परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" | अंश 82

उस समय के दौरान जब प्रभु यीशु देह में होकर काम करता था, उसके अधिकतर अनुयायी उसकी पहचान और उन चीज़ों को जो वह कहता था उनकी जाँच सम्पूर्ण रीति से नहीं कर सकते थे। जब वह क्रूस पर चढ़ गया, उनके चेलों की मानसिकता आशावान थी; जब उसे क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया गया था उस समय से लेकर क़ब्र में डाले जाने तक, उसके प्रति लोगों की मनोवृत्तियाँ निराशाजनक थी। इस समय के दौरान, लोगों ने पहले से ही अपने हृदय में उन चीज़ों को लेकर सन्देह से इन्कार की ओर जाना प्रारम्भ कर दिया था जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने देह में रहने के दिनों के दौरान कहा था। और जब वह क़ब्र से बाहर आया, और एक एक कर के लोगों के सामने प्रकट हुआ, तो वे अधिकांश लोग जिन्होंने उसे अपनी आँखों से देखा था या उसके पुनरूत्थान के समाचार को सुना था धीरे धीरे इन्कार से संशयवाद की ओर आने लगे थे। और पुनरूत्थान के बाद उस समय तक जब प्रभु यीशु ने थोमा से अपने हाथ को उसके पंजर में डालने को कहा, उस समय तक जब प्रभु यीशु ने भीड़ के सामने रोटी तोड़ी और खाया, और उसके बाद उनके सामने भूनी हुई मछली खाया, तब ही उन्होंने सचमुच में उस सत्य को समझा कि प्रभु यीशु ही देहधारी मसीहा है। तुम लोग ऐसा कह सकते हो कि यह आध्यात्मिक देह मानो मांस और लहू के साथ उन लोगों के सामने आ खड़ा हुआ था जिसने तुरन्त ही उन्हें एक स्वप्न से जगा दिया थाः वह मनुष्य का पुत्र जो उनके सामने खड़ा था उस समय से अस्तित्व में था जिसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता था। उसका एक आकार, और माँस और हड्डी था, और वह पहले से ही मानव जाति के साथ लम्बे समय तक रह चुका था...। इस समय, लोगों ने यह महसूस किया कि उसका अस्तित्व इतना अधिक यथार्थ, और इतना अधिक अद्भुत है; वे बहुत ज़्यादा आनन्दित और प्रसन्न थे, और उसी समय भावनाओं से भी भरपूर थे। और उसकी पुनःउपस्थिति ने सचमुच में लोगों को उसकी विनम्रता को देखने, और उसकी नज़दीकी, एवं उसकी चाहत, और मानव जाति के प्रति उसके लगाव का एहसास करने की अनुमति दी। इस संक्षिप्त पुनर्मिलन ने उन लोगों को जिन्होंने प्रभु यीशु को देखा था यह एहसास कराया कि मानो एक पूरा जीवन गुज़र चुका था। उनके खोए हुए, भ्रमित, भयभीत, चिन्तित, लालायित और स्तब्ध हृदय को सुकून मिला। वे आगे से सन्देहास्पद या निराश नहीं रहे क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि अब उनके पास आशा थी और कुछ ऐसा था जिस पर वे भरोसा कर सकते थे। मनुष्य का पुत्र जो उनके सामने खड़ा था पूरी अनन्तता के लिए उनके संग रहेगा, वह उनका दृढ़ गढ़, और हमेशा के लिए उनका शरणस्थान होगा।

यद्यपि प्रभु यीशु पुनरूत्थित हो चुका था, फिर भी उसके हृदय और उसके कार्य ने मानव जाति को नहीं छोड़ा था। उसने अपने प्रकटीकरण से लोगों को बताया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किस रूप में है, वह हर समय और हर जगह लोगों का साथ देगा, उनके साथ चलेगा, और उनके साथ रहेगा। और वह हर समय और हर जगह मानव जाति के लिए प्रबन्ध करेगा और उनकी चरवाही करेगा, उन्हें अपने आप को देखने और छूने की अनुमति देगा, और यह निश्चित करेगा कि वे कभी असहाय महसूस ना करें। साथ ही प्रभु यीशु यह भी चाहता है कि लोग यह जानें: वे इस संसार में अकेले नहीं हैं। मानव जाति के पास परमेश्वर की देखरेख है, परमेश्वर उनके साथ है; लोग हमेशा परमेश्वर पर आसरा रख सकते हैं; वह अपने प्रत्येक अनुयायी का परिवार है। परमेश्वर पर आसरा रखने के लिए, मानव जाति आगे से अकेला या असहाय नहीं होगा, और जो उसे अपने पापबलि के रूप में स्वीकार करते हैं वे आगे से पाप के बन्धन में नहीं रहेंगे। मनुष्य की नज़रों में, उसके कार्य के ये भाग जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया था बहुत ही छोटी चीज़ें थीं, परन्तु जिस रीति से मैं उन्हें देखता हूँ, प्रत्येक छोटी से छोटी चीज़ भी बहुत अधिक अर्थपूर्ण थी, एवं बहुत अधिक मूल्यवान थी, और वे बहुत अधिक महत्वपूर्ण और वज़नदार थे।

