परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 12

परमेश्वर का अनुसरण करते समय, लोग कभी कभार ही परमेश्वर के इरादों पर ध्यान देते हैं, और कभी कभार ही परमेश्वर के विचारों एवं मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति पर ध्यान देते हैं। तुम लोग परमेश्वर के विचारों को नहीं समझते हो, अतः जब ऐसे प्रश्नों को पूछा जाता है जिनमें परमेश्वर के इरादे शामिल होते हैं, एवं परमेश्वर का स्वभाव शामिल होता है, तो तुम लोग गड़बड़ा जाते हो; और अत्यंत अनिश्चित होते हो, और तुम लोग या तो अन्दाज़ा लगाते हो या दांव लगाते हो। यह मनोवृत्ति क्या है? यह इस तथ्य को साबित करता है: अधिकांश लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं वे उसे खाली हवा के रूप में एवं अस्पष्ट रूप में मानते हैं। मैं ने इसे इस प्रकार क्यों कहा है? क्योंकि जब भी तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है, तब तुम सब परमेश्वर के इरादों (अभिप्रायों) को नहीं जानते हो। तुम सब क्यों नहीं जानते हो? ऐसा नहीं है कि तुम लोग बस अभी इस समय नहीं जानते हो। इसके बजाय, आरम्भ से लेकर अंत तक तुम सब नहीं जानते हो कि इस मामले के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है। उन समयों में जब तू परमेश्वर की मनोवृत्ति को नहीं देख सकता है और नहीं जानता है, तो क्या तूने उस पर विचार किया है? क्या तूने उसकी खोज की है? क्या तूने उसके बारे में बताया है? नहीं! यह एक तथ्य को प्रमाणित करता है: तेरे विश्वास (जैसा तू मानता है) का परमेश्वर और सच्चा परमेश्वर आपस में सम्बन्धित नहीं हैं। तू, जो परमेश्वर पर विश्वास करता है, केवल अपनी स्वयं की इच्छा पर विचार करता है, एवं केवल अपने अपने अगुवों की इच्छा पर विचार करता है, और केवल परमेश्वर के वचन के सतही एवं सैद्धान्तिक अर्थ पर विचार करता है, परन्तु सचमुच में परमेश्वर की इच्छा को जानने एवं खोजने की कोशिश बिलकुल भी नहीं करता है। क्या यह ऐसा ही नहीं है? इस मामले का सार भयानक है! बहुत वर्षों से, मैं ने बहुत से लोगों को देखा है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। यह विश्वास कौन सा आकार लेता है? कुछ लोग परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह खाली हवा है। इन लोगों के पास परमेश्वर के अस्तित्व के प्रश्नों के विषय में कोई उत्तर नहीं होता है क्योंकि वे परमेश्वर की उपस्थिति या अनुपस्थिति को महसूस नहीं कर सकते हैं या उससे अवगत नहीं होते हैं, साफ साफ देखने या समझने की तो बात ही छोड़ दो। अवचेतन रूप से, ये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में नहीं है। कुछ अन्य परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह एक मनुष्य हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन सभी कार्यों को कार्य करने में असमर्थ होता है जिन्हें करने में वे असमर्थ होते हैं, और यह कि परमेश्वर को वैसा सोचना चाहिए जैसा वे सोचते हैं। इस व्यक्ति की परमेश्वर की परिभाषा यह है कि वह "एक अदृश्य एवं अस्पर्शनीय व्यक्ति" है। लोगों का एक समूह ऐसा भी है जो परमेश्वर में ऐसा विश्वास करता है मानो वह एक कठपुतली हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के पास कोई भावनाएं नहीं हैं, यह कि परमेश्वर एक मूरत है। जब किसी मसले से सामना होता है, तब परमेश्वर के पास कोई मनोवृत्ति, कोई दृष्टिकोण, एवं कोई विचार नहीं होता है; वह मनुष्य की दया पर निर्भर होता है। लोग बस वैसा ही विश्वास करते हैं जैसा वे विश्वास करना चाहते हैं। यदि वे उसे महान बनाते हैं, तो वह महान है, यदि वे उसे छोटा बना देते है, तो वह छोटा है। जब लोग पाप करते हैं और उन्हें परमेश्वर की दया की आवश्यकता होती है, परमेश्वर की सहनशीलता की आवश्यकता होती है, और परमेश्वर के प्रेम की आवश्यकता होती है, तो परमेश्वर को अपनी दया प्रदान करनी चहिए। इन लोगों ने अपने अपने मनों में एक परमेश्वर खोज लिया है, और इस परमेश्वर से अपनी मांगों को पूरा करवाया है और अपनी सारी अभिलाषाओं को संतुष्ट करवाया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कहाँ या कब, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह व्यक्ति क्या करता है, परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में एवं परमेश्वर में अपने विश्वास में वे इस कल्पना को स्वीकार करेंगे। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो विश्वास करते हैं कि जब वे परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर देते हैं उसके पश्चात् भी परमेश्वर उनका उद्धार कर सकता है। यह इसलिए है क्योंकि वे मानते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, परमेश्वर का स्वभाव धर्मी है, और यह कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग किस प्रकार परमेश्वर को चोट पहुंचाते हैं, परमेश्वर उनमें से किसी भी चोट का स्मरण नहीं करेगा। चूँकि मनुष्य की गलतियां, मनुष्य के अपराध, एवं मनुष्य की अनाज्ञाकारिता उस व्यक्ति के स्वभाव की क्षणिक अभिव्यक्तियां हैं, परमेश्वर लोगों को अवसर देगा, और उनके साथ सहनशील एवं धीरजवंत होगा। परमेश्वर उनसे अभी भी पहले के समान प्रेम करेगा। अतः उनके उद्धार की आशा अभी भी महान है। वास्तव में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति किस प्रकार परमेश्वर पर विश्वास करता है, जब तक वे सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं, तब तक परमेश्वर उनके प्रति नकारात्मक मनोवृत्ति रखता है। यह इसलिए है क्योंकि जब तक तू परमेश्वर पर विश्वास कर रहा है, तो शायद तू परमेश्वर के वचन की पुस्तक को संजोकर रखता है, तू प्रतिदिन इसका अध्ययन करता है, तू हर दिन इसे पढ़ता है, परन्तु तू वास्तविक परमेश्वर को अलग रख देता है, तू उसे खाली हवा के रूप में मानता है, एक व्यक्ति के रूप में मानता है, और तुममें से कुछ लोग बस उसे एक कठपुतली के रूप में मानते हो। मैं इसे इस प्रकार क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि जिस प्रकार मैं इसे देखता हूँ, इसकी परवाह किये बगैर कि तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है या किसी परिस्थितियों से आमना-सामना करते हैं, क्योंकि वे बातें जो तुम सब के अवचेतन मन में मौजूद होती हैं, वे बातें जो भीतर ही भीतर विकसित होती हैं—उनमें से किसी का भी सम्बन्ध परमेश्वर के वचन से या सत्य की खोज से नहीं होता है? तू केवल उसे ही जानता है जो तू स्वयं सोच रहा है, और जो तेरे स्वयं के दृष्टिकोण हैं, और फिर तेरे स्वयं के विचार को, और तेरे स्वयं के दृष्टिकोण को परमेश्वर के ऊपर ज़बरदस्ती थोपा जाता है। वे परमेश्वर के दृष्टिकोण बन जाते हैं, जिन्हें मानकों के रूप में उपयोग किया जाता है ताकि बिना डांवाडोल हुए उनके मुताबिक चला जाए। समय के बीतने के साथ, इस प्रकार आगे बढ़ना तुझे परमेश्वर से दूर और दूर करता जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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