परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 11

परमेश्वर मनुष्य के परिणाम और परिणाम-निर्धारण के मानकों को कैसे तय करता है

इससे पहले कि तुम्हारा अपना कोई दृष्टिकोण या निष्कर्ष हो, तुम्हें सबसे पहले अपने प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति को और वह क्या सोच रहा है, इसे समझना चाहिए, और तब तुम्हें निर्णय लेना चाहिए कि तुम्हारी सोच सही है या नहीं। परमेश्वर ने मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए कभी भी समय का माप की इकाई के रूप में उपयोग नहीं किया है, और न ही कभी उसने परिणाम निर्धारित करने के लिए किसी व्यक्ति द्वारा सहे गए कष्ट की मात्रा का उपयोग किया है। तब परमेश्वर किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए मानक के रूप में किसका उपयोग करता है? समय के आधार पर परिणाम-निर्धारण लोगों की धारणाओं के सर्वाधिक अनुरूप होता है। इसके अलावा, ऐसे लोग अक्सर नज़र आ जाएँगे, जिन्होंने किसी समय बहुत कुछ समर्पित किया था, खुद को बहुत खपाया था, बड़ी कीमत चुकायी थी, और बहुत कष्ट सहा था। ये वे लोग हैं जिन्हें, तुम लोगों की दृष्टि में, परमेश्वर द्वारा बचाया जा सकता है। जो कुछ ये लोग दिखाते हैं और जीते हैं, वह मनुष्य का परिणाम निर्धारित करने के लिए परमेश्वर द्वारा तय मानकों के बारे में लोगों की धारणाओं के अनुरूप है। तुम लोग चाहे जो मानो, मैं एक-एक करके इन उदाहरणों को सूचीबद्ध नहीं करूँगा। संक्षेप में, अगर कोई चीज़ परमेश्वर की सोच के अनुसार मानक नहीं है, तो वह मनुष्य की कल्पना की उपज है और ऐसी सारी चीज़ें उसकी धारणाएँ हैं। अगर तुम आँख बंद करके अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर ही ज़ोर देते रहो, तो क्या परिणाम होगा? स्पष्ट रूप से, इसका परिणाम केवल परमेश्वर के द्वारा तुम्हें ठुकराना हो सकता है। क्योंकि तुम हमेशा परमेश्वर के सामने अपनी योग्यताओं का दिखावा करते हो, परमेश्वर से स्पर्धा करते हो, और उससे बहस करते हो, तुम लोग परमेश्वर की सोच को समझने का प्रयास नहीं करते, न ही तुम मानवजाति के प्रति परमेश्वर की इच्छा और प्रवृत्ति को समझने की कोशिश करते हो। इस तरह तुम सबसे अधिक अपना सम्मान बढ़ाते हो, परमेश्वर का नहीं। तुम स्वयं में विश्वास करते हो, परमेश्वर में नहीं। परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं चाहता, न ही वह उनका उद्धार करेगा। यदि तुम इस प्रकार का दृष्टिकोण त्याग सको, और अतीत के अपने उन गलत दृष्टिकोणों को सुधार लो, यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार आगे बढ़ सको, अगर तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अभ्यास कर सको, अगर तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान करो, खुद को और परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए अपनी निजी कल्पनाओं, दृष्टिकोणों या आस्था का सहारा न लो, बल्कि सभी मायनों में परमेश्वर के इरादों की खोज करो, मानवता के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति का एहसास करो और समझो, परमेश्वर के मानकों पर खरा उतरकर परमेश्वर को संतुष्ट करो, तो यह शानदार बात होगी! इसका अर्थ यह होगा कि तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर कदम रखने वाले हो।

