परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 113

(योना 3) तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा: “उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।” तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था। योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, “अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।” तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया: “क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें, और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्‍ट होने से बच जाएँ।” जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।

परमेश्वर नीनवे के नागरिकों के हृदय की गहराईयों में सच्चा पश्चाताप देखता है

परमेश्वर की घोषणा को सुनने के पश्चात्, नीनवे के राजा और उसकी प्रजा ने कार्यों की एक श्रंखला को अंजाम दिया। उनके व्यवहार और कार्यों का स्वभाव क्या है? दूसरे शब्दों में, उनके सारे चाल चलन का सार-तत्व क्या है? जो कुछ उन्होंने किया था उसे क्यों किया गया था? परमेश्वर की नज़रों में उन्होंने सच्चाई से पश्चाताप किया था, न केवल इसलिए क्योंकि उन्होंने पूरी लगन से परमेश्वर से प्रार्थना की थी और उसके सम्मुख अपने पापों का अंगीकार किया था, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने बुरे व्यवहार का परित्याग कर दिया था। उन्होंने इस तरह से कार्य किया था क्योंकि परमेश्वर के वचनों को सुनने के पश्चात्, वे अविश्वसनीय रूप से भयभीत थे और यह विश्वास करते थे कि वह वही करेगा जैसा उसने कहा था। उपवास करने, टाट पहनने और राख में बैठने के द्वारा, वे अपने मार्गों का पुन:सुधार करना और दुष्टता से अलग रहने की अपनी तत्परता को प्रकट करना, उसके क्रोध को रोकने के लिए यहोवा परमेश्वर से प्रार्थना करना, और अपने निर्णय साथ ही साथ उस विपत्ति को वापस लेने के लिए यहोवा परमेश्वर से विनती करना चाहते थे जो उन पर आने ही वाला था। उनके सम्पूर्ण चालचलन का परीक्षण करने के जरिए हम देख सकते हैं कि वे पहले से ही समझ गए थे कि उनके पहले के बुरे काम यहोवा परमेश्वर के लिए घृणास्पद थे और यह कि वे उस कारण को समझ गए थे कि वह क्यों उन्हें शीघ्र नष्ट कर देगा। इन कारणों से, वे सभी पूर्ण रूप से पश्चाताप करना, अपने बुरे मार्गों से फिरना और उपद्रव के कार्यों का परित्याग करना चाहते थे। दूसरे शब्दों में, जब एक बार वे यहोवा परमेश्वर की घोषणा के विषय में जागृत हो गए थे, तब उनमें से हर एक ने अपने हृदय में भय महसूस किया था; उन्होंने आगे से अपने बुरे आचरण को निरन्तर जारी नहीं रखा और न ही उन कार्यों को निरन्तर किया जिनसे यहोवा परमेश्वर के द्वारा घृणा की जाती थी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यहोवा परमेश्वर से अपने पिछले पापों को क्षमा करने के लिए और उनके पापों के अनुसार उनसे बर्ताव नहीं करने के लिए विनती की थी। वे दोबारा दुष्टता में कभी संलग्न न होने के लिए और यहोवा परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार थे, केवल तभी जब वे फिर कभी यहोवा परमेश्वर को क्रोध नहीं दिलाएँगे। उनका पश्चाताप सच्चा और सम्पूर्ण था। यह उनके हृदय की गहराईयों से आया था और यह बनावटी नहीं था, और न ही थोड़े समय का था।

जब एक बार नीनवे के लोग, सर्वोच्च्च राजा से लेकर उसकी प्रजा तक, यह जान गए कि यहोवा परमेश्वर उनसे क्रोधित था, तो उनका हर एक कार्य, उनका सम्पूर्ण व्यवहार, साथ ही साथ उनका हर एक निर्णय और चुनाव परमेश्वर की दृष्टि में स्पष्ट और साफ थे। परमेश्वर का हृदय उनके व्यवहार के अनुसार बदल गया था। ठीक उस समय परमेश्वर की मनःस्थिति क्या थी? बाइबल तुम्हारे लिए उस प्रश्न का उत्तर दे सकती है। जैसा पवित्र शास्त्र में लिखा हुआ है: “जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।” यद्यपि परमेश्वर ने अपना मन बदल लिया था, फिर भी उसकी मनःस्थिति के विषय में कुछ भी जटिलता नहीं थी। उसने बस अपने क्रोध को प्रकट करने से लेकर अपने क्रोध को शांत करने तक का सफर तय किया था, और फिर नीनवे शहर के ऊपर उस विपत्ति को न लाने का निर्णय लिया था। क्यों परमेश्वर का निर्णय—उस विपत्ति से नीनवे के नागरिकों को बख्श देना—इतना शीघ्र था उसका कारण यह है क्योंकि परमेश्वर ने नीनवे के हर एक व्यक्ति के हृदय का अवलोकन किया था। जो कुछ उन्होंने अपने हृदय की गहराईयों में धारण किया था उसने उसे देखा: अपने पापों के लिए उनका सच्चा अंगीकार और पश्चाताप, परमेश्वर में उनका सच्चा विश्वास, उनकी गहरी समझ कि कैसे उनके बुरे कार्यों ने उसके स्वभाव को क्रोधित किया, और यहोवा परमेश्वर के सन्निकट दण्ड के परिणाम स्वरूप उत्पन्न भय। उसी समय, यहोवा परमेश्वर ने उनके हृदय की गहराईयों से निकली उनकी प्रार्थनाओं को सुना जो उससे विनती कर रहे थे कि वह उन के विरुद्ध अपने क्रोध को रोक दे जिससे वे इस विपत्ति बच सकें। जब परमेश्वर इन सभी तथ्यों का अवलोकन कर रहा था, तो थोड़ा थोड़ा करके उसका क्रोध जाता रहा। इसके बावजूद कि उसका क्रोध पहले कितना विशाल था, जब उसने इन लोगों के हृदय की गहराईयों में सच्चा पश्चाताप देखा तो इसने उसके ह्रदय को छू लिया, और इस प्रकार वह उनके ऊपर विपत्ति नहीं डाल सकता था, और उसने उन पर क्रोध करना बंद कर दिया। इसके बजाए उसने लगातार उनके प्रति करुणा और सहनशीलता का विस्तार किया और लगातार उनका मार्गदर्शन और उनकी आपूर्ति की।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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