक्त बहने लगता है केवल तभी वह आखिरकार छोड़ने एवं पीछे हटने का निर्णय लेता है। यह असली मानवीय दुख है। अतः मैं कहता हूँ, ऐसे लोग जो अधीन होने का चुनाव करते हैं वे बुद्धिमान हैं, और ऐसे लोग जो बच निकलने का चुनाव करते हैं वे महामूर्ख हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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