परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 19

ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर के द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है

कुछ लोग हैं जिनके विश्वास को परमेश्वर के हृदय में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं पहचानता है कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता है। क्योंकि ये लोग, इसकी परवाह किए बगैर कि उन्होंने कितने वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण किया है, उनकी सोच एवं उनके विचार कभी नहीं बदले हैं। वे अविश्वासियों के समान हैं, अविश्वासियों के सिद्धान्तों और कार्यों को अंजाम देने के तरीके के मुताबिक चलते हैं, और ज़िन्दा बचे रहने के नियम एवं विश्वास के मुताबिक चलते हैं। उन्होंने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में ग्रहण नहीं किया था, कभी विश्वास नहीं किया था कि परमेश्वर का वचन सत्य है, परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कभी इरादा नहीं किया था, और परमेश्वर को कभी अपने परमेश्वर के रूप में नहीं पहचाना था। वे परमेश्वर में विश्वास करने को किसी किस्म के शौकिया पसन्दीदा चीज़ के रूप में मानते हैं, और परमेश्वर से महज एक आत्मिक सहारे के रूप में व्यवहार करते हैं, अतः वे नहीं सोचते हैं कि यह इस लायक है कि इसके लिए कोशिश की जाए और परमेश्वर के स्वभाव या परमेश्वर के सार को समझा जाए। तू कह सकता है कि वह सब जो सत्य से सम्बन्धित होता है उसका इन लोगों के साथ कोई लेना देना नहीं है। उनमें कोई रूचि नहीं है, और वे प्रत्युत्तर देने की परेशानी नहीं उठा सकते हैं। यह इसलिए है क्योंकि उनके हृदय की गहराई में एक तीव्र आवाज़ है जो हमेशा उनसे कहती है: परमेश्वर अदृश्य एवं अस्पर्शनीय है, और उसका अस्तित्व नहीं है। वे मानते हैं कि इस प्रकार के परमेश्वर को समझने की कोशिश करना उनके प्रयासों के लायक नहीं है; यह अपने आपको मूर्ख बनाना होगा। वे बस शब्दों में परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, और कोई वास्तविक कदम नहीं उठाते हैं। साथ ही वे व्यावहारिक रूप से भी कुछ नहीं करते हैं, और सोचते हैं कि वे बहुत चतुर हैं। परमेश्वर इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है? वह उन्हें अविश्वासियों के रूप में देखता है। कुछ लोग पूछते हैं: "क्या अविश्वासी लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ सकते हैं? क्या वे अपने कर्तव्य को निभा सकते हैं? क्या वे इन शब्दों को कह सकते हैं: 'मैं परमेश्वर के लिए जीऊंगा'?" जो कुछ मनुष्य अकसर देखता है वे लोगों के ऊपरी प्रदर्शन होते हैं, और उनका सार नहीं। फिर भी परमेश्वर इन ऊपरी प्रदर्शनों को नहीं देखता है; वह केवल उनके भीतरी सार को देखता है। इस प्रकार, परमेश्वर के पास इन लोगों के प्रति इस प्रकार की मनोवृत्ति है, और इस प्रकार की परिभाषा है। जो कुछ ये लोग कहते हैं उसके लिहाज से: "परमेश्वर ऐसा क्यों करता है? परमेश्वर वैसा क्यों करता है? मैं इसे समझ नहीं सकता हूँ; मैं उसे समझ नहीं सकता हूँ; यह मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है; तुझे इसे मुझे समझाना होगा; ..." मेरा उत्तर है: क्या तुझे यह मामला समझाना आवश्यक है? क्या इस मामले का तुझसे कुछ लेना देना है? तू क्या सोचता है कि तू कौन है? तू कहाँ से आया है? क्या तू परमेश्वर के लिए इन संकेतों को देने के योग्य है? क्या तू उसमें विश्वास करता है? क्या वह तेरे विश्वास को स्वीकार करता है? चूँकि तेरे विश्वास का परमेश्वर से कोई लेना देना नहीं है, उसके कार्य का तुझ से क्या सम्बन्ध है? तू नहीं जानता है कि परमेश्वर के हृदय में तू कहाँ है, फिर भी तू परमेश्वर से संवाद करने के योग्य है?

चेतावनी के शब्द

क्या तुम लोग इन टिप्पणियों को सुनने के बाद असहज नहीं हो? यद्यपि हो सकता है कि तुम सब इन वचनों को सुनने के लिए तैयार नहीं हो, या उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो, फिर भी वे सब तथ्य हैं। क्योंकि कार्य का यह चरण परमेश्वर के कार्य करने के लिए है, यदि तू परमेश्वर के इरादों से सम्बन्धित नहीं हैं, परमेश्वर की मनोवृत्ति से सम्बन्धित नहीं हैं, और परमेश्वर के सार एवं स्वभाव को नहीं समझता है, तो अन्त में तू ऐसा व्यक्ति है जो अवसर को खो देगा। मेरे वचन सुनने में कठोर लगें तो मुझे दोष न दो, और तुम लोगों के उत्साह की हवा निकलने के लिए उन्हें दोष न दो। मैं सच बोलता हूँ; मेरा अभिप्राय तुम सब को निराश करना नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं तुम लोगों से क्या मांगता हूँ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इसे करने के लिए किस प्रकार तुम सब से अपेक्षा की जाती है, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग सही पथ पर चलते हो, और आशा करता हूँ कि तुम सब परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हो और इस पथ से भटकते नहीं हो। यदि तू परमेश्वर के वचन के अनुसार आगे नहीं बढ़ता है, और उसके मार्ग का अनुसरण नहीं करता है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता है कि तू परमेश्वर के विरुद्ध बलवा कर रहा है और सही पथ से भटक चुका है। इस प्रकार मुझे लगता है कि कुछ ऐसे मामले हैं जिन्हें मुझे तुम लोगों के लिए स्पष्ट करना होगा, और तुम सब से स्पष्ट रूप से, साफ साफ, और बिना जरा सी भी अनिश्चितता के विश्वास करवाना होगा, और परमेश्वर की मनोवृत्ति, परमेश्वर के इरादों, किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध करता है, और वह किस रीति से मनुष्य के परिणाम को तय करता है उसे स्पष्ट रूप से जानने में तुम लोगों की सहायता करनी होगी। यदि ऐसा दिन आता है जब तू इस मार्ग की शुरुआत करने में असमर्थ होता है, तो मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, क्योंकि इन वचनों को पहले ही तुम सभी को बिलकुल साफ साफ बता दिया गया है। जहाँ तक यह बात है कि तू अपने स्वयं के परिणाम से किस प्रकार व्यवहार करता है—यह मामला पूरी तरह से तेरे ऊपर है। विभिन्न प्रकार के लोगों के परिणामों के सम्बन्ध में परमेश्वर के पास विभिन्न मनोवृत्तियां है। उसके पास मनुष्य को मापने के लिए अपने स्वयं के तरीके हैं, और अपेक्षाओं का अपना स्वयं का मानक है। लोगों के आंकलन का उसका मानक ऐसा है जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए निष्पक्ष है—उसके विषय में कोई सन्देह नहीं है! अतः कुछ लोगों का भय अनावश्यक है। क्या अब तुम लोगों को राहत मिली है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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