अगर परमेश्वर लोगों के सोचने के ढंग, उनके विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए एक मानक के रूप में नहीं करता, तो वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? वह मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परीक्षणों का उपयोग करता है। मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने हेतु परमेश्वर के परीक्षणों का उपयोग करने के दो मानक हैं : पहला तो परीक्षणों की संख्या है जिनसे होकर लोग गुज़रते हैं, और दूसरा मानक इन परीक्षणों का लोगों पर परिणाम है। ये दो सूचक हैं जो मनुष्य का परिणाम निर्धारित करते हैं। आओ, अब हम इन दो मानकों पर विस्तार से बात करें।

सबसे पहले, जब परमेश्वर तुम्हारा परीक्षण करता है (नोट: यह संभव है कि तुम्हारी नज़र में यह परीक्षण छोटा-सा हो और उल्लेख करने लायक भी न हो), तो परमेश्वर तुम्हें स्पष्ट रूप से अवगत कराएगा कि तुम्हारे ऊपर परमेश्वर का हाथ है, और उसी ने तुम्हारे लिए इस परिस्थिति की व्यवस्था की है। तुम्हारे आध्यात्मिक कद की अपरिपक्वता की स्थिति में ही, परमेश्वर तुम्हारी जाँच करने के लिए परीक्षणों की व्यवस्था करेगा। ये परीक्षण तुम्हारे आध्यात्मिक कद, और तुम जो कुछ समझने और सहन करने योग्य हो, उसके अनुरूप होते हैं। तुम्हारे कौन-से हिस्से की जाँच की जाएगी? परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति की जाँच की जाएगी। क्या यह प्रवृत्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है? निश्चित रूप से यह महत्वपूर्ण है! इसका विशेष महत्व है! मनुष्य की यह प्रवृत्ति ही वो परिणाम है जो परमेश्वर चाहता है, इसलिए जहाँ तक परमेश्वर की बात है, यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। वरना परमेश्वर इस तरह के कार्य में लगकर लोगों पर अपने प्रयास व्यर्थ नहीं करता। इन परीक्षणों के माध्यम से परमेश्वर अपने प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति देखना चाहता है; वह देखना चाहता है कि तुम सही पथ पर हो या नहीं। वह यह भी देखना चाहता है कि तुम परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रह रहे हो या नहीं। इसलिए, समय-विशेष पर चाहे तुम बहुत-सा सत्य समझो या थोड़ा-सा, तुम्हें परमेश्वर के परीक्षण का सामना तो करना ही होगा, और जैसे-जैसे तुम अधिक सत्य समझने लगोगे, परमेश्वर उसी के अनुरूप तुम्हारे लिए परीक्षणों की व्यवस्था करता रहेगा। और जब फिर से तुम्हारा सामना किसी परीक्षण से होगा, तो परमेश्वर देखना चाहेगा कि इस बीच तुम्हारा दृष्टिकोण, तुम्हारे विचार, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति में कोई विकास हुआ है या नहीं। कुछ लोग सोचते हैं, "परमेश्वर हमेशा लोगों की प्रवृत्ति क्यों देखना चाहता है? क्या उसने देखा नहीं कि लोग किस प्रकार सत्य को अभ्यास में लाते हैं? वह अभी भी लोगों की प्रवृत्ति क्यों देखना चाहता है?" यह निरर्थक बात है! चूँकि परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है, तो ज़रूर उसमें परमेश्वर की इच्छा निहित होगी। परमेश्वर हमेशा किनारे रहकर लोगों को देखता है, उनके हर शब्द और कर्म को देखता है, उनके हर कर्म और कृत्य पर नज़र रखता है; उनकी हर सोच और हर विचार का भी अवलोकन करता है। वो लोगों के साथ होने वाली हर घटना को ध्यान में रखता है—उनके नेक कर्मों को, उनके दोषों को, उनके अपराधों को, यहाँ तक कि उनके विद्रोह और विश्वासघात को भी—परमेश्वर उनके परिणाम