परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" | अंश 75

यीशु पाँच हज़ार को भोजन कराता है

(यूहन्ना 6:8-13) उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उससे कहा, “यहाँ एक लड़का है जिसके पास जौ की पाँच रोटी और दो मछलियाँ हैं; परन्तु इतने लोगों के लिये वे क्या हैं?” यीशु ने कहा, “लोगों को बैठा दो।” उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए। तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके बैठनेवालों को बाँट दीं; और वैसे ही मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बाँट दिया। जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, “बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।” अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।

“पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ” किस प्रकार का विचार है? पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ सामान्यतः कितने लोगों के लिए काफी होंगे। यदि तुम एक औसत इंसान की भूख के आधार पर माप करोगे, तो यह केवल दो व्यक्तियों के लिए ही काफी होगा। यह ही पाँच रोटियों और दो मछलियों का मुख्य विचार है। फिर भी, यह इस अंश में लिखा है कि पाँच रोटियों और दो मछलियों ने कितने लोगों को भोजन कराया? यह पवित्र शास्त्र में इस प्रकार दर्ज हैः “उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनमें पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए।” पाँच रोटियों और दो मछलियों की तुलना में, क्या पाँच हज़ार एक बड़ी संख्या है? इसका क्या मतलब है कि यह संख्या इतनी बड़ी थी? मानवीय दृष्टिकोण से, पाँच हज़ार लोगों के बीच पाँच रोटियों और दो मछलियों को बाँटना असंभव होगा, क्योंकि उनके बीच का अंतर बहुत बड़ा है। भले ही प्रत्येक व्यक्ति बस एक छोटा सा टुकड़ा खाए, फिर भी यह पाँच हज़ार लोगों के लिए काफी नहीं होगा। परन्तु यहाँ, प्रभु यीशु ने एक चमत्कार किया—उसने ना केवल पाँच हज़ार लोगों को भरपेट भोजन कराया, बल्कि वहाँ कुछ बच भी गया था। पवित्र शास्त्र कहता हैः “जब वे खाकर तृप्‍त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, ‘बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।’ अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खानेवालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।” इस चमत्कार ने लोगों को प्रभु यीशु की पहचान और स्थिति को देखने की अनुमति दी, और इसने उन्हें यह देखने की भी अनुमति दी कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है—उन्होंने परमेश्वर की सर्वसामर्थता की सच्चाई को देखा। पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ पाँच हज़ार को भोजन कराने के लिए पर्याप्त थी, परन्तु यदि कोई भोजन ही नहीं होता तो क्या परमेश्वर पाँच हज़ार लोगों को भोजन करा सकता था? हाँ वास्तव में वह करा सकता था! यह एक चमत्कार था, लोगों ने आवश्यक रूप से महसूस किया कि यह उनके समझ से बाहर है और यह भी महसूस किया कि यह अविश्वसनीय और रहस्यमयी है, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसा कार्य करना कोई बड़ी बात नहीं थी। जबकि यह परमेश्वर के लिए एक सामान्य चीज़ थी, तो इसे अनुवाद के लिए अलग क्यों किया गया होगा? क्योंकि इस चमत्कार के पीछे प्रभु यीशु की इच्छा छिपी हुई थी, जिसे मानवजाति के द्वारा कभी भी खोजा नहीं गया था।

