परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 126

सन्तान: पाँचवां घटनाक्रम

विवाह करने के पश्चात्, कोई व्यक्ति अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने में लग जाता है। कोई यह नहीं कह सकता कि उसके पास कितने एवं किस प्रकार के संतान होंगे; यह किसी की नियति द्वारा निर्धारित होता है, सृष्टिकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित होता है। यह पाँचवां घटनाक्रम है जिससे होकर किसी व्यक्ति को गुज़रना होगा।

यदि किसी व्यक्ति ने किसी और बच्चे की भूमिका को पूरा करने के लिए जन्म लिया है, तो वह किसी और के माता पिता की भूमिका पूरा करने के लिए अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करता है। भूमिकाओं का यह स्थानान्तरण किसी व्यक्ति को अलग अलग दृष्टिकोण से जीवन के अलग अलग पहलुओं का अनुभव कराता है। साथ ही यह किसी व्यक्ति को जीवन के अनुभवों के विभिन्न संग्रह प्रदान करता है, जिसमें वह सृष्टिकर्ता की उसी संप्रभुता को जान पाता है, साथ ही साथ उस तथ्य को जान पाता है कि कोई भी व्यक्ति सृष्टिकर्ता के पूर्वनिर्धारण का अतिक्रमण या उसे पलट नहीं सकता है।

1. किसी व्यक्ति के पास इस पर कोई नियन्त्रण नहीं होता है कि उसकी संतान का क्या होगा

