परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" | अंश 72

प्रत्येक जिस ने बाइबल पढ़ा है जानता है कि बहुत सी चीज़ें घटित हुई थीं जब यीशु का जन्म हुआ था। उनमें से सब से बड़ा था शैतानों के राजा द्वारा मार गिराया जाना, यहाँ तक कि उस बिन्दु तक जहाँ सारे बच्चों को जो दो वर्ष या उस से नीचे के थे उन्हें मारा जा रहा था। यह प्रकट है कि मनुष्यों के बीच देहधारी होकर परमेश्वर ने बड़े जोखिम का अनुमान लगा लिया था; और यह भी प्रकट है कि मानव जाति को बचाने के उसके प्रबन्ध को पूरा करने के लिए उसने एक बड़ी कीमत चुकाई है। वे बड़ी आशाएँ जो परमेश्वर को अपने कार्य के ऊपर थी जिसे उसने देह में होकर मानव जाति के मध्य किया था वे भी प्रकट थे। जब परमेश्वर का देह मानव जाति के मध्य अपने कार्य को लेने में सक्षम हुआ, तो वह कैसा महसूस कर रहा था? लोगों को उसे थोड़ा बहुत समझना चाहिए, सही है? कम से कम परमेश्वर प्रसन्न था क्योंकि वह मानव जाति के मध्य अपने नए कार्य के विकास को प्रारम्भ कर सकता था। जब प्रभु यीशु ने बपतिस्मा लिया था और अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए आधिकारिक रूप से अपने कार्य को प्रारम्भ किया, तो परमेश्वर का हृदय आनन्द से भर गया क्योंकि इतने सालों के इन्तज़ार और तैयारी के बाद वह अंततः एक औसत इन्सान की देह को पहन सकता था और लहू और माँस के एक मनुष्य के रूप में अपने नए कार्य को प्रारम्भ कर सकता था जिसे लोग देख और छू सकते थे। वह अंततः मनुष्य की पहचान के द्वारा लोगों के साथ आमने सामने और दिल से दिल मिला कर बात कर सकता था। परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से मानव जाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मानव जाति की जरूरतों को पूरा कर सकता था, उन्हें प्रकाशमान कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह एक ही मेज़ पर बैठ कर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को भी देख सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और जैसा मनुष्य देखते हैं उस तरह हर चीज़ को देख सकता था और वो भी स्वयं अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में उसके कार्य की उसकी पहली विजय थी। ऐसा भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—यह वास्तव में वह था जिसके बारे में परमेश्वर सब से अधिक प्रसन्न था। तब से यह पहली बार था जब परमेश्वर ने मानव जाति के मध्य अपने कार्य में एक प्रकार का सुकून महसूस किया। यह सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और बहुत स्वाभाविक थी, और वह सुकून जो परमेश्वर ने महसूस किया था वह बहुत ही सच्चा था। मानव जाति के लिए, जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया स्तर पूरा होता था, और जब भी परमेश्वर संतुष्टि का एहसास करता था, वह तब होता था जब मानव जाति परमेश्वर के करीब आती थी, और जब लोग उद्धार के निकट आते थे। परमेश्वर के लिए, यह उस के नए कार्य की शुरूआत है, जब उसकी प्रबन्धकीय योजना ने एक कदम आगे बढा़या है, और इस के अतिरिक्त, जब उस की इच्छा पूर्ण निष्पादन तक पहुँचेगी। मानवजाति के लिए, इस प्रकार के अवसर का आगमन सौभाग्यशाली, और बहुत अच्छा है; उन सब के लिए जो परमेश्वर के उद्धार की बाट जोहते हैं, यह एक महत्वपूर्ण समाचार है। जब परमेश्वर कार्य के एक नए स्तर को करता है, तब वह एक नई शुरूआत करता है, और जब मानव जाति के मध्य इस नए कार्य और नई शुरूआत का आरम्भ और परिचय हो जाता है, यह तब होता है जब पहले से ही इस कार्य के स्तर के परिणाम को निर्धारित कर लिया जाता है, और इसे पूर्ण कर लिया जाता है, और परमेश्वर पहले से ही उसके प्रभावों और फलों को देख लेता है। यह तब भी होता है जब ये प्रभाव परमेश्वर को सन्तुष्टि का एहसास दिलाते हैं, और तब वास्तव में उसका हृदय प्रसन्न होता है। