परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 20

वास्तव में, परमेश्वर का स्वभाव सब के लिए खुला हुआ है और यह छिपा हुआ नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने जान-बूझकर कभी भी किसी व्यक्ति को दूर नहीं किया है और उसने कभी भी जान-बूझकर स्वयं को छिपाने का प्रयास नहीं किया है जिससे लोग उसे जानने या समझने के योग्य नहीं हो पाएँगे। परमेश्वर का स्वभाव हमेशा से ही खुला हुआ है और हमेशा से ही खुले तौर पर प्रत्येक व्यक्ति का सामना करता आया है। परमेश्वर के प्रबंधन के दौरान, परमेश्वर अपना कार्य करता है, प्रत्येक का सामना करता है; और उसका कार्य हर एक व्यक्ति पर किया जाता है। जब वह यह कार्य करता है, तो वह लगातार अपने स्वभाव को प्रकट करता है, और वह हर एक व्यक्ति की अगुवाई एवं आपूर्ति करने के लिए लगातार अपने सार का और जो स्वरूप का उपयोग करता है। हर युग में और हर चरण पर, इसके बावजूद कि परिस्थितियाँ अच्छी हैं या बुरी, परमेश्वर का स्वभाव प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुला होता है, और उसका स्वरूप एवं अस्तित्व प्रत्येक व्यक्ति के लिए हमेशा खुले होते हैं, उसी रीति से उसका जीवन लगातार एवं बिना रुके मानवजाति के लिए आपूर्ति कर रहा है और मानवजाति को सहारा दे रहा है। इस सब के बावजूद, परमेश्वर का स्वभाव कुछ लोगों के लिए छुपा रहता है। यह ऐसा क्यों हैं? यह इसलिए है क्योंकि भले ही ये लोग परमेश्वर के कार्य के अंतर्गत रहते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी परमेश्वर को समझने का प्रयास या परमेश्वर को जानने की इच्छा नहीं की है, परमेश्वर के निकट आने की तो बात ही छोड़ दीजिए। इन लोगों के लिए, परमेश्वर के स्वभाव को समझने का अर्थ है कि उनका अंत आ रहा है; इसका अर्थ है कि परमेश्वर के स्वभाव के द्वारा उनका न्याय किया जाने वाला है और उन्हें दोषी ठहराया जानेवाला है। इसलिए, इन लोगों ने कभी भी परमेश्वर या उसके स्वभाव को समझने की इच्छा नहीं की है, और उन्होंने परमेश्वर की इच्छा की गहरी समझ या ज्ञान की लालसा नहीं की है। वे सचेत सहयोग के माध्यम से परमेश्वर की इच्छा को समझने का इरादा नहीं करते हैं—वे तो बस सदा मौज-मस्ती करते हैं और उन कार्यों को करते हुए कभी नहीं थकते हैं जिन्हें वे करना चाहते हैं; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जिसमें वे विश्वास करना चाहते हैं; वे ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जो केवल उनकी कल्पनाओं में ही मौजूद है, ऐसा परमेश्वर जो केवल उनकी अवधारणाओं में ही मौजूद है; और ऐसे परमेश्वर में विश्वास करते हैं जिसे उनके दैनिक जीवन में उनसे अलग नहीं किया जा सकता है। जब स्वयं सच्चे परमेश्वर की बात आती है, तो वे पूर्णतः उपेक्षापूर्ण हो जाते हैं, उसे समझने के लिए, एवं उस पर ध्यान देने के लिए उनमें कोई इच्छा नहीं होती है, और उनके पास उसके करीब आने का इरादा तो बिलकुल भी नहीं होता है। वे स्वयं की अनदेखी करने के लिए, एवं स्वयं को विशेष रीति से प्रस्तुत करने के लिए उन वचनों का उपयोग कर रहे हैं जिन्हें परमेश्वर अभिव्यक्त करता है। उनके लिए, यह उनको पहले से ही सफल विश्वासी एवं ऐसे लोग बना देता है जिनके हृदय के भीतर परमेश्वर के प्रति विश्वास है। उनके हृदय में, उनकी कल्पनाओं, उनकी अवधारणाओं, और यहाँ तक कि परमेश्वर के बारे में उनकी व्यक्तिगत परिभाषाओं के द्वारा उन्हें मार्गदर्शन दिया जाता है। दूसरी ओर, स्वयं सच्चे परमेश्वर का उनके साथ कोई वास्ता नहीं है। क्योंकि जब वे एक बार स्वयं सच्चे परमेश्वर को समझ जाते हैं, परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को समझ जाते हैं, और जो वह है उसे समझ जाते हैं, तो इसका अर्थ है कि उनके कार्य, उनके विश्वास, और उनके अनुसरण को दोषी ठहराया जाएगा। इसी लिए वे परमेश्वर के सार को समझने के लिए तैयार नहीं हैं, और इसी लिए वे परमेश्वर को अच्छे से समझने, परमेश्वर की इच्छा को अच्छे से जानने, और परमेश्वर के स्वभाव को अच्छे से समझने के लिए सक्रिय रूप से