परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 56

हालाँकि परमेश्वर मनुष्य से छिपा हुआ है, फिर भी सभी चीज़ों के मध्य उसके कार्य मनुष्य के लिए पर्याप्त हैं कि वह परमेश्वर को जान सके

अय्यूब ने परमेश्वर के चेहरे को नहीं देखा था, या परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को नहीं सुना था, और उसने व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के कार्य का अनुभव तो बिलकुल भी नहीं किया था, परन्तु परमेश्वर के प्रति उसके भय एवं अपनी परीक्षाओं के मध्य उसकी गवाही को सभी लोगों के द्वारा देखा गया था, और परमेश्वर के द्वारा उनसे प्रेम किया गया है, उनमें आनन्द मनाया गया है, और उनकी प्रशंसा की गई है, और लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं और उनकी तारीफ करते हैं, और इसके अतिरिक्त, उनका गुणगान करते हैं। उसके जीवन के विषय में कुछ भी महान या असाधारण नहीं था: बिलकुल किसी साधारण मनुष्य के समान, उसने एक साधारण जीवन जीया था, सूर्य उगने पर काम पर जाना और सूर्य अस्त होने पर अपने घर पर विश्राम के लिए वापस आना। अन्तर यह है कि इन अनेक साधारण दशकों के दौरान, उसने परमेश्वर के मार्ग के भीतर एक अंतर्दृष्टि हासिल की थी, और परमेश्वर की महान सामर्थ्य एवं संप्रभुता का एहसास किया और उसे समझा था, जैसा किसी और व्यक्ति ने कभी भी नहीं किया था। वह किसी भी साधारण मनुष्य की अपेक्षा चतुर नहीं था, उसका जीवन खासतौर पर कठिन नहीं था, इसके अतिरिक्त, न ही उसके पास विशेष अदृश्य कुशलताएं थीं। हालाँकि जो उसने धारण किया था वह ऐसा व्यक्तित्व था जो ईमानदार, उदार, एवं सीधा था, एक ऐसा व्यक्तित्व जो निष्पक्षता एवं धार्मिकता से प्रेम करता था, और जो सकारात्मक चीज़ों से प्रेम करता था—जिनमें से कुछ भी अधिकांश सामान्य लोगों के द्वारा धारण नहीं किया जाता है। उसने प्रेम एवं घृणा के मध्य अन्तर किया, उसके पास न्याय का एक एहसास था, वह अडिग एवं दृढ़ था, और वह अपने विचारों में परिश्रमी था, और इस प्रकार पृथ्वी पर अपने साधारण समय के दौरान उसने उन सभी असाधारण चीज़ों को देखा जिन्हें परमेश्वर ने किया था, और उसने परमेश्वर की महानता, पवित्रता एवं धार्मिकता को देखा, उसने मनुष्य के लिए परमेश्वर की चिंता, कृपालुता, और सुरक्षा को देखा था, और उसने सर्वोच्च परमेश्वर की प्रतिष्ठिता एवं अधिकार को भी देखा था। अय्यूब क्यों इन चीज़ों को हासिल कर सका जो किसी भी साधारण मनुष्य से परे थीं इसका पहला कारण था क्योंकि उसके पास एक शुद्ध हृदय था, और उसका हृदय परमेश्वर से सम्बन्धित था, और उसकी अगुवाई सृष्टिकर्ता के द्वारा की गई थी। दूसरा कारण था उसका अनुसरण: निर्दोष, एवं सिद्ध होने के लिए अय्यूब का अनुसरण, और ऐसा व्यक्ति जो स्वर्ग की इच्छा को माने, जिसे परमेश्वर के द्वारा प्रेम किया जाए, और जो बुराई से दूर रहे। अय्यूब ने परमेश्वर को देखने या परमेश्वर के वचनों को सुनने में असमर्थ होते हुए भी इन चीज़ों को धारण एवं इनका अनुसरण किया; हालाँकि उसने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, फिर भी वह उन माध्यमों को जान गया था जिनके द्वारा वह सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है; और वह उस बुद्धि को समझ गया था जिसके तहत परमेश्वर ऐसा करता है। हालाँकि उसने परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों को कभी नहीं सुना था, फिर भी अय्यूब जानता था कि मनुष्य को प्रतिफल देने और मनुष्य से ले लेने के सभी कार्य परमेश्वर की ओर से आते हैं। हालाँकि उसके जीवन के वर्ष किसी भी साधारण मनुष्य से अलग नहीं थे, फिर भी उसने अपने जीवन की असाधारणता को सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के अपने ज्ञान को प्रभावित करने, या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग के अपने अनुसरण को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी थी। उसकी दृष्टि में, सभी चीज़ों के नियम परमेश्वर के कार्यों से भरे हुए थे, और परमेश्वर की संप्रभुता को किसी व्यक्ति के जीवन के किसी भी भाग में देखा जा सकता था। उसने परमेश्वर को नहीं देखा था, परन्तु वह यह महसूस