जन्म, पलना-बढ़ना एवं विवाह सभी विभिन्न प्रकार की और विभिन्न स्तर की निराशा प्रदान करते हैं। कुछ लोग अपने परिवारों या अपने शारीरिक रंग-रूप से असंतुष्ट होते हैं; कुछ अपने माता पिता को नापसंद करते हैं; कुछ लोग उस वातावरण से नाराज़ हैं या उससे बहुत क्रोधित हैं जिसमें वे पले-बढ़े हैं। और अधिकांश लोगों के लिए, इन सभी निराशाओं के बीच विवाह सबसे अधिक असंतोषजनक है। इसके बावजूद कि कोई व्यक्ति अपने जन्म, अपने पलने-बढ़ने, या अपने विवाह से कितना असंतुष्ट है, हर एक व्यक्ति जो इन से होकर गुज़र चुका है वह जानता है कि वह चुन नहीं सकता है कि उसे कहां एवं कब जन्म लेना है, उसे कैसा दिखना है, उसके माता पिता कौन हैं, और उसकी पत्नी कौन है, परन्तु उसे स्वेच्छा से स्वर्ग की इच्छा को स्वीकार करना होगा। परन्तु जब लोगों का समय आता है कि वे अगली पीढ़ी का पालन पोषण करें, तो वे अपने जीवन के प्रथम भाग में अपने वंशों पर अपनी सारी अपूर्ण इच्छाओं को डाल देते हैं, यह आशा करते हुए कि उनकी संतान उनकी सभी निराशाओं की क्षतिपूर्ति करेगी जिन्हें उन्होंने अपने जीवन के प्रथम भाग में अनुभव किया था। अतः लोग अपने बच्चों के विषय में सब प्रकार की कल्पनाओं में लगे रहते हैं; यह कि उनकी बेटियां बड़ी होकर बहुत ही खूबसूरत सुन्दरियां बन जाएंगी, उनके बेटे बहुत ही आकर्षक सुन्दर जवान हो जाएंगे; यह कि उनकी बेटियां सुसंस्कृत एवं प्रतिभाशाली होंगी और उनके बेटे प्रतिभावान छात्र एवं स्टार एथलीट होंगे; यह कि उनकी बेटियां नम्र, गुणी, एवं संवेदनशील होंगी, और उनके बेटे बुद्धिमान, सक्षम और संवेदनशील होंगे। वे आशा करते हैं कि चाहे बेटे हों या बेटियां, वे बुज़ुर्गों का आदर करेंगे, अपने माता पिता का ध्यान रखेंगे, और हर कोई उनसे प्रेम करेगा एवं उनकी प्रशंसा की जाएगी। इस मुकाम पर जीवन की आशा नए सिरे से अंकुरित होती है, और लोगों के हृदयों में नई नई उमंगें उत्पन्न होने लगती हैं। लोग जानते हैं कि वे इस जीवन में निर्बल एवं आशाहीन हैं, यह कि उनके पास औरों से विशिष्ट होने का दूसरा मौका, एवं दूसरी आशा नहीं होगी, और यह कि उनके पास अपनी नियति को स्वीकार करने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं है। और इस प्रकार वे अगली पीढ़ी पर अपनी सारी आशाओं, अपनी अपूर्ण इच्छाओं, एवं आदर्शों को डाल देते हैं, यह आशा करते हुए कि उनकी संतान उनके सपनों को हासिल करने में एवं उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता करेंगे; यह कि उनकी पुत्रियां एवं पुत्र परिवार के नाम को महिमावान्वित करेंगे, और अति महत्वपूर्ण, धनी या प्रसिद्ध हो जाएंगे; संक्षेप में, वे अपने बच्चों के सौभाग्य को ऊंचा उठता हुआ देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएं एवं कल्पनाएं पूर्ण हैं; परन्तु क्या वे नहीं जानते हैं कि बहुत सारे बच्चे जो उनके पास हैं, उनके बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएं, और ऐसी ही कितनी बातें, उनके लिए नहीं हैं कि वे निर्णय करें, किन्तु यह कि उनके बच्चों की नियति उनकी हथेलियों में नहीं है? मनुष्य अपनी स्वयं की नियति का स्वामी नहीं है, फिर भी वे युवा पीढ़ी की नियति को बदलने की आशा करते हैं; वे अपनी स्वयं की नियति से बचने में निर्बल हैं, फिर भी वे अपने बेटे एवं बेटियों की नियति को नियन्त्रित करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आपका बहुत अधिक मूल्यांकन नहीं कर रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता एवं अज्ञानता नहीं है? लोग अपनी संतान के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं, परन्तु अंत में, किसी व्यक्ति के पास जितने बच्चे हों, और उसके बच्चे किस प्रकार के हैं, यह उनकी योजनाओं एवं इच्छाओं के अनुरूप नहीं होता है। कुछ लोग दरिद्र होते हैं परन्तु कई बच्चों को पैदा करते हैं; कुछ लोग धनी होते हैं फिर भी उनके पास बच्चे नहीं होते हैं। कुछ लोग एक बेटी चाहते हैं परन्तु उनकी इस इच्छा का इन्कार कर दिया जाता है; कुछ लोग एक बेटा चाहते हैं परन्तु एक लड़के को जन्म देने में असफल हो जाते हैं। कुछ लोगों के लिए, बच्चे एक आशीष हैं; परन्तु अन्य लोगों के लिए, वे एक श्राप हैं। कुछ दम्पत्ति बुद्धिमान होते हैं, फिर भी मंदबुद्धि बच्चों को जन्म देते हैं; कुछ माता पिता मेहनती एवं ईमानदार होते हैं, फिर भी जिन बच्चों का वे पालन-पोषण करते हैं वे आलसी होते हैं। कुछ माता पिता उदार एवं सच्चे होते हैं परन्तु उनके पास ऐसे बच्चे होते हैं जो चालाक एवं ख़तरनाक बन जाते हैं। कुछ माता पिता दिमाग एवं शरीर से स्वस्थ्य होते हैं किन्तु अपाहिज बच्चों को जन्म देते हैं। कुछ माता पिता सामान्य एवं असफल होते हैं फिर भी उनके पास ऐसे बच्चे होते हैं जो महान चीज़ों को हासिल करते हैं। कुछ माता पिता की हैसियत छोटी होती है फिर भी उनके पास ऐसे बच्चे होते हैं जो प्रतिष्ठा में बढ़ जाते हैं।

2. अगली पीढ़ी का पालन पोषण करने के बाद, लोग नियति के विषय में एक नई समझ हासिल करते हैं