यद्यपि देह में काम करने का प्रभु यीशु का समय कठिनाईयों और दुःख से भरा हुआ था, फिर भी माँस और लहू के अपने आध्यात्मिक देह के प्रकटीकरण के जरिए, उसने मानव जाति को छुड़ाने के लिए उस समय देह में अपने कार्य को पूर्णता और सिद्धता से पूरा किया था। उसने देहधारी होकर अपनी सेवकाई की शुरूआत की थी, और मनुष्यों के सामने अपने शारीरिक रूप में उपस्थित होकर उसने अपनी सेवकाई की समाप्ति की थी। उसने अनुग्रह के युग की घोषणा की, उसने मसीह के रूप में अपनी पहचान के जरिए अनुग्रह के युग की शुरूआत की थी। मसीह के रूप में अपनी पहचान के जरिए, उसने अनुग्रह के युग में अपने कार्य को पूरा किया और उसने अनुग्रह के युग में अपने सभी अनुयायियों को बलवंत किया था और उनकी अगुवाई की थी। परमेश्वर के विषय में यह कहा जा सकता है कि जब वह किसी कार्य को प्रारम्भ करता है तो वास्तव में उसे पूरा भी करता है। एक योजना है और उसके अनेक चरण हैं, जो परमेश्वर की बुद्धि, उसकी सर्वसामर्थता, और उसके अद्भुत कार्यों से भरपूर हैं। यह परमेश्वर के प्रेम और दया से भरपूर हैं। हाँ वास्तव में, परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य की मुख्य डोर है मानव जाति के लिए उसकी देखभाल; यह उसकी चिन्ता के एहसासों से सराबोर है जिसे वह कभी अलग नहीं रख सकता है। बाइबल के इन वचनों में, अपने पुनरूत्थान के बाद हर एक चीज़ में जिसे प्रभु यीशु ने किया था, जो प्रकट हुआ था वह मानव जाति के लिए परमेश्वर का ना बदलने वाला प्रेम और चिन्ता थी, साथ ही मनुष्यों के लिए परमेश्वर का अत्याधिक प्रेम और उनका पालन पोषण था। अब तक, इसमें से कुछ भी नहीं बदला है—क्या तुम लोग इसे देख सकते हो? जब तुम लोग इसे देखते हो, तो क्या तुम लोगों का हृदय स्वतः ही परमेश्वर के करीब नहीं आ जाता है? यदि तुम लोग उस युग में रहते और प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद तुम लोगों के सामने प्रकट होता, दृश्य रूप में ताकि तुम लोग देख सको, और यदि वह तुम लोगों के सामने बैठ जाता, रोटी और मछली खाता और पवित्र शास्त्र से तुम लोगों को समझाता, और तुम लोगों से बातचीत करता, तो तुम लोग कैसा महसूस करते? क्या तुम खुशी महसूस करते? दोष भावना के विषय में क्या? परमेश्वर के प्रति पिछली ग़लतफहमियाँ और उसकी अवहेलना, परमेश्वर से टकराव और उसके प्रति सन्देह—क्या वे सब ग़ायब नहीं हो जाते? क्या परमेश्वर और मनुष्य के बीच रिश्ता और अधिक उचित नहीं हो जाता?

