परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" | अंश 95

कुछ लोग अनुमान लगाना और कल्पना करना चाहते हैं, परन्तु एक मनुष्य की कल्पनाएँ कहाँ तक पहुँच सकती हैं? क्या वह इस संसार के परे जा सकती हैं? क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार की प्रमाणिकता और सटीकता का अनुमान लगाने और कल्पना करने में सक्षम है? क्या मनुष्य के अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने की अनुमति दे सकते हैं? क्या वे मनुष्य से परमेश्वर के अधिकार की सचमुच में तारीफ और उसके प्रति समर्पण करवा सकते हैं? तथ्य इस बात को साबित करते हैं कि मनुष्य के अनुमान और कल्पना मात्र मनुष्य की बुद्धिमत्ता का फल है, और मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार को जानने में ज़रा सी भी मदद या लाभ नहीं पहुँचाते हैं। विज्ञान की कल्पनाओं को पढ़ने के बाद, कुछ लोग चन्द्रमा, और तारे किस प्रकार दिखते हैं उसकी कल्पना कर सकते हैं। फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि मनुष्य के पास परमेश्वर के अधिकार की कोई समझ है। मनुष्य की कल्पना बस ऐसी ही हैः कोरी कल्पना। इन वस्तुओं के तथ्यों के विषय में, दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के अधिकार से उनके संबंध के विषय में, उसके पास बिलकुल भी समझ़ नहीं है। अतः क्या हुआ यदि तुम चन्द्रमा में गए हो? क्या इससे यह साबित हो जाता है कि तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार की बहुआयामी समझ है? क्या यह दिखाता है कि तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ की व्यापकता की कल्पना करने में सक्षम हो? जबकि मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार को जानने की मंजूरी देने में असमर्थ है, तो मनुष्य को क्या करना चाहिए? अनुमान और कल्पना न करना ही सबसे उत्तम विकल्प होगा, कहने का तात्पर्य है कि जब परमेश्वर के अधिकार को जानने की बात आती है, मनुष्य को कभी भी कल्पना पर भरोसा, और अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं असल में यहाँ पर तुम सब से क्या कहना चाहता हूँ? परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान, परमेश्वर की सामर्थ, परमेश्वर की स्वयं की पहचान, और परमेश्वर की हस्ती को तुम्हारी कल्पनाओं पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि तुम परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए कल्पनाओं पर भरोसा नहीं कर सकते हो। तो तुम किस रीति से परमेश्वर के अधिकार के सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के द्वारा, संगति के द्वारा, और परमेश्वर के वचनों के अनुभवों के द्वारा, तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और प्रमाणीकरण होगा और इस प्रकार तुम उसकी एक क्रमानुसार समझ और निरन्तर बढ़नेवाले ज्ञान को प्राप्त करोगे। यह परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है; और कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोग कल्पना न करो कहने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सबको शिथिलता से विनाश के इन्तज़ार में बैठा दिया जाए, या तुम सबको कुछ करने से रोका जाए। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने का मतलब अनुमान लगाने के लिए अपने तर्क का इस्तेमाल न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल न करना, विज्ञान को आधार के रूप में इस्तेमाल न करना, परन्तु इसके बजाए प्रशंसा करना, जाँच करना, और प्रमाणित करना है कि वह परमेश्वर जिसमें तुम विश्वास करते हो उसके पास अधिकार है, और प्रमाणित करना है कि वह तुम्हारी नियति के ऊपर प्रभुता करता है, और यह कि उसकी सामर्थ ने सभी समयों में यह साबित किया है परमेश्वर के वचनों के द्वारा, सच्चाई के द्वारा, उन सब के द्वारा जिसका तुम अपने जीवन में सामना करते हो, वह स्वयं सच्चा परमेश्वर है। यही वह एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक सरल तरीके की खोज करना चाहते हैं, किन्तु क्या तुम लोग ऐसे किसी तरीके के बारे में सोच सकते हो? मैं तुम्हें बताता हूँ, सोचने की आवश्यकता ही नहीं हैः और कोई तरीके नहीं हैं! एकमात्र तरीका है कि हर एक वचन जिसे वह प्रकट करता है और हर एक चीज़ जिसे वह करता है उसके जरिए सचेतता और स्थिरता से जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उसे जानें और प्रमाणित करें। क्या यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र तरीका है? क्योंकि जो परमेश्वर के पास है और जो वह है, और परमेश्वर का सब कुछ, वह सब खोखला या खाली नहीं है—परन्तु वास्तविक है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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