परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 118

योना 4 यह बात योना को बहुत ही बुरी लगी, और उसका क्रोध भड़का। उसने यहोवा से यह कहकर प्रार्थना की, "हे यहोवा, जब मैं अपने देश में था, तब क्या मैं यही बात न कहता था? इसी कारण मैं ने तेरी आज्ञा सुनते ही तर्शीश को भाग जाने के लिये फुर्ती की; क्योंकि मैं जानता था कि तू अनुग्रहकारी और दयालु परमेश्‍वर है, और विलम्ब से कोप करनेवाला करुणानिधान है, और दु:ख देने से प्रसन्न नहीं होता। इसलिये अब हे यहोवा, मेरा प्राण ले ले; क्योंकि मेरे लिये जीवित रहने से मरना ही भला है।" यहोवा ने कहा, "तेरा जो क्रोध भड़का है, क्या वह उचित है?" इस पर योना उस नगर से निकलकर, उसकी पूरब ओर बैठ गया; और वहाँ एक छप्पर बनाकर उसकी छाया में बैठा हुआ यह देखने लगा कि नगर का क्या होगा? तब यहोवा परमेश्‍वर ने एक रेंड़ का पेड़ उगाकर ऐसा बढ़ाया कि योना के सिर पर छाया हो, जिससे उसका दु:ख दूर हो। योना उस रेंड़ के पेड़ के कारण बहुत ही आनन्दित हुआ। सबेरे जब पौ फटने लगी, तब परमेश्‍वर ने एक कीड़े को भेजा, जिस ने रेंड़ का पेड़ ऐसा काटा कि वह सूख गया। जब सूर्य उगा, तब परमेश्‍वर ने पुरवाई बहाकर लू चलाई, और धूप योना के सिर पर ऐसी लगी कि वह मूर्च्छित होने लगा; और उसने यह कहकर मृत्यु माँगी, "मेरे लिये जीवित रहने से मरना ही अच्छा है।" परमेश्‍वर ने योना से कहा, "तेरा क्रोध, जो रेंड़ के पेड़ के कारण भड़का है, क्या वह उचित है?" उसने कहा, "हाँ, मेरा जो क्रोध भड़का है वह अच्छा ही है, वरन् क्रोध के मारे मरना भी अच्छा होता।" तब यहोवा ने कहा, "जिस रेंड़ के पेड़ के लिये तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्‍ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहिचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?"

सृष्टिकर्ता मनुष्य के लिए अपनी सच्ची भावनाएँ प्रकट करता है

यहोवा परमेश्वर और योना के बीच का यह वार्तालाप निस्संदेह मनुष्य के लिए सृष्टिकर्ता की सच्ची भावनाओं की एक अभिव्यक्ति है। एक ओर यह लोगों को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन विद्यमान संपूर्ण सृष्टि के संबंध में उसकी समझ के बारे में सूचित करता है; जैसा कि यहोवा परमेश्वर ने कहा था : "फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहिचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?" दूसरे शब्दों में, नीनवे के संबंध में परमेश्वर की समझ सतही बिल्कुल नहीं थी। वह न केवल नगर में रहने वाले जीवित प्राणियों (लोगों और मवेशियों समेत) की संख्या जानता था, बल्कि यह भी जानता था कि कितने लोग अपने दाहिने-बाएँ हाथों का भेद नहीं पहचानते—अर्थात् कितने बच्चे और युवा वहाँ मौजूद थे। यह मानवजाति के संबंध में परमेश्वर की व्यापक समझ का एक ठोस प्रमाण है। दूसरी ओर, यह वार्तालाप लोगों को मनुष्य के प्रति परमेश्वर के रवैये, अर्थात् सृष्टिकर्ता के हृदय में मनुष्य के महत्त्व के संबंध में सूचित करता है। यह वैसा ही है, जैसा यहोवा परमेश्वर ने कहा था : "जिस रेंड़ के पेड़ के लिये तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्‍ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे ... तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?" ये योना के प्रति यहोवा परमेश्वर की भर्त्सना के वचन हैं, किंतु ये सब सत्य हैं।