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में उसने पहले से ही उन लोगों को निर्धारित कर दिया है जिन्हें वह ढूँढ़ रहा है, और पहले से ही इस समूह को प्राप्त कर लिया है, एक ऐसा समूह जो उसके कार्य को करने में सक्षम है और उसे सन्तुष्टि प्रदान कर सकता है, परमेश्वर पुनः आश्वासन का एहसास करता है, वह अपनी चिन्ताओं को दरकिनार करता है, और वह प्रसन्नता का एहसास करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्य के मध्य एक नए कार्य की साहसिक यात्रा पर जाने को सक्षम हो जाता है, और वह उस कार्य को करना प्रारम्भ कर देता है जिसे उसे बिना किसी अड़चन के करना होगा, और जब उस को यह एहसास होता है कि सब कुछ पूर्ण किया जा चुका है, तो उसने उसके अन्त को पहले से ही देख लिया है। और इस अन्त के कारण वह सन्तुष्ट है, प्रसन्न दिल है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग उसकी कल्पना कर सकते हो? क्या परमेश्वर रोयेगा? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? वह गीत कौन सा होगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुन्दर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, एक गीत जो उसके हृदय के आनन्द और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता है। वह उसे मानव जाति के लिए गा सकता है, अपने आपके लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब कुछ सामान्य है क्योंकि परमेश्वर के पास आनन्द और दुःख दोनों हैं, और उसके विभिन्न एहसासों को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। यह उसका अधिकार है और यह बिल्कुल सामान्य चीज़ है। तुम लोगों को इसके बारे में कुछ और नहीं सोचना चाहिए, और तुम लोगों को उसकी प्रसन्नता या उसके किसी भी एहसास को सीमित करने के लिए उससे यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह नहीं करना चाहिए या उस तरह नहीं करना चाहिए, तुम लोगों को अपने स्वयं के निषेधों को परमेश्वर पर थोपना नहीं चाहिए। लोगों के हृदयों में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता है, वह आँसू नहीं बहा सकता है, वह विलाप नहीं कर सकता है—वह किसी भावना को व्यक्त नहीं कर सकता है। जिन बातों के द्वारा हमने इन दो बार संवाद किया, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब और इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को अनुमति दोगे कि उसके पास कुछ स्वतन्त्रता और राहत हो। यह बहुत ही अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की उदासी को महसूस करने में सक्षम हो जाते हो जब तुम उसकी उदासी के बारे में सुनते हो, और तुम लोग सचमुच में उसकी प्रसन्नता को महसूस करने में सक्षम हो जाते हो जब तुम लोग उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनते हो—कम से कम, तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ हो गए हो कि क्या परमेश्वर को प्रसन्न करता है और क्या उसे उदास करता है—जब तुम यह महसूस करने में समर्थ हो जाते हो कि तुम उदास हो क्योंकि परमेश्वर उदास है, तुम प्रसन्न हो क्योंकि परमेश्वर प्रसन्न है, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और आगे से उसके साथ कोई अड़चन नहीं होगी। तुम आगे से मानवीय कल्पनाओं, विचार धारणाओं, और ज्ञान के द्वारा परमेश्वर को विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय, परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और सजीव होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम्हारे पास इस प्रकार की आकांक्षाएँ हैं। क्या तुम लोगों को विश्वास है कि तुम लोग इसे प्राप्त कर सकते हो?

— “वचन देह में प्रकट होता है” से उद्धृत

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