पहले, आओ ये समझने का प्रयास करें कि ये पाँच हज़ार लोग किस प्रकार के इंसान थे। क्या वे प्रभु यीशु के अनुयायी थे? पवित्र शास्त्र से हम जानते हैं कि वे प्रभु यीशु के अनुयायी नहीं थे। क्या वे जानते थे कि प्रभु यीशु कौन है? बिल्कुल भी नहीं! सब से कम, वे जानते ही नहीं थे कि वह व्यक्ति जो उनके सामने खड़ा है वह प्रभु यीशु था, या हो सकता है कि कुछ लोग जानते हों कि उसका नाम क्या था, और उन चीज़ों को जो उसने किया था उसके बारे में कुछ जानते हो या कुछ सुना हो। वे मात्र कहानियों के द्वारा प्रभु यीशु के विषय में उत्सुक थे, परन्तु तुम लोग निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते हो कि वे उसका अनुसरण करते थे, और उसे बिल्कुल नहीं समझते थे। जब प्रभु यीशु ने इन पाँच हज़ार लोगों को देखा, वे भूखे थे और भरपेट भोजन करने के सिवाए कुछ भी नहीं सोच सकते थे, इ इस प्रकार इस सन्दर्भ में प्रभु यीशु ने उनकी इच्छाओं को तृप्त किया था। जब उसने उनकी इच्छाओं को तृप्त किया, तो उसके हृदय में क्या था? इन लोगों के प्रति उसकी मनोवृत्ति क्या थी जो केवल भरपेट भोजन करना चाहते थे? इस समय, प्रभु यीशु के विचार और उसकी मनोवृत्तियाँ को परमेश्वर के स्वभाव और सार के साथ कार्य करना था। इन पाँच हज़ार लोगों का सामना करते हुए जो खाली पेट थे जो केवल एक बार का पूरा भोजन खाना चाहते थे, और ऐसे लोगों का सामना करते हुए जो उसके प्रति उत्सुकता और आशाओं से भरे हुए थे, प्रभु यीशु ने केवल इस चमत्कार का प्रयोग कर उन पर अनुग्रह करने के बारे में सोचा था। फिर भी, उसे यह आशा प्राप्त नहीं हुई कि वे उसके अनुयायी बन जाएँगे, क्योंकि वह जानता था कि वे मौज मस्ती करना और पेट भरकर खाना चाहते थे, इसलिए वहाँ जो कुछ उसके पास था उसने उससे अपना बेहतरीन कार्य किया, और पाँच हज़ार को भोजन कराने के लिए पाँच रोटियों और दो मछलियों का उपयोग किया। उसने उन लोगों की आँखों को खोल दिया जो मनोरंजन का आनंद ले रहे थे, और जो चमत्कार देखना चाहते थे, और उन्होंने अपनी आँखों से उन चीज़ों को देखा जिन्हें देहधारी परमेश्वर पूर्ण कर सकता था। यद्यपि प्रभु यीशु ने उनकी उत्सुकता को सन्तुष्ट करने के लिए कुछ स्पर्शगम्य चीज़ों का प्रयोग किया, क्योंकि वह पहले से ही अपने हृदय में जानता था कि ये पाँच हज़ार लोग बस एक बढ़िया भोजन करना चाहते थे, इसलिए उसने उन्हें कुछ भी नहीं कहा या उन्हें बिल्कुल भी प्रचार नहीं किया—उसने बस उन्हें उस चमत्कार को घटित होते हुए देखने दिया। उसने इन लोगों से बिल्कुल वैसा बर्ताव नहीं किया जैसा वह अपने चेलों के साथ करता था जो सचमुच में उसका अनुसरण करते थे, परन्तु परमेश्वर के हृदय में, सभी जीवधारी उसके शासन के अधीन थे, और वह अपनी दृष्टि में सभी जीवधारियों को जब जरूरी हो परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने की अनुमति देता था। भले ही ये लोग नहीं जानते थे कि वह कौन था या वे उसे समझते नहीं थे, या रोटियों और मछलियों को खाने के बाद उनके ऊपर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं था या परमेश्वर के प्रति उनके पास कोई धन्यवाद नहीं था, फिर भी यह कुछ ऐसा नहीं था जिससे परमेश्वर को परेशानी हो—उसने उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने के लिए एक बढ़िया अवसर दिया था। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर जो भी करता है उसके प्रति वह सैद्धांतिक होता है, और वह अविश्वासियों की निगरानी या उनकी सुरक्षा नहीं करता है, और वह विशेष रूप से उन्हें अपने अनुग्रह का आनंद उठाने की अनुमति नहीं देता है। क्या मामला वास्तव में ऐसा ही है? परमेश्वर की नज़रों में, जब तक वे एक जीवित प्राणी हैं जिन्हें स्वयं उसने ही बनाया है, वह उनके लिए प्रबन्ध करता रहेगा और उनकी परवाह करता रहेगा; वह उनसे व्यवहार करेगा, उनके लिए योजना बनाएगा, और विभिन्न तरीकों से उन पर शासन करेगा। ये सभी चीज़ों के प्रति परमेश्वर के विचार और उसकी प्रवृत्ति हैं।

