परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 27

जलप्रलय के बाद नूह के लिए परमेश्वर की आशीष

(उत्पत्ति 9:1-6) फिर परमेश्‍वर ने नूह और उसके पुत्रों को आशीष दी और उनसे कहा, "फूलो-फलो, और बढ़ो, और पृथ्वी में भर जाओ। तुम्हारा डर और भय पृथ्वी के सब पशुओं, और आकाश के सब पक्षियों, और भूमि पर के सब रेंगनेवाले जन्तुओं, और समुद्र की सब मछलियों पर बना रहेगा: ये सब तुम्हारे वश में कर दिए जाते हैं। सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे; जैसा तुम को हरे हरे छोटे पेड़ दिए थे, वैसा ही अब सब कुछ देता हूँ। पर मांस को प्राण समेत अर्थात् लहू समेत तुम न खाना। और निश्‍चय ही मैं तुम्हारे लहू अर्थात् प्राण का बदला लूँगा: सब पशुओं और मनुष्यों, दोनों से मैं उसे लूँगा; मनुष्य के प्राण का बदला मैं एक एक के भाई बन्धु से लूँगा। जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा उसका लहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा, क्योंकि परमेश्‍वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया है।"

नूह ने परमेश्वर के निर्देशों को स्वीकार किया और जहाज़ बनाया और उन दिनों के दौरान जीवित रहा जब परमेश्वर ने संसार का नाश करने के लिए जलप्रलय का उपयोग किया उसके पश्चात, आठ लोगों का उसका पूरा परिवार जीवित बच गया। नूह के परिवार के आठ लोगों को छोड़कर, सारी मानवजाति का नाश कर दिया गया था, और पृथ्वी पर सभी जीवित प्राणियों का नाश कर दिया गया था। नूह के लिए, परमेश्वर ने उसे आशीषें दीं, और उससे और उसके बेटों से कुछ बातें कहीं। ये बातें वे थीं जिन्हें परमेश्वर उन्हें प्रदान कर रहा था और उसके लिए परमेश्वर की आशीष भी थी। यह वह आशीष एवं प्रतिज्ञा है जिसे परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति को देता है जो उसे ध्यान से सुन सकता है और उसके निर्देशों को स्वीकार कर सकता था, और साथ ही ऐसा तरीका भी है जिससे परमेश्वर लोगों को प्रतिफल देता है। कहने का तात्पर्य है, इसके बावजूद कि नूह परमेश्वर की दृष्टि में एक सिद्ध पुरुष था या एक धर्मी पुरुष था, और इसके बावजूद कि वह परमेश्वर के बारे में कितना कुछ जानता था, संक्षेप में, नूह और उसके तीन पुत्र सभी ने परमेश्वर के वचनों को सुना था, परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग किया था, और वही किया था जिसे उनसे परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार करने की अपेक्षा की गई थी। परिणामस्वरूप, जलप्रलय के द्वारा संसार के विनाश के बाद उन्होंने मनुष्यों एवं विभिन्न प्रकार के जीवित प्राणियों को पुनः प्राप्त करने में परमेश्वर की सहायता की थी, और परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के अगले चरण में बड़ा योगदान दिया था। वह सब कुछ जो उसने किया था उसके कारण, परमेश्वर ने उसे आशीष दी थी। शायद आज के लोगों के लिए, जो कुछ नूह ने किया था वह उल्लेख करने के भी लायक नहीं है। कुछ लोग सोच सकते हैं: नूह ने कुछ भी नहीं किया था; परमेश्वर ने उसे बचाने के लिए अपना मन बना लिया था, अतः उसे निश्चित रूप से बचाया जाना था। उसके जीवित बचने का श्रेय उसे नहीं जाता है। यह वह है जिसे परमेश्वर घटित करना चाहता था, क्योंकि मनुष्य निष्क्रिय है। लेकिन यह वह नहीं है जो परमेश्वर सोच रहा था। परमेश्वर के लिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति महान है या मामूली, जब तक वे उसे ध्यान से सुन सकते हैं, उसके निर्देशों और जो कुछ वह सौंपता है उसका पालन कर सकते हैं, और उसके कार्य, उसकी इच्छा एवं उसकी योजना के साथ सहयोग कर सकते हैं, ताकि उसकी इच्छा एवं उसकी योजना को निर्विघ्नता से पूरा किया जा सके, तो ऐसा आचरण उसके द्वारा उत्सव मनाए जाने के योग्य है और उसकी आशीष को प्राप्त करने के योग्य है। परमेश्वर ऐसे लोगों को मूल्यवान जानकर सहेजकर रखता है, और वह उनके कार्यों एवं अपने लिए उनके प्रेम एवं उनके स्नेह को ह्रदय में संजोता है। यह परमेश्वर की मनोवृत्ति है। तो परमेश्वर ने नूह को आशीष क्यों दी? क्योंकि परमेश्वर इसी तरह से ऐसे कार्यों एवं मनुष्य की आज्ञाकारिता से व्यवहार करता है।