यद्यपि योना को नीनवे के लोगों के लिए यहोवा परमेश्वर के वचनों की घोषणा का काम सौंपा गया था, किंतु उसने यहोवा परमेश्वर के इरादों को नहीं समझा, न ही उसने नगर के लोगों के लिए उसकी चिंताओं और अपेक्षाओं को समझा। इस फटकार से परमेश्वर उसे यह बताना चाहता था कि मनुष्य उसके अपने हाथों की रचना है, और उसने प्रत्येक व्यक्ति के लिए कठिन प्रयास किया है, प्रत्येक व्यक्ति अपने कंधों पर परमेश्वर की अपेक्षाएँ लिए हुए है, और प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के जीवन की आपूर्ति का आनंद लेता है; प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर ने भारी कीमत चुकाई है। इस फटकार ने योना को यह भी बताया कि परमेश्वर मनुष्य को सँजोता है, जो उसके हाथों की रचना है, वैसे ही जैसे योना स्वयं कद्दू को सँजोता था। परमेश्वर किसी भी कीमत पर, या अंतिम क्षण तक, मनुष्य को आसानी से नहीं त्यागेगा; खासकर इसलिए, क्योंकि नगर में बहुत सारे बच्चे और निरीह मवेशी थे। परमेश्वर की सृष्टि के इन युवा और मासूम प्राणियों से व्यवहार करते समय, जो अपने दाएँ-बाएँ हाथों का भेद भी नहीं पहचानते थे, यह और भी कम समझ में आने वाला था कि परमेश्वर इतनी जल्दबाज़ी में उनका जीवन समाप्त कर देगा और उनका परिणाम निर्धारित कर देगा। परमेश्वर उन्हें बढ़ते हुए देखना चाहता था; उसे आशा थी कि वे उन्हीं मार्गों पर नहीं चलेंगे जिन पर उनके पूर्वज चले थे, उन्हें दोबारा यहोवा परमेश्वर की चेतावनी नहीं सुननी पड़ेगी, और वे नीनवे के अतीत की गवाही देंगे। और तो और, परमेश्वर ने नीनवे द्वारा पश्चात्ताप किए जाने के बाद उसे देखने, नीनवे के पश्चात्ताप के बाद उसके भविष्य को देखने, और इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप से, नीनवे को एक बार फिर अपनी दया के अधीन जीते हुए देखने की आशा की थी। इसलिए, परमेश्वर की नज़र में सृष्टि के वे प्राणी, जो अपने दाएँ-बाएँ हाथों का भेद भी नहीं जान सकते थे, नीनवे का भविष्य थे। वे नीनवे के घृणित अतीत की ज़िम्मेदारी लेंगे, वैसे ही जैसे वे नीनवे के अतीत और यहोवा परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन उसके भविष्य, दोनों की गवाही देने के महत्वपूर्ण कर्तव्य की ज़िम्मेदारी लेंगे। अपनी सच्ची भावनाओं की इस घोषणा में यहोवा परमेश्वर ने मनुष्य के लिए सृष्टिकर्ता की दया को उसकी संपूर्णता में प्रस्तुत किया। इसने मनुष्य को दिखाया कि "सृष्टिकर्ता की दया" कोई खोखला वाक्यांश नहीं है, न ही यह कोई खोखला वादा है; इसमें ठोस सिद्धांत, पद्धतियाँ और उद्देश्य हैं। परमेश्वर सच्चा और वास्तविक है, और वह किसी झूठ या स्वाँग का उपयोग नहीं करता, और इसी तरह उसकी दया मनुष्य को हर समय और हर युग में निरंतर प्रदान की जाती है। फिर भी, आज तक, योना के साथ सृष्टिकर्ता का संवाद इस बारे में उसका एकमात्र, अनन्य मौखिक कथन है कि वह मनुष्य पर दया क्यों करता है, वह मनुष्य पर दया कैसे करता है, वह मनुष्य के प्रति कितना सहनशील है और मनुष्य के प्रति उसकी सच्ची भावनाएँ क्या हैं। इस वार्तालाप के दौरान यहोवा परमेश्वर के संक्षिप्त वचन संपूर्ण मानवजाति के प्रति उसके विचारों को अभिव्यक्त करते हैं; वे मानवजाति के प्रति परमेश्वर के हृदय के रवैये की सच्ची अभिव्यक्ति हैं, और वे मानवजाति पर प्रचुर मात्रा में दया करने का ठोस सबूत भी हैं। उसकी दया न केवल मनुष्य की वृद्ध पीढ़ियों को प्रदान की जाती है; बल्कि वह मानवजाति के युवा सदस्यों को भी दी जाती है, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, जैसा हमेशा से होता आया है। यद्यपि परमेश्वर का कोप कुछ निश्चित जगहों पर और कुछ निश्चित युगों में मानवजाति पर बार-बार उतरता है, किंतु उसकी दया कभी खत्म नहीं हुई है। अपनी दया से वह अपनी सृष्टि की एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी का मार्गदर्शन और अगुआई करता है, वह सृष्टि की एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी की आपूर्ति एवं पालन-पोषण करता है, क्योंकि मनुष्य के प्रति उसकी सच्ची भावनाएँ कभी नहीं बदलेंगी। जैसा कि यहोवा परमेश्वर ने कहा : "तो क्या मैं तरस न खाऊँ?" उसने सदैव अपनी सृष्टि को सँजोया है। यह सृष्टिकर्ता के धार्मिक स्वभाव की दया है, और यह सृष्टिकर्ता की पूर्ण अद्वितीयता भी है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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