यद्यपि पाँच हज़ार लोग जिन्होंने रोटियों और मछलियों को खाया था उन्होंने प्रभु यीशु का अनुसरण करने की योजना नहीं बनाई थी, फिर भी वह उनके प्रति कठोर नहीं था; एक बार जब उन्होंने भर पेट खा लिया, तो क्या तुम लोग जानते हो कि प्रभु यीशु ने क्या किया था? क्या उसने उनको कुछ प्रचार किया? इसे करने के बाद वह कहाँ गया था? पवित्र शास्त्र मे ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है कि प्रभु यीशु ने उनसे कुछ कहा था; जब उसने अपने चमत्कार पूर्ण कर लिए तो वह चुपके से चला गया। तो क्या उसने इन लोगों से कुछ अपेक्षाएँ कीं? क्या वहाँ कोई नफरत थी? वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था—वह बस इन लोगों पर जो उसका अनुसरण नहीं कर सकते थे आगे से कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, और इस समय उसका हृदय दर्द में था। क्योंकि उसने मानवजाति की भ्रष्टता को देखा था और उसने मानवजाति के द्वारा ठुकराए जाने का एहसास किया था, और जब उसने इन लोगों को देखा या जब वह उनके साथ था, तो मनुष्य की मूढ़ता और अज्ञानता ने उसे बहुत ही दुखी कर दिया और उसके हृदय को दर्द में छोड़ दिया था, इसलिए वह इन लोगों को जितना जल्दी हो सके छोड़कर चला जाना चाहता था। प्रभु को अपने हृदय में इनसे कोई अपेक्षाएँ नहीं थीं, वह उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, विशेषकर वह उन पर अपनी ऊर्जा को खर्च करना नहीं चाहता था, और वह जानता था कि वे उसके पीछे पीछे नहीं आएँगे—इन सभी के बावजूद भी, तब भी उनके प्रति उसकी मनोवृत्तियाँ बिल्कुल साफ थी। वह बस उनके साथ अच्छा बर्ताव करना चाहता था, उन्हें अनुग्रह देना चाहता था—अपने शासन के अधीन प्रत्येक जीवधारी के प्रति यह परमेश्वर की प्रवृत्ति थीः प्रत्येक जीवधारी के साथ अच्छा बर्ताव करना, उनके लिए प्रयोजन करना, उनका पालन पोषण करना। वह मुख्य कारण जिसके लिए प्रभु यीशु ने देहधारण किया था, उसने बहुत ही प्राकृतिक ढंग से स्वयं परमेश्वर के सार को प्रकाशित किया था और इन लोगों के साथ अच्छा बर्ताव किया था। उसने उनसे दया और सहिष्णुता के हृदय के साथ अच्छा व्यवहार किया था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इन लोगों ने प्रभु यीशु को किस प्रकार देखा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वहाँ किस प्रकार का परिणाम होगा, उसने बस हर प्राणी के साथ समस्त सृष्टि के प्रभु के रूप में अपने पद के आधार पर व्यवहार किया। उसने जो प्रकट किया वह था, बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर का स्वभाव, और परमेश्वर का स्वरूप इस प्रकार प्रभु यीशु ने खामोशी से कुछ किया था, फिर वह खामोशी से चला गया—यह परमेश्वर के स्वभाव का कौन सा पहलू है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह परमेश्वर की करूणा है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि परमेश्वर निःस्वार्थ है? क्या कोई नियमित व्यक्ति ऐसा कर सकता है? निश्चित रूप से नहीं! सार रूप में, ये पाँच हज़ार लोग कौन थे जिन्हें प्रभु यीशु ने पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ खिलायी थीं? क्या तुम लोग कह सकते हो कि वे ऐसे लोग थे जो उसके अनुकूल थे? क्या तुम लोग कह सकते हो कि वे सभी परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण थे? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि वे वास्तव में प्रभु यीशु के अनुरूप नहीं थे, और उनका सार बिल्कुल परमेश्वर के विरूद्ध था। परन्तु परमेश्वर ने उनसे कैसा बर्ताव किया था? उसने परमेश्वर के प्रति लोगों के विरोध को थोड़ा कम करने के लिए एक तरीके का प्रयोग किया था—इस तरीके को कहते हैं “कृपालुता।” अर्थात्, यद्यपि प्रभु यीशु ने उन्हें पापियों के रूप में देखा था, फिर भी परमेश्वर की नज़रों में वे तब भी उसकी रचना थे, इस प्रकार उसने इन पापियों से भी कृपा के साथ व्यवहार किया था। यह परमेश्वर की सहनशक्ति है, और इस सहनशक्ति का निर्धारण स्वयं परमेश्वर की पहचान और सार से किया जाता है। इस प्रकार, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर के द्वारा सृजे गए किसी भी मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है—केवल परमेश्वर ही इसे कर सकता है।

— “वचन देह में प्रकट होता है” से उद्धृत

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