को निर्धारित करने के लिए इन्हें सबूत के रूप में अपने पास रखता है। जैसे-जैसे परमेश्वर का कार्य आगे बढ़ेगा, तुम ज़्यादा से ज़्यादा सत्य सुनकर ज़्यादा से ज़्यादा सकारात्मक बातों और जानकारी को स्वीकार करोगे, और तुम अधिक से अधिक सत्य की वास्तविकता प्राप्त करोगे। इस प्रक्रिया के दौरान, तुमसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ भी बढ़ेंगी। उसके साथ-साथ, परमेश्वर तुम्हारे लिए और भी कठिन परीक्षणों की व्यवस्था करेगा। उसका लक्ष्य यह जाँच करना है कि इस बीच परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति में कोई विकास हुआ है या नहीं। निश्चित रूप से, इस दौरान, परमेश्वर तुमसे जिस दृष्टिकोण की अपेक्षा करता है, वह सत्य-वास्तविकता की तुम्हारी समझ के अनुरूप होगा।

जैसे-जैसे तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, वैसे-वैसे वह मानक भी बढ़ता जाएगा जिसकी अपेक्षा परमेश्वर तुमसे करता है। जब तक तुम अपरिपक्व हो, तब तक परमेश्वर तुम्हें एक बहुत ही निम्न मानक देगा; जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद थोड़ा बड़ा होगा, तो परमेश्वर तुम्हें थोड़ा ऊँचा मानक देगा। परन्तु जब तुम सारे सत्य समझ जाओगे तब परमेश्वर क्या करेगा? परमेश्वर तुमसे और भी अधिक बड़े परीक्षणों का सामना करवाएगा। इन परीक्षणों के बीच, परमेश्वर जो कुछ तुमसे पाना चाहता है, जो कुछ तुमसे देखना चाहता है, वो है परमेश्वर के बारे में तुम्हारा गहन ज्ञान और उसके प्रति तुम्हारी सच्ची श्रद्धा। इस समय, तुमसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ पहले की तुलना में, जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद अपरिपक्व था, और ऊँची और "अधिक कठोर" होंगी (नोट : लोग शायद इसे कठोर मानें, परन्तु परमेश्वर इसे तर्कसंगत मानता है।) जब परमेश्वर लोगों की परीक्षा लेता है, तो परमेश्वर किस प्रकार की वास्तविकता की रचना करना चाहता है? परमेश्वर लगातार चाहता है कि लोग उसे अपना हृदय दें। कुछ लोग कहेंगे : "मैं अपना हृदय कैसे दे सकता हूँ? मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया, अपना घर-बार, रोज़ी-रोटी त्याग दी, खुद को खपा दिया! क्या ये सब परमेश्वर को अपना हृदय देने के उदाहरण नहीं हैं? मैं और कैसे परमेश्वर को अपना हृदय दूँ? क्या ऐसा हो सकता है कि वास्तव में ये तरीके परमेश्वर को अपना हृदय देने के नहीं थे? परमेश्वर की विशिष्ट अपेक्षा क्या है?" अपेक्षा बहुत साधारण है। वास्तव में, कुछ लोग परीक्षणों के अलग-अलग चरणों में विभिन्न स्तर पर अपना हृदय पहले ही परमेश्वर को दे चुके होते हैं, परन्तु ज़्यादातर लोग अपना हृदय परमेश्वर को कभी नहीं देते। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता है, तब वह देखता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के साथ है, शरीर के साथ है, या शैतान के साथ है। जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता है, तब परमेश्वर देखता है कि तुम परमेश्वर के विरोध में खड़े हो या तुम ऐसी स्थिति में खड़े हो जो परमेश्वर के अनुरूप है, और वह यह देखता है कि तुम्हारा हृदय उसकी तरफ है या नहीं। जब तुम अपरिपक्व होते हो और परीक्षणों का सामना कर रहे होते हो, तब तुम्हारा आत्मविश्वास बहुत ही कम होता है, और तुम्हें ठीक से पता नहीं होता कि वह क्या है जिससे तुम परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर सकते हो, क्योंकि तुम्हें सत्य की एक सीमित समझ है। लेकिन अगर तुम ईमानदारी और सच्चाई से परमेश्वर से प्रार्थना करो, परमेश्वर को अपना हृदय देने के लिए तैयार हो जाओ, परमेश्वर को अपना अधिपति बना सको, और वे चीज़ें अर्पित करने के लिए तैयार हो जाओ जिन्हें तुम अत्यंत बहुमूल्य मानते हो, तो तुम पहले ही उसे अपना दिल दे चुके हो। जब तुम अधिक धर्मोपदेश सुनोगे, और अधिक सत्य समझोगे, तो तुम्हारा आध्यात्मिक कद भी धीरे-धीरे परिपक्व होता जाएगा। इस समय तुमसे परमेश्वर की वे अपेक्षाएँ नहीं होंगी जो तब थीं जब तुम अपरिपक्व थे; उसे तुमसे अधिक ऊँचे स्तर की अपेक्षा होगी। जैसे-जैसे लोग परमेश्वर को अपना हृदय देते हैं, वह परमेश्वर के निकटतर आते हैं; जब लोग सचमुच परमेश्वर के निकट आ जाते हैं, तो उनका हृदय परमेश्वर के प्रति और भी अधिक श्रद्धा रखने लगता है। परमेश्वर को ऐसा ही हृदय चाहिए।

जब परमेश्वर किसी का हृदय पाना चाहता है, तो वह उसकी अनगिनत परीक्षाएँ लेता है। इन परीक्षणों के दौरान, यदि परमेश्वर उस व्यक्ति के हृदय को नहीं पाता है, या वह उस व्यक्ति में किसी तरह की प्रवृति नहीं देखता—यानी वह उस व्यक्ति को उस तरह से अभ्यास या व्यवहार करते नहीं देखता जिससे परमेश्वर के प्रति उसकी श्रद्धा नज़र आए, और अगर उसे उस व्यक्ति में बुराई से दूर रहने की प्रवृत्ति तथा दृढ़ता नज़र न आए—तो अनगिनत परीक्षणों के बाद, ऐसे व्यक्ति के प्रति परमेश्वर का धैर्य टूट जाएगा, और वह उसे बर्दाश्त नहीं करेगा, उसका परीक्षण नहीं लेगा और उस पर कार्य नहीं करेगा। तो उस व्यक्ति के परिणाम के लिए इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि उसका कोई परिणाम नहीं होगा। संभव है ऐसे व्यक्ति ने कुछ बुरा न किया हो; संभव है उसने कोई रुकावट या परेशानी पैदा करने के लिए कुछ न किया हो। शायद उसने खुलकर परमेश्वर का प्रतिरोध न किया हो। लेकिन ऐसे व्यक्ति का हृदय परमेश्वर से छिपा रहता है; परमेश्वर के प्रति उसकी प्रवृत्ति और दृष्टिकोण कभी स्पष्ट नहीं रहा है, परमेश्वर स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता कि उसका हृदय परमेश्वर को दिया गया है या नहीं या ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहने का प्रयास कर रहा है या नहीं? ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर का धैर्य जवाब देने लगता है, और अब वह उनके लिए कोई कीमत नहीं चुकायेगा, वह उन पर दया नहीं करेगा, या उन पर कार्य नहीं करेगा। ऐसे व्यक्ति के परमेश्वर में विश्वास का जीवन पहले ही समाप्त हो चुका होता है। क्योंकि उन सभी परीक्षणों में जो परमेश्वर ने इस व्यक्ति को दिए हैं, परमेश्वर ने वह परिणाम प्राप्त नहीं किया जो वह चाहता है। इस प्रकार, ऐसे बहुत से लोग हैं जिनमें मैंने कभी भी पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी नहीं देखी। इसे देखना कैसे संभव है? शायद इस प्रकार के व्यक्तियों ने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया हो, और सतही तौर पर वे बहुत सक्रिय रहे हों, उनका व्यवहार काफी जोशीला रहा हो; उन्होंने बहुत-सी पुस्तकें पढ़ी हों, बहुत से मामलों को सँभाला हो, दर्जनों नोटबुक भर दी हों, और बहुत से वचनों और सिद्धान्तों पर महारत हासिल कर ली हो। लेकिन, उनमें कभी कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई, परमेश्वर