परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" | अंश 90

कोई भी सृजा और अनसृजा प्राणी सृष्टिकर्ता की पहचान को बदल नहीं सकता है

जब से उसने सब वस्तुओं की सृष्टि की शुरूआत की, परमेश्वर की सामर्थ प्रगट होने, और प्रकाशित होने लगी थी, क्योंकि सब वस्तुओं को बनाने के लिए परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल किया था। इसके बावजूद कि उसने किस रीति से उनको सृजा था, इसके बावजूद कि उसने उन्हें क्यों सृजा था, परमेश्वर के वचनों के कारण हीसभी चीज़ें अस्तित्व में आईं थीं और स्थिर बनी रहीं, और यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। इस संसार में मानवजाति के प्रगट होने के समय से पहले, सृष्टिकर्ता ने मानवजाति के लिए सब वस्तुओं को बनाने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ का इस्तेमाल किया, और मानवजाति के लिए उपयुक्त जीवन्त वातावरण तैयार करने के लिए अपनी अद्वितीय पद्धतियों का उपयोग किया था। जो कुछ भी उसने किया वह मानवजाति की तैयारी के लिए था, जो जल्द ही श्वास प्राप्त करनेवाले थे। दूसरे शब्दों में, मानवजाति की सृष्टि से पहले, सभी जीवधारियों में परमेश्वर का अधिकार प्रकट हुआ जो मानवजाति से अलग था, ऐसी वस्तुओं में जो स्वर्ग, ज्योतियों, समुद्रों, और भूमि के समान ही महान थे, और छोटे से छोटे पशुओं और पक्षियों में, साथ ही हर प्रकार के कीड़े मकौड़ों और सूक्ष्म जीवों में, जिन में विभिन्न प्रकार के जीवाणु भी शामिल थे जो नंगी आँखों से देखे नहीं जा सकते थे। प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों के द्वारा जीवन दिया गया था, हर एक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण उगने लगे थे, और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन जीवन बिताने लगे। यद्यपि उन्होंने सृष्टिकर्ता की श्वास को प्राप्त नहीं किया था, फिर भी वे उस जीवन व चेतना कोदर्शाने लगे थे जो सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें अलग अलग रूपों और आकारों के द्वारा दिया गया था; भले ही उन्हें बोलने की काबिलियत नहीं दी गई थी जैसा सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यों को दी गयी थी, फिर भी उन में से प्रत्येक ने अपने जीवन की अभिव्यक्ति का एक अन्दाज़ प्राप्त किया जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था, और वो मनुष्यों की भाषा से अलग था। सृष्टिकर्ता के अधिकार ने न केवल दृष्टिगोचर भौतिक पदार्थों को जीवन की चेतना दी, जिससे वे कभी भी विलुप्त न हों, बल्कि इसके अतिरिक्त, पुनः उत्पन्न करने और बहुगुणित होने के लिए हर जीवित प्राणियों को अंतःज्ञान दिया, ताकि वे कभी भी विलुप्त न हों, और इसलिए वे पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहने के सिद्धांतों को आगे बढ़ाते जाएँगे जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था। जिस रीति से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है वह अतिसूक्ष्म और अतिविशाल दृष्टिकोण से कड़ाई से चिपके नहीं रहता, और किसी आकार से सीमित नहीं होता है; वह विश्व के संचालन को अधिकार में रखने के योग्य है, और सभी चीज़ों के जीवन और मृत्यु के ऊपर प्रभुता रखता है, और इसके अतिरिक्त सब वस्तुओं को भली भाँति सँभाल सकता है जिस से परमेश्वर की सेवा कर सकें; वह पर्वतों, नदियों, और झीलों के सब कार्यों का प्रबन्ध कर सकता है, और उनके साथ सब वस्तुओं पर शासन कर सकता है, और इससे बढ़कर क्या, वह सब वस्तुओं के लिए जो आवश्यक है उसे प्रदान कर सकता है। यह मानवजाति के अलावा सब वस्तुओं के मध्य सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार का प्रकटीकरण है। ऐसा प्रकटीकरण मात्र एक जीवनकाल के लिए नहीं है, और यह कभी नहीं रूकेगा, न थमेगा, और किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा बदला या तहस नहस नहीं किया जा सकता है, और न ही उस में किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा जोड़ा या घटाया जा सकता है—क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान को बदल नहीं सकता है, और इसलिए सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी सृजे गए प्राणी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है, और किसी भी न सृजे गए प्राणी के द्वारा उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के सन्देशवाहकों और स्वर्गदूतों को देखिए। उनके पास परमेश्वर की सामर्थ नहीं है, और सृष्टिकर्ता का अधिकार तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है, और उनके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ क्यों नहीं है उसका कारण है क्योंकि उन्होंने सृष्टिकर्ता की हस्ती को धारण नहीं किया है। न सृजे गए प्राणी, जैसे परमेश्वर के सन्देशवाहक और स्वर्गदूत, हालांकि वे परमेश्वर की तरफ से कुछ कर सकते हैं, परन्तु वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। यद्यपि वे परमेश्वर की कुछ सामर्थ को धारण किए हुए हैं जिन्हें मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता है, फिर भी उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, सब वस्तुओं को बनाने, सब वस्तुओं को आज्ञा देने, और सब वस्तुओं के ऊपर सर्वोच्चता रखने के लिए उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है। और इस प्रकार परमेश्वर की अद्वितीयता को किसी न सृजे गए प्राणी द्वारा बदला नहीं जा सकता है, और उसी प्रकार किसी न सृजे गए प्राणी के द्वारा परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ को बदला नहीं जा सकता है। क्या तुमने बाईबिल में परमेश्वर के किसी सन्देशवाहक के बारे में पढ़ा है जिस ने सभी चीज़ों की सृष्टि की? और परमेश्वर ने सभी चीज़ों के सृजन के लिए किसी संदेशवाहक या स्वर्गदूत को क्यों नहीं भेजा? क्योंकि उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं था, और इस प्रकार उनके पास परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल करने की योग्यता भी नहीं थी। सभी जीवधारियों के समान, वे सभी सृष्टिकर्ता की प्रभुता के अधीन हैं, और सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हैं, और इस प्रकार, इसी रीति से, सृष्टिकर्ता उनका परमेश्वर भी है, और उनका शासक भी। उन में से हर एक के बीच में—भले ही वे उच्च श्रेणी के हों या निम्न, बड़ी सामर्थ की हों या छोटी—ऐसा कोई भी नहीं है जो परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर हो सके, और इस प्रकार उनके बीच में, ऐसा कोई भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की पहचान को बदल सके। उनको कभी भी परमेश्वर नहीं कहा जाएगा, और वे कभी भी सृष्टिकर्ता नहीं बन पाएँगे। ये न बदलनेवाली सच्चाईयाँ और वास्तविकताएँ हैं!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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