परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 121

मानवता की नियति और विश्व की नियति सृष्टिकर्ता की संप्रभुता से अविभाज्य हैं

तुम सब सभी व्यस्क हो। तुम सबों में से कुछ अधेड़ उम्र के हैं; कुछ लोग वृद्धवस्था में प्रवेश कर चुके हैं। एक अविश्वासी से लेकर विश्वासी तक, और परमेश्वर में विश्वास की शुरुआत से लेकर परमेश्वर के वचन को ग्रहण करने और परमेश्वर के कार्यों का अनुभव करने तक, तुम लोगों के पास परमेश्वर की संप्रभुता का कितना ज्ञान है? तुम सब ने मानव की नियति के भीतर कौन कौन सी अंतर्दृष्टि हासिल की है? क्या एक व्यक्ति हर एक चीज़ हासिल कर सकता है जिसकी उसने अपने जीवन में इच्छा की है? जैसा तुम लोग चाहते थे उसके अनुसार तुम सब के अस्तित्व के कुछ दशकों के दौरान कितनी चीज़ें हैं जिन्हें तुम लोग पूरा करने में सक्षम हो पाए हो? जैसी अपेक्षा की गई थी उसके अनुसार कितनी चीज़ें घटित नहीं हुई हैं? कितनी चीज़ें सुखद आश्चर्यों के रूप में आई हैं? कितनी चीज़ें हैं जिनके फलवन्त होने के लिए तुम सब अभी भी इंतज़ार कर रहे हो—अवचेतन रूप से सही अवसर का इंतज़ार कर रहे हो, और स्वर्ग की इच्छा का इंतज़ार कर रहे हो? कितनी चीज़ों ने लोगों को असहाय और कुंठित महसूस कराया है? हर एक अपनी नियति के विषय में आशाओं से भरपूर है, और अनुमान लगता है कि उनकी ज़िन्दगी में हर एक चीज़ वैसी ही होगी जैसा वे चाहते हैं, यह कि उनके पास भोजन या वस्त्रों की कमी नहीं होगी, और यह कि उनका भाग्य बहुत ही बेहतरीन ढंग से उदय होगा। कोई भी ऐसा जीवन नहीं चाहता है जो दरिद्र और कुचला हुआ हो, कठिनाईयों से भरा हुआ हो, आपदाओं से घिरा हुआ हो। परन्तु लोग इन चीज़ों को पहले से ही देख नहीं सकते हैं या नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं। कदाचित् कुछ लोगों के लिए, अतीत बस अनुभवों का मिश्रण है; उन्होंने कभी नहीं सीखा है कि स्वर्ग की इच्छा क्या है, और न ही वे इसकी परवाह करते हैं कि यह क्या है। वे बिना सोचे समझे जानवरों के समान, दिन ब दिन जीते हुए अपनी ज़िन्दगियों को बिताते हैं, इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि मानवता की नियति क्या है, मानव क्यों जीवित हैं या उन्हें किस प्रकार जीवन जीना चाहिए। ये लोग मानव की नियति के विषय में कोई समझ हासिल किए बिना ही वृद्धावस्था में पहुंच जाते हैं, और उनके मरने की घड़ी तक उन्हें नहीं पता होता है कि जीवन किस के विषय में है। ऐसे लोग मरे हुए हैं; वे ऐसे प्राणी है जिनमें आत्मा नहीं है; वे जानवर हैं। हालाँकि सभी चीज़ों के मध्य जीवन बिताते हुए, लोग उन अनेक तरीकों से आनन्द पा लेते हैं जिसके अंतर्गत संसार अपनी भौतक आवश्यकताओं को संतुष्ट करता है, हालाँकि वे इस भौतिक संसार को निरन्तर बढ़ते हुए देखते हैं, फिर भी उनके स्वयं के अनुभव—जो कुछ उनका हृदय और आत्मा महसूस एवं अनुभव करता है—का भौतिक चीज़ों के साथ कोई लेना-देना नहीं है, और कोई भी पदार्थ उसका स्थान नहीं ले सकता है। यह एक पहचान है जो किसी व्यक्ति के हृदय की गहराई में होती है, ऐसी चीज़ जिसे नग्न आँखों से देखा नहीं जा सकता है। यह पहचान मानव के जीवन एवं मानव की नियति के विषय में उसकी समझ, और उसकी भावनाओं में होती है। और यह अक्सर किसी व्यक्ति को इस बात की समझ की ओर ले जाती है कि एक अनदेखा स्वामी इन सभी चीज़ों को व्यवस्थित कर रहा है, और मनुष्य के लिए हर एक चीज़ का आयोजन कर रहा है। इन सब के बीच, कोई व्यक्ति नियति के इंतज़ामों और आयोजनों को स्वीकार करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता है; उसी समय, वह उस आगे के पथ को जिसे सृष्टिकर्ता ने प्रदर्शित किया है, और उसकी नियति के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने के आलावा कुछ नहीं कर सकता है। यह एक निर्विवादित सत्य है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि नियति के विषय में कोई क्या अन्तःदृष्टि एवं मनोवृत्ति रखता है, कोई भी इस तथ्य को बदल नहीं सकता है।

