परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 16

उन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति जो उसके कार्य के दौरान भाग जाते हैं

ऐसे लोग हर जगह होते हैं : परमेश्वर के मार्ग के बारे में सुनिश्चित हो जाने के बाद, विभिन्न कारणों से, वे चुपचाप बिना अलविदा कहे चले जाते हैं और जो कुछ उनका दिल चाहता है वही करते हैं। फिलहाल, हम इस बात पर नहीं जाएँगे कि ऐसे लोग छोड़कर क्यों चले जाते हैं; पहले हम यह देखेंगे कि ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है। यह बिलकुल स्पष्ट है! जिस समय ऐसे लोग छोड़कर चले जाते हैं, परमेश्वर की नज़रों में, उनके विश्वास की अवधि समाप्त हो जाती है। इसे वो लोग नहीं, बल्कि परमेश्वर समाप्त करता है। ऐसे लोगों का परमेश्वर को छोड़कर जाने का अर्थ है कि उन्होंने पहले ही परमेश्वर को अस्वीकृत कर दिया है, यानी अब वे परमेश्वर को नहीं चाहते, अब उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार्य नहीं है। चूँकि ऐसे लोग परमेश्वर को नहीं चाहते, तो क्या परमेश्वर तब भी उन्हें चाह सकता है? इसके अतिरिक्त, जब इस प्रकार के लोगों की प्रवृत्ति और दृष्टिकोण ऐसा है और वे परमेश्वर को छोड़ने पर अडिग हो चुके हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने पहले ही परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर दिया है। इस तथ्य के बावजूद कि शायद आवेश में आकर, उन्होंने परमेश्वर को न कोसा हो, उनके व्यवहार में कोई नीचता या ज़्यादती न रही हो, और इस तथ्य के बावजूद कि ऐसे लोग सोच रहे हों, "यदि कभी ऐसा दिन आया जब मुझे बाहर भरपूर खुशियाँ मिलीं, या जब किसी चीज़ के लिए मुझे अभी भी परमेश्वर की आवश्यकता हुई, तो मैं वापस आ जाऊँगा। या कभी परमेश्वर मुझे बुलाए, तो मैं वापस आ जाऊँगा," या वे कहते हैं, "अगर मैं कभी बाहर की दुनिया में चोट खाऊँ, या कभी यह देखूँ कि बाहरी दुनिया अत्यंत अंधकारमय और दुष्ट है और अब मैं उस प्रवाह के साथ नहीं बहना चाहता, तो मैं परमेश्वर के पास वापस आ जाऊँगा।" भले ही ऐसे लोग अपने मन में इस तरह का हिसाब-किताब लगाएँ कि कब उन्हें वापस आना है, भले ही वे अपनी वापसी के लिए द्वार खुला छोड़कर रखने की कोशिश करें, फिर भी उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि वे चाहे जो सोचें और कैसी भी योजना बनाएँ, यह सब उनकी खुशफहमी है। उनकी सबसे बड़ी गलती यह है कि वे इस बारे में अस्पष्ट होते हैं कि जब वे छोड़कर जाना चाहते हैं तो परमेश्वर को कैसा महसूस होता है। जिस पल वे परमेश्वर को छोड़ने का निश्चय करते हैं, परमेश्वर उसी पल उन्हें पूरी तरह से छोड़ चुका होता है; परमेश्वर पहले ही अपने हृदय में उनका परिणाम निर्धारित कर चुका होता है। वह परिणाम क्या है? ऐसा व्यक्ति चूहों में से ही एक चूहा होगा और उन्हीं के साथ नष्ट हो जाएगा। इस प्रकार, लोग प्रायः इस प्रकार की स्थिति देखते हैं : कोई परमेश्वर का परित्याग कर देता है, लेकिन उसे दण्ड नहीं मिलता। परमेश्वर अपने सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है; कुछ चीज़ें देखने में आती हैं, और कुछ चीज़ें परमेश्वर के हृदय में ही तय होती हैं, इसलिए लोग परिणाम नहीं देख पाते। जो हिस्सा लोग देख पाते हैं वह आवश्यक नहीं कि चीज़ों का सही पक्ष हो, परन्तु दूसरा पक्ष होता है, जिसे तुम देख नहीं पाते—उसी में परमेश्वर के हृदय के सच्चे विचार और निष्कर्ष निहित होते हैं।