खोजने या प्रार्थना करने की इच्छा नहीं रखते और उसके खिलाफ हैं। इसके बजाय वे चाहेंगे कि परमेश्वर कुछ ऐसा हो जिसे बनाया गया हो, जो खोखला एवं छली हो। इसके बजाय वे चाहेंगे कि परमेश्वर कोई ऐसा हो जो बिलकुल वैसा हो जैसी उन्होंने कल्पना की है, कोई ऐसा जो उनके आदेश को मानने के लिए हमेशा तैयार रहे, आपूर्ति करने में सदा भरपूर और हमेशा उपलब्ध रहे। जब वे परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेना चाहते हैं, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह अनुग्रह बन जाए। जब उन्हें परमेश्वर की आशीष की आवश्यकता होती है, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह आशीष बन जाए। जब वे कठिनाई का सामना करते हैं, तो वे परमेश्वर से माँगते हैं कि वह उन्हें मजबूत बनाए, और उनका सुरक्षा-जाल बन जाए। परमेश्वर के विषय में इन लोगों का ज्ञान अनुग्रह एवं आशीष की परिधि के भीतर ही अटका रहता है। परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, और परमेश्वर के विषय में उनकी समझ भी उनकी कल्पनाओं और मात्र पत्रों एवं सिद्धान्तों तक ही सीमित होती है। लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए उत्सुक हैं, जो असल में परमेश्वर को देखना चाहते हैं, और सचमुच में परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप को समझना चाहते हैं। ये लोग सच्चाई की वास्तविकता एवं परमेश्वर के उद्धार की निरन्तर खोज में रहते हैं, और परमेश्वर के विजय, उद्धार एवं सिद्धता को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ये लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, प्रत्येक परिस्थिति एवं प्रत्येक व्यक्ति, घटना या ऐसी चीज़ की तारीफ करने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं, जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने उनके लिए की है। और प्रार्थना करते हैं और ईमानदारी से तलाश करते हैं। जिसे वे सब से अधिक चाहते हैं वह यह है कि वे परमेश्वर की इच्छा को जानें और परमेश्वर के सच्चे स्वभाव एवं सार को समझें। यह इसलिए है ताकि वे आगे से परमेश्वर को ठेस नहीं पहुँचाएँगे, और अपने अनुभवों के माध्यम से, वे परमेश्वर की सुंदरता और उसके सच्चे पहलु को देखने के योग्य होंगे। यह इसलिए भी है जिससे असलियत में एक सच्चा परमेश्वर उनके हृदय के भीतर बसेगा, और जिससे उनके हृदय में परमेश्वर के लिए एक स्थान होगा, कुछ इस तरह कि वे आगे से कल्पनाओं, अवधारणाओं या छलावे के मध्य जीवन नहीं बिता रहे होंगे। इन लोगों के लिए, उनके पास परमेश्वर के स्वभाव एवं उसके सार को समझने के लिए एक प्रबल इच्छा का कारण यह है क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव एवं सार ऐसी चीज़ें हैं जिनकी आवश्यकता मानवजाति को उनके अनुभवों में किसी भी क्षण पड़ सकती है, ऐसी चीज़ें जो उनके जीवनकाल के दौरान जीवन की आपूर्ति करती हैं। जब एक बार वे परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाते हैं, तो वे और भी अच्छे से परमेश्वर का आदर करने, परमेश्वर के कार्य के साथ और भी अच्छे से सहयोग करने, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति और अधिक विचारशील बनने और अपनी बेहतरीन योग्यता के साथ अपने कर्तव्य को निभाने में सक्षम होंगे। जब परमेश्वर के स्वभाव के प्रति उनकी मनोवृत्ति की बात आती है तो ये दो प्रकार के लोग हैं। प्रथम प्रकार के लोग परमेश्वर के स्वभाव को समझना नहीं चाहते हैं। यद्यपि वे कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव को समझना चाहते हैं, स्वयं परमेश्वर को जानना चाहते हैं, और जो वह है उसे देखना चाहते हैं, और परमेश्वर की इच्छा का सचमुच सम्मान करना चाहते हैं, फिर भी अपने हृदय की गहराई में वे चाहते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में न रहे। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस प्रकार के लोग निरन्तर परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन और उसका विरोध करते हैं; वे अपने स्वयं के हृदयों में पद के लिए परमेश्वर से लड़ते हैं और परमेश्वर के अस्तित्व पर अकसर सन्देह और यहाँ तक कि इंकार भी करते हैं। वे परमेश्वर के स्वभाव को, या स्वयं वास्तविक परमेश्वर को अपने हृदयों पर काबिज़ होने नहीं देना चाहते हैं। वे सिर्फ अपनी इच्छाओं, कल्पनाओं एवं महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करना चाहते हैं। अतः, हो सकता है ये लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और उसके लिए अपने परिवारों एवं नौकरियों को भी त्याग सकते हैं, लेकिन वे अपने बुरे मार्गों का अंत नहीं करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग भेंटों की भी चोरी करते हैं या उसे उड़ा देते हैं, या एकांत में परमेश्वर को कोसते हैं, जबकि अन्य लोग बार बार स्वयं के विषय में गवाही देने, स्वयं की ख्याति को बढ़ाने, और लोगों एवं हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने पदों का उपयोग कर सकते हैं। वे लोगों से अपनी आराधना करवाने के लिए विभिन्न तरीकों एवं मापदंडों का उपयोग करते हैं, और लोगों को जीतने एवं उनको नियन्त्रित करने की लगातार कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग जानबूझकर लोगों को यह सोचने के लिए गुमराह करते हैं कि वे परमेश्वर हैं और इस प्रकार उनके साथ परमेश्वर के जैसा व्यवहार किया जा सकता है। वे लोगों को कभी नहीं बताएँगे कि उन्हें भ्रष्ट कर दिया गया है, यह कि वे भी भ्रष्ट एवं अहंकारी हैं, और उनकी आराधना नहीं करना है, और यह कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितना अच्छा करते हैं, यह सब परमेश्वर को ऊंचा उठाने के कारण है और वह है जो उन्हें वैसे भी करना ही चाहिए। वे ऐसी बातों को क्यों नहीं कहते हैं? क्योंकि वे लोगों के हृदयों में अपने स्थान खोने के विषय में बहुत अधिक डरे हुए हैं। इसी लिए ऐसे लोग परमेश्वर को कभी ऊँचा नहीं उठाते हैं और परमेश्वर के लिए कभी गवाही नहीं देते हैं, चूँकि उन्होंने परमेश्वर को समझने की कभी कोशिश नहीं की है। क्या वे परमेश्वर को समझे बिना ही उसे जान सकते हैं? असंभव! इस प्रकार, जबकि "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर" के विषय में वचन साधारण हो सकते हैं, प्रत्येक के लिए उनका अर्थ अलग होता है। ऐसे व्यक्ति के लिए जो अकसर परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है, परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, और परमेश्वर के प्रति अत्यंत उग्र है, इसका अर्थ दंडाज्ञा है; जबकि ऐसे व्यक्ति के लिए जो सत्य की वास्तविकता को खोजता है और जो अकसर परमेश्वर की इच्छा को खोजने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आता है, तो वह निःसन्देह मछली के लिए जल के समान है। अतः तुम लोगों के बीच में, जब कोई परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के कार्य के विषय में की गई बातचीत को सुनता है, तो उन्हें सिरदर्द होने लगता है, उनके हृदय प्रतिरोध से भर जाते हैं, और वे अत्यधिक बेचैन हो जाते हैं। लेकिन तुम लोगों में से कुछ ऐसे भी होंगे जो सोचते हैं: यह विषय बिलकुल वैसा है जैसी मुझे आवश्यकता है, क्योंकि यह विषय मेरे लिए बहुत लाभदायक है। यह एक ऐसा हिस्सा है जो मेरे जीवन के अनुभव से गुम नहीं हो सकता है; यह मूल बिंदु का मूल बिंदु है, परमेश्वर में विश्वास का आधार है, और यह कुछ ऐसा है जिसे त्यागना मानवजाति सहन नहीं कर सकती है। तुम लोगों के लिए, हो सकता है कि यह विषय निकट एवं दूर दोनों, एवं अनजान फिर भी सुपरिचित लगे। किन्तु चाहे जो भी हो, यह एक ऐसा विषय है जिसे यहाँ पर बैठे हुए हर एक को ध्यान से सुनना होगा, जानना होगा, और समझना होगा। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम इसके साथ कैसा व्यवहार करते हो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम इसे कैसे देखते हो या तुम इसे कैसे ग्रहण करते हो, क्योंकि इस विषय के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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