तू प्रतिदिन कहाँ जाएगा, तू क्या करेगा, तू किसका या क्या सामना करेगा, तू क्या कहेगा, तेरे साथ क्या होगा—क्या इसमें से किसी की भी भविष्यवाणी की जा सकती है? लोग इन सभी घटनाओं को पहले से नहीं देख सकते हैं, और जिस प्रकार वे विकसित होते हैं उसको तो बिलकुल भी नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं। जीवन में, पहले से देखी न जा सकनेवाली ये घटनाएं हर समय घटित होती हैं, और ये प्रतिदिन घटित होनेवाली घटनाएं हैं। ये दैनिक उतार-चढ़ाव और तरीके जिन्हें वे प्रकट करते हैं, या ऐसे नमूने जिसके परिणामस्वरूप वे घटित होते हैं, वे मानवता को निरन्तर स्मरण दिलानेवाले हैं कि कुछ भी बस यों ही नहीं होता है, यह कि इन चीज़ों की शाखाओं में विस्तार को, और उनकी अनिवार्यता को मनुष्य की इच्छा के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। हर एक घटना सृष्टिकर्ता की ओर से मानवजाति को दी गई झिड़की को सूचित करती है, और साथ ही यह सन्देश भी देती है कि मानव अपनी नियति को नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं, और ठीक उसी समय हर एक घटना अपनी नियति को अपने ही हाथों में लेने के लिए मानवता की निरर्थक, व्यर्थ महत्वाकांक्षा एवं इच्छा का खण्डन है। ये मानवजाति के कान के पास एक के बाद एक मारे गए जोरदार थप्पड़ों के समान हैं, जो लोगों को पुनःविचार करने के लिए बाध्य करते हैं कि अंत में कौन उनकी नियति पर शासन एवं नियन्त्रण करता है। और चूंकि उनकी महत्वाकांक्षाएं एवं इच्छाएं लगातार नाकाम होती हैं और बिखर जाती हैं, तो मनुष्य स्वाभाविक रूप से एक अचैतन्य स्वीकृति की ओर आ जाते हैं कि नियति ने क्या संजोकर रखा है, और स्वर्ग की इच्छा और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की वास्तविकता की स्वीकृति की ओर आ जाते हैं। सम्पूर्ण मानवजीवन की नियति के इन दैनिक उतार-चढ़ावों से, ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की योजना और उसकी संप्रभुता को प्रकट नहीं करता है; ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह सन्देश नहीं देता है कि "सृष्टिकर्ता के अधिकार से आगे बढ़ा नहीं जा सकता है," जो इस अनन्त सत्य को सूचित नहीं करता है कि "सृष्टिकर्ता का अधिकार ही सर्वोच्च है।"

मानवता एवं विश्व की नियति सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के साथ घनिष्ठता से गुथी हुई हैं, और सृष्टिकर्ता के आयोजनों से अविभाज्य रूप से बंधी हुई हैं; अंत में, उन्हें सृष्टिकर्ता के अधिकार से धुनकर अलग नहीं किया जा सकता है। सभी चीज़ों के नियमों के माध्यम से मनुष्य सृष्टिकर्ता के आयोजनों एवं उसकी संप्रभुता को समझ पाता है; जीवित बचे रहने के नियमों के माध्यम से वह सृष्टिकर्ता के शासन का एहसास करता है; सभी चीज़ों की नियति से वह उन तरीकों के विषय में निष्कर्ष निकालता है जिनसे सृष्टिकर्ता अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल करता है और उन पर नियन्त्रण करता है; और मानव प्राणियों एवं सभी चीज़ों के जीवन चक्रों में मनुष्य सचमुच में सभी चीज़ों के लिए सृष्टिकर्ता के आयोजनों और इंतज़ामों का अनुभव करता है और सचमुच में इस बात का साक्षी बनता है कि किस प्रकार वे आयोजन और इंतज़ाम सभी सांसारिक विधियों, नियमों, और संस्थानों, तथा सभी शक्तियों और ताकतों का स्थान ले लेते हैं। इसके प्रकाश में, मानवजाति को यह पहचानने के लिए बाध्य किया गया है कि किसी भी सृजे गए जीव के द्वारा सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है, और यह कि सृष्टिकर्ता के द्वारा पूर्व निर्धारित की गई घटनाओं और चीज़ों के साथ कोई भी शक्ति हस्तक्षेप नहीं कर सकती है या उन्हें बदल नहीं सकती है। यह इन अलौकिक विधियों और नियमों के अधीन है कि मनुष्य एवं सभी चीज़ें पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन बिताती हैं और बढ़ती हैं। क्या यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का असली जीता जागता नमूना नहीं है? हालाँकि मनुष्य, वस्तुनिष्ठ नियमों में, सभी घटनाओं एवं सभी चीज़ों के लिए सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसके निर्धारण को देखता है, फिर भी कितने लोग विश्व के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के सिद्धान्तों का आभास करने में समर्थ हैं? कितने लोग सचमुच में अपनी अपनी नियति के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और इंतज़ाम को जान, पहचान, एवं स्वीकार कर सकते हैं, और उसके प्रति समर्पण कर सकते हैं? कौन, सभी चीज़ों के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के सत्य पर विश्वास करने के बाद, सचमुच में विश्वास करेगा एवं पहचानेगा कि सृष्टिकर्ता मानव जीवन की नियति को भी निर्धारित करता है? कौन सचमुच में इस सत्य को समझ सकता है कि मनुष्य की नियति सृष्टिकर्ता की हथेली में होती है? जब इस सत्य से सामना होता है कि वह मानवता की नियति पर शासन और नियन्त्रण करता है, तो सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के प्रति मानवता को किस प्रकार की मनोवृत्ति रखनी चाहिए, यह एक ऐसा निर्णय है जिसे हर एक मानव को अपने लिए लेना होगा जिसने अब इस तथ्य का सामना किया है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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