परमेश्वर के कार्य के दौरान भाग जाने वाले लोग सच्चे मार्ग का परित्याग कर देते हैं

तो, परमेश्वर ऐसे लोगों को इतना कठोर दंड कैसे दे सकता है? परमेश्वर उन पर इतना क्रोधित क्यों है? पहली बात तो, हम जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव प्रताप और कोप है; वह कोई भेड़ नहीं है, जिसका वध किया जाए; वह कठपुतली तो बिल्कुल नहीं है जिसे लोग जैसा चाहें, वैसा नचाएँ। उसका अस्तित्व निरर्थक भी नहीं है कि उस पर धौंस जमाई जाए। यदि तुम वास्तव में मानते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, तो तुम्हें परमेश्वर का भय मानना चाहिए, और तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के सार को क्रोधित नहीं किया जा सकता। वह क्रोध किसी शब्द से पैदा हो सकता है या शायद किसी विचार से या शायद किसी अधम और हल्के व्यवहार से, किसी ऐसे व्यवहार से जो मनुष्य की नज़र में और नैतिकता की दृष्टि से महज़ कामचलाऊ हो; या वह किसी मत, सिद्धांत से भी भड़क सकता है। लेकिन, अगर एक बार तुमने परमेश्वर को क्रोधित कर दिया, तो समझो तुम्हारा अवसर गया, और तुम्हारे अंत के दिन आ गए। यह बेहद खराब बात है! यदि तुम इस बात को नहीं समझते कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जाना चाहिए, तो शायद तुम परमेश्वर से नहीं डरते और शायद तुम उसे अक्सर अपमानित करते रहते हो। अगर तुम नहीं जानते कि परमेश्वर से कैसे डरना चाहिए, तो तुम परमेश्वर से नहीं डर पाओगे, और नहीं जान पाओगे कि परमेश्वर के सच्चे मार्ग पर कैसे चलना है—यानी परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर। एक बार जब तुम जान गए और सचेत हो गए कि परमेश्वर को अपमानित नहीं करना चाहिए, तो तुम समझ जाओगे कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना क्या होता है।

परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सच्चे मार्ग पर चलने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सत्य से कितने परिचित हो, तुमने कितने परीक्षणों का अनुभव किया है, या तुम कितने अनुशासित हो। बल्कि यह इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है, और तुम कौन-सा सार व्यक्त करते हो। लोगों का सार और उनकी आत्मनिष्ठ प्रवृत्तियाँ—ये अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रमुख बातें हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है और छोड़कर चले गए हैं, परमेश्वर के प्रति उनकी कुत्सित प्रवृत्ति ने और सत्य से घृणा करने वाले उनके हृदय ने परमेश्वर के स्वभाव को पहले ही भड़का दिया है, इसलिए जहाँ तक परमेश्वर की बात है, उन्हें कभी क्षमा नहीं किया जाएगा। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जान लिया है, उनके पास यह जानकारी है कि परमेश्वर का आगमन पहले ही हो चुका है, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के नए कार्य का अनुभव भी कर लिया है। उनका चला जाना छले जाने या भ्रमित हो जाने का मामला नहीं था, ऐसा तो और भी नहीं कि उन्हें जाने के लिए बाध्य किया गया हो। बल्कि उन्होंने होशोहवास में, सोच-समझ कर परमेश्वर को छोड़कर जाने का विकल्प चुना। उनका जाना अपने मार्ग को खोना नहीं था, न ही उन्हें दरकिनार किया गया। इसलिए, परमेश्वर की दृष्टि में, वे लोग कोई मेमने नहीं हैं, जो झुंड से भटक गए हों, भटके हुए फिज़ूलखर्च पुत्र होने की तो बात ही छोड़ दो। वे दंड से मुक्त हो कर गए हैं और ऐसी दशा, ऐसी स्थिति परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करती है, और उसका यही क्रोध उन्हें निराशाजनक परिणाम देता है। क्या इस प्रकार का परिणाम भयावह नहीं है? इसलिए यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते, तो वे परमेश्वर को अपमानित कर सकते हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है! यदि लोग परमेश्वर की प्रवृत्ति को गंभीरता से नहीं लेते, और यह मानकर चलते हैं कि परमेश्वर उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है—क्योंकि वे परमेश्वर की खोई हुई भेड़ हैं और परमेश्वर अभी भी उनके हृदय-परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहा है, तो फिर ऐसे लोग दंड के दिन से बहुत दूर नहीं हैं। परमेश्वर उन्हें केवल अस्वीकार ही नहीं करेगा—बल्कि चूँकि उन्होंने दूसरी बार उसके स्वभाव को क्रोधित किया है, इसलिए यह और भी अधिक भयानक बात है! ऐसे लोगों की श्रद्धाहीन प्रवृत्ति पहले ही परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन कर चुकी है। क्या वह अब भी उन्हें स्वीकार करेगा? इस मामले में परमेश्वर के सिद्धांत हैं कि यदि कोई व्यक्ति सत्य मार्ग के विषय में निश्चित है, फिर भी वह जानबूझकर और स्पष्ट मन से परमेश्वर को अस्वीकार करता है और उसे छोड़कर चला जाता है, तो परमेश्वर ऐसे व्यक्ति के उद्धार-मार्ग को अवरुद्ध कर देगा, उसके बाद राज्य के दरवाजे उस व्यक्ति के लिए बंद कर दिए जाएँगे। जब ऐसा व्यक्ति फिर से आकर द्वार खटखटाएगा, तो परमेश्वर द्वार नहीं खोलेगा; वह सदा के लिए बाहर ही रह जाएगा। शायद तुम में से किसी ने बाइबल में मूसा की कहानी पढ़ी हो। मूसा को परमेश्वर द्वारा अभिषिक्त कर दिए जाने के बाद, 250 अगुआओं ने मूसा के कार्यकलापों और कई अन्य कारणों से उसके प्रति अपनी असहमति व्यक्त की। उन्होंने किसके आगे समर्पित होने से इनकार किया? वह मूसा नहीं था। उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्थाओं को मानने से इनकार किया; उन्होंने इस मामले में परमेश्वर के कार्य को मानने से इनकार किया था। उन्होंने निम्नलिखित बातें कहीं : "तुम ने बहुत किया, अब बस करो; क्योंकि सारी मण्डली का एक एक मनुष्य पवित्र है, और यहोवा उनके मध्य में रहता है...।" क्या इंसानी नज़रिए से, ये बातें बहुत गंभीर हैं? गंभीर नहीं हैं! कम-से-कम शाब्दिक अर्थ तो गंभीर नहीं है। कानूनी नज़रिए से भी, वे कोई नियम नहीं तोड़ते, क्योंकि देखने में यह कोई शत्रुतापूर्ण भाषा या शब्दावली नहीं है, इसमें ईश-निन्दा जैसी कोई बात तो बिल्कुल नहीं है। ये केवल साधारण से वाक्य हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। तो फिर, ये शब्द परमेश्वर के क्रोध को इतना क्यों भड़का सकते हैं? उसकी वजह यह है कि ये शब्द लोगों के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के लिए बोले गए थे। उन शब्दों में व्यक्त प्रवृत्ति और स्वभाव परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करते हैं और परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करते हैं जिसे अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। हम सब जानते हैं कि अंत में उन अगुआओं का परिणाम क्या हुआ था। ऐसे लोगों के बारे में जिन्होंने परमेश्वर का परित्याग कर दिया है, उनका दृष्टिकोण क्या है? उनकी प्रवृत्ति क्या है? और उनका दृष्टिकोण और प्रवृत्ति ऐसे कारण क्यों बनते हैं कि परमेश्वर उनके साथ इस तरह से निपटता है? कारण यह है कि हालाँकि वे साफ तौर पर जानते हैं कि वह परमेश्वर है, मगर फिर भी वे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं, और इसीलिए उन्हें उद्धार के अवसर से पूरी तरह वंचित कर दिया जाता है। जैसा कि बाइबल में लिखा है, "क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं।" क्या अब तुम लोग इस विषय को अच्छी तरह समझ गए हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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