के प्रति उनका दृष्टिकोण अदृश्य रहता है, और उनकी प्रवृत्ति अभी भी अस्पष्ट है। यानी ऐसे व्यक्तियों के हृदय को नहीं देखा जा सकता; वे हमेशा ढके हुए और सीलबंद लिफाफे की तरह रहते हैं—वे परमेश्वर के प्रति सीलबंद रहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि परमेश्वर ने उनके सच्चे हदय को कभी देखा ही नहीं होता, उसने अपने प्रति ऐसे व्यक्ति में सच्ची श्रद्धा कभी देखी ही नहीं, और तो और उसने कभी नहीं देखा कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के मार्ग पर कैसे चलता है। यदि अब तक भी परमेश्वर ने ऐसे व्यक्ति को प्राप्त नहीं किया है, तो क्या वह उन्हें भविष्य में प्राप्त कर सकता है? नहीं! क्या परमेश्वर उन चीज़ों के लिए प्रयास करता रहेगा जिन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकता? नहीं! तब ऐसे लोगों के प्रति आज परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? (वह उन्हें ठुकरा देता है, उन पर ध्यान नहीं देता।) वह उन्हें अनदेखा कर देता है! परमेश्वर ऐसे लोगों पर ध्यान नहीं देता; वह उन्हें ठुकरा देता है। तुम लोगों ने इन बातों को बहुत शीघ्रता से, बहुत सटीकता से याद कर लिया है। ऐसा लगता है कि जो कुछ तुम लोगों ने सुना है वह सब तुम्हारी समझ में आ गया!

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो परमेश्वर के अनुसरण के आरंभ में, अपरिपक्व और अज्ञानी होते हैं; वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते; न ही वे यह समझते हैं कि उसमें विश्वास करने का क्या अर्थ है। वे परमेश्वर में विश्वास करने, उसका अनुसरण करने के मानव-निर्मित और गलत मार्ग को अपना लेते हैं। जब इस प्रकार के व्यक्ति का सामना किसी परीक्षण से होता है, तो उन्हें इसका पता ही नहीं होता; वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के प्रति सुन्न होते हैं। वे नहीं जानते कि परमेश्वर को अपना हृदय देना क्या होता है, या किसी परीक्षण के दौरान दृढ़ता से खड़ा रहना क्या होता है। परमेश्वर ऐसे लोगों को सीमित समय देगा, और इस दौरान, वह उन्हें समझने देगा कि उसके परीक्षण और इरादे क्या हैं। बाद में, इन लोगों को अपना दृष्टिकोण प्रदर्शित करना होता है। जो लोग इस चरण में हैं, उनकी परमेश्वर अभी भी प्रतीक्षा कर रहा है। जहाँ तक उनकी बात है जिनके कुछ दृष्टिकोण तो हैं फिर भी डगमगाते रहते हैं, जो अपना हृदय परमेश्वर को देना तो चाहते हैं किन्तु ऐसा करने के लिए सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाए हैं, जो कुछ मूल सत्यों को अभ्यास में लाने के बावजूद, किसी बड़े परीक्षण से सामना होने पर, छुपना और हार मान लेना चाहते हैं—उन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर अभी भी ऐसे लोगों से थोड़ी-बहुत अपेक्षा रखता है। परिणाम उनके दृष्टिकोण एवं प्रदर्शन पर निर्भर करता है। यदि लोग प्रगति करने के लिए सक्रिय नहीं होते तो परमेश्वर क्या करता है? वह उनसे आशा रखना छोड़ देता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के तुमसे आशा छोड़ने से पहले ही तुमने स्वयं से आशा छोड़ दी है। इस प्रकार, ऐसा करने के लिए तुम परमेश्वर को दोष नहीं दे सकते, है न? क्या यह उचित है? (हाँ, उचित है।)

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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