बाइबल के इन सीमित अध्यायों की विवेचना के द्वारा, क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव में किसी खोट का पता लगाया है? क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के प्रेम में मिलावट की खोज की है! क्या तुम लोग परमेश्वर की सर्वशक्ति और बुद्धि में कोई धूर्तता या बुराई देखते हो? कदापि नहीं? अब क्या तुम लोग निश्चित तौर पर कह सकते हो कि परमेश्वर पवित्र है? क्या तुम लोग निश्चित तौर पर कह सकते हो कि परमेश्वर की भावनाएँ उसके सार और उसके स्वभाव का प्रकाशन हैं। मैं आशा करता हूँ कि इन वचनों को पढ़ने के बाद, जो कुछ तुम लोगों ने इससे समझा है उससे तुम लोगों की सहायता होगी और स्वभाव में परिवर्तन और परमेश्वर के स्वभाव का अनुसरण करने में लाभ पहुँचाएगा। मैं यह भी आशा करता हूँ कि ये वचन तुम लोगों के लिए फल उत्पन्न करेंगे जो दिन ब दिन बढ़ता ही जाएगा, इस प्रकार अनुसरण की यह प्रक्रिया तुम लोगों को परमेश्वर के और करीब ले आएगी, और उस ऊँचे स्तर के और करीब ले आएगी जिसकी आकांक्षा परमेश्वर करता है, ताकि तुम लोग आगे से सत्य के पीछे पीछे चलने में बोरियत महसूस ना करो और तुम लोग आगे से यह महसूस ना करो कि सत्य और स्वभाव में परिवर्तन का अनुसरण करना एक दुःखदायी या बेकार की चीज़ नहीं है। उसके बजाए, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और परमेश्वर के पवित्र सार की अभिव्यक्ति है जो तुम लोगों को ज्योति की लालसा करने, और न्याय की लालसा करने के लिए अभिप्रेरित करता है, और सत्य का अनुसरण करने, परमेश्वर की इच्छा की सन्तुष्टि का अनुसरण करने, और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण योग्य मनुष्य बनने, और एक वास्तविक मनुष्य बनने के लिए आकांक्षा करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

परमेश्वर है मनुष्य का अनंत सहारा

I

फिर जी उठा यीशु मगर, था इन्सान के साथ उसका काम और दिल। अपने प्रकटन के ज़रिये उसने इन्सान को बताया रूप चाहे हो जो भी, पर रहेगा वो उनके साथ ही। वो चलेगा उनके साथ, रहेगा साथ वो हर जगह, हर समय, करेगा आपूर्ति और चरवाही, देगा उन्हें खुद को देखने और छूने, ताकि न हों असहाय वे फिर कभी, वे फिर कभी। अपने पुनरुत्थान के बाद यीशु ने दिखाई इन्सान के लिए परमेश्वर की आशा और चिंता, और दिखाया कि परमेश्वर करता इन्सान की परवाह और उसे है संजोता। यह तो है पहले जैसा, और कभी नहीं है बदला।

II

यीशु चाहता था कि लोग जानें कि नहीं हैं वे इस दुनिया में अकेले। उनकी परवाह करता परमेश्वर, है वो उनके साथ में, उस पर वे सदा आसरा रख सकते हैं। अपने हर अनुयायी का वो परिवार है। परमेश्वर के आसरे, इन्सान न कमज़ोर, न अकेला है। जो उसे पाप-बलि के रूप में स्वीकार करते हैं। वो पाप के बंधन में और न रहेंगे।

III

जी उठने के बाद इन्सान के वास्ते, यीशु के काम देखने में लगते थे छोटे। लेकिन परमेश्वर के लिए उनके अर्थ थे बड़े, उनके मूल्य और महत्व भी थे बड़े। परमेश्वर जो करता है आरम्भ, उसे खत्म भी वही करता है। भिन्न चरण और योजनायें, दिखाते हैं उसकी बुद्धि, वो दिखाते हैं उसके महान कर्म और सर्वसामर्थता उसकी, और दिखाते हैं उसका प्रेम और दया भी।

IV

परमेश्वर के काम में सबसे मुख्य है कि वो इन्सान की बहुत परवाह करता है, और उसके लिए सच में है वो चिंता से भरा। ये हैं भावनाएं ऐसी जिन्हें वो अनदेखा नहीं कर सकता, कर सकता। अपने पुनरुत्थान के बाद यीशु ने दिखाई इन्सान के लिए परमेश्वर की आशा और चिंता, और दिखाया कि परमेश्वर करता इन्सान की परवाह और उसे है संजोता। यह तो है पहले जैसा, और कभी नहीं है बदला, नहीं है बदला, नहीं है बदला, नहीं है बदला।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से उद्धृत

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