अधिकांश लोग जो विवाह करते हैं वे लगभग तीस वर्ष की आयु में ऐसा करते है, और जीवन के इस मुकाम पर किसी को मानव की नियति के विषय में कोई समझ नहीं होती है। परन्तु जब लोग अपने बच्चों का पालन पोषण करना प्रारम्भ करते हैं, जैसे जैसे उनकी संतानें बढ़ती हैं, वे नई पीढ़ी को पिछली पीढ़ी के जीवन और उन सभी अनुभवों को दोहराते हुए देखते हैं, और वे अपने स्वयं के अतीत को उनमें प्रतिबिम्बित होते हुए देखते हैं और एहसास करते हैं कि, उनके मार्ग के समान ही, उस मार्ग की योजना नहीं बनाई जा सकती है और उसे चुना नहीं जा सकता है जिस पर युवा पीढ़ी के द्वारा चला गया है। इस सत्य का सामना करते हुए, उनके पास यह मानने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं होता है कि हर एक व्यक्ति की नियति पूर्वनिर्धारित होती है; और पूरी तरह से इसका एहसास किए बिना ही वे आहिस्ता आहिस्ता अपनी स्वयं की इच्छाओं को दरकिनार कर देते हैं, और उनके हृदय का जोश-खरोश बेतरतीब ढंग से जल जाता है और लुप्त होजाता है। समय की इस अवधि के दौरान, उस व्यक्ति ने अधिकांशतः जीवन में मील के महत्वपूर्ण पत्थरों को पार कर लिया है और जीवन की एक नई समझ हासिल कर चुका है, और एक नई मनोवृत्ति को अपना चुका है। इस उम्र का इंसान भविष्य से कितनी अपेक्षा कर सकता है और उनके भविष्य की सम्भावनाएं क्या हैं? ऐसी कौन सी पचास साल की बूढ़ी स्त्री है जो अभी भी एक सुन्दर राजकुमार का सपना देख रही है? ऐसा कौन सा पचास साल का बूढ़ा पुरुष है जो अभी भी अपनी बर्फ के समान सफेद स्त्री की खोज कर रहा है? ऐसी कौन सी मध्यम-आयु वर्ग की स्त्री है जो अभी भी एक भद्दी बतख़ से एक हंस में बदलने की आशा कर रही है? क्या अधिकांश बूढ़े पुरुषों में जवान पुरुषों समान जीवनवृत्ति कर्मशक्ति होती है? संक्षेप में कहें तो, इसके बावजूद कि कोई पुरुष है या स्त्री, कोई भी जो इस आयु में जीवन बिताता है उसके पास सम्भवतः विवाह, परिवार, एवं बच्चों के प्रति अपेक्षाकृत कहीं अधिक तर्कसंगत, एवं व्यावहारिक मनोवृत्ति होती है। ऐसे व्यक्ति के पास अनिवार्य रूप से कोई विकल्प नहीं बचता है, और उसके पास नियति को चुनौती देने के लिए कोई प्रबल इच्छा नहीं होती है। जहाँ तक मनुष्य के अनुभव की बात है, जैसे ही कोई व्यक्ति इस आयु में पहुँच जाता है वह स्वाभाविक रूप से एक मानसिकता विकसित कर लेता है कि, "नियति को स्वीकार करना ही होगा; उसके बच्चों का अपना स्वयं का सौभाग्य होता है; मनुष्य की नियति को स्वर्ग से निर्धारित किया जाता है।" अधिकांश लोग जो सत्य को नहीं समझते हैं, इस संसार के सभी उतार-चढ़ावों, तनावों, एवं कठिनाईयों को झेलकर सही सलामत निकलने के बाद, तीन शब्दों में मानव जीवन में अपनी अंतर्दृष्टि का सारांश निकालते हैं: "यह नियति है!" हालाँकि यह वाक्यांश मानव की नियति के विषय में सांसारिक लोगों के निष्कर्ष एवं एहसास को संक्षेप में बताता है, हालाँकि यह मानवता की असहायता को अभिव्यक्ति करता है और ऐसा कहा जा सकता है कि यह आर पार भेदता है और सटीक है, फिर भी यह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की समझ से बिलकुल ही अलग अनुभव है, और सृष्टिकर्ता के अधिकार के ज्ञान के लिए मात्र कोई स्थानापन्न (के बदले में) नहीं है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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