नूह के विषय में परमेश्वर की आशीष के लिहाज से, कुछ लोग कहेंगे: "यदि मनुष्य परमेश्वर को ध्यान से सुनता है और परमेश्वर को संतुष्ट करता है, तो परमेश्वर को मनुष्य को आशीष देना चाहिए। क्या यह स्पष्ट नहीं है?" क्या हम ऐसा कह सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं: "नहीं।" हम ऐसा क्यों नहीं कह सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं: "मनुष्य परमेश्वर की आशीष का आनन्द उठाने के लायक नहीं है।" यह पूर्णतः सही नहीं है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति जो कुछ परमेश्वर सौंपता है उसे स्वीकार करता है, तो परमेश्वर के पास न्याय करने के लिए एक मापदंड होता है कि उस व्यक्ति के कार्य अच्छे हैं या बुरे और यह कि उस व्यक्ति ने आज्ञा का पालन किया है या नहीं, और यह कि उस व्यक्ति ने परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट किया है या नहीं और यह कि जो कुछ वे करते हैं वे उपयुक्त हैं या नहीं। परमेश्वर जिसकी परवाह करता है वह किसी व्यक्ति का हृदय है, न कि सतह पर किए गए उनके कार्य। स्थिति ऐसी नहीं है कि परमेश्वर को किसी व्यक्ति को तब तक आशीष देना चाहिए जब तक वे इसे करते हैं, इसके बावजूद कि वे इसे कैसे करते हैं। यह परमेश्वर के बारे में लोगों की ग़लतफ़हमी है। परमेश्वर सिर्फ चीज़ों के अंत के परिणाम को ही नहीं देखता, बल्कि इस पर अधिक जोर देता है कि किसी व्यक्ति का हृदय कैसा है और चीज़ों के विकास के दौरान किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति कैसी है, और यह देखता है कि उनके हृदय में आज्ञाकारिता, विचार, एवं परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा है या नहीं। उस समय नूह परमेश्वर के विषय में कितना जानता था? क्या यह उतना था जितने ये सिद्धान्त हैं जिन्हें अब तुम लोग जानते हो? उस सच्चाई के पहलुओं के सम्बन्ध में जैसे परमेश्वर की अवधारणाएँ एवं उसका ज्ञान, क्या उसने उतनी सिंचाई एवं चरवाही पाई थी जितनी तुम लोगों ने पाई है? नहीं, उसने नहीं पाई! लेकिन एक तथ्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता है: चेतना में, मस्तिष्कों में, और यहाँ तक कि आज के लोगों के हृदयों की गहराई में भी, परमेश्वर के विषय में उनकी अवधारणाएँ और मनोवृत्ति धुंधली एवं अस्पष्ट है। तुम लोग यहाँ तक कह सकते हो कि लोगों का एक हिस्सा परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति एक नकारात्मक मनोवृत्ति को थामे हुए है। लेकिन नूह के हृदय एवं चेतना में, परमेश्वर का अस्तित्व पूर्ण एवं बिना किसी सन्देह के था, और इस प्रकार परमेश्वर के प्रति उसकी आज्ञाकारिता अमिश्रित थी और परीक्षा का सामना कर सकती थी। परमेश्वर के प्रति उसका हृदय शुद्ध एवं खुला हुआ था। उसे परमेश्वर के हर एक वचन का अनुसरण करने हेतु अपने आपको आश्वस्त करने के लिए सिद्धान्तों के बहुत अधिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं थी, न ही उसे परमेश्वर के अस्तित्व को साबित करने के लिए बहुत सारे तथ्यों की आवश्यकता थी, ताकि जो कुछ परमेश्वर ने सौंपा था वह उसे स्वीकार कर सके और जो कुछ भी करने के लिए परमेश्वर ने उसे अनुमति दी थी वह उसे करने के योग्य हो सके। यह नूह और आज के लोगों के बीच आवश्यक अन्तर है, और साथ ही यह बिलकुल सही परिभाषा भी है कि परमेश्वर की दृष्टि में एक सिद्ध पुरुष कैसा होता है। जो परमेश्वर चाहता है वह नूह के समान लोग हैं। वह उस प्रकार का व्यक्ति है जिसकी प्रशंसा परमेश्वर करता है, और बिलकुल उसी प्रकार का व्यक्ति है जिसे परमेश्वर आशीष देता है। क्या तुम लोगों ने इससे कोई अद्भुत प्रकाशन प्राप्त किया है? लोग मनुष्यों को बाहर से देखते हैं, जबकि जो कुछ परमेश्वर देखता है वह लोगों के हृदय एवं उनके सार हैं। परमेश्वर किसी को भी अपने प्रति अधूरा-मन या सन्देह रखने की अनुमति नहीं देता है, न ही वह लोगों को किसी रीति से उस पर सन्देह करने या उसकी परीक्षा लेने की इजाज़त देता है। इस प्रकार, हालाँकि आज लोग परमेश्वर के वचन के आमने-सामने हैं, या तुम लोग यह भी कह सकते हो कि परमेश्वर के आमने-सामने हैं, फिर भी किसी चीज़ के कारण जो उनके हृदयों की गहराई में है, उनके भ्रष्ट मूल-तत्व के अस्तित्व, और उसके प्रति उनकी प्रतिकूल मनोवृत्ति के कारण, परमेश्वर में उनके सच्चे विश्वास से उन्हें अवरोधित किया गया है, और उसके प्रति उनकी आज्ञाकारिता में उन्हें बाधित किया गया है। इस कारण, यह उनके लिए बहुत कठिन है कि वे उसी आशीष को हासिल करें जिसे परमेश्वर ने नूह को प्रदान किया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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