कर सकता था कि परमेश्वर के कार्य हर जगह हैं, और पृथ्वी पर अपने साधारण समय के दौरान, वह अपने जीवन के प्रत्येक कोने में परमेश्वर के असाधारण एवं अद्भुत कार्यों को देखने में सक्षम था, और परमेश्वर के अद्भुत इंतज़ामों को देख सकता था। परमेश्वर की गोपनीयता एवं खामोशी ने अय्यूब के द्वारा परमेश्वर के कार्यों के एहसास को बाधित नहीं किया, न ही इसने सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के उसके ज्ञान को प्रभावित किया था। उसका जीवन परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों का एहसास करना था, जो उसके प्रतिदिन के जीवन के दौरान सभी चीज़ों के मध्य छिपा हुआ था। अपने प्रतिदिन के जीवन में उसने उस परमेश्वर के हृदय की आवाज़ और वचनों को भी सुना एवं समझा था, जो सभी चीज़ों के मध्य खामोश है, फिर भी अपने हृदय की आवाज़ और वचनों को सभी चीज़ों के नियमों के शासन के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। तो तूने देखा कि यदि लोगों के पास अय्यूब के समान ही मानवता एवं अनुसरण होता, तो वे भी अय्यूब के समान ही उसी एहसास एवं ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं, और अय्यूब के समान ही सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता की वही समझ एवं ज्ञान को अर्जित कर सकते हैं। परमेश्वर अय्यूब पर प्रकट नहीं हुआ था या उससे बातचीत नहीं की थी, परन्तु अय्यूब खरा एवं सीधा, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के योग्य था। दूसरे शब्दों में, बिना परमेश्वर के प्रकट हुए या मनुष्य से बात किए, सभी चीज़ों के मध्य परमेश्वर के कार्य और सभी चीज़ों के ऊपर उसकी संप्रभुता किसी मनुष्य के लिए पर्याप्त है ताकि वह परमेश्वर के अस्तित्व, सामर्थ्य और अधिकार को जान सके, और परमेश्वर की सामर्थ्य एवं अधिकार काफी है कि ऐसे मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करवाए। जबकि अय्यूब जैसा साधारण मनुष्य परमेश्वर के भय और बुराई के परित्याग को हासिल करने के योग्य था, तो हर एक साधारण मनुष्य जो परमेश्वर का अनुसरण करता है उसे भी इस योग्य होना चाहिए। हालाँकि ये शब्द एक तर्कसंगत अनुमान के समान सुनाई दे सकते हैं, फिर भी ये परिस्थितियों के नियमों का उल्लंधन नहीं करते हैं। फिर भी ये तथ्य अपेक्षाओं से मेल नहीं खाते हैं: परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना, ऐसा प्रतीत होता है कि, यह अय्यूब का और केवल अय्यूब का ही निरन्तर प्रयास है। "परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने" का जिक्र होने पर लोग सोचते हैं कि इसे केवल अय्यूब के द्वारा ही किया जाना चाहिए, मानो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की नामपट्टी को अय्यूब के नाम के साथ चिपका दिया गया था और दूसरों से इसका कोई वास्ता नहीं था। इसका कारण स्पष्ट हैः क्योंकि केवल अय्यूब ही इस प्रकार का व्यक्तित्व रखता था जो ईमानदार, उदार, एवं सीधा था, और जो निष्पक्षता एवं धार्मिकता और उन चीज़ों से प्रेम करता था जो सकारात्मक थीं, इस प्रकार केवल अय्यूब ही परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण कर सकता था। तुम सभी ने यहाँ पर निहित अर्थ को समझ लिया होगा—जो यह है क्योंकि कोई भी ऐसी मानवता को धारण नहीं करता है जो सच्चा, उदार, एवं सीधा है, और जो निष्पक्षता एवं धार्मिकता और उससे प्रेम करता है जो सकारात्मक है, कोई भी परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर नहीं रह सकता है, और इस प्रकार वे कभी परमेश्वर के आनन्द को प्राप्त नहीं कर सकते हैं या परीक्षाओं के बीच में दृढ़ता से स्थिर खड़े नहीं रह सकते हैं। जिसका मतलब यह भी है कि, अय्यूब को छोड़कर, सभी लोगों को अब भी शैतान के द्वारा बांधा एवं जाल में फंसाया जाता है, उनके द्वारा उन सबों पर दोषारोपण, आक्रमण एवं उनका शोषण किया गया है, और वे ऐसे लोग हैं जिन्हें शैतान निगलने की कोशिश करता है, और उन सभी को बिना किसी स्वतन्त्रता के शैतान के द्वारा बंधुआई में ले जाया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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